26-09-2026 (Important News Clippings)

Afeias
26 Sep 2026
A+ A-

To Download Click Here.


Date: 26-09-26

Overweight and weak

The United Nations is unwieldy, and needs to move away from superpower hegemony

Editorial

The 81st session of the United Nations General Assembly (UNGA) could have been written off as just another year, with another set of speeches delivered on the global multilateral stage. However, this year, the UN’s annual Summit has a unique sense of urgency. This is UN Secretary-General (UNSG) António Guterres’s final session, after a tenure marked by a record number of global crises, conflicts, pandemics, climate disasters and the advent of a dangerous age of Artificial Intelligence. Not since the Second World War have there been so many conflicts; one study recorded more than 65 conflicts across 35 countries in 2025, the highest since 1946. Growing polarisation on every major issue, wars by global superpowers in violation of the UN charter, nuclear threats and the imposition of unilateral and illegitimate sanctions have weakened the UN, which at 81 seems overweight, weak and unrepresentative of the world. This makes it an important year for the world to unite in favour of a strengthened and reformed UN while choosing the next UNSG to guide that process over the next decade. This is an important year for South Asia too, with the election of Bangladesh’s Foreign Minister Khalilur Rahman as the President of the UNGA’s 81st session; he will oversee the UNSG’s selection. It was disappointing that the world’s most powerful leaders and those at the heart of the conflicts in Ukraine, Gaza and the Persian Gulf failed to suggest solutions for the future. U.S. President Donald Trump spoke about the possible “annihilation” of Iran, and defended U.S. actions in Venezuela. Much to India’s chagrin, he again claimed to have negotiated peace in conflicts including the 2025 India-Pakistan four-day war. Iranian President Masoud Pezeshkian referred to the U.S. and Israel as “murderers, terrorists and assassins”. The Russian President skipped the session, while the U.S. denied visas to the Palestinian delegation. An initiative led by the European Union and a few other countries, co-sponsored by India, to build a Partnership for Multilateralism (P4M) beyond superpower hegemony is well-meaning, but was drowned out by the rancour at this year’s UNGA.

For India, this year was significant as the Narendra Modi government launched a campaign for a second two-year non-permanent term in the UN Security Council in 2028-29. It was therefore surprising that Mr. Modi decided to skip the UNGA speech this year, and the multilateral summits on the side-lines, fresh from his hosting of the Delhi BRICS Summit. India’s voice, of a balancing power that speaks for a rules-based international order based on the UN Charter, diplomacy and dialogue, is needed more than ever amidst the global warmongering.


Date: 26-09-26

ट्रम्प ने चीन पर 100 प्रतिशत टैरिफ क्यों स्थगित किया?

संपादकीय

राष्ट्रपति ट्रम्प का शी जिनपिंग के स्वागत में कुछ ज्यादा मोटी लाल कालीन बिछाना’ पाकिस्तान में चुने हुए पीएम से ज्यादा फील्ड मार्शल को तरजीह देकर पारिवारिक बिजनेस करना और तुर्किये के अधिनायकवादी शासक एर्दोगन की यूएन पटल से प्रशंसा करना भारत के लिए चिंता का विषय है। सवाल यह नहीं कि बहु-पक्षीय दोस्ती में खोट है। समस्या यह है कि तीनों देश ऐतिहासिक रूप से भारत के प्रति वैमनस्यता दिखाते रहे हैं। जिन तर्कों के आधार पर ट्रम्प ने चीन और भारत सहित कुछ देशों पर 100% टैरिफ लगाने की कानूनी शक्ति हासिल की, वे आज भी कायम हैं। फिर क्यों चीन के खिलाफ 100% टैरिफ को अगले साल जनवरी तक स्थगित कर दिया गया? क्या चीन ने रूस से तेल खरीदना बंद कर दिया? इसका कारण है कि ट्रम्प की हेकड़ी केवल कमजोरों पर चलती है। फ्रांस, जर्मनी, बेल्जियम और इटली यह समझ गए। जैसे ही वे तन कर खड़े हुए. ट्रम्प को नाटो को धमकाने, कनाडा को यूएस में शामिल करने जैसा राग धीमा करना पड़ा। चीन ट्रम्प की मजबूरी है, क्योंकि दुनिया में 90% रेयर – अर्थ की सप्लाई उसके ही पास है। सोयाबीन और मक्का किसान ट्रम्प के प्रमुख वोटर्स हैं और चीन इन उत्पादों का प्रमुख खरीदार। लेकिन क्या ‘मोटी लाल कालीन’ भावशून्य जिनपिंग को लचीला बना पाएगी ?


