19-05-2023 (Important News Clippings)

19 May 2023
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Need to Take Forest Cover Seriously

ET Editorials

The Haryana Forest Department has sent notices to more than a dozen people for encroachment on 35 acres of protected Aravali forest land, after media reports pointed to illegal deforestation and construction work in an area protected under the Forest (Conservation) Act 1980. This is a welcome move, even as the breach was clearly allowed to take place. Governments need to step up their forest conservation efforts if India is serious about showcasing its serious commitment to environmental protection. A list should be drawn up of activities, especially housing construction, for which no diversion of forest land should be permitted. In cases like the Aravali range, which has been assailed by deforestation, mining and encroachment, the ‘blacklist’ must be more exhaustive.

More stringent forest clearance norms alone will not protect forests. Tackling illegal mining, deforestation and encroachment will require authorities taking the task of monitoring and implementation of regulations and compliance seriously. The administration of forests is shared responsibility between the central and state governments. Government must put in place deterrents to stop legitimising violation and a prevalent chalta hai culture. This means taking punitive action against violators, including enablers in government.

Forests serve critical functions, particularly in ensuring the health of hydrological systems, improved air quality and stemming land degradation. They also provide ecosystem services that help underpin human life and settlements. Ring-fencing demarcated forest areas must not be seen as an economic burden. Instead, forest administrations need to focus on making evident the value that ecosystem services have for the economy and society’s well-being.


Warming warning

India must invest in infrastructure that boosts defence against disasters.


The World Meteorological Organization (WMO) has issued its annual update on its projections for temperature trends in the next decade. The prognosis, expectedly, is worrying. The annual mean global near-surface temperature for each year between 2023 and 2027 is likely to be 1.1°-1.8°C higher than the average from 1850-1900. There is a 66% chance that the global near-surface temperature will exceed 1.5°C above pre-industrial levels, in at least one year before 2027 though it is unlikely that the five-year mean will exceed this threshold. The 1.5°C threshold, the Intergovernmental Panel on Climate Change has repeatedly said, is one that is best left unbreached to avoid the disastrous consequences of global warming. While world leaders at climate summits are in agreement, few of their actions are consistent with keeping temperature-rise within this rubicon, with current climate policies poised to heat the globe beyond 2°C by the end of the century.

At least one of the years, the WMO adds, from 2023 to 2027 will be the hottest on record — exceeding the 14.84°C reported in 2016 (it was about 0.07°C warmer than the previous record set in 2015). The five-year mean for 2023-2027 was very likely to be higher than that in the last five years (2018-2022). The oceans too are on fire. The El Niño-Southern Oscillation (ENSO) is likely to be positive in December to February 2023-24, meaning that the Central Equatorial Pacific Ocean is likely to be at least half a degree, more likely over a degree above what is normal. India is bracing for this El Niño during the monsoon, with the India Meteorological Department already indicating that monsoon rainfall will be on the lower side of ‘normal’. The El Niño “will combine with human-induced climate change to push global temperatures into uncharted territory”, WMO Secretary-General Petteri Taalas said in a press statement in the context of the update. Hotter oceans also mean stronger cyclones. Cyclone Mocha, which barrelled through Myanmar this week and claimed at least 60 lives and wrought severe damage, ended up being stronger than what was initially estimated. The WMO update does not have specific inputs for India; however, the overall trend in indicators suggests that India, dependent as it is on rain-fed agriculture and with its long coastline, will be severely tested due to changes in the global climate. India’s abilities at forecasting cyclones and weather anomalies have improved but developing resilience is far more challenging. Greater investments in bolstering disaster-related infrastructure are the need of the hour.


