06-07-2026 (Important News Clippings)
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Democracy Demands Space for Dissent
ET Editorials
The Bombay High Court deserves the nation’s gratitude for reminding Mumbai Police that organising or participating in peaceful protests against the government is not tantamount to waging war against the country. Setting aside the one-year externment order against Saeed Ahmad Abdul Wahid Chaudhary, general secretary of Socialist Democratic Party of India, Justice Madhav J Jamdar rightly criticised the police for attempting to turn citizens into ‘slaves of the government’.
Criticism of the government and its policies is neither anti-India nor anti-government. It is the exercise of a fundamental constitutional right. In a democracy, citizens are entitled to question those in power, however uncomfortable that scrutiny may be. While this right is not absolute, the threshold for curtailing it must remain exceptionally high. The state cannot deny fundamental freedoms on suspicion, inconvenience or political disagreement. Restrictions demand clear, compelling evidence that speech or protest has incited violence or posed a genuine threat to public order.
The police are duty-bound to protect both public order and constitutional liberties. Their responsibility is not to shield governments from criticism but to ensure that competing viewpoints can be expressed without fear. The state must not put its thumb on the scales of public debate. Its role is to safeguard an environment in which free expression, dissent and peaceful assembly can flourish. India prides itself on being a vibrant democracy and an open society. That reputation rests not on the absence of criticism but on its willingness to tolerate and engage with it. Treating dissent as disloyalty weakens the Republic, protecting it strengthens both the nation and the bond between citizens and the Constitution.
Two together
India and Japan did well to ring-fence their ties from multilateral accords
Editorial
Japanese Prime Minister Sanae Takaichi’s first official visit to India turned out to be an occasion to signal enhanced bilateral coordination in the face of global uncertainties. Rapid changes in geopolitics and technological advances are forcing all countries into fresh thinking, most consequentially with regard to China. The U.S. appears less enthusiastic about the Quad grouping (with India, Japan, and Australia) and is unsure of the nomenclature “Indo-Pacific” in its strategy. Against this backdrop, India and Japan declared a joint intent to continue with an ‘updated’ Free and Open Indo-Pacific (FOIP) posture, ring-fencing bilateral ties from multilateral arrangements. Ms. Takaichi signed at least 16 agreements and documents, including a joint statement on energy resilience to support bilateral cooperation along the ‘maritime energy transport value chain’. The commitments to energy cooperation were supported by the awareness that to play lead roles in the FOIP, the two sides should cooperate in the energy domain from South Asia to the Indo-Pacific. This concern was also linked with the problems both sides faced regarding the safety of energy-carrying ships and sailors during the U.S.-Israel war against Iran. The two major Asian economies have a shared interest in ensuring that the nearest energy sources in the Gulf remain accessible. They have agreed to build naval platforms to enhance maritime domain awareness and surveillance.
A joint statement issued during the visit mentioned “serious concerns” about the prevailing situation in the South China and East China Seas, and Japanese officials spoke to the media frankly about the need to address the Taiwan issue peacefully. Though a planned visit to Guwahati was dropped, Ms. Takaichi underscored Japan’s attention to the northeastern regions of India by connecting them with “relevant partners and regional organisations” of the Bay of Bengal region. BIMSTEC was mentioned as a partner organisation for Japan. Japan has major investments in Bangladesh and Thailand, and connecting these projects, including the Matarbari port in Cox’s Bazar, through an ‘industrial value chain’ with India’s northeast can boost regional prosperity and security. Ms. Takaichi has painted a vast canvas of cooperation stretching from India’s neighbourhood to the Pacific Ocean to protect the India-Japan relationship from the uncertainties of the current world order, but both sides have to manage multiple other relations effectively to ensure optimal outcomes. They have to manage their relations with China and the U.S. in such a manner that their strategic interests are protected and conflicts avoided. It can be a path of mutual learning and cooperation for India and Japan as they seek to navigate the global turbulence.
