14-04-2026 (Important News Clippings)

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14 Apr 2026
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Date: 14-04-26

Magnetic Strongmen And Their Limits

ET Editorial

On Sunday, voters in Hungary triggered a tectonic shift, signalling they had had enough of their country being turned into a ‘Petri dish for illiberalism’ by PM Viktor Orbán and his Fidesz party. Orbán’s defeat not only stands out for its sheer scale but also serves as a stark reminder that the tide of populism does recede. Sixteen years of supermajority rule enabled the one-time liberal democrat to reshape the constitution in ways that entrenched his hold on power, making the electorate’s verdict even more consequential.

Orbán’s defeat underscores a basic democratic truth, even in systems that drive towards illiberalism: the greatest failure of any political class is its inability to read the changing public mood. Whether the emphatic two-thirds victory for Péter Magyar and Tisza Party marks a durable return to liberal democracy remains to be seen. A former Orbán loyalist, Magyar joined Tisza only in 2024, making the scale and speed of this shift striking.

There are broader lessons here for Orbán’s peers. ‘Strongman magnetism’ — almost always doused with nationalism and other atavistic ingredients — offers diminishing returns, particularly in societies that realise that bumper stickers and catchy slogans doth not alone good governance make. It becomes progressively harder to demonise ‘outsiders’ when economic realities require more attention than glorious promises. At some point, populist politics exhausts its supply of enemies. Voters, ultimately, are guided by more immediate concerns: economic stability, opportunity, living standards. When governments lose sight of these priorities, alienation follows. Populism can deliver, but only up to a point. Orbán’s case is a lesson others would do well to heed, even as they flex their muscles.


Date: 14-04-26

Parched again

Bengaluru is treating water supply as infinitely expandable

Editorial

While Karnataka as a whole is improving its water security, Bengaluru is dealing with extreme groundwater withdrawal. The State drew 66% of the groundwater that it could sustainably extract in 2025, but Bengaluru East Taluka drew 378%. The sustainably extractable volume of groundwater is based on how much withdrawal will deplete the aquifer, so while 378% does not mean Bengaluru East has depleted its groundwater, it is reminiscent of an ongoing crisis that has, once again, turned acute. The Bengaluru region lies on crystalline rock that already stores little water and recharges slowly. The city further concentrates demand in areas with higher population density and per-capita consumption, including ‘tech parks’ and apartment complexes. The built-up area of such urban infrastructure also suppresses recharge by percolating rainwater. A growing fraction of the population depends on water from the Cauvery, which comes with a high expansion cost. Thus, the problem has a natural basis but has been compounded over the years by inconsiderate urbanisation, where the costs — monetary and, increasingly, existential — are being passed on to the populace.

In 2024, a weak monsoon left nearly half of Bengaluru’s 14,000 borewells dry. The government launched a project to supply 775 million litres per day to 110 villages and lower groundwater stress. But to date, the project has achieved only midway coverage, leaving many residents still banking on tankers. A 2026 study found that the crisis has since moved to Koramangala and Hebbal. The Bangalore Water Supply and Sewerage Board has also been using treated sewage water to recharge lakes. It seems Bengaluru is treating supply as infinitely expandable when it is not. Its preference for grey over green infrastructure has sealed the ground against replenishment while the increasing demand liquidates ecological capital. The city does not manage its pipeline supply, groundwater, and wastewater together, allowing consumers to default to the most convenient solution: tankers. Authorities need to minimise distribution losses and penalise overextraction and mandate 100% decentralised wastewater recycling for all non-potable uses. The ideal long-term solution remains unchanged: Bengaluru needs to become a ‘sponge city’. This includes restoring the connections between lakes and wells to capture monsoon runoff, thus aligning land-use planning with the recharge capacity of each taluka, and overall sealing the ground less and increasing absorption on the surface.