भारत में धनी कहलाना है तो 1.44 करोड़ रुपए चाहिए


ताजा ‘द वेल्थ रिपोर्ट’ के अनुसार भारत में धनी (एक प्रतिशत आबादी) कहलवाने के लिए आपके पास 1.44 करोड़ रुपए की संपत्ति होनी चाहिए। भारत के एक छोटे वार्ड की साइज के देश मोनाको में धनी होने के लिए भारत के मुकाबले 160 गुना ज्यादा संपत्ति चाहिए। 25 देशों के एक प्रतिशत ‘धनी’ वर्ग में आने के लिए अपेक्षित संपत्ति के आकलन में भारत 22वें स्थान पर है। दुनिया में अरबपति लोगों का आठ फीसदी भारत से है। हारून ग्लोबल रिच लिस्ट के अनुसार दुनिया में 70 फीसदी लोग अपने बूते इस मुकाम तक पहुंचे, जबकि भारत में केवल 57 फीसदी (या 105 लोग)। देश के सबसे बड़े पूंजीपति घराने की जो संपत्ति 20 साल पहले 10 अरब डॉलर थी वह आज दस गुना बढ़ कर 100 अरब डॉलर हो गई है। ‘द वेल्थ’ के अनुसार आने वाले दिनों में संपन्न लोग पूंजी को लेकर संशय के वातावरण में रहेंगे और अपनी पूंजी को सुरक्षित स्थान पर ‘पार्क’ करेंगे। लेकिन रिपोर्ट ने उम्मीद की है कि दुनिया अंग्रेजी शब्द ‘परमाक्राइसिस’ (दीर्घकालिक संकट) की मानसिकता से उबरेगी और आर्थिक स्थिति बेहतर होगी। दुनिया में गरीब-अमीर के बीच की खाई लगातार बढ़ती जा रही है। श्रम, बुद्धि या विवेक से ज्यादा नई व्यवस्था में ‘पैसा काम पर लग रहा है’।


पूर्वोत्तर की प्रगति को लगते पंख

रमेश कुमार दुबे, ( लेखक लोक-नीति विश्लेषक हैं )

नौ मई की तिथि केवल पूर्वोत्तर भारत के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए महत्वपूर्ण रही। इस दिन केंद्रीय बंदरगाह, नौवहन और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने म्यांमार के सितवे बंदरगाह पर कोलकाता से चले पहले मालवाहक जहाज की अगवानी की। अब सितवे बंदरगाह भारत के पूर्वी तट को पूर्वोत्तर राज्यों से जोड़ेगा। सितवे बंदरगाह को भारत द्वारा कलादान मल्टी माडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट परियोजना के तहत विकसित किया गया है। इस परियोजना की परिकल्पना मिजोरम को हल्दिया-कोलकाता-म्यांमार में कलादान नदी के माध्यम से किसी भी भारतीय बंदरगाह के साथ वैकल्पिक कनेक्टिविटी प्रदान करने के लिए की गई है। इसके तहत सड़क मार्ग द्वारा मिजोरम से म्यांमार के पलेटवा और उसके बाद पलेटवा से नदी परिवहन द्वारा सितवे और सितवे से समुद्री मार्ग से भारत के किसी भी बंदरगाह तक पहुंच की परिकल्पना की गई है। स्पष्ट है कि सितवे बंदरगाह के संचालन से द्विपक्षीय और क्षेत्रीय व्यापार में बढ़ोतरी होगी। इससे पूर्वोत्तर के स्थानीय उत्पाद आसानी से दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों तक पहुंचने लगेंगे। इससे न केवल ढुलाई लागत और समय की बचत होगी, बल्कि भारत को चिकन नेक सिंड्रोम (सिलीगुड़ी कारिडोर) की चिंता से भी मुक्ति मिल जाएगी। यह वही गलियारा है जो पूर्वोत्तर को शेष भारत से जोड़ता है, जो महत्वपूर्ण व्यापारिक-संपर्क मार्ग होने के साथ ही दक्षिण पूर्व एशिया के लिए एक महत्वपूर्ण प्रवेश द्वार भी है। यह गलियारा पूर्वोत्तर राज्यों में अवैध घुसपैठ, सीमा पार आतंकवाद और इस्लामी कट्टरपंथ से निपटने की दृष्टि से भी उतना ही महत्व रखता है। उल्लेखनीय है कि दक्षिण पूर्व एशिया का क्षेत्र ‘गोल्डन ट्राइंगल’ के रूप में कुख्यात है, जिससे जुड़े म्यांमार, थाईलैंड और लाओस में संगठित अपराध और मादक पदार्थों की तस्करी का बोलबाला है।

