24-02-2023 (Important News Clippings)

24 Feb 2023
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Everyone’s Losing

A year into the Ukraine war, the talk is of more war. If others won’t, India should start a peace effort

TOI Editorials

Costs of the year-old Ukraine war are many and counting. Putin’s invasion not only extracted a terrible price from Ukrainians and wrecked their economy – total cost estimated till last month is around $700 billion – it all but sabotaged a smooth postpandemic global economic recovery. Blasé assumptions about economies pricing in the costs of war ignore history lessons that wars have a way of suddenly getting nastier than usual. Therefore, countries that have influence should really work towards stopping the conflict.

But as a Biden-starring pack of Western leaders makes a beeline for Kyiv, the only narrative is about supplying Ukraine with more weapons. Even long-time European peace advocates such as Sweden and Switzerland have started prioritising lethal aid. There’s no denying what Putin has done. But that peace is not a conversation point in the West makes no sense. Just as Moscow knows Kyiv will not fall and its invasion will not achieve most of its initially stated objectives, Ukraine and its Western backers should know all talk of defeating Putin is just talk. What will this defeat entail? Putin will never countenance a loss of face. America will never want to be party to a war that invades Russian territory. And even inside Ukraine, what is victory? Withdrawal of all Russian troops from everywhere? Before Putin is pushed into that corner, what might his response be? And remember, US-led sanctions haven’t really affected Russia’s economy, so Putin could drag this war on for long. Plus, if – a big if – China aids Russia militarily, it would take the war to a new level of lethality. Another year of Russian bombardment of Ukrainian cities like Kharkiv, Kherson, Sumy, or Kyiv would cause immense misery. That would constitute a collective failure of the international community.

Hence the need for a peace formula. A realistic start would be restoring most of the status quo ante. Putin would have to pull his troops back east of the ‘line of contact’, while Kyiv would have to rein in its impulse to carry out military operations in Crimea, and perhaps temporarily some fudgy arrangements will have to be made for the Donbas region. But who will bell this cat? America’s not interested. China’s looking at gaining advantage. Why not India? GoI could begin small and invite Ukrainian and Russian negotiators to New Delhi for ceasefire talks. There needn’t be any result expected quickly. But hosting the resumption of dialogue will in itself be a contribution to finding peace.



SC’s and many HCs’ digitisation programmes are excellent initiatives. But beware of hackers

TOI Editorials

In an emulation-worthy application of AI in public affairs, the Supreme Court introduced live-transcription of court proceedings on a screen and on Wednesday published the transcripts on its website. CJI Chandrachud, chair of SC’s e-committee, announced the measure as a constitution bench met to hear arguments in the case of Shiv Sena’s split. Live transcripts are the latest in a series of digital measures in India’s courts in the last few years, with virtual hearings and e-filing no doubt getting a boost from pandemic lockdowns.

As CJI has observed, technology can make courts and records accessible to the general public, students, researchers and archivists. He’s credited with starting the digitisation of the Bombay high court library, with its 1. 25 lakh books and records, which date back to the 1800s. Other HCs have done their bit. In 2021 Orissa HC started a Record Room Digitisation Centre, the country’s first, and by mid-2022 it had reportedly digitised almost 5. 2 lakh files. Only last month Delhi HC introduced software for online inspection of digitised judicial files, another first. And in a different kind of but equally important reform, Kerala HC recently published two judgments in a regional language, Malayalam.

SC and HCs scaling up their digital infrastructure contributes to reducing their carbon footprint too. A sustainable and accessible court ecosystem is to everyone’s benefit. But bear in mind such a system is also vulnerable to breaches that can throw a workday into chaos. Recall the AIIMS ransomware episode. Therefore, while we applaud digitisation initiatives, we must also remind all courts that they pay equal attention to threats. For hackers, India’s digitised court records are a tempting target.


क्या मोहल्ला क्लिनिक मॉडल?