Date: 26-09-26

स्वस्थ भारत लेबल से ही नहीं, बेहतर खाद्य व्यवस्था से बनेगा

डॉ. चन्द्रकान्त लहारिया, ( जाने माने चिकित्सक )

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद भारत में पैकेटबंद खाद्य पदार्थों के सामने चेतावनी लेबल लगाने की दिशा में प्रगति हुई है। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण ने प्रस्ताव दिया है कि जिन खाद्य पदार्थों में चीनी, नमक या संतृप्त वसा अधिक हो, उनके पैकेट के सामने लाल षट्कोण में ‘हाई शुगर’, ‘हाई साल्ट’ या ‘हाई फैट’ जैसी चेतावनी लिखी जाए। उपभोक्ता को यह जानने का अधिकार है कि वह जो खरीद रहा है, उसमें स्वास्थ्य के लिए चिंता पैदा करने वाले तत्व कितनी मात्रा में हैं।

अभी किसी बिस्किट, नमकीन, खाद्य या पेय की पैकिंग के सामने बड़े अक्षरों में ‘हाई प्रोटीन’, ‘मल्टीग्रेन’, ‘नेचुरल’ या ‘विटामिन युक्त’ लिखा होता है, जबकि चीनी, नमक और वसा की जानकारी पीछे छोटे अक्षरों में छिपी रहती है। सामान्य ग्राहक मार्केट में खड़े होकर पोषण तालिका का गणित नहीं करता। इसलिए पैकेट के सामने चेतावनी उपभोक्ता के अधिकार का प्रश्न है। कनाडा में जनवरी 2026 से ऐसे पैकेटबंद खाद्य पदार्थों पर सामने स्पष्ट प्रतीक अनिवार्य हैं, जिनमें संतृप्त वसा, शुगर या सोडियम तय सीमा से अधिक है। चिली, मैक्सिको और कई अन्य देशों ने भी चेतावनी-आधारित मॉडल अपनाए हैं। चिली में 2016 में चेतावनी चिह्न लागू होने के बाद मीठे पेयों की खरीद में गिरावट देखी गई। जब जानकारी साफ और तुरंत समझ आने वाली हो, तो वह व्यवहार को प्रभावित कर सकती है।

लेकिन प्रस्ताव में कमियां भी हैं। पहले चरण में चेतावनी तभी लगाने की बात है जब तीन चिंताजनक पोषक तत्वों में से कम से कम दो निर्धारित सीमा से अधिक हों। इस प्रावधान के साथ समस्या है, जैसे कि अत्यधिक चीनी वाला कोई उत्पाद केवल इसलिए चेतावनी से बच जाए क्योंकि उसमें नमक और वसा कम हैं। सिद्धांत सरल होना चाहिए- यदि चीनी अधिक है तो चीनी की चेतावनी, नमक अधिक है तो नमक की, और संतृप्त वसा अधिक है तो उसकी। चेतावनी इतनी बड़ी और स्पष्ट हो कि खरीदते समय दिखाई दे।

यह भी याद रखना होगा कि अभी प्रस्ताव कानून नहीं बना है। भारत में फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग पर चर्चा एक दशक से चलती रही है। अनेक मसौदे, समितियां और परामर्श हुए, लेकिन अंतिम निर्णय टलता रहा। ऐसे उपाय अनिश्चितकालीन विचार-विमर्श में नहीं फंसने चाहिए। उद्योग को बदलाव के लिए उचित समय मिले, पर समयसीमा स्पष्ट हो। फिर भी चेतावनी लेबल को बढ़ते मोटापे और अस्वस्थ खान-पान की जादुई दवा समझना गलती होगी। भोजन का चुनाव कीमत, उपलब्धता, विज्ञापन, आदत, परिवार, स्वाद और सामाजिक परिवेश से तय होता है। जिस बच्चे को दिन भर विज्ञापनों में जंक फूड दिखाया जा रहा हो, उसके लिए पैकेट का लाल निशान पर्याप्त नहीं होगा।

इसलिए समाधान समग्र होना चाहिए। अस्वस्थ खाद्य विज्ञापनों पर कड़े नियम हों, स्कूलों के आसपास स्वस्थ भोजन उपलब्ध हो, मीठे पेयों और अत्यधिक अस्वस्थ उत्पादों पर कर जैसे उपायों पर विचार हो, कंपनियों को उत्पादों में नमक, चीनी और वसा घटाने के लिए प्रोत्साहित किया जाए और फल, दाल, दूध, मोटे अनाज तथा कम-प्रोसेस्ड भोजन को सुलभ बनाया जाए। पोषण शिक्षा जरूरी है, लेकिन पूरी जिम्मेदारी उपभोक्ता पर डालना अनुचित है। लेबल के साथ ऐसी नीतियां भी चाहिए जो उद्योगों को स्वास्थ्यकर उत्पाद बनाने के लिए प्रेरित करें। फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी न तो खाद्य उद्योग के खिलाफ अभियान है, न यह तय करती है कि कोई खाद्य पदार्थ कभी खाया ही न जाए। इसका उद्देश्य इतना है कि खरीद का फैसला भ्रम या चमकदार विज्ञापन के बजाय स्पष्ट जानकारी के साथ हो।