Date: 14-04-26

महिला आरक्षण की पहल

संपादकीय

लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत स्थान आरक्षित करने वाले नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लेकर प्रधानमंत्री ने यह सही कहा कि यह इस सदी के महत्वपूर्ण कदमों में से एक है। पहले यह अधिनियम नई जनगणना के बाद लागू होना था, पर उसमें देरी के चलते सरकार ने इसे 2011 की जनगणना के आधार पर लागू करने का निर्णय किया। इस पर आपत्ति जताई जा रही है, पर इस आपत्ति को महत्व देने से अगले लोकसभा चुनाव में महिला आरक्षण लागू करना संभव नहीं होगा, क्योंकि ताजा जनगणना के आंकड़ों के आधार पर बनने वाले परिसीमन आयोग की रिपोर्ट आने में समय लगता और तब तक 2029 के आम चुनाव हो जाते। इसी कारण इस अधिनियम में संशोधन करने हेतु संसद का एक विशेष सत्र बुलाया गया है।

चूंकि यह सत्र विधानसभा चुनावों के बीच बुलाया जा रहा है, इसलिए कई विपक्षी दलों को यह रास नहीं रहा है। कई विपक्षी नेताओं की मानें तो बीती जनगणना के आधार पर महिला आरक्षण लागू करने से कुछ राज्यों के राजनीतिक हितों की अनदेखी हो सकती है और लोकसभा में उनका प्रतिनिधित्व कम हो सकता है। फिलहाल इस आशंका का कोई पुष्ट आधार नहीं। ध्यान रहे प्रधानमंत्री कई बार यह कह चुके हैं कि महिला आरक्षण के चलते सीटें बढ़ने से किसी राज्य के साथ अन्याय नहीं होगा। ऐसे में अच्छा यह होगा कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम का संशोधित प्रारूप सामने आने के बाद ही सवाल और संदेह खड़े किए जाएं। समस्या यह है कि मोदी सरकार कोई भी पहल करती है तो विपक्ष तत्काल उसकी नीयत पर सवाल खड़े करने लगता है। आलोचना-निंदा अनुमान और आशंका के आधार पर नहीं होनी चाहिए।

विपक्ष का यह कथन निराधार तो नहीं कि सरकार इस समय महिला आरक्षण लागू कराने वाली पहल से अपने राजनीतिक हित साधना चाहती है, लेकिन आम तौर पर सरकारों और दलों के तो हर फैसले राजनीतिक हित ध्यान में रखकर ही लिए जाते हैं। यदि महिला आरक्षण को अगले लोकसभा चुनाव में लागू करने वाली पहल सफल होती है तो ऐसा विपक्ष के समर्थन से ही संभव होगा। स्पष्ट है कि महिला आरक्षण का सपना साकार होने का श्रेय उनके खाते में भी जाएगा।

महिला आरक्षण से उन दलों को अवश्य समस्या हो सकती है, जिनका महिलाओं के बीच व्यापक जनाधार नहीं और जो उनकी राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने के प्रति उदासीन रहते हैं। वैसे कोई भी दल महिला आरक्षण का विरोध करने का साहस नहीं कर सकता, क्योंकि अब महिलाएं एक बड़ा और सशक्त वोट बैंक हैं। निःसंदेह महिला आरक्षण से देश का राजनीतिक परिदृश्य और वातावरण बदलेगा, पर यह ध्यान रहे तो बेहतर कि इस आरक्षण मात्र से उनका सामाजिक रूप से उत्थान सुनिश्चित होने वाला नहीं है। इसके लिए सरकारों, राजनीतिक दलों और समाज को कुछ और भी करना होगा।


Date: 14-04-26

आंबेडकर का जीवन ही उनका संदेश

श्यौराज सिंह ‘बेचैन’, ( लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में सीनियर प्रोफेसर हैं )

महापुरुषों के क्रियाकलाप ही उनका संदेश होते हैं। यही कारण है कि लोग दुनिया के सभी शीर्ष नायकों के जीवन-वृत्तों में गहरी दिलचस्पी दर्शाते हैं। डॉ. भीमराव आंबेडकर के जीवन संघर्ष के प्रति भी दुनिया में जिज्ञासुओं की संख्या बढ़ रही है। आज उनकी प्रासंगिकता पर विचार करें तो एक प्रचलित लोक कहावत याद आती है, ‘काम सबको प्यारा होता है, चाम किसी को नहीं।’ इसमें दो मत नहीं कि आंबेडकर भारत भूमि के महा कमेरे सपूत थे। उन्होंने जबसे होश संभाला, उत्तरोत्तर स्वयं को बौद्धिक श्रम की साधना में झोंकते चले गए। बड़ा विजन, बड़े सपने और फिर उनको हासिल करने के लिए सामर्थ्यवान बनने की निरंतर तत्परता की उनकी जैसी दूसरी मिसाल नहीं है।

