23-10-2026 (Important News Clippings)

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23 Oct 2026
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Date: 23-10-26

Tunnelling through

Domestic manufacturing and foreign partnerships must go hand-in-hand

Editorial

The Chinese Ministry of Commerce and the General Administration of Customs decision to place tunnel-boring machines (TBMs) on an export control list reveals a blind spot in India’s supply chain diversification. The curbs include TBMs, walking excavators, and high-altitude wet shotcrete machines. From November 18, if a shipment is intended for countries or regions deemed sensitive due to ongoing disputes with China, exporters will need an export licence from commerce authorities. For other countries/regions, exporters will need to be registered, obtain an export certificate, and submit end-use declarations stating that the equipment will not be re-routed to sensitive locations. While China has cornered around 70% of the global TBM market, prominent manufacturers in the West also maintain substantial component supply chains in the country to cut manufacturing overhead. Further, TBMs are complex to build as they have to be configured to geological characteristics at the project site and perform numerous tasks. Where a suitable TBM exists, it can be used for civilian or military purposes. India has struggled with TBM-related hold-ups with China for at least two years now, including for the Mumbai-Ahmedabad high-speed rail project. Germany’s Herrenknecht AG set up an assembling and refurbishing facility in Chennai in 2007-08. TBM production economics differ significantly from conventional construction equipment as new plants need a minimum number of orders and must be able to access the industrial capability required to design, manufacture and repair specialised components.

However, even though India is one of the world’s largest TBM importers, expecting every sophisticated machine to be produced domestically will send public infrastructure costs soaring. Even now, depending on China’s decision on the TBMs set for India, India may have to redirect its procurement to facilities based directly in Germany or Japan, say, and absorb the higher capital cost. The BEML experience shows that manufacturing partnerships can fail without secure licensing arrangements and access to sustained demand. India should pursue domestic manufacturing alongside international partnerships, e.g., making equipment in the country under agreement with established foreign firms, and develop shared industrial capabilities rather than singular ‘national champions’, as TBM manufacturers and their suppliers can benefit from access to common testing and precision manufacturing infrastructure. Overall, Beijing is systematically identifying sectors where it commands a significant global capacity and establishing export controls to counter western technological restrictions, such as on advanced semiconductors, so any critical infrastructure sector relying on Chinese supply lines will face a compounding geopolitical risk.


Date: 23-10-26

हम कमर्शियल कूटनीति के नए दौर में प्रवेश कर रहे हैं

संपादकीय

अमेरिका के विदेश मंत्री और एनएसए मार्को रुबियो का मुंबई में उद्योगपति अम्बानी, अदाणी और टाटा ग्रुप के चेयरमैन चंद्रशेखरन से मिलना और फिर रिलायंस की जामनगर रिफाइनरी में जाना दुनिया में बढ़ती कमर्शियल कूटनीति का संकेत है। यह नए राज्येतर अंतरराष्ट्रीय संबंधों की ओर भी इशारा करता है। भले ही किसी भी सम्प्रभु राष्ट्र में सरकारें ही अंतिम निर्णायक हों, लेकिन जिस तरह रुबियो का दौरा हुआ, अमेरिका ने प्रतिबंध हटाए और ट्रम्प ने भारत से ट्रेड समझौते के अपूर्व होने के सकारात्मक संकेत दिए, वे बदलते राजनयिक परिदृश्य की दस्तक हैं। रिलायंस के पास दुनिया में निम्न-ग्रेड के वेनेजुएलन क्रूड को भी शोधित करने की क्षमता वाली इकाई जामनगर में है। अमेरिका – नियंत्रित वेनेजुएला से ट्रम्प को मध्यावधि चुनाव के पहले रिफाइंड तेल की जरूरत है। रिलायंस टेक्सास क्रूड शोधन उपक्रम में भी अमेरिका का पार्टनर है। डेटा क्षेत्र में भी अम्बानी-अदाणी सक्रिय भूमिका में हैं। कुछ दशक पहले तक अमेरिका जैसा बड़ा देश अपनी घरेलू स्थिति बेहतर करने के लिए भारत जैसे देशों की ओर उम्मीद से देखता नहीं था। लेकिन आज भारत के लिए भी अच्छा मौका है, जब ट्रेड वार्ता अंतिम पड़ाव पर है और ट्रम्प के सबसे मजबूत साथी मुंबई में देश के तीन औद्योगिक घरानों से ट्रेड, कॉमर्स और उद्यमिता की बात करने आए हैं।


Date: 23-10-26

चुनाव प्रक्रिया का प्रश्न सत्ता व विपक्ष तक ही सीमित नहीं है

पवन के. वर्मा, ( पूर्व राज्यसभा सांसद व राजनयिक )

एसआईआर को लेकर चल रहे विवाद में एक दिलचस्प विसंगति दिखलाई देती है। यह कि विपक्षी दल तो चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठा रहे हैं, लेकिन आयोग स्वयं अपने कामकाज को लेकर उठाए जा रहे सवालों का जवाब देने से कतरा रहा है। खबरों के अनुसार तीन में से दो निर्वाचन आयुक्तों- सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने दस महीनों के दौरान कम से कम 14 मौकों पर एसआईआर से जुड़े फैसलों और प्रक्रियाओं पर आपत्तियां दर्ज की थीं। बताया गया कि ये आपत्तियां फॉर्म 6 में किए गए बदलावों, मतदाता सूची से संबंधित सॉफ्टवेयर पर नियंत्रण के केंद्रीकरण, बंगाल में मतदाताओं के नाम बहाल किए जाने के खिलाफ अपीलों और ऐसे फैसलों से जुड़ी थीं, जिन्हें कथित तौर पर पूरे आयोग की जानकारी या मंजूरी के बिना लिया गया था।

