21-08-2021 (Important News Clippings)

21 Aug 2021
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Cast Aside

We need current household data, not caste census

TOI Editorials

A multiparty delegation is to meet Prime Minister Narendra Modi next week seeking a national caste census. It’s a demand rooted in a mix of politics and deprivation. Indeed, accurate and timely data is central to India’s effort to dent poverty. However, improving existing databases is more crucial to this than caste counts. Poor data hurts efforts to design welfare programmes. If caste is about deprivation, counting the really deprived is more important than identifying the caste of everyone.

India’s National Sample Survey is unique for the extensive and periodic household level data it generates. It’s the foundation of many GoI policies, including the inflation targeting framework that is based on consumer expenditure surveys. The trouble now is that many key welfare schemes are based on work carried out by NSS and other arms of the government way back in 2011-12. The consumer expenditure survey (68th round) and the Socio Economic and Caste Census (SECC) 2011 are the bedrock of welfare schemes such as the ones for LPG cylinders and rural housing. There’s been no update to this database in a decade.

We have not had an estimate of even poverty since July 2013. Policies today are being designed on a rather old database. It’s more important for GoI to pay attention to this gap rather than embark on a new exercise when even the Census 2021 enumeration has been delayed by the pandemic.


Faith and marriage

Dubious legislation cannot be allowed to criminalise inter-faith marriages


A regressive and patently unconstitutional feature of recent anti-conversion laws enacted by different States is the criminalisation of inter-faith marriages by treating them as a means to convert one of the parties from one religion to another. While anti-conversion laws, euphemistically called in some States as laws on ‘freedom of religion’, have always sought to criminalise conversions obtained through fraud, force or allurement, the recent enactments or amendments have created “conversion by marriage” as one of the illegal forms of conversion. In its interim order protecting parties to inter-religious marriages from needless harassment, the Gujarat HC has made it clear that the “rigours” of the State’s amendments introduced earlier this year will not apply to marriages that do not involve any fraud, force or allurement. So, it has stopped the initiation of criminal proceedings against those who have married across religious faiths, unless there was any of these illegal elements. A Bench has rejected the State government’s attempt to adopt an innocent reading of the provisions of the Gujarat Freedom of Religion (Amendment) Act, 2021, by claiming that inter-faith marriages that did not involve fraud or coercion and leading to conversion would not attract the penal provisions. The argument is obviously contrary to the wording of the amendment, which makes conversion “by marriage” or “by getting a person married” or “by aiding a person to get married” an offence. The court said, “A plain reading of Section 3 would indicate that any conversion on account of marriage is also prohibited.”

It is regrettable that Hindutva votaries continue to believe in medieval-minded laws aimed at curbing inter-faith marriages. Despite clear Supreme Court rulings that it is no more constitutional to police private lives and beliefs, sections in the polity still believe that inter-religious marriages are aimed at religious conversion, that they have an adverse impact on public order and invariably involve coercion or deceit. It was always clear to the secular minded and legal experts that constitutional courts will not see such marriages as events that impinge on public order, and that making their solemnisation a ground for prosecution under anti-conversion laws was unlikely to be upheld. It is clear that the Gujarat law’s provisions “interfere with the intricacies of marriage” and an individual’s right to choice, thereby infringing Article 21 of the Constitution. The principle that the right to marry a person of one’s choice is integral to Article 21 flows from the verdict in Shafin Jahan vs Asokan. The order stalling criminal action against those entering into a valid inter-faith marriage constitutes a significant judicial pushback against disconcerting attempts by various States to foment communal divides through dubious legislation.


कानून की खामियों से उच्चतम न्यायालय भी परेशान


सीजेआई ने स्वतंत्रता दिवस पर जजों-वकीलों को संबोधित करते हुए एक अजीब परेशानी बताई जजों को कानून में व्यापत अस्पष्टता से जूझना पड़ता है क्योंकि सरकारें कानून बनाते वक्‍त अपेक्षितसावधानियां नहीं बरततीं। सिद्धांततः न्यायपालिका का काम कानून की व्याख्या करना होता है, लेकिन अगर स्वयं कानून की भाषा और मंतव्य अस्पष्ट हो तो जज उसकी व्याख्या कैसे करे ?