भरोसे की बहाली हो
संपादकीय
श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की बैठक में केवल महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी अनिल कुमार मिश्र के त्यागपत्र पर ही नहीं निर्णय होना चाहिए। इसी के साथ ट्रस्ट को कुछ ऐसे ठोस फैसले भी लेने चाहिए, जिनसे संदेह के बादल छंटे और लोगों को भरोसा हो कि भविष्य में मंदिर के चढ़ावे की देखरेख और हिसाब-किताब समुचित तरीके से होगा। ऐसे फैसले लेना इसलिए आवश्यक है, क्योंकि चढ़ावा चोरी के प्रकरण ने हिंदू समाज की भावनाओं को बुरी तरह आहत किया है। उसकी आस्था और विश्वास को गहरी चोट पहुंची है। इसकी क्षतिपूर्ति के लिए ट्रस्ट को कठोर से कठोर फैसले लेने में हिचकिचाहट का परिचय नहीं देना चाहिए। यदि आवश्यक समझा जाए तो ट्रस्ट को भंग कर उसके नए सिरे से गठन की पहल भी की जानी चाहिए। ट्रस्ट के पदाधिकारियों को यह आभास होना चाहिए कि इतने बड़े मामले में उन्होंने अपेक्षित गंभीरता, संवेदनशीलता और तत्परता का परिचय नहीं दिया। समझना कठिन है कि चढ़ावा चोरी का मामला सामने आने पर बिना किसी छानबीन के उससे इन्कार क्यों किया गया? इसी तरह तत्काल प्रभाव से उच्चस्तरीय जांच की कोई ठोस पहल क्यों नहीं की गई? वास्तव में ऐसे एक नहीं अनेक सवाल हैं, जो ट्रस्ट के पदाधिकारियों और उनकी कार्यशैली को कठघरे में खड़ा करते हैं। महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी अनिल कुमार मिश्र के त्यागपत्र पर फैसला लेने में भी एक तरह से देरी ही की गई। आखिर इन दोनों लोगों की ओर से त्यागपत्र दिए जाने के बाद यथाशीघ्र बैठक क्यों नहीं बुलाई गई?
यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि ट्रस्ट के कुछ पदाधिकारियों ने आवश्यकता से अधिक अधिकार हासिल कर रखे थे और सब कुछ अपने ही हिसाब से कर रहे थे। इसी तरह ऐसे किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के भी पर्याप्त कारण हैं कि ट्रस्ट के सभी पदाधिकारी समान रूप से सक्रिय नहीं थे और कुछ ने किन्हीं कारणों से स्वयं को निष्क्रिय अथवा अलग-थलग कर रखा था। इससे संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि चढ़ावा चोरी के मामले की छानबीन विशेष जांच दल की ओर से की जा रही है, क्योंकि तरह-तरह के आरोप लगातार सामने आ रहे हैं। इन आरोपों से ट्रस्ट की छवि धूमिल हो रही है। चूंकि चढ़ावा चोरी के प्रकरण ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया है, इसलिए राष्ट्रीय स्वयंवेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद और भाजपा के साथ-साथ केंद्र एवं राज्य सरकार को भी यह देखना होगा कि इस मामले में वास्तव में दूध का दूध और पानी का पानी हो। आवश्यकता केवल इसकी नहीं है कि भक्तों के दान की राशि का हिसाब-किताब सही तरह से हो, बल्कि ऐसी कोई व्यवस्था बनाने की भी है कि दान राशि का उपयोग किन कार्यों में किया जाएगा?