इसलिए हमें दो अतियों से बचना चाहिए- यह कहना कि लेबल सब बदल देगा और क्योंकि वह सब नहीं बदल सकता, इसलिए उसकी जरूरत नहीं। सार्वजनिक स्वास्थ्य में अकसर परिणाम किसी एक बड़े कदम से नहीं, बल्कि कई छोटे और सही कदमों के साथ आने से बनते हैं। भारत को इसे स्पष्ट, मजबूत और शीघ्र लागू करना चाहिए। साथ ही समझना चाहिए कि स्वस्थ भारत केवल बेहतर लेबल से नहीं, बेहतर खाद्य व्यवस्था से बनेगा।


Date: 26-09-26

तकनीक के मोर्चे पर छाप छोड़ता भारत

डॉ. दीपक कोहली, ( लेखक भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं )

इक्कीसवीं सदी के वैश्वीकृत और प्रौद्योगिकी-संचालित संसार में जिस वस्तु को आधुनिक सभ्यता का अदृश्य हृदय कहा जा सकता है, वह अति-सूक्ष्म सेमीकंडक्टर चिप है। जिस प्रकार बीसवीं सदी के वैश्विक भू-राजनीतिक एवं आर्थिक समीकरणों को कच्चे तेल की उपलब्धता और नियंत्रण ने आकार दिया था, ठीक उसी प्रकार आज की डिजिटल और कृत्रिम बुद्धिमत्ता चालित दुनिया में सेमीकंडक्टर चिप्स वैश्विक शक्ति का नया केंद्र बन चुके हैं। स्मार्टफोन, इलेक्ट्रानिक उपकरणों से लेकर आटोमोबाइल, रक्षा प्रणालियों, एयरोस्पेस, चिकित्सा उपकरणों, संचार और उन्नत सुपरकंप्यूटिंग तक, आधुनिक जीवन का शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र बचा हो, जो इन सूक्ष्म सिलिकान चिप्स पर निर्भर न हो। ऐसे निर्णायक दौर में भारत ने केवल एक उपभोक्ता राष्ट्र बने रहने के बजाय स्वयं को सेमीकंडक्टर निर्माण के वैश्विक मानचित्र पर स्थापित करने का जो संकल्प लिया है, उसे ‘सेमीकान इंडिया’ पहल के नाम से जाना जाता है।

भारत सरकार ने देश को सेमीकंडक्टर निर्माण का एक मजबूत वैश्विक केंद्र बनाने के लिए प्रारंभिक वित्तीय परिव्यय के साथ ‘राष्ट्रीय सेमीकंडक्टर मिशन’ और सेमीकान इंडिया कार्यक्रम की आधारशिला रखी है। वैश्विक सेमीकंडक्टर सम्मेलन ‘सेमीकान इंडिया 2026’ के मंच से प्रधानमंत्री मोदी के संबोधन ने भारत के इस परिवर्तनकारी संकल्प को वैश्विक विश्वसनीयता प्रदान की। सेमीकंडक्टर विनिर्माण प्रक्रिया को मुख्य रूप से तीन चरणों में विभाजित किया जाता है- डिजाइनिंग, फैब्रिकेशन और संयोजन एवं पैकेजिंग। भारत की रणनीतिक योजना इन तीनों चरणों को समानांतर रूप से मजबूत करने की है। भारत के पास पहले से ही चिप डिजाइनिंग की क्षमता मौजूद है। दुनिया की लगभग सभी प्रमुख चिप डिजाइन कंपनियों के बड़े अनुसंधान और विकास केंद्र भारत में स्थित हैं। सेमीकान इंडिया के अंतर्गत शुरू की गई ‘डिजाइन-संबद्ध प्रोत्साहन’ योजना का उद्देश्य घरेलू स्तर पर भारतीय स्टार्टअप्स और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों को अपनी बौद्धिक संपदा विकसित करने और स्वदेशी चिप्स डिजाइन करने के लिए वित्तीय और तकनीकी संसाधन प्रदान करना है। जब भारतीय इंजीनियरों द्वारा भारत में ही चिप्स डिजाइन किए जाएंगे और उनका निर्माण भी घरेलू संयंत्रों में होगा, तब वास्तविक रूप में तकनीकी स्वावलंबन का सपना साकार होगा। फैब्रिकेशन और संयोजन के स्तर पर भारत ने जिस त्वरित गति से कदम बढ़ाए हैं, वह आधुनिक औद्योगिक इतिहास में अभूतपूर्व है। असेंबली, टेस्टिंग और पैकेजिंग इकाइयां सेमीकंडक्टर मूल्य शृंखला का वह महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इन इकाइयों की स्थापना से भारत को त्वरित सफलता मिल रही है, जिससे देश में बुनियादी औद्योगिक ढांचा तैयार हो रहा है और साथ ही हजारों उच्च-कुशल रोजगार के अवसर पैदा हो रहे हैं। इसके समानांतर, उच्च-स्तरीय सिलिकान वेफर फैब्रिकेशन संयंत्रों की स्थापना से भारत उस विशिष्ट श्रेणी वाले देशों के समूह में शामिल होने जा रहा है, जिनके पास उन्नत नैनोमीटर स्तर की चिप्स बनाने की क्षमता है।

