18-07-2026 (Important News Clippings)
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अमेरिका के बजाय चीन की साख बढ़ती जा रही है
संपादकीय
अमेरिका के यूटा राज्य स्थित साल्ट लेक के एक मॉल में एक भारतीय का धर्म पूछकर एक अमेरिकी युवा ने उस पर 15 बार चाकू से प्रहार किया। उधर ट्रम्प सरकार ने विदेशी छात्रों के खिलाफ वीसा नियमों को और सख्त बनाया है। इस फैसले के पीछे ट्रम्प की गिरती साख को बचाने का प्रयास माना जा रहा है, क्योंकि उनकी वोट जुटाने की मागा-नीति गैर-अमेरिकियों को देश में हतोत्साहित करने पर टिकी है। इसके उलट देश की गिरती अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए यूएस फेडरल बैंक (आरबीआई के सामान) ने एक बार फिर भारतीय मूल के तीन अर्थशास्त्रियों को अपनी मौद्रिक नीति समितियों का मुखिया बनाया है। ये हैं रघुराम राजन, राज चेट्टी और आशा शर्मा। दरअसल ट्रम्प की समस्या बहुआयामी हो चुकी है। मध्यावधि चुनाव में कुछ माह बचे हैं। साख घट रही है। ताजा प्यू सर्वे के अनुसार अमेरिका पर विश्व के देशों का भरोसा घटा है, जबकि चीन पर बड़ा है। इस सर्वे में शामिल 36 देशों में 22 ने चीन पर ज्यादा भरोसा दिखाया है। सबसे चिंता की बात यह है कि ऐसे देशों में कनाडा और मैक्सिको के अलावा जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन भी शामिल हैं। जिन देशों की जनता अभी भी जिनपिंग के मुकाबले ट्रम्प पर भरोसा बनाए हैं, वे हैं इजराइल, जापान, द. कोरिया, फिलीपीन्स और पोलैंड | विश्व पटल पर चीन का बढ़ता महत्व भारत की चिंता का विषय होना चाहिए।
Date: 18-07-26
नई चेतावनी : धरती अनुमान से 30% तक ज्यादा तेजी से गर्म हो सकती है
धरती पहले के अनुमानों से कहीं अधिक तेजी से गर्म हो रही है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर मौजूदा रुझान जारी रहे तो आने वाले वर्षों में ग्लोबल वार्मिंग मौजूदा आकलन से 10 से 30 प्रतिशत तक अधिक हो सकती है। इसका असर भीषण गर्मी, जंगलों में आग, सूखा और चरम मौसमी घटनाओं के रूप में पहले से ज्यादा दिखाई देगा। 2027 के अब तक का सबसे गर्म साल बनने की संभावना है, जबकि प्रशांत महासागर में मजबूत हो रहे अल नीनो के कारण अगले साल भी हालात गंभीर बने रह सकते हैं।
वैज्ञानिकों की सबसे बड़ी चिंता पृथ्वी के ऊर्जा असंतुलन को लेकर है। सामान्य स्थिति में पृथ्वी सूर्य से मिलने वाली ऊर्जा का एक हिस्सा अंतरिक्ष में लौटा देती है। इसी प्रक्रिया को अल्बेडो कहा जाता है, लेकिन पिछले दो दशकों में उपग्रहों से मिले आंकड़े बताते हैं कि पृथ्वी की यह क्षमता तेजी से घट रही है। नतीजतन ज्यादा सौर ऊर्जा धरती और समुद्रों में ही फंस रह जाती है, जिससे तापमान लगातार बढ़ रहा है। क्लाइमेट वैज्ञानिक रेटो नुटी के अनुसार पृथ्वी का ऊर्जा असंतुलन जिस गति से बढ़ रहा है, वह संकेत देता है कि भविष्य में ग्लोबल वार्मिंग मौजूदा अनुमानों से कहीं ज्यादा हो सकती है। इसको झलक पहले ही दिखने लगी है। प्रशांत महासागर की गहराइयों में जमा अतिरिक्त गर्मी अब समुद्र की ऊपरी लगभग 100 मीटर परत तक पहुंच चुकी है। अल्बेडो घटने की एक बड़ी वजह समुद्रों के ऊपर ठंडे बादलों में कमी भी मानी जा रही है। ग्रीनहाउस गैसों के कारण समुद्र अधिक गर्म हो रहे हैं और इससे बादलों का निर्माण प्रभावित हो रहा है।
