16-05-2026 (Important News Clippings)

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16 May 2026
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Date: 16-05-26

Make Destination Holidays Truly Count

Diversify India’s tourism product portfolio

ET Editorial

Indians have historically exported a part of their savings through gold purchases. A much more recent trend is exporting consumption through foreign holidays. Indians last year spent serious moolah on foreign travel, a big chunk of it on leisure. To tighten belts in these trying times, GoI is trying moral persuasion to discourage it. But curbing holidays overseas for well-heeled Indians is trickier than getting the less affluent to pull back on buying gold. The price of gold works as a deterrent. Over and above this, GoI can raise import duties, as it has done this week. International tourism is another matter. It’s not as price-sensitive and it’s difficult to design tax measures that do not hurt business travel as well in the process.

But here’s the funny thing. Indians may be the fastest-growing segment of international travellers. But they overwhelmingly holiday at home. This exerts an even big-ger pressure on the rupee through energy imports. Growth in domestic tourism is riding on rapidly growing aviation and highway infra, which is being shielded by incomplete transmission of fuel prices to consumers. GoI could try moral persuasion here, too. But a better alternative exists in raising fuel costs. The longer fuel prices are kept artificially depressed, the greater is the eventual impact on local tourism. Since effects of a tourism downturn diverge across states, it’s felt more acutely among vulnerable economic groups.

An energy crisis tends to show up structural faults in India’s tourism industry. Over-dependence on religious tourism makes demand less price-elastic, magnifying effects of a crash in destinations of secular interest. The country needs to diversify its tourism product portfolio for resilience against business cycles as well as sustainability. Given the employment potential of tourism and hospitality sectors, more cooperative federalism is called for to develop infrastructure and skills. India needs to prioritise its domestic tourism potential to counteract outflow from international travel.


Date: 16-05-26

चीन ने कूटनीतिक कौशल दिखाया पर संकेत चिंतनीय

संपादकीय

शी जिनपिंग ने राजकीय शिखर सम्मलेन में सैकड़ों कैमरों के सामने अमेरिका को जो चेतावनी दी, उसे पश्चिमी मीडिया ने या तो जानबूझकर या अज्ञानता में नजरअंदाज किया। अमेरिकी राष्ट्रपति की मौजूदगी में दी गई इस चेतावनी को दुनिया के कूटनीतिज्ञ सबसे गम्भीर मान रहे हैं। शी ने ट्रम्प के समक्ष ‘धूसीडायसिस ट्रैप’ का जिक्र किया। हार्वर्ड प्रोफेसर एलिसन के अनुसार इस ट्रैप में युद्ध अनिवार्य हो जाता है (पिछले 500 वर्षों के 16 अहम युद्धों में से 12 इसी के कारण हुए)। ट्रैप का सिद्धांत कहता है कि कोई स्थापित शक्ति जब किसी नई शक्ति को अपने लिए चुनौती मान लेती है तो युद्ध अपरिहार्य हो जाता है। शी का स्पष्ट संदेश था कि अगर ताइवान का मुद्दा अपेक्षित तरीके से नहीं लिया गया तो युद्ध होगा । कूटनीतिज्ञ मान रहे हैं कि ट्रेड में कुछ समझौते हासिल कर ट्रम्प दुनिया और अमेरिका को अपनी जीत का संदेश तो देंगे, लेकिन अमेरिका को अपने वर्तमान तेवरों को फिर से जांचना होगा। भारत के लिए भी चीन की चेतावनी चिंता का विषय है, क्योंकि ताइवान पर उसका भी नजरिया अलग है। चीन ने अपने पर लगी आक्रामक पुनरीक्षणवादी देश की छवि से निकलते हुए अमेरिका पर अति प्रतिक्रियावादी देश की छवि आरोपित कर दी है। दो-दिवसीय शिखर सम्मेलन में शी जिनपिंग ने ट्रम्प की तुलना में ज्यादा कूटनीतिक बुद्धिमानी का परिचय दिया।


Date: 16-05-26

मंदिर ही है भोजशाला

संपादकीय

मध्य प्रदेश के धार में भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद मामले में इंदौर हाई कोर्ट के इस निर्णय पर आश्चर्य नहीं कि भोजशाला परिसर एक हिंदू मंदिर ही था। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग यानी एएसआइ के उस आदेश को रद कर दिया, जिसमें निर्देशित किया गया था कि भोजशाला परिसर में शुक्रवार को नमाज पढ़ी जाएगी और मंगलवार को पूजा होगी।