कबीरपंथी पिता सूबेदार रामजी ने उन्हें पहला पाठ पढ़ाया कि यदि तुम्हें अस्पृश्य-जातियों को सामाजिक गुलामी से मुक्ति दिलानी है तो ज्ञान की सत्ता से स्वयं को समर्थ बनाना होगा। ज्ञान से ही ज्ञान का जवाब दिया जा सकता है। सो पिता की मंशा समझ आई और पढ़ाई को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया, पर पढ़ाई के मार्ग में अस्पृश्यता और जाति-हिकारत कदम-कदम पर अवरोध खड़े कर रही थीं। ऐसे परिवेश में दसवीं पास कर लेने पर उनका सम्मान किया गया। वे अस्पृश्य समुदाय के दसवीं पास पहले विद्यार्थी थे।

शिक्षा-उपाधियों के उनके कीर्तिमान अध्ययन की निरंतरता के ही परिणाम हैं। अन्यथा स्नातक का उनका परीक्षाफल एक औसत छात्र की छवि ही सामने लाता है। अपनी पैदायशी सुपरमैन वाली धारणा को उन्होंने अपने साक्षात्कारों में स्वयं ही तोड़ा। 13 अप्रैल, 1947 को ‘साप्ताहिक नवयुग’ में अपने साक्षात्कार में उन्होंने बताया था कि मेरी बीए में थोड़े ही अंकों से सेकेंड डिवीजन रह गई। इंटरमीडिएट में कुल 600 में 223 अंक ही आए थे। इस बाबत उन्होंने कहा था कि अगर कोई मेरे बीए तक के परीक्षा परिणाम देख कर भविष्यवाणी करता कि यह लड़का आगे चल कर इतनी उपलब्धियां प्राप्त करेगा तो उसे पागल करार दिया जाता। फिर भी उनके अध्ययन और लेखन का चुनाव, रिसर्च की गुणवत्ता और देश समाज के संदर्भ में उसकी उपयोगिता महत्वपूर्ण है। उनके शोध के निष्कर्षों की रोशनी में ही भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना हुई। अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार पाने वाले अमर्त्य सेन ने भी गरीबी को समझने के लिए डा. आंबेडकर के रिसर्च को श्रेय दिया था।

राष्ट्रीय एकता को लेकर डॉ. आंबेडकर न केवल चिंतित रहते थे, बल्कि उन्होंने पंथ के आधार पर भारत विभाजन रोकने की सलाह भी दी थी। ‘थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ पुस्तक लिखकर उन्होंने दोनों पक्षों को समझाया भी था। जिन्ना को समझाया था कि एकता से हल निकालें, बंटवारा करा कर पछताएंगे। जिन्ना ने उन्हें अनसुना करते हुए कहा, ‘मैं आपकी किताब पढ़ चुका हूं, डॉ. आंबेडकर यह आपकी राय है, हमारा फैसला नहीं है।’ बाबा साहब दूरद्रष्टा थे। उन्होंने तभी बता दिया था कि विभाजन से स्थायी शांति और प्रगति स्थापित नहीं होगी। आधे मुसलमान भारत और आधे पाकिस्तान में, इससे समाधान नहीं होगा, परंतु उनकी किसी ने नहीं सुनी।

भारत-पाकिस्तान संबंधों को लेकर डॉ. आंबेडकर की शंकाएं सही साबित हुईं। आज भी दोनों में प्रेम, सहयोग, शांति और सद्भाव नहीं है। पाकिस्तान पोषित आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भारत को भारी धन-बल खर्च करने पड़ रहे हैं। पाकिस्तान भी जब तब हथियार भांजता रहता है। यदि दोनों देश अविभाजित होते तो युद्ध सामग्री पर खर्च होने वाली मोटी धनराशि देश के आर्थिक, बौद्धिक और सामाजिक विकास पर खर्च होती है।