डॉ चंद्रकांत लहरिया, ( प्रख्यात चिकित्सक )

स्वास्थ्य क्षेत्र में किए जाने वाले सुधार राज्य या जिले की स्थिति पर निर्भर करते हैं। इसका ताजा उदाहरण पंजाब से सामने आया है। वहां नई सरकार ने दिल्ली के मोहल्ला क्लीनिक की तर्ज पर आम आदमी क्लीनिक शुरू किया है। लेकिन अब खबर आ रही है कि आम आदमी क्लीनिक वहां की स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने के बजाय कमजोर कर रहे हैं. इस पर समय रहते ध्यान देने की जरूरत है।

दरअसल, मोहल्ला क्लीनिक ने दिल्ली जैसे शहरी इलाकों में स्वास्थ्य सेवा को एक नया आयाम दिया। मोहल्ला क्लिनिक खुलने के बाद नए डॉक्टरों और नर्सों की नियुक्ति की गई। सरकार ने वित्तीय प्रावधान भी बढ़ाया। झुग्गियों और गरीब वर्गों के करीब स्थित नए केंद्र बनाए गए और डॉक्टरों और स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता में वृद्धि हुई। इसके विपरीत, पंजाब में खोले गए आम आदमी क्लीनिक ज्यादातर पुराने केंद्रों के नए नाम हैं या पहले से उपलब्ध डॉक्टरों की नई पोस्टिंग हैं। अपेक्षित वित्तीय आवंटन भी नहीं बढ़ा है। पहले से स्थापित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का नाम बदलकर आम आदमी क्लीनिक करना चिंता का विषय है और पीछे हटने वाला कदम है।

मोहल्ला क्लिनिक को देशभर से सराहना मिल रही है। मैंने योजना की शुरुआत से ही इसकी सलाह दी है और मैं इस प्रकार के सामुदायिक क्लिनिक का बहुत बड़ा समर्थक हूं। ऐसे क्लीनिक शहरी क्षेत्रों में बीमारियों के इलाज के लिए एक उपयुक्त समाधान हैं – जहां अस्पताल भीड़भाड़ वाले हैं – लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों के लिए उपयुक्त नहीं हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को एकीकृत स्वास्थ्य सेवाओं की आवश्यकता है, जिसमें बीमारियों की रोकथाम, मलेरिया-टीबी की रोकथाम और उपचार, टीकाकरण, गर्भवती महिलाओं की जांच और प्रसव आदि शामिल हैं। बीमार लोगों का इलाज करना भी जरूरी है। यह प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के कारण ही संभव है।

दिल्ली के मोहल्ला क्लीनिकों को निवारक सुविधाओं और समुदाय आधारित जांच और उपचार पर ध्यान केंद्रित करने के लिए उपलब्ध स्वास्थ्य सेवाओं का धीरे-धीरे विस्तार करने के समग्र विचार के साथ शुरू किया गया था। करीब सात साल पहले दिल्ली में स्वास्थ्य मंत्री के सभागार में भी इस तरह के प्रस्ताव को स्वीकार किया गया था, लेकिन मोहल्ला क्लीनिक के माध्यम से स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार नहीं किया गया. ऐसे में पंजाब सरकार की पूरी योजना को समझे बिना सिर्फ बीमारी के इलाज पर ध्यान देने, पहले के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को कमजोर करने की योजना पर पुनर्विचार करने की जरूरत है.

सरकारें कई वर्षों में एक बार स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार करती हैं। ऐसे मामलों में, राज्य या जिले की स्थितियों के आधार पर कोई भी संशोधन किया जाना चाहिए। मोहल्ला क्लीनिक से प्रेरणा लेते हुए तेलंगाना राज्य ने अप्रैल 2018 में स्लम क्लीनिक शुरू किया। उनकी कई गतिविधियां मोहल्ला क्लीनिकों से बेहतर हैं, लेकिन मीडिया की चकाचौंध और पूंजी की कमी के कारण उन पर कम ध्यान दिया जाता है। इसी तरह केंद्र सरकार ने 2018 में आयुष्मान भारत कार्यक्रम के तहत 1.50, 000 स्वास्थ्य और कल्याण केंद्रों की घोषणा की गई। इस योजना में कई सकारात्मक कदम थे, जिनमें स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता बढ़ाना और भवनों की मरम्मत और रखरखाव के लिए धन उपलब्ध कराना शामिल था। 2022 के अंत तक, आधिकारिक तौर पर 1,50,000 स्वास्थ्य और कल्याण केंद्र बनाए गए हैं। उनसे स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंचना आसान हो गया है और सवाल यह है कि क्या लोग अब पहले से ज्यादा स्वस्थ हैं। जवाब है, ज्यादा कुछ नहीं बदला है। ऐसा इसलिए है क्योंकि हेल्थ एंड वैलनेस सेंटर नए केंद्र नहीं हैं, बल्कि दशकों से बने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और उप-स्वास्थ्य केंद्रों के नए नाम हैं।