साइबर संजाल
संपादकीय
इंटरनेट की दुनिया में अनेक स्तर पर लोगों के ठगी का शिकार होने से लेकर ‘डिजिटल अरेस्ट’ और अन्य गंभीर अपराधों के फैलते जाल ने वैश्विक स्तर पर एक जटिल चुनौती पेश की है। इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि जो तकनीक लोगों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने, उनकी समझ का विस्तार करने के काम में आनी चाहिए थी, वह अब कुंठित और आपराधिक मानसिकता के लोगों के लिए एक कारगर औजार बन रही है। ताजा विवाद सोशल मीडिया के एक लोकप्रिय मंच ‘इंस्टाग्राम’ से जुड़ा है, जिस पर पैसे लेकर ऐसे विज्ञापन दिखाने का आरोप है, जिसके जरिए बच्चे- बच्चियों के यौन शोषण की सामग्री का प्रसार हो रहा है। यही नहीं, उपयोगकर्ताओं को बच्चों के यौन शोषण के वीडियो मामूली खर्च पर खरीदने के लिए आनलाइन संपर्क भी दिए जा रहे हैं। सवाल है कि अगर इस तरह की आपराधिक गतिविधियां व्यापक पहुंच रखने वाले एक लोकप्रिय सोशल मीडिया मंच पर चलाई जा रही हैं, तो इसके पीछे कौन लोग हैं और उन्हें बिना बाधा के यह सब करने की छूट और सुविधा कौन मुहैया करा रहा है। क्या ‘इंस्टाग्राम’ और उसकी संचालक कंपनी ‘मेटा’ की इसके लिए सीधी जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह अपने मंच पर आपराधिक हरकतों को फलने-फूलने की जगह दे रही है?
यह बेवजह नहीं है कि सरकार ने बाल यौन शोषण से जुड़ी सामग्री को बढ़ावा देने वाले इंस्टाग्राम विज्ञापनों के मामले में मेटा को तलब करने का निर्देश दिया है। हाल ही में सरकार ने मेटा के ही स्वामित्व वाले वाट्सऐप को उसकी नई उपयोगकर्ता सुविधा के मामले में नोटिस भेजा था, जिसमें नाम छिपा कर बात करने की छूट दी गई है। कहने को सोशल मीडिया के मंचों के अपने नियम-कायदे या दिशानिर्देश होते हैं, जिनके तहत वे आपत्तिजनक सामग्री को हटा देते हैं। मगर ऐसा लगता है कि आपत्तिजनक सामग्री’ की परिभाषा ये कंपनियां अपनी सुविधा और एजेंडे के मुताबिक तय करती हैं। वरना सामाजिक और कानूनी तौर पर भी अपराध के दायरे में मानी जाने वाली अश्लील और बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री के खिलाफ सख्ती और उन पर पूरी तरह रोक लगाने को लेकर वे उदासीन क्यों रहती है? ऐसे में यह क्यों नहीं माना जाए कि वे आपत्तिजनक सामग्री को प्रसारित करने के जरिए सिर्फ अपनी कमाई सुनिश्चित करती है और प्रकारांतर से वे भी ऐसी हरकतों की भागीदार होती हैं ?
यह ध्यान रखने की जरूरत है कि इंस्टाग्राम पर विज्ञापन तभी जारी होते हैं, जब उसके मातहत काम करने वाले तंत्र की बेहद आधुनिक तकनीक उसे सही बताती है। ऐसे में जिस डिजिटल संसार में तेजी से साइबर अपराध का दायरा फैलता जा रहा है, उसमें आपराधिक हरकतों पर रोक लगाने के प्रति उदासीनता बरतने को कैसे देखा जाएगा ? कोई भी तकनीक अपने आप में एक निरपेक्ष साधन है। समस्या तब आती है, जब इसके सकारात्मक और जनहित में उपयोग के बजाय न केवल बेजा इस्तेमाल की कोशिश की जाती है, बल्कि इसे आपराधिक हरकतों का भी जरिया बनाया जाने लगता है। इंटरनेट की दुनिया ने इंसानी समाज के लिए बहुस्तरीय सुविधाएं मुहैया कराई हैं और इसकी उपयोगिता को देखते हुए ही इसका दायरा फैल रहा है। मगर इसके समांतर डिजिटल संसाधनों का ही सहारा लेकर ऐसी कई गतिविधियां संचालित की जा रही हैं या फिर लोग निजी स्तर पर भी उसका दुरुपयोग करने लगे हैं, जो अब व्यापक चिंता का कारण बन रही हैं।