हाई कोर्ट ने मुस्लिम समाज से सरकार से मस्जिद के लिए अलग से जमीन की मांग करने को कहा है। यह फैसला अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले का स्मरण कराने वाला है। इंदौर हाई कोर्ट के फैसले पर इसलिए किसी को चकित नहीं होना चाहिए, क्योंकि यह किसी से छिपा नहीं कि परमार राजवंश के राजा भोज के वंशजों ने भोजशाला परिसर में मां वाग्देवी यानी देवी सरस्वती के मंदिर का निर्माण कराया था। एक समय यह संस्कृत शिक्षण का बड़ा केंद्र था।

इस धार्मिक स्थल के मंदिर होने के साक्ष्य कथित कमाल मौला मस्जिद की दीवारों पर उससे भी स्पष्ट रूप से अंकित थे, जैसे अयोध्या में मिले थे। इस विवादित स्थल को लेकर इंदौर हाई कोर्ट इसलिए अपना फैसला दे सका, क्योंकि यह स्थल 1958 के अधिनियम के तहत एक एएसआइ संरक्षित स्मारक है। यदि ऐसा नहीं होता तो 1991 में पारित धार्मिक स्थल अधिनियम के चलते इस स्थान की यथास्थिति कायम रहती। दुर्भाग्य से इस भेदभावपूर्ण अधिनियम के चलते धार जैसे अन्य मामलों का निस्तारण नहीं हो पा रहा है और इसके चलते समय-समय पर विवाद उभरते रहते हैं, जो सांप्रदायिक सद्भाव पर बुरा असर डालते हैं।

यह अच्छा है कि धार मामले में हाई कोर्ट की ओर से फैसला आने के कारण किसी तरह का सांप्रदायिक विग्रह देखने को नहीं मिला, लेकिन इतना तो है ही कि इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाएगी। इस प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट का फैसला जो भी हो, इसकी अनदेखी न की जाए कि इस तरह के न जाने कितने मामले हैं। उनके निस्तारण में जो धार्मिक स्थल अधिनियम बाधक है, उसे भी चुनौती दी गई है। सुप्रीम कोर्ट के लिए उचित यह होगा कि वह इस अधिनियम के खिलाफ दायर याचिकाओं का निपटारा शीघ्र करे।

इसी के साथ यह भी उचित होगा कि विवादित धार्मिक स्थलों को संबंधित पक्ष अर्थात हिंदू और मुस्लिम आपसी सहमति से सुलझाएं। इससे उनमें सद्भाव बढ़ेगा। यह तभी संभव हो पाएगा, जब मुस्लिम पक्ष इस यथार्थ को स्वीकार करेगा कि गजनवी, गोरी, खिलजी, बाबर, औरंगजेब जैसे आक्रांताओं ने सैकड़ों मंदिरों का ध्वंस ही नहीं किया, बल्कि उनके ही अवशेषों से ही वहां मस्जिदें बनवाईं। ऐसा केवल अयोध्या और धार में ही नहीं किया गया, बल्कि वाराणसी, मथुरा, संभल, जौनपुर समेत न जाने कितने स्थानों पर किया गया।


Date: 16-05-26

अदालतों के लिए बेहतर ढांचा जरूरी

संपादकीय

भारत की अदालतों में बहुत बड़ी संख्या में लंबित मामले देश की न्यायिक प्रणाली की एक सर्वविदित कमजोरी है। लंबित मामलों की संख्या लगभग 5.5 करोड़ है। इस समस्या का मुख्य कारण अदालतों में कर्मचारियों की भारी कमी बताया जाता है। मुख्य रूप से न्यायाधीशों की, साथ ही स्टेनोग्राफर और क्लर्क जैसे अधीनस्थ कर्मचारियों की भी भारी कमी है। वर्ष 2026 की स्थिति के अनुसार भारत में प्रति दस लाख लोगों पर केवल 22 न्यायाधीश हैं, जबकि विधि आयोग ने 1987 में ही 50 न्यायाधीशों की सिफारिश की थी। न्यायिक दक्षता में बाधा डालने वाले एक अन्य कारक को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है, वह है बुनियादी ढांचा देश भर में इसकी आवश्यकताओं का आकलन करने के लिए न्यायिक अवसंरचना सलाहकार समिति गठित करने का भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत का कदम सराहनीय है। समिति न्याय प्रदान करने की प्रणाली को उन्नत करने के लिए सरकार से लगभग 40,000 करोड़ से 50,000 करोड़ रुपये का बजट अलग से आवंटन कराने की दिशा में काम करेगी। यह पहली बार नहीं है जब किसी मुख्य न्यायाधीश ने इस समस्या को स्वीकार किया है। वर्ष 2016 में एक न्यायाधीश ने न्यायपालिका को प्रभावित करने वाली रिक्तियों और बुनियादी ढांचे की कमी को गिनाते हुए सार्वजनिक रूप से भावुक होकर अपनी भावनाएं व्यक्त की थीं। एक अन्य ने निचली अदालतों में सुविधाएं विकसित करने के लिए एक राष्ट्रीय न्यायिक अवसंरचना निगम की स्थापना का सुझाव दिया।

