18-12-2025 (Important News Clippings)
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Nuclear is Atomic! But It’s Not Enough
ET Editorial
With Lok Sabha passing Sustainable Harnessing and Advancement of Nuclear Energy for Transforming India (SHANTI) Bill 2025, a major step has been taken towards finally leveraging the India-US civil nuclear deal formalised in 2008. This is along-overdue reform that will open one of India’s most closed sectors, making it possible for private players to take minority equity in new nuclear power projects, and for investments by foreign companies and global sovereign wealth funds.
Packaged as a trade and investment outreach, it could grease wheels for clinching the India-US trade deal and bring in capital critical to cleaning’n’greening the energy system. But nuclear isn’t a silver bullet to be tom-tommed in announcements and unplanned projects, with other options left by the wayside. GoI must provide a clear vision of India’s energy system, including a decarbonisation roadmap that is in line with its net zero by 2070 goal. This plan must be more than just capacity-addition targets like 100 GW of nuclear by 2047. It should consider the role and share of different energy sources and their implications, be it costs, access or supporting ecosystem requirements.
The blueprint should also set out an implementation roadmap to provide clarity on rollout of the proposed decarbonised energy system, and give the right signals for investment. While NITI Aayog has taken several stabs at a long-term strategy, it now must engage in a wider and time-bound public consultation. As a growing economy that’s still energy-poor, India has been a sponge, agnostically soaking in every new plant. But such an approach has its limits. A proper plan will ensure that India’s clean energy transition augments energy security and improves access for all.
Change for the worse
The move to alter MGNREGS beyond recognition must be dropped
Editorial
The Viksit Bharat – Guarantee for Rozgar and Ajeevika Mission (Gramin), or VB-G RAM G Bill, tabled in the Lok Sabha on Tuesday to replace the Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act (MGNREGA), deserves to be rejected for more than one reason. What is sought to be changed is not only the nomenclature but also the fundamental character of the existing Scheme (MGNREGS). This marks yet another attempt by the BJP-led government at the Centre to reduce the size of the development space to States. The only plausible reason for the name change is the fact that the BJP’s ideological master, the RSS, had strong differences with Gandhi. The use of Gandhi’s name in the 20-year-old scheme signifies the link to his Gram Swaraj concept that gives importance to democratic decentralisation. But the new Bill, by making the Union government virtually the sole decision maker in the proposed law, will not make any positive contribution in this direction. Supporters of the government point out that the increase in the days of work to 125 in a year is a major benefit for people in rural India. But, the data, on employment given to households under the MGNREGS, reveal that it was only during 2020-21, the COVID-19 pandemic year, that 9.5% (nearly 7.2 million) of households actually worked for 100 days. Over the last two years, only around 7% of families could get the full quota.
By calling the VB-G RAM G “a centrally sponsored scheme”, the Union government has done away with the special status that the MGNREGS had enjoyed, wherein it had been absorbing the entire cost of wages payment for unskilled manual labour. In the proposed scheme, the fund-sharing pattern between the Centre and States generally would be 60:40. A benefit of the existing scheme was that rural wages have gone up sharply. The finances of States are not in a robust condition and there are apprehensions about the likely impact of the restructuring of the GST. Besides, when direct cash transfer schemes are increasingly being viewed as a political game changer, it is an open secret that not many States will be keen on participating in the fresh scheme. More importantly, the soul of the current law — a bottom up demand-based scheme — has been taken away. What has been proposed is a supply-driven framework wherein allocations will be capped, as decided by the Union government. Also, States will have to bear any excess expenditure, which is a new feature. Tamil Nadu and Kerala have opposed the Bill citing an undermining of States’ interests. A feature of the Bill, which is meant to ensure that work does not clash with farm work during sowing/harvesting, may be included explicitly in the MGNREGS, after consultations with States. Howsoever passionately Minister for Rural Development Shivraj Singh Chouhan may say that the new law is in line with Gandhi’s sentiments, good governance, which is the goal of the idea of Ram Rajya, does not become a reality without diffused grassroots democracy — a condition neither sought to be promoted nor nourished by the proposed legislation.