अछूतों को आत्मनिर्भर और सामाजिक रूप से समर्थ बनाने के उद्देश्य से डॉ. आंबेडकर गोलमेज सम्मेलन से पृथक निर्वाचन का अधिकार लेकर आए। इस पर गांधी जी ने कहा, ‘अस्पृश्य मेरे दिल के टुकड़े हैं। मैं उन्हें अलग नहीं होने दूंगा।’ तत्कालीन मीडिया ने भी पृथक निर्वाचन को ऐसे पेश किया जैसे पाकिस्तान की तरह डॉ. आंबेडकर कोई अलग दलितस्थान बनाने जा रहे हों। गांधी जी ने पूना की यरवदा जेल में आमरण अनशन कर दिया। डॉ. आंबेडकर पर चारों ओर से दबाव डाला गया कि बापू के प्राण बचाओ। वे धर्म संकट में थे। गांधीजी के प्राणों की रक्षा करें या अस्पृश्यों के हितों-अधिकारों की रक्षा? आखिर राजनीतिक सत्ता, प्रशासनिक एवं राजकीय सेवाओं में निर्धारित प्रतिनिधित्व के आधार पर पूना पैक्ट हो गया। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि समझौते पर नेक नीयत से अमल नहीं हुआ। दस वर्ष के भीतर प्रतिनिधित्व पूरा होने का आश्वासन आज तक पूरा नहीं हुआ। उच्च शिक्षा, न्यायपालिका, मेडिकल, इंजीनियरिंग एवं प्रशासनिक उच्च स्तर पर प्रतिनिधित्व पूरा होना तो दूर, उपस्थिति तक नगण्य बनी हुई है।

भारत में जातिभेद की तरह अमेरिका में नस्लभेद की समस्या थी। उसमें समावेशी नीतियों को लागू करके अश्वेतों को उद्योग, मीडिया, कला, सिनेमा, राजनीति, खेल, संगीत सब क्षेत्रों में समावेश कर लिया। भारत के आधुनिक सेवा क्षेत्र में दलितों का उचित समावेश नहीं है। नतीजा उन्हें देश को अमेरिका बनाने का अवसर नहीं मिल रहा है। बेशक हम विकासशील हैं, परंतु संतुलन और समग्रता में उसे विकसित बनाने वाले नागरिकों को मौके देने से राष्ट्रीय निर्माण में तेजी आएगी।


Date: 14-04-26

डिजिटल सुरक्षा जरूरी

संपादकीय

अपनी शुरुआत के एक दशक बाद यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी यूपीआई देश की डिजिटल भुगतान व्यवस्था का अनिवार्य अंग बन चुका है। यह तेज गति से मुद्रा हस्तांतरण से लेकर परस्पर संचालन के जरिये विभिन्न प्लेटफॉर्म और संस्थानों के बीच अबाध गति से लेनदेन सुनिश्चित करता है। 45 करोड़ से अधिक उपयोगकर्ताओं के साथ यह हर माह करीब 22 अरब लेनदेन करता है और मार्च में इस लेनदेन का मूल्य करीब 29.5 लाख करोड़ रुपये रहा। इस प्रकार इसने भारतीयों के लेनदेन के तरीके को पूरी तरह बदल दिया है। बहरहाल, एक ओर जहां वृद्धि में अब धीमापन आ रहा है वहीं धोखाधड़ी का जोखिम लगातार बढ़ रहा है।

राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल के आंकड़ों के अनुसार धोखाधड़ी के रिपोर्ट हुए मामले 2021 के 2.6 लाख से बढ़कर 2025 में करीब 28 लाख तक पहुंच गए। इनका सालाना मूल्य 22,000 करोड़ रुपये का स्तर पार कर गया। ध्यान देने वाली बात है कि धोखाधड़ी के 98.5 फीसदी मामले 10,000 रुपये से अधिक मूल्य के थे। इस संदर्भ में हाल ही में रिजर्व बैंक की ओर से जारी परिचर्चा पत्र ‘एक्सप्लोरिंग सेफगार्ड्स इन डिजिटल पेमेंट्स टु कर्ब फ्रॉड्स’ में यह प्रस्ताव रखा गया है कि उच्च मूल्य के नकदी हस्तांतरण में एक घंटे का विलंब किया जाए।

साथ ही, वरिष्ठ नागरिक अगर 50,000 रुपये से अधिक का लेनदेन करें तो किसी विश्वसनीय व्यक्ति द्वारा उसका प्रमाणन किया जाए। कम क्रेडिट टर्नओवर खातों के लिए 25 लाख रुपये वार्षिक प्रवाह सीमा और एक ‘व्हाइटलिस्टिंग’ (चुनिंदा विश्वसनीय चीजों को अनुमति देना बाकी को रोक देना) तंत्र का प्रस्ताव रखा गया है, जिसके तहत भुगतानकर्ता कुछ लेनदेन को अधिकृत कर सकते हैं ताकि वे विलंब को दरकिनार कर सकें।