ये गंभीर आरोप हैं। इनके कारणों की व्याख्या संभव है, लेकिन इन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जब उस तंत्र की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं, जिसके माध्यम से भारतीय नागरिक लोकतांत्रिक भागीदारी के अपने सबसे बुनियादी अधिकार का प्रयोग करता है, तो उन सवालों का जवाब देने की पूरी जिम्मेदारी भी उसी तंत्र की होती है।

इसके बजाय, निर्वाचन आयोग ने एक प्रेस नोट जारी कर कहा कि आंतरिक टिप्पणियां और आपत्तियां चुनावी प्रक्रियाओं को बेहतर बनाने के लिए संस्थागत विचार-विमर्श का सामान्य हिस्सा हैं। आयोग ने यह भी दावा किया कि पिछले एक वर्ष के दौरान आयोग द्वारा लिए गए सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे। लेकिन यह नहीं बताया गया कि फॉर्म 6 में विवादित बदलाव को मंजूरी किसने दी, बंगाल में बहाल किए गए मतदाताओं के नामों के खिलाफ अपील दायर करने की अनुमति किसने दी, चुनावी सॉफ्टवेयर के ऑडिट की मांग पर उठाई चिंताओं का जवाब क्यों नहीं दिया गया या मई से अगस्त के बीच कथित तौर पर पूर्ण आयोग की बैठक क्यों नहीं हुई?

सर्वसम्मति का दावा करना और यह समझाना कि वह सर्वसम्मति कैसे बनी- दो अलग-अलग बातें हैं। प्रक्रियाएं सही हैं, यह आश्वासन देना इस बात का प्रमाण पेश करने का विकल्प नहीं हो सकता कि वे वास्तव में सही हैं। और संस्थागत ईमानदारी की घोषणा भर से संस्थागत आचरण के बारे में उठाए गए सवालों का जवाब नहीं दिया जा सकता।

इसलिए यह जरूरी है कि चुनाव आयोग एक प्रेस वार्ता बुलाए, जिसमें तीनों निर्वाचन आयुक्त मौजूद हों। उन्हें सवालों के जवाब देने चाहिए, संबंधित फैसलों और प्रक्रियाओं की व्याख्या करनी चाहिए, यह बताना चाहिए कि कौन-से रिकॉर्ड कानूनी रूप से सार्वजनिक किए जा सकते हैं, और स्पष्ट करना चाहिए कि दोनों आयुक्तों द्वारा उठाई गई आपत्तियों पर किस तरह विचार किया गया और उनका समाधान कैसे निकाला गया।

जब सत्तारूढ़ दल चुनाव आयोग के बचाव में उतरता है, तो वह अनजाने में उसी धारणा को और मजबूत कर बैठता है, जिसे वह दूर करना चाहता है- यह कि आयोग और सरकार राजनीतिक रूप से एक-दूसरे के साथ खड़े हैं। भाजपा ने चुनाव जीते भी हैं और हारे भी। उसे मानकर चलना चाहिए कि भविष्य में भी उसे इन दोनों परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए ऐसा चुनाव आयोग उसी के दीर्घकालिक हित में नहीं है, जिसे तत्कालीन सरकार के प्रति सहानुभूति रखने वाला माना जाए। ऐसा आयोग वांछनीय है, जिसकी निष्पक्षता पर संदेह करने का कोई आधार न हो। यही सिद्धांत हर दल पर लागू होता है।

सभी राजनीतिक दलों को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि संविधान के अनुच्छेद 324(2) के तहत निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया में अधिकतम विश्वसनीयता हो। संसद द्वारा इस संबंध में कानून बनाए जाने के अभाव में, सर्वोच्च न्यायालय ने 2023 में निर्देश दिया था कि नियुक्तियों की सिफारिश प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और सीजेआई की समिति करे। इसके बाद संसद ने एक कानून पारित किया, जिसमें सीजेआई की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय मंत्री को शामिल कर लिया गया। इससे सरकार को समिति में संख्यात्मक बढ़त मिल गई। इस कानून की वैधता का मामला संविधान पीठ के विचारार्थ मुख्य न्यायाधीश के समक्ष लम्बित है।

मौजूदा विवाद को भाजपा और विपक्ष के बीच की लड़ाई तक ही सीमित नहीं कर देना चाहिए। चुनाव आयोग न तो भाजपा का है, न विपक्ष का। वह एक संवैधानिक संस्था है और उसे अपनी बात स्वयं रखनी चाहिए। भारत का लोकतंत्र इसका सुपात्र है।


Date: 23-10-26

भारत और पाक के रिश्ते अब स्थायी रूप से बदल चुके हैं

शशि थरूर, ( पूर्व केंद्रीय मंत्री और सांसद )