दूसरी ओर, औद्योगिक प्रदूषण कम करने के प्रयास भी एक नई दुविधा पैदा कर रहे हैं। वातावरण वैज्ञानिक पॉल क्रटजेन ने वर्षों पहले आगाह किया था कि जीवाश्म ईंधन से निकलने वाले सल्फर डाइऑक्साइड के सूक्ष्म कण भले ही मानव स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह हों, लेकिन वे सूर्य की कुछ ऊर्जा को अंतरिक्ष में परावर्तित कर पृथ्वी को ठंडा रखने में भी भूमिका निभाते हैं। सल्फर उत्सर्जन घटने से वह प्राकृतिक ‘कूलिंग प्रभाव’ भी कमजोर हुआ है, जिससे ग्लोबल वार्मिंग और बढ़ सकती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि केवल ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन घटाना पर्याप्त नहीं होगा। पृथ्वी की सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करने की क्षमता कैसे बढ़ाई जाए, इस पर भी तेजी से काम करना होगा। क्योंकि यदि ऊर्जा असंतुलन लगातार बढ़ता रहा, तो जलवायु परिवर्तन की रफ्तार को नियंत्रित करना पहले से कहीं अधिक कठिन हो जाएगा।
Date: 18-07-26
पीएम मोदी की कूटनीतिक पहल से मिले एशिया में नए ट्रेंड के संकेत
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया विदेश यात्राओं ने इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में तेजी से बदलते कूटनीतिक समीकरणों को नई दिशा दी है। पिछले महीने अपनी 100वीं विदेश यात्रा के दौरान फ्रांस और स्लोवाकिया जाने के बाद मोदी सेशेल्स पहुंचे। इसके बाद जापान की प्रधानमंत्री ताकदची साने की मेजबानी की और फिर इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैंड का दौरा किया। इन यात्राओं ने संकेत दिया है कि एशिया के मध्यम शक्ति वाले देश अमेरिका और चीन के बीच संतुलन बनाते हुए रणनीतिक स्थिति मजबूत करने में जुटे हैं।
इन दौरों के दौरान भारत ने रक्षा, समुद्री सुरक्षा, सेमीकंडक्टर और दुर्लभ खनिजों जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया। चीन की बढ़ती आर्थिक और सैन्य ताकत लंबे समय से भारत सहित कई एशियाई देशों की चिंता रही है। वहीं, अमेरिका की बदलती प्राथमिकताओं ने क्षेत्रीय देशों को नए साझेदार तलाशने के लिए भी प्रेरित किया है। विदेश नीति विशेषज्ञ सी. राजामोहन इसे ‘जी माइनस 2’ की रणनीति बताते हैं। उनका कहना है कि एशियाई देश न तो अमेरिका से दूरी बनाना चाहते हैं और न ही चीन के साथ सीधे टकराव की राह पर हैं। उनकी कोशिश दोनों महाशक्तियों के बीच संतुलन बनाते हुए आपसी सहयोग बढ़ाने की है। विश्लेषकों का मानना है कि 2018 में अमेरिका ने पैसेफिक रणनीति में ‘इंडो’ शब्द जोड़कर भारत की रणनीतिक भूमिका को रेखांकित किया गया था, जबकि अब इसे हटाना अमेरिकी प्राथमिकताओं में बदलाव का संकेत माना जा रहा है। इसी पृष्ठभूमि में भारत ने क्षेत्रीय साझेदारियों को मजबूत करने की रफ्तार बढ़ाई है। ऑस्ट्रेलिया अब भारत को परमाणु ऊर्जा के लिए यूरेनियम उपलब्ध कराने और समुद्री सुरक्षा सहयोग बढ़ाने पर सहमत हुआ है। जापान के साथ संबंध अब बुनियादी ढांचे से आगे बढ़कर रक्षा उत्पादन और प्रौद्योगिकी सहयोग तक पहुंच गए हैं। न्यूजीलैंड के साथ अधिक नौसैनिक अभ्यास और सूचनाओं के आदान-प्रदान पर सहमति बनी है, जबकि इंडोनेशिया के साथ ब्रह्मोस मिसाइल प्रणाली की आपूर्ति का समझौता हुआ है।
अतिवाद की हदों को पार करता स्त्रीवाद
