18-10-2025 (Important News Clippings)

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18 Oct 2025
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Date: 18-10-25

दुनिया के व्यापार पैटर्न में बदलाव होना अब तय है

संपादकीय

ट्रम्प ने कहा कि मोदी ने रूस से तेल न खरीदने का वादा किया है। इसके कुछ घंटे बाद भारत ने कहा कि कोई बात ही नहीं हुई। इसी बीच दक्षिण कोरिया द्वारा आगामी 29 अक्टूबर को एपीईसी शिखर बैठक में ट्रम्प के आने की पुष्टि के बाद चीनी प्रमुख जिनपिंग से उनकी मुलाकात की संभावनाएं बढ़ गई हैं। रेयर अर्थ निर्यात को लेकर चीन की नई पाबंदियों के बाद अमेरिकी वित्त मंत्री ने कहा कि चीन बनाम बाकी दुनिया की इस लड़ाई में यूरोप, भारत और एशिया के अन्य सभी देशों को अमेरिका के साथ आना होगा। यह अलग बात है कि दुनिया में ट्रेड युद्ध का जनक कौन हैं, यह सभी जानते हैं। इस बीच विगत सितम्बर माह में चीन और सऊदी अरब को भारत से निर्यात काफी बढ़ा है, जबकि उच्च टैरिफ के कारण अमेरिका को निर्यात नकारात्मक हो गया है। ट्रम्प-जिनपिंग की मुलाकात से पहले भारत के लिए अमेरिका से नई उदार ट्रेड डील करना जरूरी है। अगर अमेरिका-चीन में ट्रेड संबंध सुधरते हैं तो यह भारत के लिए चिंता का विषय होगा। लेकिन ताजा खबर है कि चीन के कुछ और उत्पादों के निर्यात पर अमेरिका ने भी अपने पोट्र्स के इस्तेमाल पर फी बढ़ा दी है। ट्रम्प को इतना तो समझ में आ गया है कि चीन अमेरिका का दीर्घकालिक और भरोसेमंद मित्र नहीं हो सकता, जबकि भारत के साथ दोस्ती – बहाली के सामाजिक-आर्थिक ही नहीं, राजनीतिक लाभ भी हैं।


Date: 18-10-25

बेलगाम साइबर ठग

संपादकीय

डिजिटल अरेस्ट के बढ़ते मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय गृहमंत्रालय और सीबीआइ से जो जवाब मांगा, उसके नतीजे में इस तरह के मामले थमने के आसार कम ही हैं। इसलिए कम हैं, क्योंकि एक तो लोगों में जागरूकता की कमी है और दूसरे एजेंसियां डिजिटल अरेस्ट का भय दिखाकर ठगी करने वाले अपराधियों तक आसानी से पहुंच नहीं पा रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा में एक बुजुर्ग दंपती से एक करोड़ रुपये से अधिक की ठगी के मामले का स्वतः संज्ञान संभवतः इसलिए लिया, क्योंकि इसमें अदालत और जांच एजेंसियों के फर्जी आदेश का सहारा लिया गया। ऐसा एक अर्से से हो रहा है। साइबर अपराधी कभी पुलिस बनकर लोगों को डिजिटल अरेस्ट करने की धमकी देते हैं, कभी सीबीआई, ईडी, कस्टम अथवा नारकोटिक्स ब्यूरो का अधिकारी बनकर पिछले कुछ समय से वे फर्जी अदालती आदेशों की भी आड़ लेने लगे हैं। इसका अर्थ केवल यही नहीं कि साइबर अपराधी बेलगाम हैं, बल्कि यह भी है कि लोगों को इसका अनुमान ही नहीं, कि कोई एजेंसी किसी को डिजिटल अरेस्ट नहीं करती। यह विडंबना ही है कि डिजिटल अरेस्ट जैसी कोई व्यवस्था न होने के बाद भी साइबर अपराधी लोगों को धमकाकर उगाही करने में सफल हैं।