सेमीकंडक्टर उद्योग दुनिया के सबसे कठिन और अनिश्चित उद्योगों में से एक माना जाता है। आज जो तकनीक अत्याधुनिक है, वह पांच साल बाद पुरानी और अप्रासंगिक हो सकती है। ऐसे में भारत को न केवल वर्तमान तकनीकों जैसे 28 नैनोमीटर, 40 नैनोमीटर या उससे अधिक के पारंपरिक चिप्स जो आटोमोबाइल और बिजली उपकरणों में प्रयुक्त होते हैं, पर ध्यान केंद्रित करना होगा, बल्कि अगली पीढ़ी की तकनीकों जैसे दो नैनोमीटर, गैलियम नाइट्राइड, सिलिकान कार्बाइड और सिलिकान फोटोनिक्स आधारित यौगिक सेमीकंडक्टर्स में भी अनुसंधान और विकास को निरंतर गति देनी होगी। इसके लिए सतत वित्तीय निवेश, दीर्घकालिक नीतिगत निरंतरता और निजी उद्योगों के बीच अटूट तालमेल की आवश्यकता है। एक और प्रमुख चुनौती पर्यावरण और बुनियादी ढांचे से जुड़ी है। सेमीकंडक्टर विनिर्माण में बड़े पैमाने पर बिजली और पानी की खपत होती है। बिजली का बाधित होना या पानी में सूक्ष्म अशुद्धि का होना अरबों रुपये के सिलिकान वेफर्स को एक झटके में नष्ट कर सकता है। इसलिए भारत को अपने सेमीकंडक्टर पार्कों में निर्बाध, विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचा और शून्य-दोष गुणवत्ता सुनिश्चित करनी होगी।

सेमीकान इंडिया का लक्ष्य केवल पारंपरिक सिलिकान-आधारित चिप्स तक सीमित नहीं है। भारत भविष्य की तकनीकों, जैसे क्वांटम कंप्यूटिंग, फोटोनिक्स, आप्टोइलेक्ट्रानिक्स और एआइ के लिए विशेष रूप से डिजाइन किए गए चिप्स के क्षेत्र में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने को तत्पर है। जैसे-जैसे दुनिया 6जी संचार, स्वायत्त वाहनों, स्मार्ट ग्रिड्स और रोबोटिक्स की ओर बढ़ रही है, वैसे-वैसे अत्यधिक कुशल और कम बिजली खपत करने वाले चिप्स की मांग तेजी से बढ़ेगी। भारत यदि समय रहते इन उभरती तकनीकों में अपनी अग्रणी स्थिति बना लेता है तो वह अगली औद्योगिक क्रांति का नेतृत्व करने वाले अग्रिम पंक्ति के देशों में शामिल हो जाएगा।


Date: 26-09-26

देसी पर्यटन के लिए अलग नीति

संपादकीय

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा किए गए नवीनतम घरेलू पर्यटन व्यय सर्वेक्षण से पता चलता है कि भारत की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार देसी पर्यटन है। भारत के पर्यटन क्षेत्र ने परंपरागत रूप से विदेशी पर्यटकों, विदेशी मुद्रा आय और छुट्टियों के दौरान की जाने वाली उच्च मूल्य वाली यात्राओं पर काफी जोर दिया है। वर्ष 2023-24 में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में पर्यटन का 5.22 फीसदी योगदान होने का सरकारी अनुमान है, जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 8.46 करोड़ नौकरियां पैदा करता है। यह अर्थव्यवस्था के कुल रोजगार में लगभग 13.3 फीसदी योगदान है।

