आस्था पर सरकारी शिकंजा
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महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ ने हाल ही में धर्म परिवर्तन पर कानून पारित किए हैं। ये गुमराह करते हैं। कहने को तो ये धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा का दावा करते हैं, लेकिन असल में इसका उल्टा कर रहे हैं। चिंता की बात यह है कि इनके बनाए कानून का अनुसरण अन्य 10 राज्य भी कर रहे हैं। क्या हैं ये कानून –
- महाराष्ट्र के कानून के तहत, धर्म परिवर्तन करने के इच्छुक व्यक्ति को 60 दिनों का नोटिस देना होगा, और नामित प्राधिकारी से पूर्व अनुमति लेनी होगी। धर्म परिवर्तन के 25 दिनों के भीतर पंजीकृत किया जाना चाहिए। अन्यथा इसे रद्द माना जाएगा। प्राधिकरण स्थानीय स्तर पर नोटिस प्रकाशित करेगा। इसमें संबंधित ग्राम पंचायत भी शामिल है। 30 दिनों के भीतर आपत्तियां दर्ज की जा सकेंगी। आपत्ति मिलने पर पुलिस जांच कर सकती है।
- छत्तीसगढ़ के कानून में भी इसी तरह के प्रावधान हैं। इसमें ससुदायों के धाार्मिक जमावड़े भी शामिल कर लिए गए हैं। ये अविभाजित मध्यप्रदेश के 1968 के कानून की जगह लेंगे।
क्या प्रभाव हो सकते हैं –
- यह सच है कि राज्य की जिम्मेदारी है कि वह सभी नागरिकों को जबरदस्ती और धोखाधड़ी से बचाए। लेकिन इस कानून में धर्म परिवर्तन को सार्वजनिक करने, सबूत का बोझ आरोपी पर डालकर लोगों की आस्था की स्वतंत्रता को कैद किया जा रहा है।
- आस्था पर पुलिस की जांच बैठाने की कोई भी कोशिश मनमानी को बढ़ावा दे सकती है।
- इस कानून से सामाजिक व्यवस्था और सद्भाव के बिगड़ने की आशंका है।
फिलहाल, इन कानूनों को चुनौती देने वाली याचिकाएं सर्वोच्च न्यायालय में लंबित हैं। कानूनों की अंतिम स्थिति कानूनों की संवैधानिकता से ही निश्चित होगी।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 31 मार्च 2026