साझी जिम्मेदारी से ही बनेंगे रहने योग्य शहर

Afeias
04 Aug 2026
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हाल ही में बॉम्बे उच्च न्यायालय ने एक कड़वी लेकिन आवश्यक सच्चाई सामने रखी है। इस सप्ताह न्यायालय ने कहा कि शहरी बाढ़ केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि नागरिक विफलता भी है।

हर मानसून में भारत के शहर एक जैसी तस्वीर पेश करते हैं। दिल्ली की सड़कें पानी में डूब जाती हैं, मुंबई की रफ्तार थम जाती है, यात्री घंटों फँसे रहते हैं और कई मोहल्ले झीलों में बदल जाते हैं। इसके लिए निश्चित रूप से नगर निकायों को खराब शहरी नियोजन, अपर्याप्त जल निकासी व्यवस्था और जर्जर बुनियादी ढाँचे के लिए जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए।

लेकिन न्यायालय की टिप्पणी एक असहज सत्य भी उजागर करती है कि शहरों की बदहाल स्थिति केवल सरकार की विफलता नहीं, बल्कि नागरिकों की सामूहिक उदासीनता का भी परिणाम है।

महत्वपूर्ण आँकड़े –

  • भारत की लगभग 36% आबादी शहरों में रहती है। 2036 तक इसके लगभग 43% होने का अनुमान है।
  • नीति आयोग के अनुसार भारत में तेजी से बढ़ता शहरीकरण बुनियादी ढाँचे पर भारी दबाव डाल रहा है।
  • आईपीसीसी (IPCC) के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण अत्यधिक वर्षा की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ रही है।
  • केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के अनुसार भारत प्रतिदिन 1.6 लाख टन से अधिक ठोस कचरा उत्पन्न करता है, जिसका बड़ा भाग वैज्ञानिक ढंग से प्रबंधित नहीं होता। यही कचरा नालियों के जाम होने का प्रमुख कारण बनता है।
  • भारत के अधिकांश महानगरों में वर्षा जल निकासी की क्षमता वर्तमान वर्षा की तीव्रता के अनुरूप नहीं है।

समस्या के प्रमुख कारण –

  • अनियोजित एवं अवैज्ञानिक शहरीकरण।
  • झीलों, तालाबों और आर्द्रभूमियों पर अतिक्रमण।
  • नालियों में ठोस कचरा और प्लास्टिक का जमाव।
  • जल निकासी तंत्र का नियमित रखरखाव न होना।
  • जलवायु परिवर्तन के कारण अत्यधिक वर्षा।
  • नगर निकायों की सीमित वित्तीय एवं तकनीकी क्षमता, तथा
  • नागरिकों में सार्वजनिक संपत्ति के प्रति उत्तरदायित्व का अभाव।

सरकार द्वारा उठाए गए कदम –

  • स्मार्ट सिटीज मिशन।
  • अमृत (AMRUT) मिशन।
  • स्वच्छ भारत मिशन।
  • 15वें वित्त आयोग द्वारा शहरी स्थानीय निकायों को अनुदान।
  • राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) द्वारा शहरी बाढ़ संबंधी दिशा-निर्देश, तथा
  • जल शक्ति अभियान एवं वर्षा जल संचयन को बढ़ावा।

आगे की राह –

  • स्पंज सिटी (Sponge City) मॉडल अपनाना।
  • झीलों, नालों और आर्द्रभूमियों का संरक्षण।
  • भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS) आधारित शहरी नियोजन।
  • ठोस कचरा प्रबंधन को प्रभावी बनाना।
  • नगर निकायों की वित्तीय और तकनीकी क्षमता बढ़ाना, तथा
  • नागरिक भागीदारी, सामाजिक जागरूकता और स्थानीय निगरानी को संस्थागत रूप देना।

नागरिक जिम्मेदारी छोटे-छोटे कार्यों से शुरू होती है —

  • कचरे का सही निपटान।
  • अवैध अतिक्रमण की सूचना देना।
  • जहाँ संभव हो, वहाँ स्थानीय स्तर पर जल निकासी में बाधा दूर करना।
  • सार्वजनिक संपत्ति को अपनी साझा संपत्ति समझना, तथा
  • जलवायु-लचीला (Climate Resilient) शहरी बुनियादी ढाँचा विकसित करना।

स्मार्ट सिटी का वास्तविक आधार आधुनिक तकनीक नहीं, बल्कि उत्तरदायी शासन, टिकाऊ शहरी नियोजन और जागरूक नागरिक हैं। जलवायु परिवर्तन के दौर में शहरी बाढ़ से निपटने के लिए सरकार और समाज; दोनों की साझी जिम्मेदारी आवश्यक है।

द इकोनॉमिक टाइम्समें प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। (10/07/26)