दशकों तक यह स्थिति बनी रही थी कि भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य टकराव के बाद तनाव कम होता और औपचारिक शांति वार्ता शुरू होती। लेकिन अंततः यह प्रक्रिया एक बार फिर संघर्ष में तब्दील हो जाती। अब यह सिलसिला टूट चुका है। 2016 के बाद से दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय वार्ता नहीं हुई है। यह महज कूटनीतिक नाराजगी का कोई अस्थायी दौर नहीं, बल्कि भारत की विदेश नीति में आए एक बुनियादी बदलाव का संकेत है, जिसने उपमहाद्वीप की सुरक्षा व्यवस्था को स्थायी रूप से बदल दिया है।

इस गतिरोध की जड़ें अतीत की कूटनीति विफलताओं में खोजी जा सकती हैं। 1947, 1965 और 1971 में पाकिस्तान ने पारंपरिक युद्ध शुरू किए, लेकिन किसी में उसे मनचाहा परिणाम नहीं मिला। तीसरे युद्ध के परिणामस्वरूप पाकिस्तान का विभाजन हुआ और बांग्लादेश का जन्म हुआ। 1980 के दशक के उत्तरार्ध में अफगानिस्तान में सोवियत सेनाओं के खिलाफ अमेरिकी समर्थन प्राप्त मुजाहिदीन की सफलता ने पाकिस्तान को एक नई रणनीति अपनाने के लिए प्रेरित किया। यह रणनीति आतंकवाद पर आधारित थी। 1989 से 1993 के बीच जब आतंकवादी हमलों में भारत में आम नागरिक मारे जा रहे थे, तब पाकिस्तानी सैन्य अधिकारी यह कहकर अपनी पीठ थपथपाते थे कि वे भारत को ‘हजार घाव देकर नष्ट कर देंगे।’

इसके बावजूद, भारतीय नेताओं का यह विश्वास बना रहा कि सुनियोजित वार्ता के जरिये पाकिस्तान को यह रणनीति छोड़ने के लिए राजी किया जा सकता है। लेकिन भारत की ओर से शांति की दिशा में की गई हर बड़ी पहल का जवाब सैन्य उकसावे या आतंकवादी कार्रवाई से दिया गया। पाकिस्तानी सरकार या तो इन घटनाओं को रोकने में असमर्थ थी या उन्हें रोकने की इच्छुक नहीं थी। 1999 में जब अटल बिहारी वाजपेयी ऐतिहासिक बस यात्रा करके लाहौर पहुंचे और एक महत्त्वपूर्ण शांति घोषणा पर हस्ताक्षर किए, ठीक उसी समय पाकिस्तानी सैनिक कारगिल में घुसपैठ कर रहे थे। 2008 में जब पर्दे के पीछे चल रही कूटनीतिक बातचीत कश्मीर मुद्दे के किसी गैर-क्षेत्रीय समाधान तक पहुंचने के कगार पर थी, तब 26/11 हो गया।

इसने पाकिस्तान की संस्थागत व्यवस्था के भीतर मौजूद एक गहरी खाई को उजागर कर दिया। उसकी असैन्य सरकारों के पास वार्ता की मेज पर किए गए वादों को पूरा करने के लिए न तो पर्याप्त अधिकार थे, न ही वे इतने लंबे समय तक सत्ता में टिक पाती थीं कि उन वादों को निभा सकें। दूसरी ओर, उसकी सैन्य-खुफिया व्यवस्था भारत के साथ शांति को अपने वर्चस्व के लिए खतरे के रूप में देखती थी।

लेकिन अब भारत का सब्र जवाब दे चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुरुआत में तो शांति स्थापित करने की पुरानी कूटनीतिक परंपरा का ही अनुसरण किया। उन्होंने 2014 में अपने शपथ ग्रहण समारोह में नवाज शरीफ को आमंत्रित किया और अगले वर्ष स्वयं लाहौर गए। यहां तक कि पठानकोट स्थित भारतीय वायुसेना के अड्डे पर आतंकवादी हमले के बावजूद मोदी ने शरीफ को इस घटना की आधिकारिक जांच में शामिल होने का न्योता दिया।

लेकिन इसके बाद वह घटना हुई, जिसने भारत के धैर्य की सीमा समाप्त कर दी। पाकिस्तान की संयुक्त जांच टीम ने निष्कर्ष निकाला कि यह हमला दरअसल ‘पाकिस्तान को बदनाम करने के लिए भारत द्वारा रचा गया स्वांग’ था। इसके साथ ही भारत ने रणनीतिक संयम की अपनी नीति छोड़ दी और एक नए सिद्धांत को मार्गदर्शक बना लिया : बातचीत और आतंकवाद साथ-साथ नहीं चल सकते। भारत वार्ता की मेज पर तभी लौटेगा, जब पाकिस्तान राज्य-समर्थित आतंकवादी नेटवर्कों को ध्वस्त कर देगा।

इस कूटनीतिक बदलाव के साथ भारत के सैन्य सिद्धांत में भी एक बुनियादी परिवर्तन आया। लगभग तीन दशकों तक पाकिस्तान यह मानकर चलता रहा था कि उसका परमाणु हथियारों का जखीरा भारत को आतंकवादी हमलों के जवाब में पारंपरिक सैन्य कार्रवाई करने से रोक देगा। लेकिन विशेष रूप से पिछले वर्ष चलाए गए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के साथ ही भारत ने पाकिस्तान की इस धारणा को भी चुनौती दे डाली है।


