24-03-2026 (Important News Clippings)

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24 Mar 2026
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Date: 24-03-26

Flight Path

Costly jet fuel may drive up airfares briefly, but lack of competition is the real long-term risk to Indian aviation

TOI Editorials

India pulled its airfare cap yesterday, without a price surge. Big question now is, what happens next month, when jet fuel prices are revised. If US and Iran achieve “total resolution of hostilities”, as Trump has hinted, price pain might not arise. Crude slid below $100 within minutes of Trump’s announcement yesterday, and if peace prevails, and Hormuz Strait reopens, it will trend back to its pre-war level. But if fighting resumes, all bets are off.

That’s a problem for aviation, because jet fuel isn’t seen as a “need” like diesel, or cooking gas. There’s no strong political compulsion to cushion its price. Already, Singapore benchmark for jet fuel has touched $225 once – about $50 more than its peak at the start of Ukraine war. Although India is a major producer and exporter of jet fuel, that won’t shield Indian airlines from fuel inflation. And since fuel is 40% of operating costs, no airline can absorb its impact for long.

In the worst case, then, flyers would pay a lot more everywhere – not just in India. But India’s duopoly market – the Big Two hold over 90% share – is especially suited to price gouging. So, govt must watch airfares. It can also offer some respite by slashing taxes on jet fuel until war ends. More important, it must create conditions for at least one more strong airline to emerge. By govt’s own admission, 11 airlines have folded up in the past 10 years. That suggests systemic issues. China’s top three airlines together have less than 60% market share. In US, no airline has even 25% share. As the fastest growing aviation market, India should plug this gap. Jet fuel price is a short-term irritant, lack of competition is the real concern.


Date: 24-03-26

समय रहते ही चुनौतियों के लिए तैयारी करनी होगी

संपादकीय

होर्मुज मार्ग खोलने को लेकर ट्रम्प के अल्टीमेटम और उस पर ईरान की उतनी ही संगीन धमकी के बाद प्रधानमंत्री ने सीसीएस की बैठक में कई अन्य मंत्रालयों को बुलाकर युद्ध के फौरी, मध्य और दीर्घकालिक प्रभावों पर चर्चा की। उधर सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार ने भले ही कहा हो कि भारत पर वैश्विक बाजार में क्रूड तेल के दाम 90-100 डॉलर प्रति बैरल तक रहने पर भी कोई खास असर नहीं होगा और अगर कीमत 130 डॉलर तक छह से नौ माह तक रहे, तब जाकर महंगाई बढ़ेगी, लेकिन प्रधानमंत्री आसन्न संकट के प्रबंधन की तैयारी में लग गए हैं। वैश्विक तेल उत्पादन 30% कम हो गया है, जिससे दाम बढ़ गए हैं। अरब देशों में ईरानी हमलों के डर से सारे कारोबार ठप हैं। ऐसे में चिंता यह है कि वहां काम करने वाले एक करोड़ भारतीय क्या अब रोजगार में रहेंगे? क्या वे भारत में पैसे भेज पाएंगे? उनके वापस लौटने से बेरोजगारों की फौज में और इजाफा नहीं होगा ? दुनिया में रेमिटेंस से सबसे ज्यादा आय (120 अरब डॉलर) भारत की है। हमारे कुल रेमिटेंस का 38% खाड़ी देशों से आता है। तेल आयात पर भारत की निर्भरता 90% है। परिवहन के लिए भारत ने चीन की तरह ईवी पर शिफ्ट नहीं किया है, ना ही केमिकल फर्टिलाइजर्स का कच्चा माल भारत में पैदा होता है। हमें समय रहते आने वाली चुनौतियों के लिए तैयारी करनी होगी।


Date: 24-03-26

चीन अमेरिका से सीख रहा है कि ताइवान को कैसे हड़पें

ब्रह्मा चेलानी, ( पॉलिसी फॉर सेंटर रिसर्च के प्रोफेसर एमेरिटस )