जागरूकता के अभाव ने साइबर अपराधियों का काम और आसान कर दिया है। एक से एक पढ़े-लिखे और यहां तक कि बैंकों और अपराध रोधी एजेंसियों में काम करने वाले भी साइबर अपराधियों के झांसे में आकर लाखों-करोड़ों गंवा रहे हैं। हाल में ही मुंबई में साइबर अपराधियों ने एक उद्यमी से 58 करोड़ रुपये ऐंठ लिए। कई मामले ऐसे आए हैं, जिनमें लोग हफ्तों तक कथित रूप से डिजिटल अरेस्ट रहे और बैंक से पैसे निकालकर ठगों को देते रहे। समझना कठिन है कि ऐसे लोग पुलिस में शिकायत करना आवश्यक क्यों नहीं समझते? क्या उन्हें उस पर भरोसा नहीं ? जो भी हो, कुछ मामले ऐसे भी आए हैं, जिनमें बैंक कर्मियों की भी मिलीभगत देखने को मिली। यह बहुत ही चिंताजनक स्थिति है। निःसंदेह चिंताजनक यह भी है कि डिजिटल अरेस्ट का दावा कर ठगी करने वाले आसानी से पकड़ में नहीं आते। ज्यादातर मामलों में डूबी रकम वापस ही नहीं मिल पाती। इससे वही पता चलता है कि साइबर ठग अपराध रोकने वाले तंत्र से चार कदम आगे हैं। होना तो यह चाहिए अपराध रोधी तंत्र इतना सक्षम हो कि साइबर अपराधियों में भय व्याप्त हो। इसमें संदेह है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश निर्देश यह काम कर पाएंगे? आवश्यकता केवल साइबर अपराध रोधी तंत्र को और सक्षम बनाने की ही नहीं, लोगों को जागरूक करने के अभियान को प्रभावी ढंग से संचालित करने की भी है। बैंकों के साथ विभिन्न एजेंसियां वह समझें कि अभी यह अभियान सही तरह नहीं चल रहा है।


Date: 18-10-25

क्षमता वृद्धि

संपादकीय

अल्फाबेट का विशाखापत्तनम में आर्टिफिशल इंटेलिजेंस का बड़ा केंद्र बनाने का निर्णय भारत के तेजी से बढ़ते डेटा सेंटर उद्योग को पूरी तरह बदल देने वाला हो सकता है। गूगल की मूल कंपनी द्वारा इस परियोजना में अगले 5 साल के दौरान 15 अरब डॉलर का निवेश करने की बात कही गई है। यह निवेश ऐसे समय में आ रहा है। जब अमेरिकी शुल्क वृद्धि के कारण भारत और अमेरिका के बीच हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं। गूगल की यह अमेरिका के बाहर अब तक की सबसे बड़ी परियोजना होगी।

गूगल 12 देशों में डेटा सेंटर स्थापित कर चुकी है। यह निवेश भूराजनीतिक तनावों और संभावित कानूनी जटिलताओं के बावजूद किया जा रहा है। इसका मतलब यह है कि अल्फाबेट का प्रबंधन यह मानता है कि इसके संभावित लाभ, जोखिम से कहीं अधिक हैं। कानूनी मसलों के बावजूद अल्फाबेट भारत को एक प्रमुख बाजार मानता है। भारत ऍड्रॉइड फोन का एक बड़ा बाजार है और इसके साथ हो दुनिया में सबसे अधिक यूट्यूब उपयोगकर्ता भी भारत में ही हैं। प्रस्तावित केंद्र से 1,88,000 नौकरियां तैयार हो सकती हैं। अदाणी समूह और भारती एयरटेल गूगल के साथ साझेदारी करके अधोसंरचना विकास करेंगे। इसमें एक नया अंतरराष्ट्रीय सब-सी गेटवे (जहां ऑप्टिकल केबल समुद्र से बाहर आती हैं) स्थापित करने की बात शामिल है। इस परियोजना में क्लाउड और आर्टिफिशल इंटेलिजेंस यानी एआई अधोसंरचना शामिल होगी जो नवीकरणीय ऊर्जा व्यवस्था से संचालित होंगी और फाइबर ऑप्टिक नेटवर्क से जुड़ी होगी। यह आंध्र प्रदेश सरकार की 2029 तक 6 गीगावॉट डेटा सेंटर क्षमता हासिल करने की योजना का हिस्सा है।