गरीब बच्चों के स्वास्थ्य पर खर्च क्यों घटा रही है दुनिया
संपादकीय

दो ताजा रिपोट्र्स से पता चला कि जहां दुनिया के आधे से ज्यादा देशों में गरीबी अमीरी की खाई बढ़ी है, वहीं वैश्विक स्वास्थ्य मद में खर्च में 27% कटौती के कारण बाल मृत्यु दर बढ़ने का खतरा है। नेचर सस्टेनेबिलिटी पत्रिका में छपी रिपोर्ट फिनलैंड के आल्टो यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने 151 देशों की स्थिति पर अध्ययन करके तैयार की है। रिपोर्ट के अनुसार, 1990 के बाद से दुनिया के देशों की राष्ट्रीय आय में तो 94% वृद्धि हुई लेकिन आधी से ज्यादा आबादी आय – असमानता की शिकार रही। भारत का जिक्र करते हुए रिपोर्ट कहती है कि उत्तर के मुकाबले दक्षिण भारत के राज्य ज्यादा खुशहाल रहे क्योंकि यहां समावेशी विकास हुआ, जबकि उत्तर में असमानता बढ़ी। यह भी पता चला कि दक्षिण के राज्यों में सरकारों ने सार्वजनिक स्वास्थ्य, शिक्षा, बुनियादी ढांचे में निवेश किया। रिपोर्ट में आशंका है कि यूएन का सतत विकास कार्यक्रम सामूहिक तौर पर विफल हो सकता है। भारत में जीडीपी भले बढ़ी हो, लेकिन सब-डेटा का विश्लेषण करने पर असमानता साफ झलकती है। उदाहरण के लिए दिल्ली की प्रति व्यक्ति आय बिहार के मुकाबले सात गुना अधिक है। उधर गेट्स फाउंडेशन की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया तो अमीर हुई है, लेकिन असमानता के कारण गरीब बच्चों पर स्वास्थ्य के मद में खर्च 27% घटा है, जिससे बाल मृत्यु दर बढ़ने का खतरा है। अगर स्वास्थ्य खर्च में यह कटौती 3% और बढ़ जाए तो 2045 तक 1.50 करोड़ अतिरिक्त बच्चे अकाल मृत्यु के शिकार होंगे।
Date: 18-12-25
सौर ऊर्जा को बढ़ाने की चुनौतियां
सुनीता नारायण

अब आप जैसे ही छत के बारे में सोचते हैं आपके जेहन में वहां लगे सौर पैनल की तस्वीर उभरने लगती है। आप सौर ऊर्जा की बात सोचते हैं तो आप दिन में पैदा होने वाली बिजली को देखते हैं जो उपकरणों को चलाती है और यहां तक कि ग्रिड में भी जाती है। इस ग्रिड से रात में रोशनी के लिए बिजली वापस हासिल की जा सकती है, जब सूरज की चमक नहीं होती।
यह दुनिया का सबसे बेहतरीन समाधान है, जहां हम में से हर कोई बिजली का उत्पादक बन जाता है। यह इसलिए काम करता है क्योंकि सौर ऊर्जा मॉड्यूलर है, और इसके पैनल ताप विद्युत संयंत्रों और नाभिकीय ऊर्जा उत्पादक संयंत्रों के विपरीत, कहीं भी फिट हो सकते हैं। हालांकि बड़े सौर ऊर्जा संयंत्रों के निर्माण के लिए बहुत अधिक जमीन की जरूरत होती है, जो हमेशा दुर्लभ और अक्सर विवादित जमीन होती है, लेकिन इस मॉडल में हर उपलब्ध छत अपने आप में एक बिजली संयंत्र बन जाती है।
आप यह सवाल कर सकते हैं कि मैं छत पर लगने वाले सौर ऊर्जा के उन लाभों के बारे में क्यों बता रही हूं जिससे सभी वाकिफ हैं। मेरा भी मानना है कि इसकी क्षमता बहुत ज्यादा है। फिर, केंद्र सरकार के दफ्तरों और घरों में छत पर लगने वाले सौर ऊर्जा को प्रोत्साहन देने की योजनाओं के बावजूद, इस क्षेत्र में प्रगति अब भी परिवर्तनकारी स्तर पर क्यों नहीं है? यह नीति या इरादे की कमी नहीं है। असली सवाल यह है कि यह तकनीक मौजूदा बिजली वितरण प्रणालियों के साथ कैसे एकीकृत होगी।