पिछले वर्ष सत्ता में आने के बाद से ट्रम्प ने कैरेबियाई क्षेत्र से लेकर पूर्वी-प्रशांत और अफ्रीका से लेकर मध्य पूर्व तक सैन्य-हमलों के आदेश दिए हैं। उन्होंने वेनेजुएला पर हमला करके उसके नेता मादुरो का अपहरण कर लिया।

और अब उन्होंने इजराइल के साथ मिलकर ईरान से युद्ध छेड़ रखा है। इस बीच, अमेरिका क्यूबा पर भी चारों ओर से फंदा कस रहा है। उसे उम्मीद है कि इससे उत्पन्न होने वाली मानवीय-त्रासदी से घबराकर क्यूबा उसके लिए दरवाजे खोल देगा।

जैसे-जैसे ट्रम्प अंतरराष्ट्रीय कानूनों की बेधड़क अवमानना कर रहे हैं, चीन भी इससे सबक ले रहा है। ट्रम्प का क्यूबा-मॉडल तो शी जिनपिंग के सामने ताइवान को हड़पने का एक उपयोगी खाका प्रस्तुत करता है। यह इस बात का खुलकर मुजाहिरा है कि महाशक्तियां किस प्रकार से किसी देश को घुटनों पर लाने के लिए उसका गला घोंट सकती है।

आधुनिक समाज कुछ महत्वपूर्ण प्रणालियों- जैसे भोजन, जल, परिवहन और संचार पर निर्भर करते हैं। लेकिन एक प्रणाली इन सब पर हावी है : ऊर्जा। बिजली से ही पानी के पम्प, रेफ्रिजरेशन, स्वास्थ्य सेवाएं, डिजिटल नेटवर्क, औद्योगिक-कृषि उत्पादन संचालित होते हैं।

जैसे ही बिजली ग्रिड फेल होती है, अन्य सभी महत्वपूर्ण प्रणालियां चरमराने लगती हैं और सामाजिक स्थिरता के समक्ष खतरे उत्पन्न हो जाते हैं। यही कारण है कि जो देश बिजली उत्पादन के लिए आयातित ईंधन पर अत्यधिक निर्भर हैं, वे मूलतः असुरक्षित होते हैं।

क्यूबा लंबे समय से मुख्यतः वेनेजुएला और मैक्सिको से खरीदे गए तेल पर निर्भर रहा है। ट्रम्प ने उसकी इसी असुरक्षा का फायदा उठाते हुए ईंधन आपूर्ति पर पूर्ण नाकाबंदी लागू कर दी है। लाखों लोग बिजली से वंचित हो गए हैं।

जल-पम्पिंग स्टेशन बंद हो गए हैं। ट्रैक्टर और डिलीवरी ट्रक निष्क्रिय पड़े हैं, जिससे खाद्य कीमतों में उछाल आ गया है और खाद्य संकट बढ़ता जा रहा है। अस्पताल अनियमित ब्लैकआउट के बीच काम करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

शी जिनपिंग इससे सबक सीखकर ताइवान की भी इस प्रकार की दमनकारी घेराबंदी कर सकते हैं। वे ताइपेई पर मिसाइलें दागने या ताइवान के समुद्र तटों पर धावा बोलने के बजाय उसके चारों ओर एक समुद्री क्वारंटीन या कस्टम-निरीक्षण व्यवस्था घोषित कर सकते हैं, जिसमें चीनी तटरक्षक पोत ताइवानी बंदरगाहों की ओर जा रहे ऊर्जा टैंकरों को सुरक्षा जांच या तस्करी-विरोधी अभियानों के नाम पर रोक सकते हैं।

इस तरह के मामूली व्यवधान भी तेजी से आपूर्ति-अवरोध पैदा कर सकते हैं। चूंकि ताइवान अपने लगभग पूरे ईंधन (मुख्यतः एलएनजी) का आयात करता है और मुश्किल से दो सप्ताह के भंडार को ही बनाए रखता है, ऐसे में तट से दूर प्रतीक्षा कर रही एलएनजी टैंकरों की कतार कुछ ही हफ्तों में वहां शृंखलाबद्ध किल्लत को जन्म दे सकती है।