ये सेंटर भौतिक सुविधाएं हैं जहां ऐसे कंप्यूटिंग और नेटवर्किंग उपकरण रहते हैं जिनका इस्तेमाल डेटा संग्रह, प्रसंस्करण, भंडारण और वितरण के लिए किया जा सकता है अचल संपत्ति के अलावा इस व्यवस्था के संचालन और चीजों को ठंडा रखने के लिए बहुत अधिक बिजली की आवश्यकता होगी। यही वजह है कि डेटा सेंटर की क्षमताओं को गीगावॉट में आंका जाता है जो बिजली मापने की इकाई है, बजाय कि गीगाबाइट के। इतना ही नहीं बिजली की 24 घंटे उपलब्धता आवश्यक है वह भी वोल्टेज में उतार चढ़ाव के बिना। यह इंजीनियरिंग की दृष्टि से चुनौतीपूर्ण हो सकता है। राज्य सरकार निवेशकों को आकर्षित करने के लिए जमीन और बिजली सब्सिडी देने की घोषणा की है। वह डेटा सेंटर उद्योग को बढ़ावा देने वाले नीतिगत बदलावों का लाभ उठाने वाले शुरुआती राज्यों में शामिल है। वर्ष 2027 28 तक इरादे के मुताबिक एक लाख करोड़ डॉलर की डिजिटल अर्थव्यवस्था बनाने के लिए भौतिक अधोसंरचना तैयार करने के लिएडिजिटल अधोसंरचना कायम करना जरूरी है।

भारत के पास अन्य लाभ भी हैं। डेटा सस्ता है और भारत दुनिया का सबसे बड़ा डेटा ग्राहक भी है। हमारे यहां बहुत बड़ी डिजिटल आबादी है जिसकी संख्या बढ़ती ही जा रही है। परंतु भौतिक क्षमता और इकोसिस्टम के साथ विधायी और नियामकीय नीतिगत बदलाव भी अहम हैं दुनिया की बड़ी कंपनियों को भारत में अपना डेटा सेंटर स्थापित करने के लिए आकर्षित करने में इनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों को यह विश्वास होना चाहिए कि उनका डेटा भारत में मौजूद सर्वर में पूरी तरह सुरक्षित है भारत की नीति डेटा स्थानीयकरण पर जोर देती है और वह डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन ऐक्ट तथा संबंधित नियमों के जरिये सुरक्षित है। गूगल की प्रतिबद्धता और इसके पहले माइक्रोसॉफ्ट एवं एमेजॉन जैसी कंपनियों की भागीदारी इस नीति की पुष्टि करती है।

मुंबई, चेन्नई, पुणे, हैदराबाद, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, बेंगलूरु और कोलकाता जैसे शहरों में डेटा सेंटर की क्षमताएं विकसित हो रही हैं क्योंकि कई राज्य निवेश आकर्षित करने का प्रयास कर रहे हैं। भारत की डेटा सेंटर क्षमता 2024 में 1 गीगावॉट पार कर गई जो 2019 की तुलना में 200 फीसदी अधिक है। रोजगार के अलावा इस बदी परियोजना का भारत में मौजूद होना देश के अपने आर्टिफिशल मिशन को गति देने में मददगार होगा। इसके लिए अत्यधिक कंप्यूटिंग क्षमता की जरूरत होती है। खासकर ऐसे विशेष केंद्रों की मांग बढ़ रही है। जहां चिप को कस्टमाइज्ड तरीके से डिजाइन किए गए सर्वरों में एकत्रित किया जा सके। विशाखापत्तनम और अन्य ऐसे केंद्रों से लिया सबक भारत को वह क्षमता विकसित करने में मदद करेगा जिसकी उसे जरूरत है।