यह चुनौती सिर्फ भारत के लिए ही अनोखी नहीं है। सभी नई तकनीकें समान रास्ते पर चलती हैं। उन्हें अपनी जगह सुरक्षित करने के लिए पुरानी चीजों को हटाने के तरीके खोजने होंगे और इस मामले में तो सचमुच यह जरूरी है। हकीकत यह है कि सौर तकनीक, केवल तभी बिजली दे सकती है जब सूरज चमकता है, ऐसे में किसी तरह के बैकअप की आवश्यकता होती है।
याद रखें कि रात के समय ऊर्जा की खपत अक्सर दिन के समय के बराबर या उससे भी ज़्यादा होती है। दिन में प्राकृतिक रोशनी उपलब्ध होती है और आमतौर पर किसी चीज को गर्म रखने या वातानुकूलन की कम जरूरत होती है। आदर्श व्यवस्था यह है कि सौर पैनल दिन के दौरान बिजली पैदा करते हैं, जिसका कुछ हिस्सा पैनल वाली साइट पर ही इस्तेमाल किया जाता है,
जबकि अतिरिक्त बिजली ग्रिड को भेजी जाती है या फिर बैटरी में संग्रहित की जाती है जिसका इस्तेमाल तब होता है जब सूरज की रोशनी नहीं होती है। चूंकि बैटरी अब भी महंगी हैं, इसलिए ग्रिड को भेजना सबसे व्यावहारिक विकल्प बना हुआ है। इस सेटअप में यह वितरण कंपनी (डिस्कॉम) या बिजली आपूर्ति कंपनियों के बैकअप के रूप में काम करती है।
हालांकि मुश्किलें यहीं से शुरू हो जाती हैं। केरल का उदाहरण लें, जो छतों पर लगाई जाने वाली सौर ऊर्जा परियोजनाओं में देश के सबसे सफल राज्यों में से एक है। राज्य ने छतों पर लगाए जाने वाले 1.5 गीगावॉट के तंत्र स्थापित किए हैं जिसकी पहुंच इसके एक करोड़ घरेलू ग्राहकों के 2 फीसदी हिस्से तक है। केरल राज्य बिजली बोर्ड (केएसईबी), जो इस योजना को लागू करता है, उसने अगस्त में कहा कि उसका वित्तीय नुकसान असहनीय हो गया है।
समस्या यह थी कि केएसईबी दिन के दौरान छत पर लगने वाले जेनरेटर से बिजली खरीद रहा था, जब दरें कम थीं और उन्हें रात में उतनी ही मात्रा में वापस बेच रहा था, जब उसकी खरीदी हुई बिजली की लागत ज़्यादा थी। इस सौर कार्यक्रम के माध्यम से केवल 2 फीसदी उपभोक्ताओं को सेवाएं मिलने से बिजली दरों पर बोझ बढ़ गया, जिससे बदले में बाकी उपभोक्ताओं के लिए बिल बढ़ गए।
इसलिए, केएसईबी ने एक मसौदा आदेश जारी किया, जो ग्रिड को बिजली देने की अधिकतम क्षमता को सीमित करेगा, ग्रिड शुल्क पर कर लगाएगा और दिन के समय की गणना के आधार पर शुल्क पेश करेगा। जैसे ही यह आदेश आया, छत पर लगाई जाने वाली योजना ठप पड़ गई और एक महीने के भीतर, इंस्टॉलेशन आधे हो गए।
नवंबर में, केरल राज्य बिजली नियामक आयोग (केएसईआरसी) ने ग्रिड से जुड़े छत पर लगने वाले सिस्टम के लिए अंतिम अधिसूचना जारी की। यह नए जुड़े घरों को बैटरी स्टोरेज लगाना अनिवार्य करके वितरण कंपनियों पर बोझ कम करने का प्रयास करता है, ताकि उनकी रात के समय बिजली की खरीद कम हो जाए। छत पर लगने वाले 10 किलोवॉट से ऊपर के सौर ऊर्जा पैनल में 10 फीसदी बैटरी स्टोरेज होनी चाहिए और 15-20 किलोवॉट वाले पैनल तंत्र में 20 फीसदी की आवश्यकता होगी। वर्ष 2027 के बाद, छोटे 5 किलोवॉट तंत्र में भी स्टोरेज की आवश्यकता होगी। यह नीति कुल मीटरिंग तंत्र के माध्यम से प्रोत्साहन की पेशकश भी करती है, जिससे बिजली की अधिक मांग वाले समय के दौरान सौर ऊर्जा की आपूर्ति करने वाले ग्राहकों को अधिक टैरिफ की पेशकश होती है।