क्यूबा की तरह ताइवान को भी ब्लैकआउट का सामना करना पड़ सकता है, जिससे उसके जल-आपूर्ति और स्वास्थ्य-सेवा तंत्र बाधित होंगे। औद्योगिक उत्पादन- जिसमें वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था को संचालित करने वाले सेमीकंडक्टर संयंत्र भी शामिल हैं- ठप हो जाएगा।

चीन का मकसद ताइवान का तत्काल आत्मसमर्पण भले न हो, लेकिन इस तरह से वो धीरे-धीरे उसकी जड़ें कमजोर कर सकता है। वैसी स्थिति में चीन ताइवान में स्थिरता लाने या वहां के लोगों की रक्षा करने का हवाला देकर उसे हड़प सकता है।

वैसे भी ट्रम्प-युग में फ्रेंडली-टेकओवर को किसी कॉर्पोरेट-रीस्ट्रक्चरिंग जैसा बना दिया गया है। फॉर्मूला सरल है : किसी देश में समस्याएं पैदा करो और फिर उनका समाधान देने का हवाला देकर उसके अंदरूनी मामलों में दखल देने लगो।

अगर चीन ताइवान पर सीधे हमला बोलता है तो अन्य देशों को प्रतिक्रिया देने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। लेकिन अगर जहाजों के रूटीन निरीक्षणों का हवाला देकर ताइवान की आपूर्ति को बाधित कर दिया जाए तो वह किसी बड़ी सैन्य प्रतिक्रिया को उचित नहीं ठहराएगा। वैसे भी शी जिनपिंग ऐसी रणनीतियों के माहिर हैं, जिसके चलते उन्होंने दक्षिण चीन समुद्र और अन्य भौगोलिक क्षेत्रों में एक भी गोली चलाए बिना बड़े सामरिक लाभ हासिल किए हैं।

महाशक्तियां एक-दूसरे का बारीकी से मुआयना करती हैं। ऐसे में जो एक के लिए कारगर हो, वह दूसरे के लिए एक मिसाल बन जाता है। आज अमेरिका जो कर रहा है, वह चीन के लिए एक पूर्वाभ्यास और परीक्षण की तरह है।


Date: 24-03-26

विनिर्माण को बढ़ावा

संपादकीय

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने हाल ही में 33,660 करोड़ रुपये की स्कीम ‘भव्य’ ( भारत औद्योगिक विकास योजना ) को मंजूरी दी है। इसके तहत 100 प्लग पेंड प्ले वानी इस्तेमाल के लिए तैयार औद्योगिक पार्कों की स्थापना की जानी है। वह देश के विनिर्माण आधार को मजबूती देने, रोजगार निर्माण को बढ़ावा देने और कारोबारी सुगमता में सुधार करने की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण कदम है ये पार्क 33,000 एकड़ में फैले होंगे और इन्हें छह साल में तैयार किया जाएगा। ये उद्यमों के लिए पूर्व मंजुरी वाली जमीन, तैयार अधोसंरचना और एकीकृत सेवाएं मुहैया कराएंगे। इसके लिए राज्यों की ओर से मजबूत एकल खिड़की मंजूरी प्रणाली और नियमन में ढोल जैसे उपाय अपनाए जाएंगे। मूल बुनियादी ढांचे मसलन आंतरिक संपर्क के लिए सड़कों, अंडरग्राउंड सुविधाओं, नाली और साझा सुविधाओं आदि के लिए एक करोड़ रुपये प्रति एकड़ की वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी। अनुमान बताते हैं कि इससे करीब 15 लाख प्रत्यक्ष रोजगार तैयार हो सकते हैं और क्लस्टर आधारित विकास के जरिये घरेलू आपूर्ति श्रृंखला मजबूत हो सकती है।

