क्या भारत की पश्चिम एशिया नीति को नया मोड़ चाहिए?
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अमेरिका-ईरान शांति-वार्ता का नतीजा चाहे जो भी हो, तीन महीने तक चलने वाले इस खूनी संघर्ष ने भारत को अपनी पश्चिम एशिया नीति की समीक्षा का मौका दिया है। यह इसलिए जरूरी है, क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा आपूर्ति के लिए 80% से ज्यादा इसी क्षेत्र पर निर्भर है। दूसरे, इस क्षेत्र में 90 लाख से अधिक भारतीय काम करते हैं। ये कुल मिलाकर हर वर्ष 51 अरब डॉलर भेजते हैं।
कुछ बिंदु –
- इस क्षेत्र में संघर्ष की आशंका व बदलते गणबंधनों को देखते हुए भारत की सभी सरकारों ने क्षेत्रीय प्रतिद्वंदिता से समान दूरी बनाए रखी है।
- भारत की मौजूदा पश्चिम एशिया नीति ‘मल्टी अलाइनमेंट’ या बहु-संरेखण की नीति है। यह प्रमुख देशों के साथ संतुलन बनाने और इनमें से किसी के भी प्रति दुश्मनी से बचने की नीति है।
- इस नीति पर चलते हुए भारत प्रमुख खाड़ी देशों के साथ द्विपक्षीय संबंधों को केवल लेन-देन वाले रिश्तों से व्यापक रणनीतिक साझेदारी में बदलने और क्षेत्रीय विविधता के अनुरूप हर देश के साथ अलग दृष्टिकोण बनाकर चल रहा है। जैसे-यूएई आज हमारा तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है।
- वर्तमान संघर्ष ने भारत को अपनी ऊर्जा आपूर्ति के स्रोतों में विविधता लाने को मजबूर कर दिया है। भारत को खाड़ी के अपने मित्र देशों, खासकर यूएई और ओमान के साथ मिलकर समुद्र के नीचे से वैल्पिक ऊर्जा पाइपलाइन बिछाने की गंभीर कोशिश करनी चाहिए। ताकि इससे होर्मुज जलडमरूमध्य पर अत्यधिक निर्भरता न रहे और ऊर्जा की निर्बाध आपूर्ति होती रहे।
(समाचार पत्र पर आधारित-24/06/2026)