ग्राहक के बिजली बिलों का अंतिम निपटान प्रत्येक वित्तीय वर्ष के अंत में किया जाएगा। इस निपटान प्रक्रिया के तहत, पहले ग्राहक के खाते से निश्चित शुल्क और ग्रिड शुल्क की कटौती की जाएगी। इन कटौतियों के बाद भी, यदि ग्राहक की कोई बिजली की यूनिट अधिशेष या ‘जमा’ बचती है (यानी ग्राहक ने ग्रिड को जितनी बिजली दी, वह ली गई बिजली से अधिक है), तो उस बची हुई बिजली के लिए भुगतान किया जाएगा।
मौजूदा ग्राहकों को यह भुगतान 3.08 रुपये प्रति किलोवॉट की दर से और नए कनेक्शन वाले ग्राहकों को 2.79 रुपये प्रति किलोवॉट की दर से किया जाएगा। यह महत्त्वपूर्ण है कि अधिशेष यूनिट के लिए भुगतान की जाने वाली यह दर, बिजली की सामान्य या अधिक मांग वाले समय की दरों से काफी कम होगी। इस अधिसूचना पर राज्य उच्च न्यायालय ने रोक लगा दी है और यह देखना दिलचस्प होगा कि इस मामले का समाधान कैसे होता है।
सवाल यह है कि छत पर लगने वाले सौर ऊर्जा उत्पादकों, घरों के लिए और ऊर्जा वितरकों के लिए कारगर लगने वाला सबसे अच्छा नियामक वातावरण क्या होगा। या क्या वितरण पर भरोसा किए बिना सौर भविष्य बनाने के तरीके हो सकते हैं, खासकर उन देशों और क्षेत्रों में जहां आज ग्रिड नहीं है?
पड़ोसी पाकिस्तान से आ रही खबरें एक अलग रास्ते के संकेत देती हैं। यह देश बिजली की कमी के कारण अधिक ऊर्जा लागत का सामना कर रहा है। हालांकि, इसने चीनी सौर पैनलों और लीथियम बैटरी पर आयात शुल्क हटा दिया है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा विश्लेषकों का अनुमान है कि 2024 तक, पाकिस्तान ने लगभग 25 गीगावॉट क्षमता के ऐसे सोलर तंत्र लगाए जो ग्रिड से जुड़े हुए थे इसकी तुलना में, पाकिस्तान की कुल ग्रिड बिजली उत्पादन क्षमता लगभग 50 गीगावॉट थी। इसके अलावा, देश ने दूर-दराज के ऐसे इलाके जो ग्रिड से नहीं जुड़े हैं, उन्हें चलाने में मदद के लिए 1.25 गीगावॉट क्षमता वाली लीथियम बैटरियां भी आयात की थीं।
इस रफ्तार से, पाकिस्तान वर्ष2030 तक सौर ऊर्जा के माध्यम से अपनी दिन के समय की बिजली की 100 फीसदी मांग और रात के समय की मांग का 25 फीसदी पूरा कर सकता है। लेकिन रिपोर्ट से संकेत मिलता है कि यह बदलाव वितरण कंपनियों की लागत में वृद्धि कर रहा है, जिससे पीछे हटने और नीति की समीक्षा को बढ़ावा मिल रहा है। यह स्पष्ट नहीं है कि यह बात कहां तक जाएगी। यह हमारे दौर का अहम प्रश्न है कि नई ऊर्जा प्रणालियां मौजूदा जीवाश्म-ईंधन-आधारित ग्रिड को कैसे विस्थापित करेंगी और हमें अलग तरीके से क्या करना चाहिए? यह एक ऐसा सवाल है जिसे हम सभी को ध्यान से देखने की कोशिश करनी चाहिए।
विकास के दावे और विषमता की खाई
अजय प्रताप तिवारी
देश की आर्थिक प्रगति ने समाज के कई समुदायों और वर्गों की भी उपेक्षा की है। दरअसल, विकास के क्रम में कतिपय वर्गों के हितों को साधने का प्रयास किया गया। इससे आर्थिक विकास के समक्ष लैंगिक असमानता, जीवन स्तर और जीवन गुणवत्ता में असमानता, निर्धनता, जलवायु परिवर्तन तथा ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में असमानता जैसी गंभीर चुनौतियां पैदा हो गई हैं। हाल में जारी वैश्विक असमानता रपट-2026 के अनुसार देश की कुल संपत्ति का 40 फीसद हिस्सा सिर्फ एक फीसद लोगों के हाथों में है, जबकि 65 फीसद संपत्ति दस फीसद लोगों के पास है। देश में आय के स्तर पर भी स्थिति चिंताजनक है। कुल राष्ट्रीय आय की 58 फीसद हिस्सेदारी दस फीसद लोगों के पास है। जबकि पचास फीसद की हिस्सेदारी में 15 फीसद लोगों की भागीदारी है।