सिफारिश देने वाली किसी भी समिति के लिए काम आसान नहीं होगा। सरसरी तौर पर देखने से ही गंभीर भौतिक और डिजिटल कमियां सामने आती हैं, खासकर निचली अदालतों में, जहाँ मामलों का 85 फीसदी लंबित है। ई-कोर्ट को बढ़ावा देने के प्रयासों के बावजूद, आधी से भी कम निचली अदालतों में स्टूडियो आधारित वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की सुविधा है, और एक शिवाई से भी कम अदालतें न्यायाधीशों को आसन पर कंप्यूटर उपलब्ध करा पाती है। कई अदालती भवनों में साफ शौचालय, पीने का पानी, आरामदायक प्रतीक्षा क्षेत्र या डिजिटल सूचना प्रणाली जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। उच्च स्तर पर भी स्थिति कुछ खास बेहतर नहीं है। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय की एक सुनवाई में न्यायाधीशों ने पंचाटों के न्यायाधीशों को दी जाने वाली आवास और परिवहन सुविधाओं की कमी पर टिप्पणी की। विडंबना यह है कि पंचाट, जो न्यायिक प्रक्रिया को गति देने के लिए स्थापित संस्थाएं हैं, वे भी हर तरह की कमियों से जूझ
रहे हैं। इनमें से कई अस्थायी या साझा कार्यालयों से काम करते हैं। उदाहरण के लिए, राष्ट्रीय कंपनी विधि पंचाट और उसका समकक्ष अपील निकाय, दोनों मध्य दिल्ली के एक सरकारी परिसर में तंग, अस्थायी परिसर से काम चला रहे हैं। दूरसंचार विवाद निपटान और अपील पंचाट पास के ही एक होटल से संचालित होता है। यही हाल माल एवं सेवा कर अपील पंचाट के दिल्ली राज्य पीठ का है।

कमियां स्पष्ट हैं और उन्हें दूर करना ही असली चुनौती है। मुख्य न्यायाधीश ने सतही डिजिटलीकरण के बजाय ‘अधिकार केंद्रित डिजिटल दृष्टिकोण’ अपनाने की बात कही है। यह स्पष्ट नहीं है कि इसमें क्या शामिल होगा, खासकर तब जब नवनिर्मित परिसर भी अपर्याप्त और खराब रखरखाव वाले होते हैं इस मुद्दे के लिए व्यवस्थागत सुधार और बुनियादी ढांचे पर अधिक खर्च की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए, न्यायिक नियुक्तियों में बढ़ते राजनीतिकरण ने सभी स्तरों पर न्यायाधीशों की कमी को और मदा दिया है। इसके अलावा, निचली और अधीनस्थ अदालतों के कामकाज की निगरानी के लिए कोई व्यवस्था नहीं दिखती, जहां न्यायाधीश अक्सर कई दिनों तक अनुपस्थित रहते हैं। सुविधाओं के उन्नयन पर खर्च करने की राज्यों की अनिच्छा से स्थिति और भी जटिल हो जाती है। केंद्र ‘न्यायिक अवसंरचना के लिए केंद्रीय प्रायोजित योजना चलाता है। लेकिन राज्य अक्सर अपना 40 फीसदी हिस्सा देने में विफल रहते हैं। अधिकांश राज्यों ने न्यायिक अवसंरचना के लिए अपने बजट का 2 फीसदी से भी कम आवत किया है। जवाबदेही, साथ ही साथ बुनियादी ढांचे पर अधिक खर्च आज के समय की मांग है। हालांकि, वह देखना होगा कि कार्यपालिका और न्यायपालिका मिलकर बेहतर परिणाम प्राप्त कर सकती है या नहीं।