Date: 06-07-26
साख पर सवाल
संपादकीय
यह बात सच है कि भारत में खेल प्रतिभाओं की कमी नहीं है। देश में कई ऐसे खिलाड़ी उभरकर सामने आए हैं, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन किया है। हालांकि, इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि कौशल विकास की कमी और पर्याप्त अवसर एवं बुनियादी सुविधाओं का अभाव आज भी बना हुआ है। इस बीच, एक और गंभीर समस्या की जकड़बंदी का दायरा इतना बड़ा हो गया है कि भारतीय खेलों की साख पर ही सवाल खड़े हो गए हैं। यह समस्या डोपिंग नियमों का पूरी तरह पालन नहीं करने से जुड़ी है। यही वजह है कि ‘एथलेटिक्स इंटीग्रिटी यूनिट की ओर से हाल ही में जारी की गई डोपिंग उल्लंघन करने वालों की वैश्विक सूची में भारत को फिर से शीर्ष स्थान पर रखा गया है। ऐसे में अहम सवाल यह है कि क्या देश में डोपिंग रोधी नियमों की गंभीरता को समझने में लापरवाही बरती जा रही है या फिर इसकी वजह कुछ और है। यहां प्रश्न सिर्फ खिलाड़ियों पर ही नहीं, बल्कि सरकार, प्रशासक और प्रशिक्षकों की कुशलता, सतर्कता एवं संवेदनशीलता पर भी है।
गौरतलब है कि पिछले दो वर्षों से डोपिंग उल्लंघन करने वालों की सूची में सबसे ऊपर रहने के कारण विश्व एथलेटिक्स ने बीते अप्रैल में भारत को डोपिंग के ‘बहुत अधिक’ जोखिम वाले देश के रूप में भी चिह्नित किया था । इसकी गंभीरता को देखते हुए हालांकि सरकार की ओर से डोपिंग रोधी कार्यक्रम शुरू किए गए हैं, लेकिन इनकी गुणवत्ता जोखिमों के अनुपात में कहीं कम नजर आती है। यह सही है कि नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर संबंधित खिलाड़ी को ही दोषी माना जाता है, लेकिन इससे प्रशासकों या खेल संघों की जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती है। अगर कोई खिलाड़ी अनजाने में ऐसी दवा या खाद्य एवं पेय पदार्थ लेता है, जो नियमों के विरुद्ध है, तो इसके लिए जवाबदेही पूरे खेल तंत्र की बनती है। नियमों की पर्याप्त जानकारी देकर खिलाड़ियों को सतर्क एवं जागरूक करना और नियमित निगरानी की जिम्मेदारी प्रशासकों तथा प्रशिक्षकों की ही होती है। ऐसे में जरूरी है कि ‘डोप मुक्त भारत’ बनाने के लिए प्रतिक्रियात्मक प्रवर्तन से आगे बढ़कर एक परिवर्तनकारी बदलाव की ओर कदम बढ़ाया जाए।
विदा तीजन बाई
संपादकीय