Date: 23-10-26

संयुक्त राष्ट्र का रवैया

संपादकीय

संयुक्त राष्ट्र अपनी महत्ता और विश्वसनीयता किस तरह खो रहा है, इसका ताजा प्रमाण है उसके मानवाधिकार और आतंकवाद-रोधी मामलों के विशेष प्रतिवेदक बेन साल की रिपोर्ट में यह कहा जाना कि आतंकी सरगना दाऊद इब्राहिम का गिरोह भारत आधारित है। इस पर हैरानी नहीं कि इस कारण उसे भारत की फटकार सुननी पड़ी। अपनी इस फजीहत के लिए संयुक्त राष्ट्र स्वयं के अतिरिक्त अन्य किसी को दोष नहीं दे सकता। दाऊद इब्राहिम के बारे में ऐसी भ्रामक और नितांत झूठी जानकारी संयुक्त राष्ट्र के कामकाज के तरीकों पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है। समझना कठिन है कि आतंकी सरगना के रूप में दुनिया भर में कुख्यात दाऊद को लेकर संयुक्त राष्ट्र के प्रतिवेदक इस नतीजे पर कैसे पहुंच गए कि वह भारत में सक्रिय है, जबकि पिछले कई दशकों से वह पाकिस्तान में रह रहा है। भारत समय-समय पर इसके प्रमाण भी उपलब्ध कराता रहा है। इसके अतिरिक्त अमेरिका ने 2023 में दाऊद को वैश्विक आतंकी नामित किया था और उस पर इनाम भी रखा था। अमेरिका का यह भी निष्कर्ष था कि वह कराची में छिपा है। यही भारत कहता रहा है।

दाऊद इब्राहिम को भारत आधारित गिरोह बताने वाली रिपोर्ट आस्ट्रेलिया के प्रोफेसर बेन साल के नेतृत्व में तैयार हुई है। संभव है कि इसे तैयार करने में उन लोगों का भी हाथ हो, जो भारत के प्रति दुराग्रह से ग्रस्त हैं। वैसे खुद बेन साल की विश्वसनीयता भी संदिग्ध है। एक रिपोर्ट के अनुसार उनके कार्यालय को चीन से भारी-भरकम राशि मिली थी। इसके बाद बेन साल ने चीन में उइगर मुसलमानों के अत्याचारों पर बयान जारी करने से इन्कार कर दिया था। संयुक्त राष्ट्र के आतंकवाद-रोधी मामलों को देखने वालों की ओर से दाऊद के बारे में शरारतपूर्ण रिपोर्ट तैयार किए जाने से यही लगता है कि आतंक के मामले में उन्होंने कामचलाऊ रवैया अपना रखा है। शायद इसका कारण संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न एजेंसियों में पाकिस्तान जैसे कई ऐसे देशों का सक्रिय होना भी है, जो खुले-छिपे रूप से आतंक की पैरवी करते हैं और यह किसी से छिपा नहीं कि चीन किस तरह उसे भारत के खिलाफ अपना मोहरा बनाए हुए है। यह अच्छा हुआ कि भारत ने संयुक्त राष्ट्र को याद दिलाया कि दाऊद उसी पाकिस्तान में रहता है, जहां ओसामा बिन लादेन पाया गया था। यह चिंताजनक है कि अभी हाल में संयुक्त राष्ट्र की ओर से भारत में हो रहे प्रदर्शनों से निपटने के तरीकों पर भी चिंता जताई गई थी। यह अनावश्यक चिंता थी और इस पर भी उसे भारत के प्रतिरोध का सामना करना पड़ा था। इस प्रतिरोध से अमेरिकी विदेश मंत्री ने भी सहमति जताई थी। यदि संयुक्त राष्ट्र अपनी प्रतिष्ठा बचाना चाहता है तो उसे अपना रवैया सुधारना ही होगा।


Date: 23-10-26

बदल रही युवाओं के करियर की दिशा

डॉ. रोहित यादव, ( लेखक आईआईएम, बोधगया में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं )

पिछले कुछ वर्षों में इंजीनियरिंग की दुनिया में यह धारणा लगभग स्थापित हो गई थी कि अच्छे अंक हासिल करने वाले छात्रों की पहली पसंद कंप्यूटर साइंस होगी। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), कोडिंग और आइटी क्षेत्र के तेज विस्तार ने सिविल, मैकेनिकल और इलेक्ट्रिकल जैसी पारंपरिक शाखाओं को धीरे-धीरे पीछे धकेल दिया था, पर अब तस्वीर बदलती दिखाई दे रही है। भारत में बुनियादी ढांचे के विस्तार और सेमीकंडक्टर जैसे आधुनिक उद्योगों में बढ़ते निवेश ने युवाओं के करियर विकल्पों को नई दिशा देना शुरू कर दिया है। पीएम गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान और भारत सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 जैसी पहल केवल आर्थिक विकास की योजनाएं नहीं, बल्कि रोजगार और कौशल की मांग को भी बदल रही हैं।