Date: 18-10-25

हरित ऊर्जा में भारत के बढ़ते कदम

रंजना मिश्रा

भारत ने ऊर्जा के क्षेत्र में एक ऐसी ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है, जो न केवल देश के लिए, बल्कि संपूर्ण विश्व के लिए अध्ययन का विषय है। वर्ष 2030 तक अपने निर्धारित लक्ष्य से पूरे पांच वर्ष पहले भारत ने अपनी कुल स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता का पचास फीसद गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से प्राप्त कर लिया है। यह असाधारण सफलता पेरिस समझौते के प्रति भारत की दृढ़ प्रतिबद्धता और जलवायु परिवर्तन के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में उसकी नेतृत्वकारी भूमिका को सशक्त रूप से रेखांकित करती है। यह केवल आंकड़े नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षित और पर्यावरणीय रूप से जिम्मेदार भारत की एक निर्णायक छलांग है। यह भारत की एक बड़ी उपलब्धि है, जो अपनी विकास की आकांक्षाओं को पृथ्वी की सेहत के साथ संतुलित करना सीख रहा है और दुनिया को दिखा रहा है कि आर्थिक प्रगति और पारिस्थितिक स्थिरता एक साथ संभव है।

ऊर्जा क्षेत्र में भारत की यह यात्रा एक दशक से भी अधिक समय पहले शुरू हुई, जब देश ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा और बढ़ते कार्बन उत्सर्जन की दोहरी चुनौती को स्वीकार किया। उस समय भारत का ऊर्जा परिदृश्य मुख्य रूप से कोयले पर आधारित था, जो सस्ता और सुलभ तो था, लेकिन पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संबंधी गंभीर चिंताओं को जन्म दे रहा था। वर्ष 2010 में शुरू किया गया ‘जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय सौर मिशन’ इस दिशा में एक प्रारंभिक और महत्त्वपूर्ण कदम था। इसने देश में सौर ऊर्जा के प्रति जागरूकता पैदा की और एक नीतिगत ढांचे की नींव रखी। हालांकि, इस हरित क्रांति की असली गति पिछले दशक में आई, जब सरकार ने नवीकरणीय ऊर्जा को राष्ट्रीय प्राथमिकता के केंद्र में रखा। यह एक रणनीतिक बदलाव था, जिसे मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति और महत्त्वाकांक्षी लक्ष्यों का समर्थन प्राप्त था।

वर्ष 2015 में भारत ने 2022 तक 175 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता स्थापित करने का एक साहसिक लक्ष्य निर्धारित किया, जिसमें सौ गीगावाट सौर ऊर्जा, 60 गीगावाट पवन ऊर्जा, 10 गीगावाट बायोमास और पांच गीगावाट छोटी जलविद्युत परियोजनाएं शामिल थीं। इस लक्ष्य ने दुनिया को चकित कर दिया, लेकिन इसने घरेलू और अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को एक स्पष्ट संकेत दिया कि भारत अपने ऊर्जा भविष्य को लेकर गंभीर है। इसके बाद वर्ष 2021 में ग्लासगो में आयोजित काप – 26 शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दुनिया के सामने भारत की जलवायु कार्रवाई के लिए पांच सूत्रीय एजंडा ‘पंचामृत’ प्रस्तुत किया। इसी के तहत वर्ष 2030 तक भारत ने अपनी गैर जीवाश्म ऊर्जा क्षमता को 500 गीगावाट तक पहुंचाने और अपनी कुल ऊर्जा आवश्यकताओं का पचास फीसद नवीकरणीय ऊर्जा से पूरा करने का विशाल लक्ष्य निर्धारित किया।

नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, भारत की कुल स्थापित बिजली क्षमता लगभग 485 गीगावाट को पार कर गई है, जिसमें से 243 गीगावाट से अधिक क्षमता गैर जीवाश्म स्रोतों से आती है। यह स्पष्ट रूप से पचास फीसद के आंकड़े को पार करता है। देश की हरित ऊर्जा उपलब्धि में सौर ऊर्जा ने केंद्रीय भूमिका निभाई है। पिछले दस वर्षों में देश की सौर क्षमता में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है, जो मार्च 2014 के 2.63 गीगावाट से बढ़कर जुलाई 2025 तक 119.02 गीगावाट हो गई है। इस सफलता के पीछे कई कारक हैं। सरकार ने ‘अल्ट्रा मेगा सोलर पावर पार्क्स’ की स्थापना को प्रोत्साहित किया। राजस्थान का भड़ला सोलर पार्क (2,245 मेगावाट) और कर्नाटक का पावागड़ा सोलर पार्क (2050 मेगावाट) दुनिया के सबसे बड़े सोलर पार्कों में से हैं।