रिजर्व बैंक ने यह सही चिह्नित किया है कि धोखाधड़ी की प्रकृति भी बदली है। आज धोखाधड़ी के अधिकांश मामले ऐप्स से होते हैं या अधिकृत पुश भुगतान से होते हैं। उपयोगकर्ताओं के साथ धोखा करके छद्म कॉल, छद्म पहचान या आकस्मिक जरूरत का हवाला देकर उनसे पैसे ले लिए जाते हैं। यूपीआई जैसी रियल टाइम प्रणाली में एक बार पैसा चला जाने के बाद उसकी वसूली करना मुश्किल होता है। यही वजह है कि बचाव और अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है।

उच्च-मूल्य हस्तांतरणों के लिए प्रस्तावित एक घंटे की देरी उपयोगकर्ताओं को लेनदेन पर पुनर्विचार या उसे रद्द करने का एक अवसर दे सकती है, और बैंकों को संदिग्ध गतिविधियों को चिह्नित करने का समय मिल सकता है। सिंगापुर, ब्रिटेन और स्वीडन जैसे देशों के अनुभव से पता चलता है कि ऐसी ‘कूलिंग-ऑफ’ अवधि धोखाधड़ी को कम कर सकती हैं। यह सब नियमित भुगतानों को महत्त्वपूर्ण रूप से प्रभावित किए बिना हो सकता है।

यद्यपि कुछ ढांचागत दिक्कतें बरकरार हैं। लेनदेन में देरी यूपीआई के त्वरित भुगतान के बुनियादी वायदे के विरुद्ध है। बैंकों को भी अलर्ट और धन वापसी आदि की नई प्रणालियों में निवेश करना होगा। इससे लागत और समन्वय की चुनौतियां बढ़ेंगी। धोखाधड़ी करने वाले उपयोगकर्ताओं को ‘व्हाइटलिस्टिंग’ के माध्यम से सुरक्षा उपायों को दरकिनार करने के लिए भी मना सकते हैं। ‘विश्वसनीय व्यक्ति’ द्वारा प्रमाणीकरण भी वास्तविक लेनदेन में देरी कर सकता है। इसलिए इन खामियों को दूर करने में प्रौद्योगिकी महत्त्वपूर्ण होगी।

आर्टिफिशल इंटेलिजेंस आधारित निगरानी, बैंकों के बीच बेहतर डेटा साझा करने और वास्तविक समय में जोखिम का अंकन आदि संदिग्ध रुझानों का पता लेनदेन पूरा होने के पहले लगाने में मदद कर सकते हैं। ऐसे उपाय यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि सुरक्षा उपाय व्यापक न होकर लक्षित हों, जिससे दक्षता बनी रहे और सुरक्षा में सुधार हो।

हाल ही में रिजर्व बैंक द्वारा उपभोक्ता-केंद्रित प्रोत्साहन, जैसे कि छोटे मूल्य की धोखाधड़ी के लिए क्षतिपूर्ति तंत्र, जो इस वर्ष जुलाई से लागू होगा, उपभोक्ता विश्वास को भी बढ़ाएगा। खासकर अगर दावों का निपटारा शीघ्रता से किया जाए। अंततः, प्रणाली में विश्वास केवल रोकथाम पर नहीं, बल्कि निष्पक्ष और समय पर निवारण पर भी निर्भर करता है।

फिर भी, उपयोगकर्ताओं, खासकर संवेदनशील वर्गों के हितों की रक्षा के लिए स्पष्ट सुरक्षा-सीमाएं तय की जा सकती हैं। यद्यपि यह भी महत्त्वपूर्ण होगा कि उपयोगकर्ताओं को ऐसे तंत्र से बाहर निकलने का विकल्प दिया जाए। इस संदर्भ में जागरूकता भी अत्यंत आवश्यक है। यद्यपि रिजर्व बैंक और अन्य एजेंसियों ने प्रयास तेज किए हैं, परंतु धोखाधड़ी का पैमाना और उसका बदलता स्वरूप यह दर्शाता है कि कहीं अधिक सतत और व्यापक डिजिटल साक्षरता पहलों की आवश्यकता है।