पीएम गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान भारत में बुनियादी ढांचे की योजना बनाने के तरीके को बदलने की कोशिश है। इसके तहत सड़क, रेलवे, बंदरगाह, बिजली, नागर विमानन और दूरसंचार जैसे क्षेत्रों को अलग-अलग विकसित करने के बजाय उन्हें एक साझा योजना के तहत जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है। अब तक इसने करीब 18.66 लाख करोड़ रुपये की 396 बड़ी अवसंरचना परियोजनाओं का मूल्यांकन किया है। इनमें से 256 परियोजनाओं को मंजूरी मिल चुकी है और 198 पर निर्माण कार्य चल रहा है। इस मंच से 58 केंद्रीय मंत्रालय और सभी राज्य तथा केंद्रशासित प्रदेश जुड़े हैं। इस तरह के समन्वित निवेश का असर केवल सड़कों और रेलवे लाइनों की संख्या बढ़ने तक सीमित नहीं रहता। जब राजमार्ग, औद्योगिक गलियारे, बिजली नेटवर्क, बंदरगाह और गोदाम बेहतर तालमेल के साथ विकसित होते हैं तो निर्माण मजदूरों से लेकर सिविल-मैकेनिकल इंजीनियरों, सर्वेक्षकों, परियोजना प्रबंधकों और तकनीकी विशेषज्ञों तक-हर स्तर पर कुशल मानव संसाधन की मांग बढ़ती है। आइआइएम बेंगलुरु के एक अध्ययन के अनुसार, राष्ट्रीय राजमार्गों पर खर्च किया गया प्रत्येक एक रुपया जीडीपी में 3.2 रुपये तक की वृद्धि कर सकता है। इसी तालमेल का नतीजा है कि देश की लाजिस्टिक्स लागत, जो कभी जीडीपी के 13-14 प्रतिशत के आसपास हुआ करती थी, अब घटकर करीब 7.9 प्रतिशत रह गई है। यानी बेहतर बुनियादी ढांचा केवल आवागमन आसान नहीं बनाता, बल्कि उद्योगों की लागत घटाकर आर्थिक गतिविधियों और रोजगार के नए अवसर भी पैदा करता है।

आज दुनिया की आधुनिक अर्थव्यवस्थाएं सेमीकंडक्टर के बिना नहीं चल सकतीं। मोबाइल फोन और कारों से लेकर रक्षा उपकरणों और एआइ तक, लगभग हर आधुनिक तकनीक चिप पर निर्भर है। ऐसे में भारत लंबे समय तक केवल चिप का उपभोक्ता बने रहने के बजाय इस क्षेत्र में अपनी क्षमता विकसित करना चाहता है। इसके लिए हाल में सरकार ने सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 को मंजूरी दी। इसके तहत अब तक छह राज्यों में 12 परियोजनाओं को मंजूरी मिल चुकी है, जिनमें सिलिकान फैब, कंपाउंड सेमीकंडक्टर इकाइयां और असेंबली तथा टेस्टिंग इकाइयां शामिल हैं, लेकिन सेमीकंडक्टर उद्योग केवल फैक्ट्रियां लगाने से विकसित नहीं होगा। इसके लिए बड़ी संख्या में प्रशिक्षित इंजीनियरों और तकनीकी विशेषज्ञों की भी जरूरत होगी। 2026-27 के लक्ष्यों के अनुसार, सेमीकंडक्टर उद्योग में हजारों प्रत्यक्ष उच्च-कौशल रोजगार सृजित होने की उम्मीद है। सरकार की स्मार्टलैब पहल के तहत एक लाख इंजीनियरों को प्रशिक्षित करने का लक्ष्य रखा गया है, जिनमें से 62,000 का प्रशिक्षण पूरा हो चुका है। डिजाइन लिंक्ड इंसेंटिव योजना के तहत 105 भारतीय कंपनियों को चिप डिजाइन से जुड़े अत्याधुनिक उपकरण उपलब्ध कराए जा रहे हैं। इन नीतिगत बदलावों का असर अब इंजीनियरिंग कालेजों में छात्रों की पसंद पर भी दिखाई देने लगा है।

बीते डेढ़ दशक में कंप्यूटर साइंस का दबदबा इतना बढ़ गया था कि सिविल, मैकेनिकल और इलेक्ट्रिकल जैसी शाखाएं कई छात्रों के लिए दूसरा विकल्प बन गई थीं, पर अब सिविल एव मैकेनिकल इंजीनियरिंग में भी आइआइटी जैसे संस्थानों में बेहतर रैंक वाले छात्रों की रुचि बढ़ी है। इसकी वजह सिर्फ बाजार का उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि दो ठोस कारण हैं। पहला, एआइ के बढ़ते असर ने खुद पारंपरिक आईटी नौकरियों को लेकर नई बहस छेड़ दी है, जिससे कई छात्र मशीनों, उत्पादन और भौतिक दुनिया से जुड़े क्षेत्रों की ओर आकर्षित हो रहे हैं। दूसरा, गति शक्ति, सेमीकंडक्टर मिशन, रक्षा विनिर्माण में आत्मनिर्भरता और मेक इन इंडिया जैसी दीर्घकालिक नीतियां वाकई कोर इंजीनियरों की मांग बढ़ा रही हैं। युवाओं के सोच में यह बदलाव किसी अस्थायी ट्रेंड का नहीं, बल्कि जमीनी नीतिगत हकीकत का असर है।