विश्व यात्रा एवं पर्यटन परिषद का अनुमान है कि 2025 में देसी पर्यटकों द्वारा किया गया खर्च 203 अरब डॉलर या लगभग 17.7 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो भारत के कुल यात्रा एवं पर्यटन खर्च का 86 फीसदी है और इसमें सालाना 10 फीसदी से अधिक की वृद्धि हुई है। जुलाई 2025 से जून 2026 के बीच किए गए सर्वेक्षण के आंकड़े इस देसी बाजार की स्थिति को समझने में सहायक हैं और यह भी दर्शाते हैं कि इस पर अधिक नीतिगत ध्यान देने की आवश्यकता क्यों है। जहां 36.1 फीसदी परिवारों ने रात भर की यात्रा की सूचना दी, वहीं 58.2 फीसदी ने एक ही दिन की यात्रा की। इससे भी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इस यात्रा का अधिकांश हिस्सा छुट्टियों से संबंधित नहीं है। देश में रात भर की यात्राओं में से लगभग 48 फीसदी तीर्थयात्रा या अन्य धार्मिक उद्देश्यों के लिए थीं, जबकि स्वास्थ्य और चिकित्सा संबंधी यात्राएं 29.6 फीसदी थीं। इनमें से ग्रामीण भारत में 38.4 फीसदी, जबकि शहरी भारत में 16.5 फीसदी यात्राएं की गईं।

चिकित्सा संबंधी यात्राओं के आंकड़े विशेष रूप से चिंताजनक हैं। ऐसी यात्राएं सबसे महंगी होती हैं, ग्रामीण क्षेत्रों में औसतन 29,454 रुपये और शहरी क्षेत्रों में 41,649 रुपये प्रति यात्रा खर्च होती है। ग्रामीण परिवार इस खर्च का लगभग 75 फीसदी दवाओं और अन्य उपचार संबंधी मदों पर खर्च करते हैं, जबकि सरकारी प्रतिपूर्ति केवल 8.2 फीसदी ही होती है। उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और बिहार में मिलाकर स्वास्थ्य और चिकित्सा संबंधी रात्रिकालीन यात्राओं का 30 फीसदी से अधिक हिस्सा होता है। यह स्वास्थ्य देखभाल क्षमता में असमानता की व्यापक समस्या को दर्शाता है। जिन परिवारों को स्थानीय स्तर पर विशेष स्वास्थ्य देखभाल उपलब्ध न होने के कारण यात्रा करनी पड़ती है, उनके लिए यह स्वैच्छिक पर्यटन खर्च नहीं है। यह स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं की अपर्याप्त उपलब्धता के कारण होने वाला खर्च है। इसलिए, चिकित्सा संबंधी यात्राओं को कम करने के लिए जिला अस्पतालों, निदान सुविधाओं और विशेषज्ञों की उपलब्धता में निवेश की आवश्यकता है, विशेष रूप से ग्रामीण भारत में। इससे यात्रा की आवश्यकता और वित्तीय बोझ दोनों को कम किया जा सकता है।

सर्वेक्षण के आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि देसी पर्यटन मुख्य रूप से सड़क और रेल नेटवर्क पर निर्भर है। ग्रामीण क्षेत्रों में रात भर की यात्रा वाले पर्यटकों की यात्राओं में बसों का हिस्सा 32 फीसदी था, जबकि शहरी क्षेत्रों में ट्रेनों का हिस्सा 35.1 फीसदी था। किराये पर लिए परिवहन का ग्रामीण यात्राओं में 30.4 फीसदी हिस्सा था। आमतौर पर ठहरने की जगह पारंपरिक होटल बाजार से बाहर होती है। ग्रामीण क्षेत्रों के रात भर रुकने वाले पर्यटकों में से केवल 16.7 फीसदी ने होटल या गेस्ट हाउस का उपयोग किया, 13.5 फीसदी मित्रों और रिश्तेदारों के यहां रुके और 27.7 फीसदी ने अन्य गैर-व्यावसायिक आवास का उपयोग किया।

इसलिए, यह केवल पर्यटन की कहानी नहीं है, बल्कि स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच, सार्वजनिक परिवहन और क्षेत्रीय विकास की कहानी भी है। ग्रामीण यात्रा में बसों और शहरी यात्रा में ट्रेनों की प्रधानता को देखते हुए, नीति में एक संकीर्ण होटल-और-हवाई अड्डे मॉडल के बजाय किफायती कनेक्टिविटी, स्वच्छता, आवास और स्वास्थ्य सेवा नेटवर्क को प्राथमिकता देनी चाहिए। तीर्थ स्थलों और अन्य अधिक भीड़भाड़ वाले स्थलों पर किफायती आवास भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। जिला स्वास्थ्य सेवा को मजबूत करने से महंगी चिकित्सा यात्राओं को कम किया जा सकता है। भारत को अंतरराष्ट्रीय और उच्च मूल्य वाले पर्यटन को बढ़ावा देना जारी रखना चाहिए, जिसका बहुत बड़ा गुणक प्रभाव हो सकता है, लेकिन देसी मांग के लिए एक अलग दृष्टिकोण की आवश्यकता है।