एक समय पूर्वोत्तर का आर्थिक तंत्र चटगांव बंदरगाह से जुड़ा हुआ था, लेकिन भारत विभाजन के बाद कोलकाता बंदरगाह का विकल्प ही शेष रह गया जो दूर होने के साथ-साथ बहुत व्यस्त भी है। परिणामस्वरूप पूर्वोत्तर के समृद्ध हस्तशिल्प और बागवानी उत्पाद बाजार के अभाव में दम तोड़ने लगे। दुर्भाग्यवश सरकारें इस क्षेत्र को वैकल्पिक कनेक्टिविटी प्रदान करने के बजाय अलगाववादी गुटों को बढ़ावा देकर राजनीतिक रोटियां सेंकने लगीं। इससे जनजातीय संघर्ष, अलगाववाद, आतंकवाद और गरीबी को उर्वर भूमि मिली।

दूसरी ओर, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने पहले कार्यकाल से ही पूर्वोत्तर की समस्या के स्थायी समाधान के लिए अपनी ‘एक्ट ईस्ट नीति’ को पूर्वोत्तर भारत के विकास से जोड़ा। मोदी यह भलीभांति समझ गए थे कि पूर्वोत्तर में समृद्धि की बहार तभी आएगी जब सरकार यहां के उत्पादों की दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों तक पहुंच सुनिश्चित करे। इसीलिए मोदी सरकार विभाजन पूर्व के रेल संपर्कों को बहाल करने के साथ-साथ पूर्वोत्तर राज्यों की राजधानियों को ब्राडगेज रेल लाइन से जोड़ रही है। रेल मार्गों का विद्युतीकरण और हाई स्पीड नेटवर्क बनाने पर भी काम हो रहा है। नदी परिवहन को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। अब तक गुवाहाटी (असम), इटानगर (अरुणाचल प्रदेश) और अगरतला (त्रिपुरा) को ब्राडगेज रेल नेटवर्क से जोड़ दिया गया है। इंफाल को रेलवे से जोड़ने के लिए जिरीबाम-इंफाल नई ब्राड गेज रेल लाइन बिछाई जा रही है और इस साल के अंत तक यह परियोजना पूरी हो जाएगी। आगे चलकर इस रेल लाइन को म्यांमार से मोरेह (मणिपुर) और तामू (मेघालय) तक बिछाया जाएगा। इसी प्रकार आइजोल और कोहिमा को भी रेल नेटवर्क से जोड़ने का काम प्रगति पर है।

भारत-बांग्लादेश के बीच 1965 से बंद पड़ी रेल लाइनों को पुन: शुरू करने की मोदी सरकार की योजना प्रशंसनीय है। यह रेल संपर्क एक्ट ईस्ट नीति के लिए मील का पत्थर साबित होगा। वर्तमान में अगरतला पूरे देश से रेल, सड़क और हवाई मार्ग से जुड़ा है। अगरतला-अखौरा रेल लिंक शुरू होने के बाद कोलकाता और अगरतला के बीच की दूरी 31 घंटे के बजाय महज 10 घंटे में पूरी हो जाएगी। इस साल के अंत तक यह रेल परियोजना पूरी हो जाएगी। इससे दोनों देशों के लोगों को बड़ी सुविधा मिलेगी। सरकार का पूरा जोर चटगांव-माकुम रेल लाइन बनाने पर है। इससे चटगांव बंदरगाह पूर्वोत्तर राज्यों के लिए मुख्य बंदरगाह की तरह काम करने लगेगा। इससे केवल पूर्वोत्तर ही नहीं, बल्कि समूचे पूर्वी भारत के उत्पाद भी आसानी से दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों में पहुंचने लगेंगे। हल्दीबाड़ी-चिलाहाटी रेल लाइन को भी तीन साल पहले पुन: शुरू किया गया। यह रेल लिंक असम, बंगाल, नेपाल और भूटान से बांग्लादेश माल भेजने के लिए छोटा रास्ता है। इसी प्रकार के अन्य बंद पड़े रेलमार्गों को शुरू कराने के प्रयास जारी हैं।