भारत जिस तरह सड़क, रेल, ऊर्जा, लॉजिस्टिक्स, इलेक्ट्रानिक्स और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में निवेश कर रहा है, उससे साफ है कि भविष्य में अच्छे साफ्टवेयर इंजीनियरों की जरूरत जितनी बनी रहेगी, उतनी ही जरूरत उन इंजीनियरों की भी होगी जो सड़कें, पुल बनाएंगे, मशीनें डिजाइन करेंगे, बिजली प्रणालियां मजबूत करेंगे और दुनिया के लिए चिप तैयार करेंगे।


Date: 23-10-26

बढ़ते साइबर जोखिम

संपादकीय

भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) का यह खुलासा कि डार्क वेब पर मिले करीब 3.75 लाख रिकॉर्ड्स में से 3,897 ग्राहकों की व्यक्तिगत जानकारी वाला रिकॉर्ड मिला, इस बात की याद दिलाता है कि साइबर सुरक्षा अब केवल सूचना प्रौद्योगिकी से जुड़ा मुद्दा नहीं रह गया है। रिपोर्ट के मुताबिक उजागर हुई जानकारी में मोबाइल नंबर, पते, जन्मतिथि और ऋण से संबंधित विवरण शामिल हैं। स्टेट बैंक इस जानकारी के लीक होने के स्रोत और उसके दायरे की जांच कर रहा है। लेकिन ग्राहकों की चिंता इससे अलग है। ऐसी जानकारी के आधार पर धोखेबाज किसी व्यक्ति की पहचान बनाकर ठगी कर सकते हैं। इस बात पर भी सवाल है कि स्टेट बैंक को इस मामले की जानकारी खुद पता लगने के बजाय खतरे से जुड़ी खुफिया जानकारी देने वाली एक कंपनी, डिफेंस साइबर एजेंसी और भारतीय कंप्यूटर आपातकालीन प्रतिक्रिया दल (सर्ट-इन) से मिली।

जोखिम केवल डेटा चोरी तक सीमित नहीं हैं। रिजर्व बैंक के आंकड़े बताते हैं कि डिजिटल भुगतान से जुड़ी धोखाधड़ी के मामलों में बैंकों में होने वाली धोखाधड़ी की घटनाएं सबसे ज्यादा संख्या में हैं। सर्ट-इन ने गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी), डिजिटल ऋणदाताओं, फिनटेक कंपनियों, भुगतान सेवा प्रदाताओं और डिजिटल वॉलेट पर होने वाले हमलों को लेकर भी चेतावनी दी है। आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) के कारण हमलों की लागत और उन्हें अंजाम देने में लगने वाला समय कम हो रहा है जिससे इन पर काबू पाना कठिन होता जा रहा है। इस महीने की शुरुआत में जारी सर्ट-इन की चेतावनी में बताया गया कि एआई एजेंटों ने बिना अनुमति भारतीय संगठनों के लाइव सिस्टम और गोपनीय रिकॉर्ड तक पहुंच बनाई। प्रभावित संगठनों में से किसी को भी इस अनधिकृत पहुंच का पता खुद नहीं चला। हमलावर साइबर हमलों में एआई टूल्स का भी इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे सबक मिलता है कि साइबर सुरक्षा की पारंपरिक कमजोरियां मसलन उजागर लॉगिन क्रेडेंशियल, असुरक्षित एपीआई और क्लाउड सिस्टम में जरूरत से ज्यादा अनुमतियां आदि तब ज्यादा खतरनाक हो जाते हैं जब मशीनें उनका इस्तेमाल तेजी से और बड़े पैमाने पर कर सकती हैं।

हाल ही में ई-मुद्रा के डिजिटल सर्टिफिकेट से जुड़ी घटना व्यापक समस्या को उजागर करती है। सर्ट-इन ने चेतावनी दी थी कि यदि निजी क्रिप्टोग्राफिक कुंजियों (प्राइवेट कीज) से छेड़छाड़ हो जाए तो उनका इस्तेमाल फर्जी सर्टिफिकेट जारी करने और वैध वेबसाइटों के रूप में खुद को पेश करने के लिए किया जा सकता है। इसलिए बैंकों, फिनटेक कंपनियों, क्लाउड सेवा प्रदाताओं, एपीआई या डिजिटल प्रमाणन व्यवस्था की किसी भी परत में मौजूद कमजोरी के परिणाम केवल सीधे प्रभावित संगठन तक सीमित नहीं रहते, बल्कि दूसरे संस्थानों और उपयोगकर्ताओं पर भी पड़ सकते हैं। नियामकीय कार्रवाई का दायरा केवल परिचालन संबंधी लचीलापन सुनिश्चित करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। भारत में रिजर्व बैंक के तहत साइबर सुरक्षा और धोखाधड़ी के जोखिम से निपटने के लिए पहले से ही नियामकीय ढांचे मौजूद हैं। वहीं डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 प्रभावित व्यक्तियों को व्यक्तिगत डेटा के उल्लंघन की सूचना देने का प्रावधान करता है। हालांकि डीपीडीपी अधिनियम के संबंधित प्रावधान और नियम अलग-अलग चरणों में लागू किए जा रहे हैं। नवंबर 2025 में जारी अधिसूचना के अनुसार, डेटा उल्लंघन की सूचना देने से जुड़े प्रमुख प्रावधान केवल 18 महीने बाद प्रभावी होंगे। इससे अंतरिम अवधि में एक महत्त्वपूर्ण खामी बनी रहती है।