Date: 26-09-26

कच्चा तेल: दुनिया का सबसे बड़ा अप्रत्याशित कारक

मिहिर एस शर्मा

कच्चे तेल की कीमतें एक बार फिर 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि ईरान और अमेरिका की जंग जिसके खत्म होने की उम्मीद जताई जा रही थी वह पिछले कुछ सप्ताहों से फिर जोर पकड़ रही है। अगस्त में यह 80-90 डॉलर प्रति बैरल के करीब था। परंतु अब इस तरह का बदलाव अस्वाभाविक नहीं रह गया है। तेल और गैस बाजार अब अतीत के कई दशकों की तुलना में कहीं अधिक अप्रत्याशित हो चुका है। इसके लिए कई कारक जिम्मेदार हैं।

सबसे बड़ा और सबसे अप्रत्याशित रुझान लोकलुभावन नीतियों पर चलने वाले और अधिनायकवादी नेताओं का व्यवहार है। पहला बड़ा झटका 2022 में रूसी राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन के यूक्रेन पर हमला करने के फैसले से लगा। इसके चलते प्राकृतिक गैस की कीमतें आसमान छू गईं। इसके बावजूद काफी मुश्किल से हासिल हुई स्थिरता लौटती हुई दिखाई दे रही थी। लेकिन इसी साल की शुरुआत में अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ जंग छेड़ने का फैसला कर लिया।

दोनों ही मामलों में उम्रदराज नेता, चाहे वे अलग-थलग हों या आसानी से प्रभावित होने वाले, वे ऐसा मानते दिखाई दिए कि दूसरा पक्ष जवाबी कार्रवाई में सक्षम नहीं होगा और युद्ध जल्द खत्म हो जाएगा। इसके अलावा ऐसा लगता है कि पुतिन ने रूसी तेल और गैस के निर्यात पर लगाए जाने वाले व्यापक और लंबे समय तक चलने वाले प्रतिबंधों को अपने आकलन में शामिल ही नहीं किया।

लेकिन ऐसा भी नहीं था कि जब कोई विश्व नेता जानबूझकर बाजारों में खलल नहीं डाल रहा था तब बाजार बहुत अच्छी तरह काम कर रहे थे। उदाहरण के लिए 2024 के अंत में ज्यादातर अनुमान यह थे कि अगले साल यानी 2025 के दौरान तेल की कीमत करीब 75 डॉलर प्रति बैरल रहेगी लेकिन हकीकत में यह 68 डॉलर रही।

2026 के लिए तेल की कीमत का अनुमान करीब 61 डॉलर प्रति बैरल था लेकिन पूरे साल के दौरान वायदा बाजार में यह आंकड़ा इसके दोगुने तक पहुंचने की आशंका पैदा हुई है। ईरान द्वारा होर्मुज स्ट्रेट में लगाए गए प्रतिबंधों और रूस के सामने अपने तेल और गैस को बाजार तक पहुंचाने में बनी हुई मुश्किलों के अलावा अब हूती विद्रोहियों के कारण लाल सागर के भी बंद होने की आशंका के बीच पूर्वानुमान लगाने वालों को कई अन्य जटिलताओं को भी अपने आकलन में शामिल करना पड़ता है।

साल की दूसरी तिमाही में चीन ने कच्चे तेल का आयात प्रतिदिन करीब 35 लाख बैरल घटा दिया जो 2025 की इसी अवधि की तुलना में लगभग 30-32 फीसदी की गिरावट है। कुछ लोगों का मानना है कि इसका मतलब यह है कि चीन के पास कच्चे तेल का वाणिज्यिक और रणनीतिक भंडार पहले के अनुमान से कहीं अधिक है।

दूसरों का मानना है कि चीन अपनी अर्थव्यवस्था के व्यापक विद्युतीकरण का लाभ उठाते हुए तेल की मांग घटा रहा है या रूस के उस तेल और गैस को आयात करने के नए रास्ते तलाश रहा है जो अन्यथा बाजार में उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं। लेकिन किसी भी स्थिति में यह पता नहीं है कि चीन कितने समय तक तेल के आयात को इस तरह दबाए रख सकता है या फिर रणनीतिक रूप से मांग में इस मौजूदा कमी का कोई स्थायी परिणाम यह होगा कि चीन की मुख्य भूमि की तेल आयात मांग हमेशा के लिए कम हो जाए।