सरकारों को अधिक जवाबदेह होना चाहिए और स्वास्थ्य सुधारों के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए, न कि सतही सुधारों के लिए। पंजाब सरकार को आम आदमी क्लीनिक शुरू करते समय स्वास्थ्य व्यवस्था को कमजोर न करने का ध्यान रखना चाहिए। दिल्ली में मोहल्ला क्लीनिकों को समग्र स्वास्थ्य देखभाल प्रदान करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। केंद्र सरकार को हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर्स का स्वतंत्र मूल्यांकन करना चाहिए। स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार होगा और भारत एक स्वस्थ देश तभी बनेगा जब सरकारें लोगों की जरूरतों को केंद्र में रखेंगी।


महाशक्तियों के टकराव से त्रस्त विश्व

हर्ष वी. पंत, ( लेखक आब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में रणनीतिक अध्ययन कार्यक्रम के निदेशक हैं )

यूक्रेन पर रूस के हमले को साल भर पूरा हो गया। यह द्वितीय विश्व युद्ध के उपरांत बने वैश्विक ढांचे की हमारी समझ से जुड़ा एक अहम पड़ाव है। आरंभ में लग रहा था कि यह युद्ध कुछ ही दिनों की बात है, क्योंकि रूस और यूक्रेन की सैन्य शक्ति में कोई बराबरी नहीं थी, लेकिन इस युद्ध का दूसरे वर्ष में खिंचना यही दर्शाता है कि रूसी सेना अपने अतीत की दुर्बल छाया मात्र बनकर रह गई है। यूक्रेनवासी जिस तरह रोज रूस के विरुद्ध खड़े हो रहे हैं, वह यही स्मरण कराता है कि रणभूमि में मिलने वाली सफलता केवल विशुद्ध शक्ति एवं बल पर ही निर्भर नहीं करती। युद्ध में अपने संसाधनों का प्रभावी उपयोग अधिक मायने रखता है। रूस की कमजोरी कई स्तरों पर उजागर हुई है। इसके साथ ही यूक्रेन संभवत: पश्चिम और रूस के बीच संघर्ष के आखिरी अखाड़े के रूप में उभरा है कि शीत युद्ध के उपरांत यूरेशियाई सुरक्षा ढांचे को किस प्रकार आकार दिया जाए। अब यह एक ऐसे युद्ध में बदल गया है, जिसे न तो रूस जीत सकता है और न यूक्रेन उसमें परास्त हो सकता है। अब यह युद्ध पश्चिम और पुतिन के बीच अहं और इच्छाशक्ति की लड़ाई बनकर रह गया है।

युद्ध के साल भर पूरा होने से ठीक पहले अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने यूक्रेन का दौरा किया। राष्ट्रपति बनने के बाद पहली बार अचानक यूक्रेन पहुंचे बाइडन ने यह दोहराया कि ‘यूक्रेन के लोकतंत्र, संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए’ अमेरिका पूरी तरह प्रतिबद्ध है। इसी के साथ उन्होंने मास्को को संदेश भी दिया कि खतरनाक दौर में पहुंचे टकराव के बीच वाशिंगटन की पीछे हटने की कोई मंशा नहीं। असल में यूक्रेन संकट ने ट्रांस-अटलांटिक साझेदारी और नाटो जैसे उन ध्रुवों को नए तेवर दिए हैं, जो अपनी चमक खो रहे थे। हालांकि म्यूनिख सिक्योरिटी कांफ्रेंस के दौरान युद्ध समाप्त कर वार्ता आरंभ करने के पक्ष में कुछ प्रदर्शन हुए, लेकिन यूरोपीय नीति-नियंताओं ने यही दोहराया कि वे हथियार निर्माण का दायरा बढ़ाकर यूक्रेन को हथियारों की आपूर्ति जारी रखेंगे। नाटो के महासचिव जेंस स्टोलेनबर्ग के अनुसार यूक्रेन बड़ी तेज गति से उनके हथियारों का इस्तेमाल कर रहा है। दिलचस्प है कि जर्मनी ने ही यूरोप को तेजी से हथियार आपूर्ति की मांग करने के साथ ही नाटो सहयोगियों से रक्षा पर जीडीपी के दो प्रतिशत के बराबर लक्ष्य पर सहमति बनाने का आह्वान किया था। इस बीच रूसी सीमाओं तक नाटो की पहुंच को लेकर पुतिन के विरोध पर उनके हमले ने इसके विपरीत ही काम किया। इससे स्वीडन और फिनलैंड जैसे देशों का झुकाव भी नाटो की ओर हुआ है, जो दशकों तक तटस्थ बने रहे।