भारतीय लोक संस्कृति की एक मुखरतम कलाकार तीजन बाई की विदाई अपूरणीय क्षति है। लोक नाट्य की मनमोहक शैली पंडवानी ने अपना एक ऐसा रत्न खो दिया है, जिसकी ख्याति अपने देश में ही नहीं, पूरी कला दुनिया में थी। केवल छत्तीसगढ़ ही नहीं, भारत की भी अपनी एक पहचान खो गई है। एक कलाकार के रूप में जो सम्मान तीजन बाई को प्राप्त हुआ, वह अपने आप में एक इतिहास है। कला क्षेत्र के हरसंभव पुरस्कार उन्हें मिले थे। पद्मश्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण के बाद केवल भारत रत्न जैसा विरल सम्मान ही उनके लिए शेष रह गया था। वह सदा प्रेरणा रहेंगी। भारत में जब भी कोई लोक कलाकार निराश होगा, तो उसके लिए तीजन बाई को याद कर लेना पर्याप्त होगा। जो संघर्ष तीजन बाई ने किया था, उसे सदैव याद रखने की जरूरत है। अनुसूचित जनजाति समाज से आने वाली तीजन बाई को पीछे रखने के लिए न जाने कितने रोड़े बिछाए गए। जितने रोड़े दुनिया ने बिछाए, उतने ही रोड़े स्वयं उनके समाज ने बिछाए। मात्र 12 की उम्र में विवाह कर दिया गया। वह जनजाति से बेदखल हो गईं। घर-परिवार छूट गया, पर पंडवानी को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हुईं।
भारतीय लोक कला में पंडवानी का स्थान अनूठा है। यह संवाद, गीत-संगीत, नृत्य, अभिनय और हर्ष ध्वनियों से सजा लोक नाट्य है। पंडवानी में पांडवों की गाथा अर्थात महाभारत की रोचक-नाटकीय कथाओं का प्रदर्शन-गायन होता है। ध्यान रहे, तीजन बाई की लोकप्रियता से पहले झाड़ूराम देवांगन का नाम पंडवानी का पर्याय था। देवांगन मंच पर बैठकर या चौकड़ी मारकर या घुटने के बल होकर गाते थे। पंडवानी की इस वेदमती शैली से अलग तीजन बाई ने कापालिक शैली को अपनाया। तीजन बाई की आवाज में बहुत दम था, वह कथा सुनाते-सुनाते पूरे उत्साह में आ जाती थीं। वध दुशासन का हो या कीचक का, बैठकर सुनाना उन्हें मंजूर नहीं था। वह खड़े होकर और झूम-झूमकर सुनाती थीं और कथा के भाव के साथ पूरा न्याय करती थीं। हाथ में तंबूरा लिए तीजन बाई स्वयं किसी महाभारत के योद्धा से कम नहीं लगती थीं। खूब जतन से सजाया गया तंबूरा कभी गदा हो जाता, तो कभी धनुष, तो कभी द्रौपदी के लंबे केश, कभी आकाश, तो कभी जमीन, तो कभी भगवान कृष्ण का पालना या पालकी। कोई आश्चर्य नहीं, झाड़ूराम देवांगन ने पंडवानी को जहां तक पहुंचाया, वहां से इस विधा को बहुत दूर और ऊंचाई तक ले गईं तीजन बाई।
आज पंडवानी के कलाकार तो बहुत हैं, पर तीजन बाई जैसा कोई नहीं है। आज मोबाइल और रील वाले कलाकार तो बहुत बन रहे हैं, पर सच्चे लोक कलाकारों का टोटा होने लगा है। तीजन बाई अपने पीछे शून्य छोड़ गई हैं। लोकभाषा छत्तीसगढ़ी का समाज उन्हें हर उत्सव-आयोजन में खोजेगा। अब दुनिया में छत्तीसगढ़ और महाभारत से निकली कला पंडवानी का प्रतिनिधित्व कौन करेगा? उनकी उम्र ज्यादा नहीं थी, पर बीते दस वर्ष से उनका शरीर साथ नहीं दे रहा था। ध्यान देने की बात है कि तीजन बाई ने अपनी शैली और ख्याति से छत्तीसगढ़ के पारंपरिक संगीत को भी नवजीवन दिया। याद कीजिए, भारत के सुविख्यात नाटककार-अभिनेता हबीब तनवीर के नाटकों पर तीजन बाई का असर साफ दिखता था। मंच पर तंबूरा लिए तीजन बाई की वह भीम गर्जना और उसके साथ तबला, ढोलक, झाल, मंजीरे की मनोरंजक संगत अविस्मरणीय है। समग्रता में उनकी विरासत एक प्रकाश स्तंभ है, जो इस देश के कलाकारों को राह दिखाती रहेगी।