मोदी सरकार भारतमाला परियोजना के तहत पूर्वोत्तर राज्यों में 5,300 किलोमीटर सड़कों का निर्माण कर रही है। पूर्वोत्तर को दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों के साथ जोड़ने में सबसे महत्वपूर्ण कदम है भारत-म्यांमार-थाईलैंड सुपर हाईवे। 3,200 किलोमीटर लंबा यह हाईवे मोरेह से शुरू होकर म्यांमार के मांडले और यंगून होते हुए मेसोट (थाईलैंड) को जोड़ेगा। इससे पूर्वोत्तर के कृषि, बागवानी, खाद्य प्रसंस्करण, इंजीनियरिंग, वस्त्र और दवा उद्योग की आसियान देशों तक आसान पहुंच बन जाएगी। सरकार हवाई यातायात को भी बढ़ावा दे रही है। पूर्वोत्तर के हवाई अड्डों के उन्नयन के साथ-साथ इंफाल, बागडोगरा, गुवाहाटी हवाई अड्डों का विस्तार किया जा रहा है ताकि यहां से अंतरराष्ट्रीय उड़ानें संचालित की जा सकें। स्पष्ट है कि कनेक्टिविटी के मोर्चे पर हो रहे ये बड़े प्रयास पूर्वोत्तर में आर्थिक विकास की नई गाथा लिखने जा रहे हैं।


क्या हम फिर बना पाएंगे नालंदा, तक्षशिला

हरिवंश चतुर्वेदी, ( डायरेक्टर, बिमटेक )

उच्च शिक्षा में नया सत्र शुरू होने में बस दो महीने शेष हैं। विश्वविद्यालयों और कॉलेज कैंपस में फिलहाल शिक्षक व विद्यार्थी परीक्षाओं में व्यस्त हैं। गरमी की धूप तेज होने के साथ ही शिक्षा परिसरों में सन्नाटा बढ़ता जाएगा, किंतु पूरी संभावना है कि इन्हीं परिसरों में आगामी महीनों में उच्च शिक्षा का परिदृश्य तेजी से बदलेगा। हमारी उच्च शिक्षा व्यवस्था में क्या नए सुधार और बदलाव होने जा रहे हैं?

पहली बात, तीन साल पहले जिस राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 की घोषणा की गई थी, उसकी कुछ खास बातों पर अभी अमल होना बाकी है। राष्ट्रीय स्तर पर ‘यूजीसी, एआईसीटीई’ और ‘मेडिकल कमीशन ऑफ इंडिया’ आदि की जगह जिन नियामक संस्थाओं की स्थापना होनी है, उनके गठन से संबंधित कानूनों का अभी संसद में पारित होना बाकी है। संसद के पिछले कई सत्रों में इन संस्थानों के गठन से जुड़े कानूनों को पारित करने की सुर्खियां मीडिया में सामने आईं, किंतु ऐसा हो नहीं पाया। संसद का मानसून सत्र भी 18 जुलाई को शुरू होना है। क्या इस बार कुछ हो पाएगा?

दूसरी बात, देश के सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों और कुछ निजी विश्वविद्यालयों में एनईपी के अंतर्गत चार वर्षीय यूजी पाठ्यक्रमों और ‘एकेडमिक बैंक ऑफ क्रेडिट’ जैसे प्रावधानों पर तेजी से काम चल रहा है, किंतु अभी इन प्रमुख नीतियों की भविष्य में क्या स्थिति होगी, यह शिक्षा से जुड़े बड़े वर्ग को नहीं मालूम। अभी भी कई राज्यों में एनईपी को लेकर कई आशंकाएं हैं। लोग पूछते हैं कि चार वर्षीय यूजी पाठ्यक्रम के लिए अतिरिक्त शिक्षक, पुस्तकें, कक्षाएं और लेबोरेटरी कहां से आएंगी?