यूक्रेन युद्ध से पहले ही उथल-पुथल से गुजर रहे वैश्विक शक्ति संतुलन की स्थिति चीन-रूस धुरी से और ध्रुवीकृत हो गई है। अमेरिका और यूरोप दोनों ने चीन को चेताया है कि यदि उसने रूस को किसी तरह की सैन्य मदद पहुंचाई तो इसके विध्वंसक नतीजे होंगे। चीन ने अभी तक रूस का समर्थन जरूर किया है, लेकिन उसे किसी प्रकार की मारक क्षमता प्रदान करने वाली मदद उपलब्ध नहीं कराई है। दूसरी ओर यूक्रेन को पश्चिम से अत्याधुनिक टैंक और हथियार मिल रहे हैं। ऐसे में चीन का जरा सा भी सामरिक सहयोग रूसी हमलों की क्षमताओं को बढ़ाने के साथ ही रणभूमि में टिके रहने की उसकी क्षमताओं को ही बढ़ाएगा। यदि पश्चिम इन दोनों देशों की धुरी को तोड़ने के लिए आगे नहीं आएगा तो उनके रिश्तों की यह कड़ी मजबूत होती जाएगी। बीजिंग में यह माहौल बनाने की कोशिश हो रही है कि यूरेशिया में बढ़ते हुए टकराव से वे आजिज आ गए हैं और शांति एवं किसी सहमति के स्वरों की पैरवी सुनाई पड़ रही है। हालांकि उसके ऐसे स्वरों में आलोचना के सुर भी हैं कि ‘कुछ ताकतें’ इस युद्ध को लंबा खींचना चाहती हैं। बीजिंग-मास्को साझेदारी के पीछे रणनीतिक पहलू प्रत्यक्ष दिखते हैं जिनके जल्द ही किसी तार्किक परिणति पर पहुंचने के आसार हैं। यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की भी चीन को आगाह कर चुके हैं इस युद्ध में रूस को उसकी मदद से विश्व युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी। इस युद्ध में चीन के प्रवेश से टकराव केवल यूरेशियाई युद्ध के रूप में ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसके हिंद-प्रशांत क्षेत्र तक फैलने की आशंका होगी।

महाशक्तियों के बीच संघर्ष जहां इस दौर के एक प्रमुख पहलू के रूप में उभरा है, वहीं यूक्रेन युद्ध से उपजे उन दुष्प्रभावों की अनदेखा किया जा रहा है, जिनसे दुनिया का एक बड़ा हिस्सा जूझ रहा है। इस युद्ध के कारण खानपान, ऊर्जा और आर्थिक संकट ने पूरी दुनिया को त्रस्त किया है। बड़ी शक्तियों के निर्णायक रणनीतिक लाभ की चाह ने विकासशील देशों में अस्तित्व के संकट को दिन-प्रतिदिन और बढ़ा दिया है। हमारे पड़ोस में ही श्रीलंका, नेपाल, पाकिस्तान और यहां तक कि बांग्लादेश की नाजुक होती स्थिति यही दर्शाती है कि दुनिया ग्लोबल साउथ के समक्ष उत्पन्न समस्याओं का प्रभावी समाधान उपलब्ध कराने में नाकाम रही है।

