घटती प्रजनन दर एक सामाजिक संकट नहीं, बल्कि एक सचेत विकल्प
To Download Click Here.

दुनिया के कई देशों में सरकारें, धार्मिक संस्थाएं और उद्योगपति लगातार अधिक बच्चे पैदा करने की अपील कर रहे हैं। उनका तर्क है कि घटती आबादी से आर्थिक विकास, श्रमशक्ति और सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था पर संकट आएगा। लेकिन वास्तविकता यह है कि महिलाएं और पुरुष अब परिवार नियोजन को अपने जीवन, करियर और व्यक्तिगत आकांक्षाओं के आधार पर तय कर रहे हैं। इसलिए कम प्रजनन दर (Low Fertility Rate) केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन का भी परिणाम है।
वैश्विक स्थिति
संयुक्त राष्ट्र (UN World Population Prospects 2024) के अनुसार –
- दुनिया की औसत प्रजनन दर 1950 में 5 बच्चे प्रति महिला थी।
- 2024 में यह घटकर लगभग 2.2 बच्चे प्रति महिला रह गई है।
- 1 की प्रजनन दर को “Replacement Level Fertility” माना जाता है, यानी इतनी दर पर आबादी स्थिर रहती है।
- अनुमान है कि 2100 तक वैश्विक प्रजनन दर 1.8 तक पहुंच सकती है।
विभिन्न देशों की प्रजनन दर (लगभग)
देश प्रजनन दर
दक्षिण कोरिया 0.75
जापान 1.20
इटली 1.21
चीन 1.01
जर्मनी 1.46
भारत 1.9
सरकारों के प्रयास –
कई देशों ने जन्मदर बढ़ाने के लिए अरबों डॉलर खर्च किए हैं।
लोग बच्चे क्यों नहीं चाहते?
- आर्थिक दबाव
OECD देशों में एक बच्चे के पालन-पोषण पर लाखों डॉलर तक खर्च हो जाता है। शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास की बढ़ती लागत बड़ी चिंता है।
- करियर और व्यक्तिगत आकांक्षाएं
विशेषकर महिलाओं की शिक्षा और रोजगार में बढ़ती भागीदारी ने विवाह और मातृत्व की आयु बढ़ा दी है।
- जलवायु परिवर्तन
स्वीडन और अन्य यूरोपीय देशों के सर्वेक्षणों में युवाओं ने कहा कि वे बच्चों के भविष्य को लेकर जलवायु संकट से चिंतित हैं।
जीवनशैली में बदलाव
आज कई लोग मानते हैं कि जीवन का उद्देश्य केवल माता-पिता बनना नहीं है। यात्रा, करियर, रचनात्मकता और व्यक्तिगत विकास भी जीवन के महत्वपूर्ण लक्ष्य हैं।
क्या पैसा समस्या का समाधान है?
जनसांख्यिकी विशेषज्ञों का निष्कर्ष है कि केवल आर्थिक प्रोत्साहन जन्मदर नहीं बढ़ा सकते।
OECD के अध्ययन बताते हैं कि जहां पुरुष घरेलू काम और बच्चों की देखभाल में बराबर भागीदारी करते हैं, वहां प्रजनन दर अपेक्षाकृत बेहतर रहती है। इसका अर्थ है कि लैंगिक समानता (Gender Equality) जन्मदर को सकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकती है।
भारत के लिए क्या सबक?
भारत अभी “जनसांख्यिकीय लाभांश” (Demographic Dividend) के दौर में है। लेकिन भविष्य में वृद्ध आबादी बढ़ेगी। इसलिए नीतियों का उद्देश्य केवल अधिक बच्चे पैदा कराना नहीं होना चाहिए, बल्कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं, महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी, सस्ती चाइल्डकेयर सुविधाएं, लचीली कार्य व्यवस्था, तथा लैंगिक समानता पर ध्यान देना अधिक आवश्यक है।
निष्कर्ष –
घटती प्रजनन दर को केवल संकट के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह महिलाओं और पुरुषों द्वारा अपने जीवन, आर्थिक स्थिति और भविष्य को ध्यान में रखकर लिया गया एक सोचा-समझा निर्णय है।
यदि समाज और सरकारें वास्तव में जन्मदर बढ़ाना चाहती हैं, तो उन्हें केवल आर्थिक प्रोत्साहन देने के बजाय ऐसा वातावरण बनाना होगा जहां माता-पिता बनने की जिम्मेदारी समान रूप से साझा हो, बच्चों का पालन-पोषण सुलभ हो और व्यक्तिगत आकांक्षाओं का सम्मान किया जाए।
यही कारण है कि आज का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि “लोग अधिक बच्चे क्यों नहीं पैदा कर रहे हैं?”, बल्कि यह है कि “क्या समाज ऐसी परिस्थितियां बना रहा है, जिनमें लोग स्वेच्छा से माता-पिता बनना चाहें?”
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया‘ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। (15/06/26)