भारत की लक्षित ऊर्जा योजनाओं पर संभावित संकट
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हाल ही में ज्यूरिख इंश्योरेंस समूह का एक विश्लेषण आया है। इस अध्ययन में यह दावा किया गया है कि भारत के सुनियोजित नवकरणीय ऊर्जा बुनियादी ढांचे के बड़े हिस्से पर जलवायु संकट का खतरा मंडरा रहा है। इस अध्ययन के अनुसार –
- दशक केअंत तक लगभग 55 अरब डॉलर की भौतिक संपत्तियों को नुकसान हो सकता है।
- 10 भारतीय राज्यों में प्रस्तावित सौर, पवन और जलविद्युत क्षमता का लगभग 239 गीगावाट बवंडर, जंगल की आग और बाढ़ जैसी मौसम संबंधी घटनाओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है।
- सौर परियोजनाएं सबसे अधिक जोखिम में हैं। 871 संपत्तियों में से 70% पर खतरा मंडरा रहा है। राजस्थान और गुजरात के सौर गलियारों में बड़ा खतरा हो सकता है।
- इसी तरह, शुष्क क्षेत्रों में, लंबे समय तक चलने वाला सूखा, मॉड्यूल्स पर धूल की परत जमाकर समस्याओं को और बढ़ा देता है। इससे बिजली उत्पादन या महंगी सफाई प्रक्रियाओं में से किसी को चुनना पड़ता है।
2035 तक भारत का बड़ा लक्ष्य –
भारत ने 2035 तक गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से बिजली उत्पादन क्षमता की हिस्सेदारी को बढ़ाकर 60% करने का लक्ष्य रखा है। इस दिशा में प्रगति भी हो रही है। अध्ययन में बताई गई चुनौतियों को देखते हुए केवल अधिक मात्रा में सोलर पैनल या पवन चक्की जोड़ना ही काफी नहीं होगा।
अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि डिजाइन और निर्माण के शुरुआती चरणों में लक्षित जलवायु लचीलेपन के उपायों के लिए पूंजीगत व्यय का केवल 2% भी लगा देने से संभावित नुकसान 55 अरब डॉलर से घटाकर 27 अरब डॉलर तक लाया जा सकता है।
इंश्योरेंस समूह की चेतावनी पर ध्यान तो दिया ही जाना चाहिए। सरकार चाहे तो अपने विश्वसनीय समूहों से इस संभावित हानि का पुनर्विश्लेषण करवा सकती है। उसके परिणामों के आधार पर ही आगे की योजनाओं का खाका तैयार किया जाना चाहिए।
(समाचार पत्र व अन्य डिजिटल माध्यमों पर आधारित-26/06/2026)