भारत में आय, संपत्ति और लैंगिक समानता में काफी अंतर देखने को मिलता है। महिला श्रम भागीदारी में भी निराशाजनक तस्वीर है। वहीं आज पूरी दुनिया में आर्थिक, लैंगिक और श्रम क्षेत्र में स्त्री-पुरुष विभेद बढ़ रहे । भारत वैश्विक स्तर पर सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। मगर जब बात लैंगिक समानता, श्रम क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी और निर्धनता की आती है, तो मालूम होता है कि भारत वैश्विक मानकों पर बहुत पीछे है देश में लैंगिक असमानता दुनिया के अन्य देशों की अपेक्षा कहीं ज्यादा है। विश्व आर्थिक मंच की ओर से जारी ‘ग्लोबल जेंडर गैप रपट- 2025 में भारत 148 देशों में से 131 वें स्थान पर है। देश में राजनीतिक असमानता भी दिखाई देती है। वर्ष 2024 के चुनाव के बाद लोकसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 13.6 फीसद है। वहीं स्थानीय सरकार में भागीदारी 44.4 फीसद है।
दुनिया भर में लड़कियां और महिलाएं आर्थिक असमानता की शिकार हो रही हैं। इस मसले पर अनेक रपटों में चिंता व्यक्त की गई है। भारत में अन्य देशों की अपेक्षा पुरुषों की तुलना में महिलाओं को वेतन वाले काम कम मिलते हैं। देश के 119 अरबपतियों की सूची में मात्र नौ महिलाएं शामिल हैं। यदि विकास से जुड़े कार्यों की तुलना की जाए, तो महिलाएं 72 फीसद ही इसे हासिल कर पा रही हैं। महिलाएं पुरुषों की अपेक्षा 28 फीसद कम उपलब्धियां हासिल कर रही हैं। आज दुनिया भर में 15 फीसद ऐसी महिलाएं हैं जो काम करने के योग्य हैं, लेकिन उनके पास काम के अवसर उपलब्ध नहीं हैं। यदि पुरुषों की बात करें, तो यह आंकड़ा दस फीसद है। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों को काम करने के अवसर ज्यादा हैं। भारत में शिक्षा के क्षेत्र में महिलाओं की बात करें, तो वर्ष 2022 में 24.9 फीसद ने ही माध्यमिक और उच्चतर शिक्षा हासिल की है। जबकि पुरुषों की यह संख्या 38.6 फीसद दर्ज की गई है।
भारत में विज्ञान, गणित और इंजीनियरिंग विषय में लगभग 43 फीसद महिलाएं स्नातक की उपाधि प्राप्त कर रही हैं। यह आंकड़ा पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं की ज्यादा है। मगर दुनिया भर में शीर्ष प्रशासनिक सेवाओं में महिलाओं की भागीदारी अब भी बहुत कम है। भारत में महिलाओं की स्थिति बहुत स्पष्ट नहीं है। इसी तरह वर्ष 2012 से 2022 के बीच लगभग 44 फीसद युवा लड़कियां शिक्षा और रोजगार से वंचित रह गई थीं। कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है, जहां महिलाओं की भागीदारी पुरुषों की अपेक्षा ज्यादा हो। निजी और सार्वजनिक उपक्रमों में महिलाएं बराबरी के लिए संघर्ष कर रही हैं। भारत में कृषि एक ऐसा क्षेत्र है जहां रोजगार की अपार संभावनाएं हैं, लेकिन इस क्षेत्र में भी महिलाएं बहुत पीछे हैं।