उच्च शिक्षा के पिछले सत्र (2022-23) में एक बड़ी उपलब्धि रही 53 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में यूजी कक्षाओं में प्रवेश की एकीकृत प्रवेश परीक्षा (सीयूईटी) का संचालन। इस परीक्षा में 9.68 लाख प्रवेशार्थियों ने भाग लिया था। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी के अनुसार, 2023 की सीयूईटी परीक्षा समूचे भारत में और भारत के बाहर 24 शहरों में 21 मई से 31 मई, 2023 तक संचालित की जाएगी। हालांकि, सीयूईटी से राज्यों के विश्वविद्यालयों का जुड़ना बाकी है।

तीसरी बात, यह पहलू भी छिपा नहीं है कि दशकों से विश्वविद्यालयों की प्रवेश परीक्षाओं में भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद भयंकर रूप ले चुका है। गरीब वर्ग के विद्यार्थियों को अनेक प्रवेश परीक्षाओं में भाग लेने की मजबूरी में पिसना पड़ता है। सीयूईटी निश्चित रूप से एक प्रगतिशील कदम माना गया, किंतु इसके साथ ही कोचिंग का एक बड़ा धंधा पनप गया। पहले ही देश के करोड़ों युवा कोचिंग के आर्थिक-मानसिक बोझ से दबे जा रहे थे। कोटा में हर साल अनेक युवा आत्महत्या के लिए मजबूर हो जाते हैं।

चौथी बात, भारतीय उच्च शिक्षा से जुड़ी एक ज्वलंत समस्या है प्रतिभा पलायन। बड़ी संख्या में भारतीय विद्यार्थी विदेश पढ़ने चले जाते हैं। यह देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी हानिकारक है और भारतीय उच्च शिक्षा पर भी सवाल उठ खड़े होते हैं। संसद में शिक्षा राज्य मंत्री सुभास सरकार ने बताया था कि कोविड के तत्काल बाद उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाने वाले भारतीय युवाओं की तादाद 68 प्रतिशत बढ़ी है। 2021 में विदेश जाने वाले युवाओं की संख्या 4.45 लाख थी, जो 2022 में 7.50 लाख हो गई। ध्यान रहे, 2017 से 2022 के बीच के छह वर्षों में 30 लाख भारतीय युवा उच्च शिक्षा के लिए विदेश गमन कर चुके हैं। इनमें से कितने भारत लौटकर आएंगे, कहना मुश्किल है। भारत को दुनिया में सबसे ज्यादा युवा विद्यार्थियों को विदेश भेजने का ‘गौरव’ मिल रहा है, जो हमारी उच्च शिक्षा व्यवस्था की विफलताओं, सीमाओं और चुनौतियों को भी रेखांकित करता है।

क्या हमारा देश सिंगापुर, हांगकांग, यूएई की तरह भारत को उच्च शिक्षा का एक लोकप्रिय हब बना सकता है? क्या हम देश के प्रमुख शहरों में विदेशी विद्यार्थियों को आकर्षित करने के समुचित इंतजाम कर सकते हैं? क्या हम विकसित देशों की तरह भारतीय उच्च शिक्षा की छवि सुधारने, उसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ब्रांडिंग करने और विदेशी विद्यार्थियों को भारत लाने के लिए संगठिन प्रयास कर सकते हैं? क्या यह काम सिर्फ ‘स्टडी इंडिया पोर्टल’ बनाने से हो जाएगा?