Date: 16-05-26

परीक्षा सुधार का समय

संपादकीय

भारत में परीक्षाओं को सोलह आना चाक-चौबंद बनाने की कोई भी कोशिश सराहनीय है। मेडिकल प्रवेश परीक्षा को लेकर सवालों के अंबार लगे हुए हैं, जिनका जवाब सरकार को ठोस कदम उठाकर देना चाहिए। शुक्रवार को सरकार ने इस दिशा में कदम बढ़ाते हुए मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं को भी अब ऑनलाइन ढंग से कराने का फैसला लिया है। ध्यान रहे, इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा ऑनलाइन ढंग से होती है और उसे लेकर कभी सवाल नहीं खड़े होते। मेडिकल प्रवेश परीक्षा में प्रश्नोत्तर पुस्तिका और कागज-कलम का प्रयोग होता है। प्रश्नों की हार्ड कॉपी के लीक होने की आशंका रहती है। अब जिस तरह से पेपर लीक की जांच हो रही है और जो शर्मनाक तथ्य सामने आ रहे हैं, उनको देखते हुए बीते वर्षों में हुई नीट या मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं को सौ प्रतिशत ईमानदार नहीं माना जा सकता। पेपर लीक में जैसे लोग पकड़े जा रहे हैं, उससे यही लगता है कि पेपर लीक का एक पूरा गिरोह परीक्षा तंत्र में सेंध मारे बैठा है। देश के भविष्य और सम्मान से खिलवाड़ करने वाले किसी गिरोह के सांस लेने की रत्ती भर भी गुंजाइश नहीं छोड़नी चाहिए। यह परीक्षा द्रोह किसी भी सूरत में देशद्रोह से कम नहीं है।

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने पेपर लीक के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का जो वादा दोहराया है, उसे साकार रूप देने की जरूरत है। केवल छात्र ही नहीं, पूरा देश परीक्षाओं को बेदाग बनाने के पक्ष में है। चोरों को ठिकाने लगाने और मेधावी छात्रों को आगे बढ़ाने के लिए पेपर लीक पर पूरी तरह से लगाम लगाने के तमाम प्रबंध होने चाहिए। परीक्षा लेने वाली एजेंसी एनटीए की कमियों को दूर करने के साथ ही, उसे पूरी तरह से जिम्मेदार बनाने की जरूरत है। अगले महीने जब 21 जून को नीट यूजी- 2026 का आयोजन होगा, तब किसी छात्र को शिकायत का मौका नहीं मिलना चाहिए। बीती 3 मई को हुई परीक्षा के रद्द होने से छात्रों को जो तकलीफ हुई है, उसकी हरसंभव भरपायी करने की जरूरत है। स्नातक चिकित्सा कार्यक्रमों में प्रवेश के लिए 22 लाख से ज्यादा विद्यार्थियों को एक बार फिर परीक्षा से गुजरना होगा, इन तमाम परीक्षार्थियों के साथ ही देश भी आश्वस्त करने की जरूरत है। परीक्षा पर विश्वास की बहाली कैसे होगी ? जो लोग पेपर लीक में शामिल हैं, उन्हें कठोर दंड देकर भी विश्वास की बहाली संभव होगी। यह भी देखा जाए कि पेपर लीक की जो घटनाएं पहले हुई हैं, उनके दोषियों का क्या हुआ? पेपर लीक की जांच कर रही सीबीआई अगर दोषियों को कड़ी सजा दिला पाती है, तो इससे पूरे शिक्षा जगत का भला होगा।

ध्यान रहे, भारत में परीक्षाएं महंगी भी हो गई हैं और परीक्षा देने वालों की संख्या भी साल-दर-साल बढ़ती चली जाएगी। परीक्षा लेने वाली एजेंसियां छात्रों से कमाई भी कर रही हैं। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी अर्थात एनटीए ने अपने संचालन के पहले पांच वर्षों में परीक्षा शुल्क से 448.21 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि अर्जित की है। छात्रों से प्राप्त राशि के 87.2 प्रतिशत हिस्से का ही इस्तेमाल हुआ है। बेशक, बची हुई धनराशि का उपयोग परीक्षाओं को दुरुस्त बनाने में किया जा सकता था। यह मामला बहुत गंभीर है, उत्तर भारत में पेपर लीक की घटना हुई है, तो दक्षिण में फिर शिकायती स्वर उठे हैं। दक्षिण के राज्य अपने स्तर पर परीक्षा व्यवस्था चाहते हैं। क्या परीक्षाओं के राष्ट्रीय स्वरूप को बेहतर क्षेत्रीय स्वरूपों में बांटा जा सकता है? कुल मिलाकर, परीक्षाओं की शुचिता को युद्ध स्तर पर सुनिश्चित करने की जरूरत आन पड़ी है।