दाल उत्पादक किसानों का हित साधना होगा
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भारत-अमेरिका व्यापार समझौता अपने अंतिम रूप में है। इसको लेकर सरकार पर आरोप भी लगाए जा रहे हैं कि समझौते में सरकार ने किसानों के हितों को ध्यान में नहीं रखा है। दालों को लेकर ऐसा सच सामने आ रहा है।
कुछ बिंदु –
- हाल के वर्षों में भारत का दाल उत्पादन लगभग 2.5 करोड़ टन रहा है। जबकि मांग तीन करोड़ होने का अनुमान है। इस कमी को आयात से पूरा किया जाता है।
- दालों से पाँच करोड़ किसान जुड़े हुए हैं।
- दालें गैर-अनाज प्रोटीन भोजन के लगभग एक चौथाई की पूर्ति कर देती हैं।
- दालों के उपभोग की मांग को सरकार आयात नीति, मूल्य स्थिरता और सशर्त एमएसपी खरीद के मिलेजुले तरीके से संतुलित रखती है।
- दालों के लिए निश्चित समर्थन मूल्य न होने से बिक्री का भी निश्चित तंत्र नहीं है। 2019-24 के बीच मूल्य समर्थन योजना के तहत सरकारी खरीद 2.9% और 12.4% के बीच ऊपर-नीचे होती रही है। कई राज्यों में बिक्री केंद्र बहुत कम रहे। इससे किसानों को इसे निजी व्यापारियों को बेचना पड़ा। इससे किसानों को दाल उगाने का प्रोत्साहन नहीं मिलता है।
- इसके अलावा, अमेरिका का कहना है कि होने वाले व्यापार समझौते में भारत को दाल खरीदने के लिए मजबूर किया जा रहा है। इसका मतलब है कि सरकार किसानों के हितों के खिलाफ आयात करने के लिए तैयार हो गई है। 2020-21 में ऐसी ही आशंकाओं को लेकर कृषि-कानूनों का विरोध किया गया था।
फिलहाल, सरकार के पास अमेरिकी शर्तों का अगर कोई विकल्प नहीं है, तो किसानों की रक्षा के लिए संरचनात्मक सुधार किए जाने चाहिए। इससे ही खाद्य सुरक्षा भी सुनिश्चित हो सकेगी।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 13 फरवरी 2026