इसी तरह ‘प्रधानमंत्री सूर्य घरः मुफ्त बिजली योजना’ ऊर्जा उत्पादन के विकेंद्रीकरण की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है। इसका लक्ष्य एक करोड़ घरों की छत पर सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित करना है। इससे परिवारों को 300 यूनिट तक मुफ्त या सस्ती बिजली मिलेगी और वे अतिरिक्त बिजली ग्रिड को बेचकर आय भी अर्जित कर सकेंगे। यह योजना न केवल ऊर्जा आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देगी, बल्कि सौर ऊर्जा को एक जन आंदोलन बनाने में भी सहयोग कर रही है। प्रौद्योगिकी में प्रगति और वैश्विक स्तर पर बड़े पैमाने पर उत्पादन के कारण सौर संयंत्रों की कीमतों में गिरावट आई है। ‘प्रधानमंत्री कुसुम योजना’ देश के कृषि क्षेत्र को ऊर्जा सुरक्षा प्रदान करने पर केंद्रित है। इसके तहत किसानों को सोलर पंप स्थापित करने और अपनी बंजर भूमि पर सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित करके अतिरिक्त बिजली बेचने के लिए सबसिडी और प्रोत्साहन दिया जा रहा है।

वहीं, पवन ऊर्जा का भी भारत की आत्मनिर्भरता में महत्त्वपूर्ण योगदान है। विशेष रूप से तमिलनाडु, गुजरात, कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे लंबे समुद्र तट वाले राज्यों ने पवन ऊर्जा क्षमता के विस्तार में अहम भूमिका निभाई है। अब सरकार का ध्यान अपतटीय पवन ऊर्जा पर केंद्रित है। इसमें तट से दूर समुद्र में पवन चक्कियां स्थापित की जाती हैं, जहां हवा की गति अधिक, स्थिर और शक्तिशाली होती है, जिससे बिजली उत्पादन की क्षमता काफी बढ़ जाती है। गुजरात और तमिलनाडु के तटों पर विशाल अपतटीय पवन ऊर्जा फार्म विकसित करने की योजनाएं चल रही हैं। इसके अलावा पवन-सौर हाइब्रिड परियोजनाएं भी एक नया कदम हैं, जो एक ही स्थान पर दोनों प्रौद्योगिकियों का उपयोग करके भूमि और ट्रांसमिशन’ के बुनियादी ढांचे का बेहतर इस्तेमाल करने की क्षमता प्रदान करता है।

देश में जलविद्युत और परमाणु ऊर्जा की भूमिका भी अहम है। ये स्रोत बिजली ग्रिड को संतुलित रखने और मांग को पूरा करने के लिए आवश्यक हैं। सरकार ने 25 मेगावाट से अधिक की बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं को नवीकरणीय ऊर्जा का दर्जा दिया, जिससे उन्हें वित्तीय प्रोत्साहन मिला। साथ ही, भारत का स्वदेशी परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम स्वच्छ ऊर्जा प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। सरकार अब एक साथ कई परमाणु रिएक्टरों के निर्माण को मंजूरी दे रही है, ताकि क्षमता विस्तार में तेजी लाई जा सके। कोयले और तेल के आयात पर निर्भरता कम होने से भारत की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हो रही है। जीवाश्म ईंधन का उपयोग कम होने से ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में सीधी कमी आती है, जो भारत को वर्ष 2070 तक शून्य कार्बन उत्सर्जन के अपने दीर्घकालिक लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में मजबूती से आगे बढ़ाएगा। कोयला जलाने से होने वाले वायु प्रदूषण में कमी से शहरों में हवा की गुणवत्ता में सुधार होगा, जिससे श्वसन संबंधी बीमारियों में भी कमी आएगी।