आगे की स्थिति को देखते हुए कई अन्य कारकों को भी ध्यान में रखना होगा। पेट्रोलियम उत्पादक देशों के संगठन (ओपेक) की स्थिति पहले से ही मुश्किल में थी क्योंकि 1970 के दशक में इसकी स्थापना के बाद कुछ ऐसे देश बड़े तेल निर्यातक बन गए जो ओपेक का हिस्सा नहीं थे जैसे अमेरिका। इस साल की शुरुआत में संयुक्त अरब अमीरात ने ओपेक से बाहर होने का फैसला किया। इससे सऊदी अरब के प्रभुत्व वाले इस समूह की भविष्य में तेल की कीमतें तय करने की क्षमता काफी कम हो जाती है।

फिर भी कीमतों पर ओपेक का पर्याप्त प्रभाव बना हुआ है। उसके पास एक ऐसा लक्ष्य है जो वैश्विक बाजार में तेल की संतुलित कीमत को प्रभावित करता है। लेकिन वह लक्ष्य क्या है? संभवतः वह सऊदी अरब की आंतरिक राजनीति की आगे की दिशा से तय होगा।

हालांकि प्राथमिकता उन विभिन्न तरीकों को आगे बढ़ाने की होगी जिनके जरिये सऊदी अरब की सरकार अपने नागरिकों तक आय पहुंचाती है क्योंकि राजनीतिक स्थिरता काफी हद तक उसके कल्याणकारी राज्य के विस्तार पर निर्भर हो सकती है। सऊदी अरब को अपना बजट संतुलित करने के लिए तेल की कीमत कितनी रखनी चाहिए इस बारे में अनुमान बहुत अलग-अलग है।

वर्ष 2023 में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) का अनुमान था कि यह कीमत 80 डॉलर प्रति बैरल होनी चाहिए। 2024 में उसी संस्था ने इसे 100 डॉलर के करीब माना, जबकि 2025 में आईएमएफ का अनुमान 90 डॉलर प्रति बैरल था।

इस संभावना को भी ध्यान में रखना होगा कि तेल के कुछ अन्य स्रोतों से फिर से उत्पादन शुरू हो जाए। यदि ईरान के साथ कोई समझौता होता है तो जाहिर है कि बाजार में केवल होर्मुज स्ट्रेट के जरिये अरब देशों का तेल बाहर आने की स्थिति ही नहीं बनेगी, बल्कि ईरान के तेल क्षेत्रों में भी उत्पादन उस स्तर तक पहुंच सकता है, जो एक दशक से अधिक समय से नहीं देखा गया है। वेनेजुएला की बात करें तो आर्थिक पतन और अंतरराष्ट्रीय अलगाव से पहले यह दक्षिण अमेरिकी तेल निर्यातक देश प्रतिदिन 30 लाख बैरल से अधिक तेल का उत्पादन करता था। 2025 में उसका निर्यात घटकर 8 लाख बैरल प्रतिदिन से भी कम रह गया। आखिर वह समझौता क्या है जिसे ट्रंप ने वेनेजुएला पर लागू किया है? यदि वहां से प्रतिदिन करीब 10 लाख बैरल अतिरिक्त तेल बाजार में आने लगे तो इसका कीमतों पर असर पड़ेगा।

सबसे महत्त्वपूर्ण संभावना यह है कि मौजूदा संकट कच्चे तेल से हटकर ऊर्जा के अन्य स्रोतों चाहे वे नवीकरणीय ऊर्जा हों या परमाणु ऊर्जा की ओर बदलाव को तेज कर सकता है। इस बदलाव का पूरा असर सामने आने में दशकों लग सकते हैं लेकिन इसके प्रभाव हमें उससे कहीं पहले दिखाई देने लग सकते हैं।

भारत ने मौजूदा उथलपुथल का सामना अधिकांश देशों की तुलना में बेहतर ढंग से किया है। लेकिन तथ्य यह है कि भारतीय अर्थव्यवस्था को बेहतर या बदतर दिशा में प्रभावित करने की सबसे अधिक क्षमता रखने वाले दो कारक माॅनसून की स्थिति और तेल की कीमत हैं। देश में इस समय अधिकारी यह तय करने में लगे होंगे कि 2027 के केंद्रीय बजट तैयार करते समय तेल की कीमत का अनुमान क्या हो। एक बात को लेकर हम निश्चित हो सकते हैं कि अपनी किसी गलती के कारण नहीं बल्कि परिस्थितियों के कारण उनका अनुमान गलत साबित होने वाला है।