बैंकों और वित्तीय कंपनियों के लिए एपीआई सुरक्षा, तीसरे पक्ष से जुड़े जोखिमों, क्लाउड तक पहुंच और एआई एजेंटों को दी जाने वाली अनुमतियों के संबंध में ऐसे मानक भी तय किए जाने चाहिए जिनका पालन कानूनन अनिवार्य हो। एजेंटों की पहुंच सीमित रखने, परीक्षण के वातावरण को अलग रखने, महत्त्वपूर्ण प्रभाव डालने वाली कार्रवाइयों के लिए मानवीय मंजूरी अनिवार्य करने और ऐसे लॉग बनाए रखने जिनमें छेड़छाड़ न की जा सके, इन सबके बारे में सर्ट-इन के दिशानिर्देश केवल सलाह बनकर नहीं रहने चाहिए। इन्हें संस्थानों की नियमित कार्यप्रणाली का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। अब उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना नहीं होना चाहिए कि साइबर हमले के बाद भी बैंक काम करते रहें बल्कि यह भी होना चाहिए कि सुरक्षा व्यवस्था विफल होने पर ग्राहकों की रक्षा हो उन्हें समय पर जानकारी मिले और वे आवश्यक कदम उठा सकें।


Date: 23-10-26

साइबर खतरा

संपादकीय

इसमें कोई दोराय नहीं कि आधुनिक तकनीक की वजह से दुनिया भर में लोगों की जिंदगी आसान हुई है और इसने बहुस्तरीय विकास को रफ्तार दी है। मगर तकनीक के अद्यतन होते जाने के साथ जैसे-जैसे इसका सार्वजनिक उपयोग एक औपचारिक व्यवस्था का रूप ले रहा है, उसी के समांतर इसके जोखिम भी सामने आ रहे हैं। भारतीय स्टेट बैंक यानी एसबीआइ के हजारों ग्राहकों का डेटा डार्क वेब पर लीक हो जाने की खबर ने एक बार फिर उस जोखिम की गंभीरता और संवेदनशीलता पर विचार की जरूरत को रेखांकित किया है, जिसकी अनदेखी की जाती रही है। गौरतलब है कि डेटा लीक की खबर आने के पहले एक हैकर गिरोह ने यह दावा किया था कि उसने एसबीआइ के करीब पौने चार लाख ग्राहकों के निजी ब्योरे हासिल कर लिए हैं। इसके बाद बैंक का तंत्र सक्रिय हुआ और उसकी शुरुआती जांच में तीन हजार आठ सौ सतानबे ग्राहकों की निजी पहचान से जुड़ी जानकारी डार्क वेब पर मिलने की पुष्टि की गई। जाहिर है, यह साइबर संसार में लगातार खड़ी हो रही चुनौतियों की ही एक कड़ी है, जिसने यह सोचने पर मजबूर किया है कि आधुनिक तकनीक की सुविधा किस हद तक सुरक्षित है और उसके जोखिम का असर कितना गहरा हो सकता है।

एसबीआइ के जिन ग्राहकों का डेटा लीक हुआ है, उसमें उनका नाम, मोबाइल नंबर, ईमेल, पता, आधार और कुछ अन्य ब्योरे शामिल हैं। अभी ग्राहकों के खातों पर कोई खतरा होने की बात नहीं कही गई है। हालांकि डेटा लीक होने की चेतावनी मिलने के बाद एसबीआइ ने अपने सुरक्षा तंत्र को सक्रिय कर दिया, सीईआरटी-इन की एक स्वतंत्र साइबर सुरक्षा एजेंसी को जांच का जिम्मा सौंपा। मगर इस बात की क्या गारंटी है कि बैंक का अपना तंत्र जब डेटा को सुरक्षित नहीं रख सका, तो इससे इतर खतरों से वह ग्राहकों को बचा लेगा। डार्क वेब पर होने वाली अवांछित गतिविधियां पहले ही वैश्विक स्तर पर एक गंभीर चुनौती बनी हुई थीं। अब उस संजाल में फैले गिरोहों ने जिस तरह बैंकों के डेटा तक पहुंच बनानी शुरू कर दी है, वह दुनिया भर के लिए बेहद की बात है। इसके अलावा, एक खबर यह भी आई कि भारत में डिजिटल सुरक्षा देने वाली कंपनी ई-मुद्रा में एक तकनीकी गड़बड़ी सामने आने के बाद इलेक्ट्रानिक एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने इसकी जांच के लिए विशेष टीम बनाई है। इसके बाद सरकार ने सफाई दी कि इस खामी का असर कंपनी के सिर्फ विदेशी कारोबार पर पड़ा है।

सवाल है कि एसबीआइ के डेटा लीक या ई-मुद्रा में तकनीकी खामी क्या यह नहीं दर्शाती कि अगर आने वाले वक्त में डार्क वेब पर मौजूद या कोई अन्य गिरोह व्यापक और जटिल धोखाधड़ी के लिए साइबर हमला करता है, तो उसका सामना करने के लिए हमारा डिजिटल तंत्र पूरी तरह तैयार नहीं है? मुश्किल यह है कि डार्क वेब यानी इंटरनेट के छिपे हुए हिस्से में जिस तरह डेटा चोरी, उसकी अवैध खरीद-बिक्री का व्यापक संजाल खड़ा हो चुका है, उससे पार पाने के लिए डिजिटल संसार में अब तक कोई सुरक्षा दीवार खड़ी नहीं की जा सकी है। अगर साइबर अपराधियों का कोई गिरोह दुनिया के अलग- अलग देशों के बेहद अहम संस्थानों की संवेदनशील सूचनाओं तक इतनी आसानी से पहुंच बना कर डेटा हैक कर सकते हैं, तो ऐसे में एक आम आदमी अपने बैंक खाते या इंटरनेट पर मौजूद अपनी अन्य निजी जानकारियों और सामग्री के सुरक्षित होने का भरोसा कैसे करे ?