संयुक्त राष्ट्र भी मानता है कि अभी भी पूरी दुनिया में महिलाओं के लिए संसाधन और तकनीकी पहुंच पुरुषों की अपेक्षा सीमित है। आज पूरे विश्व में 62 फीसद पुरुष इंटरनेट का उपयोग करते हैं, वहीं 57 फीसद महिलाएं इंटरनेट का इस्तेमाल करती हैं। डिजिटल तकनीक की सुलभता के मामलों में पुरुषों की अपेक्षा महिलाएं अब भी पीछे हैं। कई ऐसे कार्य हैं जहां महिलाओं की मेहनत का मोल नहीं है। आक्सफैम की रपट के अनुसार पूरी दुनिया में घरेलू कार्यों में लगी महिलाएं एक वर्ष में करीब दस हजार अरब डालर के बराबर काम करती हैं, जिसका उन्हें वेतन नहीं मिलता है। यदि इन महिलाओं के कार्यों की आर्थिक गणना की जाए, तो वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद करीब चार फीसद के बराबर होगा । कृषि कार्यों में जिस काम के लिए पुरुषों को अगर एक रुपया मिलता है, उसी काम को करने के लिए महिलाओं को 82 पैसे मिलते हैं। पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं की मजदूरी में लगभग 15 फीसद का अंतर है।
अगर श्रम बल आय की बात की जाए, तो यहां भी महिलाओं की भागीदारी महज 18 फीसद है जबकि पुरुषों का कुल श्रम बल आय 82 फीसद है। भारत में कुल व्यवसाय का लगभग 14 फीसद हिस्सा महिलाओं द्वारा संचालित होता है। वहीं केवल 17 फीसद महिलाओं को नियमित वेतन वाली नौकरी प्राप्त है। इक्यावन फीसद महिलाओं का कार्य अवैतनिक है। पनचानबे फीसद महिलाओं का कार्य अनौपचारिक और असंगठित है। श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी बढ़ने से आर्थिक विकास की उन्नति होती है, गरीबी और भुखमरी घटती है।
संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन के अनुसार, भारत में महिलाओं की आर्थिक विकास में भागीदारी बढ़ने से लगभग 4.5 करोड़ लोगों की भूख की समस्या से निजात मिलेगी। विश्व में लगभग दो सौ चालीस करोड़ महिलाएं आर्थिक, सामाजिक और अवसर में पुरुषों के बराबर अधिकार से वंचित हैं। इस असमानता की खाई को कम करने में करीब 50 वर्ष या इससे अधिक वर्ष लग सकते हैं। आर्थिक विकास में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने से वैश्विक अर्थव्यवस्था को 81.6 लाख करोड़ रुपए का लाभ होगा। भारत में आर्थिक विकास में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित होने से काफी लाभ होगा। ‘मेकिस्से ग्लोबल इंस्टीट्यूट’ के अध्ययन के अनुसार, भारत में महिलाओं की आर्थिक भागीदारी से वर्ष 2025 तक सकल घरेलू उत्पाद 2.9 ट्रिलियन डालर की वृद्धि होने की संभावना जताई गई है। फिर भी भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में बढ़ती असमानता संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों का उल्लंघन है। लोकतंत्र का मूल आधार सभी नागरिकों की समान भागीदारी सुनिश्चित करना है, ऐसे में बढ़ती असमानता लोकतंत्र के लिए भी एक बड़ी चुनौती है।
आर्थिक विकास में समान भागीदारी से नवप्रवर्तन, प्रतिष्ठा में बढ़ोतरी और अलग-अलग आर्थिक क्षेत्रों के सूचकांकों में बेहतरी आएगी। आर्थिक विकास में समान भागीदारी बढ़ाने के लिए प्रत्येक व्यक्तियों को उनकी क्षमता और योग्यता के अनुसार कौशल विकसित करना होगा और ज्ञान आधारित विकास पर जोर देना होगा, क्योंकि अब अर्थव्यवस्था तकनीक और डिजिटल की ओर बढ़ रही है। देश में समान भागीदारी से न सिर्फ आर्थिक उन्नति बल्कि सकल घरेलू उत्पाद को वैश्विक स्तर पर मजबूती मिलेगी। लोगों के जीवन स्तर में सुधार आएगा। निर्धनता घटेगी और खुशहाली बढ़ेगी। समावेशी समाज का निर्माण होगा। किसी भी राष्ट्र की प्रगति समान भागीदारी के बिना संभव नहीं है।