पांचवीं बात, देश में उच्च शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए विदेशी विश्वविद्यालयों को अपने कैंपस भारत में स्थापित करने के सवाल पर पिछले दो दशक से बहस होती रही है। यूजीसी ने इस दिशा में एक कदम उठाने से पहले शिक्षाविदों और नागरिकों की राय जानने के लिए जनवरी, 2023 में भारत में विदेशी विश्वविद्यालयों के कैंपस स्थापित करने से संबंधित प्रस्तावित नियमावली को जारी किया। इसके अंतर्गत विदेशी विश्वविद्यालयों को अनेक रियायतें दी गईं, जो भारतीय विश्वविद्यालयों को नहीं मिलती हैं। भारतीय विश्वविद्यालय इस बात से क्षुब्ध हैं कि हम विश्व गुरु बनने के लिए विदेशी विश्वविद्यालयों का सहारा लेते समय देशी विश्वविद्यालयों के हितों की रखवाली की चिंता नहीं कर रहे हैं। यह सवाल उठ रहा है कि विदेशी संस्थानों को अधिकांश नियमों से छूट मिलेगी, लेकिन उनकी अपनी कोई जवाबदेही नहीं होगी। वे कितने विदेशी प्रोफेसर लाएंगे या देशी विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर को ज्यादा पैसे देकर कितना नुकसान करेंगे?

आज उच्च शिक्षा की गुणवत्ता सुधारना सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। अधिकांश विश्वविद्यालय और कॉलेज अभी भी अपनी गुणवत्ता को अपेक्षित मानकों के अनुरूप सुधार नहीं पाए हैं। उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए 1986 की राष्ट्रीय नीति के तहत 1993-94 में नैक एवं एनबीए जैसी एक्रेडिटेशन संस्थाओं की स्थापना की गई थी। किंतु पिछले तीन दशकों में मात्र 20 प्रतिशत विश्वविद्यालयों और कॉलेजों का ही एक्रेडिटेशन हो पाया है, जिनमें मुश्किल से 5 से 10 प्रतिशत संस्थानों को ही ‘ए’, ‘ए प्लस’ या ‘ए प्लस प्लस’ ग्रेड मिल पाए हैं। बस उम्मीद ही है कि एक्रेडिटेशन के क्षेत्र में भारत ‘वाशिंगटन एकॉर्ड’ के अनुरूप अपने संस्थानों को चुस्त-दुरुस्त कर पाएगा।

कुल मिलाकर, उच्च शिक्षा के नए सत्र 2023-24 में अनेक सुधारों और बदलावों की संभावना है। क्या हम नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति को ढंग से लागू कर पाएंगे? क्या हम नालंदा और तक्षशिला जैसे उच्च शिक्षा के आदर्श मंदिरों को फिर खड़ा कर पाएंगे?


हरित दीवारों में सेंध और शहरों पर बार-बार धूल की चादर

अनुमिता रॉयचौधरी, ( कार्यकारी निदेशक, सीएसई )

हल्की बूंदाबांदी के बाद दिल्ली के आसमान पर छाई धूल की चादर फिलहाल छंट चुकी है, लेकिन यह ऐसी मौसमी परिघटना है, जिससे हम हर वर्ष गरमियों में जूझते ही हैं। इस साल भी आने वाले दिन इसके गवाह बन सकते हैं, जब हमारे आस-पास की हवा बेहिसाब पीएम-10 से भर जाएगी। मौसम विभाग की मानें, तो पश्चिमी विक्षोभ के कारण एक बड़े क्षेत्र में मौसमी बदलाव हुआ, जिसके कारण हवा की रफ्तार बढ़ी, और उसने आसपास के शहरों की धूल को राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली तक पहुंचा दिया।

मगर पूरे आसमान के यूं धूसरित हो जाने की कई अन्य वजहें भी हैं, जिनको हम दो हिस्सों में- प्राकृतिक एवं मानव-निर्मित, बांट सकते हैं। प्राकृतिक कारणों में सबसे पहला यही है कि उत्तर भारत की मिट्टी ढीली है। इसमें नमी काफी कम है, और यह ‘एक्स्पोज्ड’ यानी अनावृत भी है, यानी मिट्टी को जमीन से बांधने के लिए जरूरी पेड़-पौधे, घास-पात या जंगल आदि यहां तुलनात्मक रूप से काफी कम हैं। नतीजतन, जब पर्यावरणीय स्थिति बिगड़ती है, तो धूल की आंधी शुरू हो जाती है। मानव-निर्मित कारणों में, जिनसे यह समस्या और गहरा रही है, सबसे बड़ा है- जलवायु परिवर्तन। इसकी वजह से तापमान बढ़ रहा है, जिससे हवा की गति प्रभावित हो रही है। यही रफ्तार धूल को आसमान की ओर ले जाती है। फिर, हरित क्षेत्र भी लगातार कम हो रहे हैं। यह जानते हुए भी हरियाली मिट्टी को बांधे रखती है, हम अपने इस सुरक्षा कवच को नुकसान पहुंचा रहे हैं। दिल्ली में ही अरावली के काफी समृद्ध जंगल थे, जिसको ‘हरित दीवार’ कहा जाता था, लेकिन अब इसके क्षेत्रफल में सेंध लगाने के कारण धूल की समस्या बढ़ गई है।