समय से पहले अपने लक्ष्यों को प्राप्त करके भारत ने खुद को जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई में एक जिम्मेदार और अग्रणी राष्ट्र के रूप में स्थापित किया है। यह उपलब्धि शानदार है, लेकिन यह यात्रा का अंत नहीं, बल्कि एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव है। वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट के विशाल लक्ष्य तक पहुंचने के लिए अभी भी कई चुनौतियों से पार पाना होगा। नवीकरणीय ऊर्जा की अस्थिर प्रकृति को संभालने के लिए एक आधुनिक और लचीले ग्रिड की आवश्यकता है। इसके लिए ‘ट्रांसमिशन’ लाइनों का विस्तार, उन्नत पूर्वानुमान प्रणाली और स्वचालित ग्रिड प्रबंधन प्रणालियों में भारी निवेश की जरूरत होगी। कृषि भूमि और पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों पर प्रभाव को कम करने के लिए बंजर भूमि नहरों और जलाशयों पर तैरते हुए सौर संयंत्र जैसे नवीन समाधानों को बढ़ावा देना होगा। इसके लिए सरकार को एक स्थिर और आकर्षक नीतिगत ढांचा बनाए रखना होगा और हरित बांड जैसे नवीन वित्तीय साधनों को प्रोत्साहित करना होगा।


Date: 18-10-25

पारदर्शितापूर्ण समाधान

संपादकीय

एआई यानी आर्टीफिशल इंटेलिजेंस (कृत्रिम मेधा) का इस्तेमाल जिस तेजी से प्रचलित होता जा रहा है। वह कई तरह के संकट भी उपजा रहा है। इसलिए संसद की समिति ने सरकार से एआई के मार्फत गढ़ी गई फर्जी खबरों को फैलाने वालों की पहचान करने और उन पर मुकदमा दायर करने के लिए ठोस कानूनी व तकनीकी समाधान विकसित करने को कहा है। संचार व सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी स्थाई समिति ने मसौदा रिपोर्ट में सूचना- प्रसारण मंत्रालय, इलेक्ट्रॉनिक्स व सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय व अन्य संबंधित मंत्रालयों के बीच सहयोग का आग्रह भी किया है। हालांकि समिति के सुझाव सरकार के लिए मान्य नहीं हैं मगर संसदीय समितियां संसद का प्रतिनिधित्व करती हैं और सरकार इस पर बार-बार विचार करती रही है इसलिए ठोस कानूनी व तकनीकी समाधान विकसित किया जा सकता है। रिपोर्ट के अनुसार फर्जी खबरों का पता लगाने के लिए दो सॉफ्टवेयर प्रयोग हो रहे हैं। डीप लर्निंग फ्रेमवर्क व डीप फेक वीडियो, जिनके द्वारा फर्जी भाषण व फाइल का पता लगाने का प्रयास किया जाता है। कृत्रिम बुद्धिमता के प्रचलित होते ही घोटालेबाजों, उपद्रवियों व नफरत फैलाने वाले नकारात्मक लोगों द्वारा फर्जी खबरों या तस्वीरों का प्रयोग किया जा रहा है। गूगल समेत सभी तकनीकी कंपनियां कृत्रिम बुद्धिमता के उपयोग को सच बनाकर प्रचारित करने में पीछे नहीं रहना चाहती। बेशक फर्जी खबरों या वीडियो के मार्फत केवल राजनीतिक दलों को ही नुकसान नहीं पहुंचाया जा रहा बल्कि जानी-मानी शख्सियतों या भीषण दुर्घटनाओं, प्राकृतिक आपदाओं व युद्धादि की खबरों को भी बढ़ा-चढ़ाकर या वीभत्स तरीके से प्रचारित किया जाता है। फर्जी खबरों / वीडियो को समाज के लिए खतरे के तौर पर देखा जाता है। इनसे न सिर्फ नागरिकों में भय फैल सकता है बल्कि दंगे-फसाद या उन्माद भी बढ़ने की आशंका है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स विभिन्न चरणों की जांच का आश्वासन भले ही देते हैं मगर ओछी मानसिकता वाले फर्जी बातें, खबरें या तस्वीरों को वायरल करने से बाज नहीं आते। हालांकि सरकार को सिर्फ अपने स्वार्थानुसार मुकदमे या कानून की बजाए एआई के किसी भी तरह के फर्जी / गलत या बदनियति से फैलाई खबरों / चित्रों पर रोकने या कानूनी कार्रवाई की कोशिशें करनी होगीं।