धोलेरा विशेष निवेश क्षेत्र, शेंद्रा-बिडकिन औद्योगिक क्षेत्र, विक्रम उद्योगपुरी और ब्रेटर नोएडा औद्योगिक क्षेत्र जैसे मौजूदा औद्योगिक केंद्र ‘प्लग ऐंड प्ले इकोसिस्टम की संभावनाओं को अच्छी तरह से दर्शाते हैं, जहां पूर्व स्वीकृत भूमि, एकीकृत बुनियादी ढांचा और मल्टीमॉडल कनेक्टिविटी तेज औद्योगिकीकरण को संभव बनाते हैं। राष्ट्रीय औद्योगिक कॉरिडोर विकास निगम, जो वर्तमान में 13 राज्यों में 20 परियोजनाओं को लागू कर रहा है, उसने दिखाया है कि ऐसे मॉडल प्रवेश बाधाओं को कम करके और परियोजना की तत्परता में सुधार करके सूक्ष्म, लघु और मध्यम उच्चनों (एमएसएमई) के साथ-साथ बड़े व्यवसायों को भी आकर्षित कर सकते हैं। हालांकि निर्माण में देरी और कार्य पूरा करने के लिए लंबी समयसीमा जैसी चुनौतियां अक्सर लागत यदा देती हैं और निवेशकों के विश्वास को कमजोर करती हैं।

अतीत के अनुभवों में चेतावनी देने वाला सबक भी छिपा है। विभिन्न राज्यों में कई औद्योगिक क्षेत्र ऐसे हैं जिनका पूरा इस्तेमाल नहीं हो सका। उदाहरण के लिए कर्नाटक के कुछ पार्को में कुल आवंटित इकाइयों की केवल 25 फीसदी ही संचालित हैं। इसकी वजह खराब कनेक्टिविटी, कमजोर संचालन नियामकीय देरी और मांग की कमी आदि हैं। इसी प्रकार कई विशेष आर्थिक क्षेत्र और औद्योगिक कॉरिडोर विभिन्न दिक्कतों से जूझते रहे हैं।

आंतरिक बुनियादी ढांचे को बाहरी नेटवर्क जैसे राजमार्गो, रेल मालवाहक कॉरिडोर और बंदरगाहों के साथ समन्धित करने में देरी अक्सर औद्योगिक पार्कों के परिचालन को बाधित कर देती है।

भूमि और बुनियादी सुविधाएं तैयार होने पर भी कंपनियों को बिजली, पानी और डिजिटल कनेक्टिविटी तक भरोसेमंद तरीके से पहुंचने में रुकावटों का सामना करना पड़ता है, जिससे परिचालन लागत बढ़ती है और प्रतिस्पर्धात्मकता में कमी आती है। यह दर्शाता है कि ‘कारोबारी सुगमता’ केवल नीति निर्माण का विषय नहीं है, बल्कि जमीनी स्तर पर निरंतर क्रियान्वयन और विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय का भी है।

सफल होने के लिए, भव्य को क्रियान्वयन पर ध्यान देना होगा। योजना का जोर पीएम गतिशक्ति के साथ एकीकरण के माध्यम से निर्वाध रूप से ‘अंतिम सिरे तक संपर्क’ सुनिश्चित करने पर है, जिससे लॉजिस्टिक्स लागत कम होगी और प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी। विश्वसनीय बिजली, पानी और डिजिटल ढांचा जिन्हें भूमिगत यूटिलिटी कॉरिडोर जैसी सुविधाओं का समर्थन प्राप्त हो निरंतर औद्योगिक संचालन सुनिश्चित करने के लिए गारंटीशुदा होना चाहिए । योजना की चुनौती आधारित चयन प्रक्रिया के तहत उच्च गुणवत्ता वाली, निवेश के लिए तैयार प्रस्तावों को प्राथमिकता देनी चाहिए और इलेक्ट्रॉनिकी, वस्त्र, औषधि और पर्यावरण के अनुकूल विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में क्षेत्र विशिष्ट क्लस्टरिंग को बढ़ावा देना चाहिए। इन पार्कों को कौशल विकास इकोसिस्टम से जोड़ना भी आवश्यक है ताकि रोजगार सृजन समावेशी और टिकाऊ हो।