Date: 14-04-26

फिर युद्ध को हवा

संपादकीय

अमेरिका-ईरान वार्ता नाकाम होने के बाद दुनिया में आर्थिक तनाव का का पारा फिर चढ़ने लगा है। विश्व स्तर पर तेल की कीमतों में फिर उछाल का दौर शुरू हो गया है, तो सोमवार को भारतीय शेयर बाजार भी गिरावट के साथ बंद हुआ है। यह ताजा तनाव अमेरिका-ईरान शांति वार्ता के विफल होने और अमेरिका द्वारा ईरानी बंदरगाहों के आसपास नौसैनिक नाकाबंदी करने के एलान के बाद पैदा हुआ है। आशंका जताई जा रही है कि किसी भी समय ईरान पर हमला शुरू हो सकता है। अगर ऐसा हुआ, तो कच्चे तेल के भाव में और तेजी आएगी। कच्चे तेल या ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत बढ़कर 102 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई है। यह भारत के लिए अच्छा नहीं है। यहां सरकार को उम्मीद थी कि शांति वार्ता कामयाब हुई, तो तेल से उपजा तनाव घट जाएगा। ध्यान रहे, ज्यादातर देशों में तेल की कीमत में 30 प्रतिशत तक इजाफा हो चुका है, पर भारत में सामान्य पेट्रोल, डीजल की कीमतें नहीं बढ़ी हैं। सवाल और गहरा गया है कि भारत तेल की कीमतों को कब तक रोकेगा?

यह नई बात नहीं है, जब एक समस्या आती है, तब अपने साथ समस्याओं का एक सिलसिला भी लाती है। जब किसी समस्या को सुलझाने में नाकामी मिलती है, तब उससे भी समस्याओं में इजाफा होता है। अमेरिका ने होर्मुज के नाकाबंदी की ठान रखी है। वह ईरानी जहाजों की तलाशी ले सकता है, पर गैर-ईरानी जहाजों को आसानी से जाने देगा। इससे यह पता चलता है कि अमेरिका तेल आपूर्ति को लेकर सजग है। ईरान पर हमले का असर अगर होर्मुज पर नहीं पड़ता, तो संभव है, दुनिया को अमेरिका से परेशानी नहीं होती। कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित होने से अमेरिका को कोसने वाले देशों और लोगों की संख्या बढ़ी है। ईरान चूंकि लंबी लड़ाई का इच्छुक नहीं है, तो वह होर्मुज को बाधित करके जल्दी फैसला चाहता है। अब अमेरिका होर्मुज की नाकाबंदी करेगा, तो ईरान भी चुप नहीं बैठेगा। ऐसे में, युद्ध किसी भी समय भड़क उठेगा। वास्तव में, अमेरिका ने युद्ध की रणनीति मे बदलाव किया है। वह ऐसे कदम उठाएगा, ताकि दुनिया के देश उसके पक्ष मे खड़े हो जाएं। पहले वह अपने लिए युद्ध लड़ रहा था, लेकिन अब वह यह जताने की कोशिश करेगा कि वह दुनिया के लिए युद्ध लड़ रहा है। ऐसा करते हुए, उसकी रणनीति होगी कि ईरान को दुनिया के ज्यादातर देश कठघरे में खड़ा कर दें। ईरान के खिलाफ गुस्सा फूट पड़े। ट्रंप के इस बयान पर गौर कीजिए, उन्होंने कहा है कि ब्रिटेन क्षेत्र में माइनस्वीपर भेजेगा। हालांकि, ब्रिटिश रक्षा मंत्रालय ने इस दावे की पुष्टि नहीं की है।

क्या अमेरिका की नई रणनीति कामयाब होगी? क्या अमेरिका अन्य देशों को अपने पक्ष में खड़ा कर पाएगा? क्या वह ईरानी बंदरगाहों की नाकाबंदी में कामयाब हो पाएगा? निस्संदेह, यह एक ऐसा संघर्ष है, जिसमें सवाल ही सवाल हैं और जवाब खोजने में शामिल लोग शायद उतने ईमानदार नहीं हैं, जितना उन्हें होना चाहिए। सातवें सप्ताह में प्रवेश कर चुके इस युद्ध में अब तक हजारों लोग मारे जा चुके हैं और वैश्विक बाजार बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं। वैसे, अमेरिका के लिए होर्मुज की नाकाबंदी आसान नहीं है। ईरान की नौसेना ने होर्मुज पर नियंत्रण का दावा दोहराया है। उसने साफ कह दिया है, होर्मुज जलमार्ग के पास आने वाले किसी भी सैन्य जहाज को बलपूर्वक जवाब दिया जाएगा। ऐसे में, यही उम्मीद की जा सकती है कि युद्ध के लिए लालायित देश संयम बरतते हुए समाधान का हिस्सा बनेंगे, समस्या का नहीं।