अब जब यूक्रेन युद्ध अपने दूसरे वर्ष में प्रवेश कर रहा है तो विश्व एक संकट के मुहाने पर खड़ा दिखाई पड़ता है। इस समय वैश्विक नेतृत्व नदारद दिख रहा है और बहुपक्षीय ढांचे की अक्षमताएं भी उजागर हो रही हैं। हम बड़ी शक्तियों के रणनीतिक समीकरणों को आकार देने में हार्ड पावर का पुन: उभार होता देख रहे हैं। साथ ही यह भी देख रहे हैं कि युद्धों का चरित्र और स्वरूप तकनीकी पहलुओं के आधार पर किस प्रकार परिवर्तित होकर रणभूमियों को बुनियादी रूप से नया आकार दे रहा है। जो भी हो, साल भर की उथल-पुथल के बाद भी यूक्रेन में शांति के कोई संकेत नहीं दिखते। यह स्थिति यही दर्शाती है तमाम उदारवादी विरोध-प्रदर्शनों के बावजूद हिंसा वैश्विक राजनीतिक ढांचे के मूल में निंरतर रूप से बनी हुई है और हाल-फिलहाल वह इस केंद्र से ओझल होती भी नहीं दिख रही।


निगरानी का तंत्र


पुलिस और जांच एजंसियों की नियम-कायदों को ताक पर रख कर और मानवाधिकारों की परवाह किए बगैर मनमानीपूर्ण तरीके से कार्रवाई करने की कोशिश प्रकट तथ्य है। अपराधियों को सुधारने और आपराधिक मामलों में जानकारियां जुटाने के नाम पर कई बार गिरफ्तार किए गए लोगों की इस बेरहमी से पिटाई की जाती है कि वे हिरासत में ही जान गंवा बैठते हैं। इसे लेकर लंबे समय से अंगुलियां उठती रही हैं, मगर चिंता का विषय है कि हिरासत में होने वाली मौतों का आंकड़ा कम होने का नाम नहीं ले रहा। जिन राज्यों में सरकारों ने सुशासन के नाम पर पुलिस को मुक्तहस्त कर रखा है, वहां ऐसी मौतों का आंकड़ा अधिक है। इसी के मद्देनजर करीब दो साल पहले सर्वोच्च न्यायालय ने प्रवर्तन निदेशालय, राष्ट्रीय जांच एजंसी, केंद्रीय जांच ब्यूरो और देश के सभी पुलिस थानों को छह हफ्ते के भीतर अपने दफ्तरों में सीसीटीवी कैमरे और रिकार्डिंग उपकरण लगाने का आदेश दिया था। मगर पुलिस थानों में इस दिशा में कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हो पाई है। अब सर्वोच्च न्यायालय ने सख्ती बरतते हुए कहा है कि सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेश की सरकारें अपने यहां के थानों में एक महीने के भीतर सीसीटीवी और रिकार्डिंग उपकरण लगाएं, नहीं तो उनके गृह सचिवों और मुख्य सचिवों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी। देखना है, इस कड़ाई का कितना असर हो पाता है।

कानून के मुताबिक गिरफ्तारी के बाद किसी भी व्यक्ति की मार-पिटाई करना वर्जित है। मगर पुलिस के कामकाज में अभी तक वही औपनिवेशिक ठसक बनी हुई है, इसलिए वह मार-पिटाई को अपना मुख्य हथकंडा मानती है। यही स्थिति प्रवर्तन निदेशालय, राष्ट्रीय जांच एजंसी और केंद्रीय जांच ब्यूरो का है। वे भी तथ्य उगलवाने के नाम पर ऐसी ज्यादतियां करते देखे जाते हैं। मगर पुलिस इस मामले में कुछ अधिक बदनाम है। वह तो रसूखदार लोगों के प्रभाव में कई बार, बेकसूर होने के बावजूद, किसी को सबक सिखाने के मकसद से भी उठा लाती और थाने में बंद कर इस कदर पिटाई करती है कि वह दम तोड़ देता है। ऐसे अनेक उदाहरण मौजूद हैं, जब पुलिस ने किसी को बेवजह मारा-पीटा और उसे मार डाला। इस तरह की यातना झेलने वालों में ज्यादातर गरीब तबके के लोग होते हैं। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय ने थानों में कैमरे लगाने का आदेश दिया था, ताकि जब भी ऐसी शिकायतें आएं तो उन मामलों के तथ्यों को जाना-समझा जा सके। फिर इस तरह पुलिस पर एक मनोवैज्ञानिक दबाव भी रहे।

