वीबी-जी राम जी से जुड़े वादें और चुनौतियाँ

Afeias
31 Jan 2026
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पिछले लगभग दो दशकों से महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना ने ग्रामीण संकट के समय रोजगार को अधिकार की तरह पाने में मदद की। कोई भी ग्रामीण 100 दिनों के रोजगार की मांग कर सकता था तथा प्रशासन द्वारा इसे समय से पूरा करना भी अनिवार्य था। यह सिर्फ बजट तक सीमित योजना न थी बल्कि श्रम बाजार में अस्थिरता के दौर में बीमा की तरह काम करती थी। 2024-25 में 2.9 अरब कार्य दिवस का रोजगार दिया गया, जिसमें 58.15% महिलाएँ थी।

अब मनरेगा को विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड अजीविका मिशन अधीनियम 2025 कर दिया गया है। इसमें अधिक रोजगार दिवसों की गारंटी, टिकाऊ संपत्ति बनाने पर जोर, कड़ी निगरानी और विकास प्राथमिकताओं के साथ बेहतर तालमेल पर जोर दिया गया है। लेकिन अब यह योजना अधिक नियंत्रण वाली हो गई है। इस अधिनियम के तहत बनाई गई सम्पत्तियाँ जलवायु अनुकूलन से प्रेरित होंगी। इससे कृषि उत्पादन एवं ग्रामीण आय व पानी की उपलब्धता में भी लाभ होगा।

इससे जुड़े वायदे और चुनौतियाँ –

  • इस योजना के तहत 100 की जगह 125 दिन रोजगार दिया जाएगा। लेकिन यह विचारणीय बिंदु है कि पिछले 4 सालों से औसत रोजगार 52.24 दिन ही रहा है। इसीलिए मांग की फंडिंग की स्वीकृति व क्रियान्वयन ज्यादा महत्वपूर्ण है न कि दिनों की संख्या।
  • मांग संचालित योजना अस्थिरता के समय अधिक उपयोगी होती है और यह श्रम प्रधान भी होनी चाहिए। जबकि उच्च गुणवत्ता वाले बुनियादी ढ़ाँचे के लिए लंबी अवधि के कार्यदिवसों की जरूरत होती है। इससे योजना में लचीलापन नहीं रहता। इसी कारण जरूरत के समय योजना कितना काम आएगी, इसमें अनिश्चितता है।
  • मनरेगा की फंडिंग मांग पर आधारित थी। इसीलिए आर्थिक झटकों के समय व्यय बढ़ाया जाता था। इसके कारण व्यापक आर्थिक स्थिरता आती थी। लेकिन इस योजना के तहत यह तर्क कमजोर कर दिया गया है। इसमें अतिरिक्त फंडिंग भी राज्यों पर निर्भर होगी। जो राज्य गरीब हैं, वे इस कारण से योजना मंजूरी में देरी कर सकते हैं। इससे उप-राष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक अस्थिरता बढ़ सकती है।
  • भारत का श्रम बाजार अलग-अलग हिस्सों में बंटा हुआ है। परिवारों की आर्थिक स्थिति भी नाजुक होती है इसीलिए बोवाई व कटाई के समय 60 दिन का मौसमी अंतराल भी गलत सोच पर आधारित है।
  • भूमिहीन परिवारों, महिला श्रमिकों और स्वास्थ्य या कर्ज से जूझ रहे लोगों के लिए मनरेगा योजना एक सुरक्षा कवच थी। जबकि वीबी जी राम जी को कैलेंडर में श्रम दिवसों का निलंबन इस योजना की सफलता पर प्रश्न चिन्ह् लगाता है।

बड़ा सवाल यह नही है कि वीबी-जीरामजी ज्यादा कार्यदिवसों का सृजन करेगी या बेहतर परिसम्पत्तियों का सृजन करेगी, बल्कि यह है कि यह किस तरह के राज्य की कल्पना करेगी? प्रशासनिक दूरदर्शिता व आत्मविश्वास से परिपूर्ण यह नियंत्रण गलत भी हो सकता है। इस योजना की वास्तविक परीक्षा यह होगी कि यह बुरे समय में कितना स्थिरता का सहारा बनती है या सिर्फ अच्छे समय में कुशलता से काम करती है।

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