Date: 18-10-25

अंत की ओर नक्सली

संपादकीय

देश में नक्सली आतंक का पटाक्षेप होने वाला है और यह एक ऐसी कामयाबी होगी, जिसे इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाएगा। यह सुखद है कि बुधवार गुरुवार को छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में 258 माओवादियों ने आत्मसमर्पण कर दिया है। इससे पता चलता है कि सरकार की मंशा हिंसा की नहीं है और वह माओवादियों को मुख्यधारा में आने का अवसर दे रही है। यह एक खुशखबरी है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने छत्तीसगढ़ में हिंसा के गढ़ रहे अबूझमाड़ और उत्तरी बस्तर को नक्सली आतंक से मुक्त घोषित कर दिया है। गौर करने की बात है, आत्मसमर्पण करने वालों में प्रतिबंधित भारतीय कम्युनस्टि पार्टी (माओवादी) के अनेक पदाधिकारी शामिल हैं। ऐसे-ऐसे नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है, जिन पर एक करोड़ रुपये तक का इनाम घोषित था। अब सिर्फ दक्षिणी बस्तर और कुल तीन जिलों में कुछ माओवादियों के बचे रहने का अनुमान है, उन पर भी जल्दी ही शिकंजा कस लिया जाएगा। माओवादी हिंसा के खिलाफ सरकारों की कामयाबी कोई एक दिन की मेहनत का फल नहीं है। यह सुरक्षा बलों के बलिदान और उनकी लाजवाब रणनीतियों का प्रतिफल है। सुरक्षा बल धीरे-धीरे नक्सलियों को उनकी मांद में समेटते चले गए हैं।

आज से चार वर्ष पहले ऐसी कल्पना भी नहीं थी कि नक्सली सरकार के काबू में आ जाएंगे। विशेष रूप से केंद्र सरकार की दृढ़ता और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के दृढ निश्चय का परिणाम है कि जनवरी 2024 से अभी तक 2,100 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है। करीब 1,785 नक्सली गिरफ्तार हुए हैं, जबकि 477 को मौत नसीब हुई है। बचे हुए माओवादियों को भी हिंसा का सहारा लेने से बचते हुए मुख्यधारा में लौट आना चाहिए। यह जगजाहिर है कि माओवादी हिंसा की वजह से लाखों लोग मारे गए है। यह समीक्षा अब अवश्य होनी चाहिए कि लगभग छह दशक की हिंसा का आखिर क्या हासिल है ? स्वयं माओवादियों या उनसे सहानुभूति रखने वालों को भी गहराई से अध्ययन करना चाहिए कि उनके कथित आंदोलन की वजह से पांच से ज्यादा राज्यों की तरक्की प्रभावित हुई है। सामाजिक, आर्थिक और बुनियादी सुविधाओं के मामले में एक बड़ा इलाका हिंसा की वजह से वंचित है। अब माओवादी आत्मसमर्पण करके अपने जीवन को संवारेंगे, तो जाहिर है, वंचित इलाकों में भी विकास का नया दौर शुरू होगा। छत्तीसगढ़ की ही बात करें, तो रायपुर और बस्तर के विकास में जमीन-आसमान का अंतर हो गया है, इसे पाटने के लिए बुद्ध स्तर पर विकास अभिवानों की जरूरत पड़ेगी।

अब एहसास होने लगा है कि वाकई, 31 मार्च, 2026 से पहले ही देश से नक्सली हिंसा का अंत हो जाएगा। यह प्रमाण है कि अगर सरकार ठान ले, तो कुछ भी कर सकती है। यह अध्ययन का विषय है कि सरकार ने विकास की सहायता से वंचित इलाकों तक पहुंचने के जो प्रयास किए है, उनका निचोड़ क्या है? देश के बंचित इलाकों में लोगों की खुशी वा खुशहाली के लिए क्या और कैसे कदम उठाए जा सकते हैं? भूलना नहीं चाहिए कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी नक्सलवादी हिंसा को नियंत्रित न कर पाने का अफसोस था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने तीसरे कार्यकाल में यह सफलता हासिल हो रही है। अगर सुरक्षा बलों की जिम्मेदारी घट रही है, तो प्रशासन- शासन की जिम्मेदारियां बढ़ रही हैं। विचार के स्तर पर भी विदेश प्रेरित माओवादी आक्रामकता का अंत सुनिश्चित होना चाहिए।