मगर साफ है कि न तो राज्य सरकारें पुलिस के कामकाज का तरीका बदलना चाहती हैं, न पुलिस खुद अपने को बदलना चाहती है। पुलिस सुधार को लेकर अब तक गठित आयोगों और समितियों ने कई मूल्यवान सुझाव दिए हैं, मगर उन पर केंद्र सरकार ने भी कभी गंभीरता से विचार करने की जरूरत नहीं समझी। इसलिए पुलिस मनमानी से बाज नहीं आती। जब भी हिरासत में मौत का मामला उठता है, तो वह किसी न किसी तरह अपने को पाक-साफ साबित कर लेती है। मगर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग इस पर कई बार चिंता जता चुका है कि भारत में हिरासत में होने वाली मौतों का आंकड़ा चिंताजनक है। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय की कड़ाई के बाद अगर थानों में कैमरे लगा भी दिए जाते हैं, तो पुलिस के कामकाज में बहुत बदलाव आएगा, इसका दावा करना मुश्किल है। कैमरे लगाने के बाद उनके संचालन और एक केंद्रीय इकाई द्वारा उन पर निगरानी रखने का तंत्र भी विकसित होना चाहिए।


यूक्रेन युद्ध का एक साल


इसमें कोई संदेह नहीं है कि इस समय वैश्विक स्तर पर राजनीतिक और रणनीतिक गतिविधियों में जो गतिविधियां सर्वाधिक चर्चाओं के केंद्र में है वह है अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन की यूक्रेन यात्रा और रूस- यूक्रेन युद्ध का एक वर्ष पूरा होना। 24 फरवरी 2022 को युद्ध आरंभ हुआ था और यह अभी भी जारी है। लोगों को याद होगा कि पिछले वर्ष दिसम्बर में यूक्रेन के राष्ट्रपति बलादिमीर जेलेंस्की ने भी युद्ध के बीच गोपनीय स्तर पर अमेरिका की यात्रा की थी। बाइडेन के साथ उनकी वार्ता तथा अमेरिकी संसद में उनके संबोधन को दुनिया भर में देखा-सुना गया था । जेलेंस्की की अमेरिका यात्रा से यह जाहिर हो गया था कि युद्ध लंबा खिंचेगा। अब बाइडेन की यूक्रेन यात्रा का रूसी राष्ट्रपति पुतिन पर जिस तरह का नकारात्मक प्रभाव पड़ा है उसके आलोक में कहा जा सकता है कि यह युद्ध कब समाप्त होगा, इसका सहज अनुमान लगाना भी मुश्किल है। पुतिन ने राष्ट्र के अपने संबोधन में यूक्रेन में रूसी कब्जे इलाकों से अपने सैनिकों को हटाने की अंतरराष्ट्रीय मांगों को खारिज कर दिया और परमाणु हथियारों पर नियंत्रण के लिए अमेरिका के साथ 1991 में हुए परमाणु संधि को निलंबित करने की घोषणा भी की। इससे दुनिया में परमाणु हथियारों की होड़ का खतरा भी बढ़ जाएगा। रूस यूक्रेन युद्ध के एक साल पूरा होने पर युद्ध के सैनिक और आर्थिक प्रभाव विश्व के अनेक देशों में महसूस किए जा रहे हैं। सबसे बड़ा संकट ऊर्जा सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा को लेकर है। घरेलू उपयोग में आने वाली ऊर्जा की कीमतों में जो इजाफा हुआ है, उसके कारण यूरोपीय देशों को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। दूसरी ओर, यूक्रेन से खाद्यान्न आपूर्ति में रुकावट के कारण अफ्रीका सहित दुनिया के विभिन्न देशों में खाद्यान्न संकट पैदा हुआ। पुतिन ने अपनी सेना को परमाणु हथियारों से लैस करने की बात कहकर सभी को डरा दिया है। युद्ध को समाप्त करने में भारत की भूमिका अहम हो सकती है। प्रधानमंत्री मोदी प्रभावशाली मध्यस्थ के रूप में उभर सकते हैं। वर्तमान माहौल में इसे आशावादिता कहा जा सकता है, किंतु भारत की सलाह पर अमेरिका, प. देश और रूस यदि कूटनीति और संवाद का सहारा लें तो यह युद्धविराम और शांति की पहल हो सकती है।


बातूनी मशीनें आगे बहुत काम आएंगी

प्रांजल शर्मा, ( डिजिटल नीति विशेषज्ञ )