सीजेआई ने आगे कहा कि कानून की खामियों की वजह से वादों की भरमार होती है क्योंकि आम जनता को ही नहीं, उसका अनुपालन कराने वाली संस्थाओं और यहां तक कि कोटर्स को भी इन्हें समझने में कठिनाई होती है। ‘हमें कई बार यह भी नहीं पता चलता कि अमुक कानून बनाने के पीछे सरकार का उद्देश्य क्या था।’ दरअसल हाल में ही सरकार ने संविधान-संशोधन या नए कानून के जरिए सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों को पलट दिया। सीजेआई ने बताया ‘एक जमाने में संसद में कानून के हर पहलू पर विचार होता था लेकिन आज दुर्भाग्य से ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा है। नतीजतन कोर्ट्स भी नहीं समझ पाती कि अमुक कानून को बनाने के पीछे संसद की मंशा क्या रही होगी।’ तीन दिन पहले खत्म हुए मानसून सत्र में 20 विधेयक में से एक पर भी पूर्ण चर्चा नहीं हुई और वे कानून बनने की प्रक्रिया के अंतिम चरण में पहुंच गए। आंकड़े बताते हैं कि कानूनों को संसदीय समितियों के पास भेज कर विशेषज्ञ-जांच करबाने की परंपरा भी खत्म कर दी गई है।

15वीं लोक-सभा में 71% प्रतिशत बिल समितियों को भेजे गए, जबकि 16वीं में 27 प्रतिशत और वर्तमान में अब तक केवल 12 प्रतिशत सीजेआई की शिकायत पर सरकार को संजीदा होना चाहिए।


सहारा कूटनीति का


अफगानिस्तान के हालात पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत ने जो चिंताएं रखी हैं, उनका सरोकार सभी देशों से है। ज्यादातर देश किसी न किसी रूप में आतंकवाद और मुल्कों के टकराव से होने वाली अशांति के खतरों से जूझ रहे हैं। भारत ने साफ कहा है कि अफगानिस्तान के हालात न सिर्फ क्षेत्रीय बल्कि वैश्विक शांति के लिए भी गंभीर चुनौती बन गए हैं। भारत ने एक फिर दोहराया है कि अब किसी भी तरह से दुनिया से आतंकवाद का खात्मा करना होगा। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने सुरक्षा परिषद के विशेष सत्र में उन देशों को आड़े हाथों लिया जिनका मूल काम आतंकवाद को बढ़ावा देना है।

गौरतलब है कि इस महीने के लिए सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता भारत को मिली है। यह ऐसा वक्त है जब अफगानिस्तान में सत्ता पलट हो चुका है। इस घटनाक्रम से सबसे ज्यादा जो देश प्रभावित हुए हैं उनमें भारत भी है। इसलिए अब सुरक्षा परिषद में अफगानिस्तान के मुद्दे भारत कुछ रहा है तो उसकी अहमियत ज्यादा ही है। भारत ने जिस सबसे गंभीर मुद्दे पर वैश्विक समुदाय का ध्यान खींचा है वह आतंकी संगठनों को बढ़ावा देने वाले देशों को लेकर है। सवाल है कि इन देशों से निपटने की रणनीति क्या बने?

अफगानिस्तान के हालात बता रहे हैं कि आतंकवाद से निपटने में अगर वैश्विक समुदाय ने इच्छाशक्ति नहीं दिखाई तो भविष्य में हालात और बदतर होते चले जाएंगे। दूसरे और देश भी आतंकवाद की जद में आते जाएंगे। इसीलिए भारत के विदेश मंत्री ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस और अमेरिकी विदेश मंत्री एटंनी ब्लिंकन से बातचीत में आतंकवाद के खतरों को केंद्र में रखा। बतौर सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष भारत ने जो उपाय सुझाए हैं, वे भी महत्त्वपूर्ण हैं। गंभीर होते जा रहे हालात में भारत ने यह भी दोहराया है कि आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले देशों पर कार्रवाई के लिए बनाए गए वित्तीय कार्रवाई कार्यबल को और सशक्त बनाने की जरूरत है। गौरतलब है कि इस बल ने पाकिस्तान को निगरानी सूची में डाल रखा है। यह तो पूरी दुनिया जान रही है कि दूसरे देशों की तरह भारत भी लंबे समय से सीमापार आतंकवाद की मार झेल रहा है। अब तक अमेरिका के साथ भारत भी यही कहता रहा है कि पाकिस्तान आतंकियों के प्रशिक्षण का वैश्विक केंद्र है।

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