Date: 26-09-26

नैतिकता के नाम पर

संपादकीय

एक सभ्य समाज अपने बीच उदारता और करुणा से लैस जीवन-मूल्यों की कद्र करता है और अपनी सोच-समझ के बरक्स अन्य लोगों या समुदायों की जीवन-पद्धतियों, जीने के तरीकों का भी सम्मान करता है। मगर इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि आज इक्कीसवीं सदी का सफर तय करते हमारे देश में आए दिन ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जिनमें किसी के निजी विचार या उसकी पसंद को न केवल नियंत्रित करने की कोशिश की जाती है, बल्कि ऐसा करने के लिए हिंसा या अपराध का भी सहारा लिया जाता है। हाल ही में बिहार के जमुई के अलावा बांका और समस्तीपुर में लगातार ऐसी घटनाओं के वीडियो प्रचारित हुए, जिनमें कुछ आपराधिक मानसिकता वाले लोगों ने रास्ते में लड़कियों के खिलाफ यौन हिंसा की या उनके दोस्त को भी मारा-पीटा। ऐसे मामले सामने आने के बाद पुलिस ने कानून के मुताबिक कदम उठाए, लेकिन इस दौरान एक बार फिर यह सवाल उठा कि महज नैतिकता के नाम पर लड़कियों या उनके दोस्त को प्रताड़ित करने का अधिकार किसी को किसने दे दिया !

एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में अगर दो लोग दूसरों के जीवन को बाधित किए बिना अपनी जिंदगी खुद तय करते हैं, तो इससे किसी को परेशानी नहीं होनी चाहिए। खासतौर पर दो युवा जब दोस्ती करते हैं, मिलते-जुलते हैं या फिर आगे चलकर प्रेम और विवाह करते हैं, तो यह उनका अपना चुनाव है और इसमें किसी भी अन्य को दखल देने का अधिकार नहीं है। इस संबंध में अदालतों ने भी समय-समय पर यह व्यवस्था दी है कि कोई भी वयस्क किसी से दोस्ती करने का अधिकार रखता है। मगर कुछ असामाजिक तत्त्व न तो अपने विचारों में सभ्यता और परिपक्वता लाने के लिए तैयार होते हैं और न ही इस संबंध में कानूनी तकाजों का खयाल रखना जरूरी समझते हैं। देश भर से ऐसे मामले सामने आते रहते हैं, जिनमें अराजक समूहों ने कहीं पार्क या रेस्तरां में जबरन घुस कर लड़के-लड़कियों या प्रेमी युगलों के खिलाफ अपमानजनक और हिंसक व्यवहार किया।

हैरानी की बात यह है कि एक ओर समाज अपनी रोजमर्रा की जीवनशैली में सभी आधुनिक सुविधाओं का उपभोग करना चाहता है, लेकिन सोच-समझ और पूर्वाग्रहों के मामले में उन्हीं प्रतिगामी मूल्यों को ढोता है, जो कई बार अमानवीय और आपराधिक भी होते हैं ऐसी घटनाएं कितनी शर्मनाक होती हैं, जिनमें कहीं बैठे या जा रहे युवक-युवती को रोक कर उन्हें सिर्फ नैतिकता के नाम पर अपमानित और प्रताड़ित किया जाता है। सच यह है कि कथित नैतिकता की पहरेदारी करने का दावा करने वाले लोग अपनी सोच-समझ में बेहद पिछड़े और संकीर्ण दायरे में सिमटे होते हैं। इसके अलावा, जब कोई जनप्रतिनिधि भी ‘शालीन तरीके से ‘ नैतिक पहरेदारी की वकालत करे, तो समझा जा सकता है कि एक जड़ मानसिकता वाले समाज को और ज्यादा पीछे करने में ऐसे नेता कितनी बड़ी भूमिका निभाते हैं। समूचे समाज के लिए एक जरूरी चिंता का मसला यह होना चाहिए कि लोगों के बीच यह कैसी प्रवृत्ति विकसित हो रही है या पल-बढ़ रही है कि वे किसी की निजी जिंदगी को अपने पूर्वाग्रहों के मुताबिक संचालित कर सकते हैं। इस तरह की आपराधिक मानसिकता का अगर विस्तार होता है, तो क्या इसके नतीजों का अंदाजा लगाना इतना मुश्किल है? अगर समाज में किसी की निजी जिंदगी में नाहक दखल देने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया जाएगा, तो यह किस रूप में किसके पास पहुंचेगा या लौटेगा, कहा नहीं जा सकता!