तकनीक की हर नई छलांग उत्साह भी पैदा करती है और चिंता भी लाती है। डीपमाइंड और ओपनएआई जैसी कंपनियों द्वारा बनाए गए नए स्मार्ट चैटबॉट्स ने लोगों का मन मोह लिया है। इनमें इंसानों की तरह सवालों के जवाब देने की क्षमता है। ये बारीकियों की व्याख्या कर सकते हैं, साथ ही, तथ्यों को विश्वास के साथ साझा भी कर सकते हैं।

ये चैटबॉट नए नहीं हैं। इंसानों के साथ संवाद करने में सक्षम कंप्यूटर प्रोग्राम या चैटबॉट्स की अवधारणा का 1950 के दशक से ही एक इतिहास रहा है। प्रारंभिक चैटबॉट्स को प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रौद्योगिकियों का परीक्षण करने के तरीके के रूप में विकसित किया गया था। शुरुआती चैटबॉट्स में से एक एलिजा है, जिसे 1960 के दशक में कंप्यूटर वैज्ञानिक जोसेफ वीजेनबाम ने बनाया था। एलिजा को भाषा पैटर्न की नकल के लिए डिजाइन किया गया था। यह कीवर्ड और वाक्यांशों का जवाब देकर उपयोगकर्ताओं के साथ सहज ढंग से संवाद कर सकता था। गौर कीजिएगा, उपरोक्त जवाब मुझे चैटजीपीटी ने दिया है, वही जो ओपनएआई द्वारा बनाया गया अग्रणी नया चैटबॉट है। मैंने चैटबॉट्स के इतिहास के बारे में सवाल पूछा था। जाहिर है, यह चैटबॉट्स के इतिहास पर शोध करने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए एक व्यापक जवाब है। चैटजीपीटी को अभी तक का सबसे उन्नत चैटबॉट माना जा रहा है।

चैटजीपीटी को ओपनएआई द्वारा विकसित किया गया है, जो खोसला वेंचर्स और माइक्रोसॉफ्ट द्वारा समर्थित शोध प्रयोगशाला है। चैटजीपीटी का एक भाषा मॉडल है, जो इंसानों की तरह ही प्रतिक्रिया करता है। मैंने चैटजीपीटी से एक और सवाल पूछा, चैटबॉट अब तक कितने कारगर रहे हैं? मुझे जवाब मिला, पिछले कुछ वर्षों में चैटबॉट विकसित हुए हैं और अब अधिक परिष्कृत भी हो गए हैं। आज ग्राहक सेवा, ई-कॉमर्स और शिक्षा सहित विभिन्न क्षेत्रों में चैटबॉट का इस्तेमाल किया जाता है। वे वेबसाइटों, मैसेजिंग एप्स और अन्य प्लेटफॉर्म पर पाए जा सकते हैं और अक्सर इनका इस्तेमाल जानकारी प्रदान करने, सवालों के जवाब देने और टिकट बुक करने या आरक्षण करने जैसे कार्यों के लिए किया जाता है। कुछ चैटबॉट ज्यादा जटिल संवाद करने में भी सक्षम हैं और समय के साथ अपनी प्रतिक्रियाओं को बेहतर बनाने के लिए मशीन लर्निंग एल्गोरिदम का उपयोग करते हैं

तेजी से परिष्कृत होते चैटबॉट्स के नए सर्च इंजन बनने की संभावना के बारे में पहले ही बहस शुरू हो गई है। अभी चैटजीपीटी सहित अधिकांश चैटबॉट अपने लिए सूचनाएं एक विशाल, लेकिन सीमित दायरे से ही प्राप्त करते हैं। जैसे ,चैटजीपीटी का ताजा संस्करण 2021 के अंत तक संचित हुई सूचनाओं तक सीमित है। मतलब, चैटजीपीटी को साल 2022-23 के बारे में कोई सूचना नहीं है।

कोई शक नहीं कि चैटबॉट अपनी प्रतिक्रिया में कहीं अधिक मुखर हैं और किसी जिज्ञासा पर ज्यादा ध्यान केंद्रित करते हैं, जबकि ऐसा करना गूगल या बिंग जैसे सर्च इंजन के लिए मुश्किल है। हालांकि, चैटजीपीटी की इंसानों जैसी प्रतिक्रिया में सूचना स्रोत का जिक्र नहीं होता है और न ही कोई लिंक या उद्धरण दिया जाता है। अभी चैटजीपीटी द्वारा जुटाई गई सूचना उपयोगी भी है और पेचीदा भी, इसकी सत्यता की पुष्टि कठिन है। फिर भी, चैटजीपीटी के साथ आसान बातचीत ने दुनिया भर में धूम मचा दी है। उत्साही लोग तरह-तरह के हजारों सवाल पूछ रहे हैं। हर संवाद के साथ चैटबॉट का भी परीक्षण और प्रशिक्षण चल रहा है। चैटजीपीटी के साथ कोई भी लॉगिन और चैट कर सकता है। हर बातचीत आईटी वैज्ञानिकों के लिए शोध का हिस्सा है।