Date: 23-10-26

आर्थिक सजगता

संपादकीय

पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध का असर दुनिया और भारतीय अर्थव्यवस्था पर साफ दिखने लगा है। गुरुवार को भी भारतीय शेयर बाजारों में गिरावट का क्रम जारी रहा। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? ध्यान रहे, युद्ध के चलते कच्चे तेल की कीमतें 110 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी हुई हैं, जिससे कच्चे तेल के तीसरे सबसे बड़े आयातक भारत में महंगाई की चिंता बढ़ती जा रही है। बाजार में अस्थिरता को बढ़ावा मिला है। ऐसा लगता है कि युद्ध में भी अमेरिका केवल अपना हित देखने में लगा है। ईरान और उसके समर्थक संगठन लगातार हमले कर रहे हैं। अमेरिकी रुख के सामने सऊदी अरब जैसा देश लाचार है और इजरायल को भी चिंता सताने लगी है। विडंबना है कि युद्ध के बावजूद इस साल अमेरिका के प्रमुख शेयर बाजार में 13.7 प्रतिशत की बढ़त दर्ज हुई है, जबकि भारत में अब तक सेंसेक्स 14 प्रतिशत, तो निफ्टी 16 प्रतिशत तक गिर चुका है। भारत ही नहीं, चीन के शेयर बाजार में भी जून महीने के बाद करीब 20 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई है।

भारतीय शेयर बाजार में करीब आठ सप्ताह से जारी गिरावट को थामने के विशेष प्रबंध होने चाहिए। देश में कहीं मंदी नहीं है, बाजारों में भीड़ है, पर शेयर बाजार में मंदी के सिलसिले को तोड़ना होगा, तभी निवेश बढ़ेगा और महंगाई पर लगाम लगेगी। भारतीय शेयर बाजार को दुनिया भर के निवेशक बहुत उत्साह से देखते आए हैं, लेकिन लगभग 25 साल बाद यहां निवेश मंदा पड़ता दिख रहा है। यहां निवेश के दम पर ही हमने एक लंबा सफर तय किया है, वरना 25 साल पहले मुंबई शेयर बाजार का सूचकांक महज 3,000 अंक से कुछ ही ऊपर हुआ करता था। इस साल 1 जनवरी को सेंसेक्स 85,189 के स्तर पर था, जो अब गिरकर 73,400 से नीचे चला गया है। कुछ दूसरे संकेत भी सावधान कर रहे हैं। भारत के मुद्रा भंडार में करीब 59 अरब डॉलर की कमी आई है, तो एक अमेरिकी डॉलर का भाव 95 रुपये की ओर बढ़ता दिख रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह कच्चे तेल की कीमत है। चूंकि भारत तेल आयात पर निर्भर है, इसलिए उसका आयात बजट बढ़ता जा रहा है। युद्ध के समय निर्यात बढ़ाने में भी मुश्किलें आ रही हैं। यहां तक कि चीन में भी आर्थिक संकट मंडरा रहा है। वहां घरेलू मांग में कमी आ रही है। हालांकि, चीन के लिए अच्छी बात है कि वहां महंगाई दर एक प्रतिशत से नीचे है, जबकि भारत में महंगाई दर बहुत तेजी से छह प्रतिशत की ओर बढ़ रही है।

क्या हम अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के लिए पूरे प्रयास कर रहे हैं? क्या इसमें हर नागरिक का योगदान मिल रहा है? मिसाल के लिए, सरकार की ओर से अपील हुई थी कि लोगों को सोना खरीदने में कमी करनी चाहिए, पर इसमें महज छह प्रतिशत कमी आई है। विशेषज्ञों का मानना है कि वास्तव में स्वर्ण की कीमत बढ़ने से उसकी खरीद घटी है। एक अपील विदेश दौरा कम करने के लिए हुई थी, पर विदेश दौरे बढ़ गए हैं और विदेशी पर्यटकों की संख्या घट रही है। सितंबर के आंकड़ों को देखें, तो डीजल की बिक्री तीन प्रतिशत घटी है, पर पेट्रोल की बिक्री में 5.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। आज की जरूरत के मुताबिक अगर देखें, तो मितव्ययिता बढ़ने के संकेत न के बराबर हैं। कोई दोराय नहीं, भारत दुनिया के ज्यादातर देशों से तुलनात्मक रूप से बेहतर स्थिति में है, लेकिन अब आगे संकट को और बढ़ने से रोकना होगा। अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत रखने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक, सरकार, उद्यमियों और आम लोगों को यथोचित योगदान देना चाहिए।