धूल का वायु प्रदूषण से भी गहरा संबंध है। इससे प्रदूषण में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। इनका जल्द प्रबंधन आवश्यक है। इसके लिए हमें राष्ट्रीय और क्षेत्रीय, दोनों स्तरों पर काम करना होगा। अपने आस-पास हरियाली बढ़ाने के साथ-साथ हमें जल-स्रोतों की भी रक्षा करनी होगी या उनका पुनरोद्धार करना होगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन कहता है कि शहरों में प्रतिव्यक्ति नौ वर्गमीटर हरियाली होनी चाहिए। यह निर्देश महानगरों में दम तोड़ देता है, क्योंकि यहां दूर-दूर तक कंक्रीट बिछे हुए हैं। ऐसे में, पुनर्विकास के दरम्यान हमें मानक के अनुसार हरियाली की व्यवस्था करनी होगी। जल-स्रोतों के बारे में भी यही कहा जाएगा। जल शक्ति मंत्रालय के मुताबिक, देश भर में 24.24 लाख जल-निकाय हैं, जिनमें से करीब 97 फीसदी गांवों में हैं और शहरों में बमुश्किल तीन फीसदी। इस तस्वीर को संवारने के प्रयास देश भर में किए जाने की जरूरत है। अच्छी बात है कि दिल्ली सरकार ने अपनी योजना के पहले चरण में 250 जल-निकायों और 15 झीलों के पुनरोद्धार को गति देने का फैसला किया है। अपनी जमीन को ‘हीट आइलैंड’ बनने से बचाने के लिए हमें व्यापक पैमाने पर वृक्षारोपण अभियान भी चलाना होगा, साथ-साथ मिट्टी को स्थिर रखने की आधुनिक तकनीकें भी अपनानी होंगी। हम चाहें, तो सड़कों के किनारे वृक्षारोपण को बढ़ावा देकर कुछ हरियाली बढ़ा सकते हैं, ताकि हरित दीवार खड़ी हो सके।

इस तरह की मौसमी परिघटना से सिर्फ दिल्ली नहीं जूझ रही। खासतौर से पूरा उत्तर भारत इससे मुकाबिल है। इसका अर्थ है कि शहर ही नहीं, गांव भी बुरी तरह प्रदूषण की चपेट में हैं। छोटे शहरों में तो निर्माण-कार्य ने हवा में सूक्ष्म कणों की मात्रा बढ़ाई है। वहां यदि नियामक तंत्र सक्रिय हो, तो निर्माण-कार्यों से होने वाले प्रदूषण पर काफी हद तक लगाम लगाई जा सकती है। फिर, सड़कों पर गाड़ियों की भीड़ को भी कम करने की दरकार होगी। जरूरी यह भी है कि मास्टर प्लान में धूल या वायु प्रदूषण से पार पाने के उपायों पर गंभीरता दिखाई जाए। खेतों में भी मिट्टी को स्थिर करने की तकनीकें अपनानी होंगी। सुखद है कि केंद्र व राज्य सरकारें वायु प्रदूषण को कम करने के लिए योजनाएं बना रही हैं, लेकिन हमें यह देखना होगा कि वे कितनी तेजी से लागू हो पाती हैं। यदि योजनाएं जमीन पर नहीं उतरेंगी, तो समस्या का समाधान भला कैसे हो सकेगा?

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