कुछ लोग चिंतित हैं कि छात्र अपना होमवर्क करने या निबंध लिखने के लिए चैटबॉट का उपयोग करेंगे। चैटबॉट के खूब सारे प्रयोग-उपयोग आने वाले दिनों में सामने आएंगे। हमें सतर्क रहना होगा। एक चैटबॉट सब कुछ नहीं जानता, जबकि इसका इजहार या इसकी अभिव्यक्ति या लेखन इंसानों की तरह ही है। इसकी जानकारी गलत और दोषपूर्ण भी हो सकती है। जरूरी है, हर उपयोगकर्ता हर जानकारी को परख ले और चैटबॉट द्वारा कही गई हर बात आंख मूंदकर न माने। ध्यान रहे, अभी कुछ चैटबॉट गलत बात भी कर रहे हैं, शादी तोड़ने की सलाह भी दे रहे हैं, तो करियर तबाह करने की धमकी भी। ऐसे जवाबों को लेकर बड़ी चिंता है। वैसे इसी तरह की चिंता तब व्यक्त की गई थी, जब गूगल और अन्य सर्च इंजन लॉन्च किए गए थे। अब चैटबॉट के साथ भी हमें सूचना के स्रोतों और तथ्यों के बारे में आश्वस्त होना पड़ेगा।

चैटबॉट्स को अभी भी कई बाधाओं या हदों को पार करना है। चैटबॉट्स के पास उपलब्ध डाटा या सूचनाओं को बढ़ाना है। विशेष चैटबॉट्स के लिए विशेष डोमेन भी मुमकिन है। मिसाल के लिए, एक हेल्थकेयर चैटबॉट केवल मरीजों के लिए हो सकता है, जबकि दूसरा केवल गणित के छात्रों के लिए। कई भाषाओं के विकल्पों के साथ डिजिटल संचार पाठ से आवाज की ओर बढ़ रहा है। डिजिटल दुनिया में हर शब्द स्वरबद्ध होता जा रहा है। एलेक्सा जैसे सर्च इंजन और आवाज आधारित अन्य सहायकों से आगे जाने के लिए चैटबॉट्स को ज्यादा मात्रा में सूचनाओं की जरूरत पड़ेगी। लोगों की तमाम जिज्ञासाओं को शब्दों से ही नहीं, स-स्वर शांत करना होगा।

चैटबॉट्स, सर्च इंजन व डिजिटल सहायकों के बीच पहले से ही एक स्तर का परस्पर संपर्क स्थापित है। वे एक-दूसरे के पूरक होने लगे हैं। मशीन लर्निंग और स्वर पहचान तकनीक भी तेजी से बदल रही है, जिससे आने वाले दिनों में कई पुराने काम खत्म होंगे, तो कई नए शुरू हो जाएंगे। विज्ञान रुकने वाला नहीं है। माइक्रोसॉफ्ट में चैटजीपीटी से भी अधिक शक्तिशाली एआई मॉडल विकसित करने पर काम चल रहा है। यह ज्यादा तेज, सटीक और सक्षम होगा।

अभी की बात करें, तो स्पैरो चैटबॉट में चैटजीपीटी की तुलना में कुछ बेहतर विशेषताएं हैं। स्पैरो में स्रोतों का हवाला देने की क्षमता है। जल्दी ही ऐसे चैटबॉट भी उपलब्ध होंगे, जो गलत सवालों को पहचानने में सक्षम होंगे। जैसे अगर कोई पूछेगा कि कार चोरी कैसे करें, तो चैटबॉट मुंह मोड़ लेंगे। ऐसे चैटबॉट की भी बाढ़ आ सकती है, जो चैटिंग से आगे बढ़कर हमारा साथ देंगे। वाकई, समझदारी से अगर इस्तेमाल हुआ, तो चैटबॉट हमारे बहुत काम आएंगे।

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