क्षमा शर्मा, ( लेखिका साहित्यकार हैं )
हाल में अमेरिका में हुए कुछ सर्वे और रिपोर्ट पढ़ी। उनमें बताया गया है कि वहां अधिकांश स्त्रियां पुरुषों से बराबरी चाहती हैं। समान वेतन और समान सुविधाओं को पसंद करती हैं, लेकिन उनमें से अधिकांश खुद को फेमिनिस्ट या स्त्रीवादी नहीं कहलाना चाहतीं। बहुत से पुरुष भी स्त्रियों के अधिकारों के प्रबल समर्थक हैं, पर वे इस शब्द से परहेज करते हैं। आखिर इसका कारण क्या है? स्त्रियों का कहना है कि स्त्रीवाद ने शुरुआत में जो अधिकार मांगे थे, जैसे शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य आदि वे कमोबेश पूरे हो चुके हैं। जहां नहीं हुए हैं, वहां इन पर सोचा जा रहा है। इसलिए अब पुराने रागों का अलाप बंद होना चाहिए। वे फेमिनिज्म के अतिवादी रूप (रेडिकल फेमिनिज्म) से परेशान हैं। उनका कहना है कि हमेशा पुरुषों को शिकारी और अपने को शिकार दिखाना गलत अवधारणा है। पुरुष अच्छे भी हो सकते हैं और स्त्रियां बुरी भी हो सकती हैं। वे यह भी कहती हैं कि किसी दफ्तर में अधिकारी बनकर घंटों काम करने और दफ्तर की परेशानियों को झेलने से उनका जीवन आसान नहीं, बहुत कठिन हुआ है।
यही नहीं, फेमिनिज्म द्वारा स्त्री की हर पुरानी भूमिका की आलोचना की जाती है, जैसे खाना बनाने, बच्चे पालने, घर की देखभाल करने आदि को पिछड़ापन और शोषण का कारक बताया जाता है। यह सोच उन स्त्रियों को छोटा करता है, उनका अपमान करता है, जो इन भूमिकाओं में रहना चाहती हैं। इन स्त्रियों का कहना है कि यदि वे अपनी मर्जी से ये सब करना चाहती हैं तो कोई और उनका मजाक कैसे उड़ा सकता है? उन्हें मुख्यधारा से कटा हुआ कैसे कह सकता है? यह भी सच है कि नौकरीपेशा स्त्रियां एक तरह से खुद को सैंडविच की तरह से महसूस करती हैं, क्योंकि उन्हें घर भी देखना होता है और दफ्तर में भी काम करना होता है। स्त्रियों का कहना यह भी है कि मेनस्ट्रीम फेमिनिस्ट स्त्रियों को हमेशा कमजोर साबित करती रहती हैं, जबकि उन्हें स्त्रियों की तरह-तरह की भूमिकाओं, उन्हें निभाने की उनकी ताकत और उनकी क्षमताओं पर बात करनी चाहिए। यही नहीं, पुरुषों को हमेशा नकारात्मक रूप में पेश करना भी समाज की कोई भलाई नहीं करता, क्योंकि अधिकांश पुरुष भी परिवार के लिए नौकरी या अच्छे काम करते हैं। उनकी इन भूमिकाओं की सराहना आखिर क्यों नहीं की जानी चाहिए?
अमेरिका में चलने वाले ट्रेडिशनल वाइफ मूवमेंट में शामिल स्त्रियां यह तक कहती हैं कि यदि वे अपने पति के लिए खाना बनाती हैं, बच्चों की देखभाल करती हैं तो यह उनका चुनाव है, पसंद है। दूसरी महिला इस पर सवाल उठाने वाली कौन होती है। इन बातों को पढ़ते हुए यही लगा कि कोई भी विमर्श शुरुआत में सहानुभूति से शुरू होता है। फिर धीरे-धीरे उसे ताकत प्राप्त होती है। मीडिया, जनता और सरकारों का समर्थन मिलता है तो फिर वह गुर्राने लगता है। सबसे सवाल पूछने और असहमत होने का अधिकार तो मांगता है, मगर यह नहीं देखना चाहता कि कोई उससे असहमत हो। इन दिनों अपने देश में चल रहे कई विमर्शों की यही सच्चाई है। आप जैसे ही उनसे असहमत होते हैं, सवाल पूछते हैं तो फौरन तरह-तरह के अपशब्दों के साथ आप पर हमला बोल देते हैं। यह एक तानाशाहीपूर्ण रवैया है, क्योंकि तानाशाहियों में ही सवाल पूछना मना होता है। यदि कोई विमर्श सवालों से बचने लगे, सवाल पूछने वालों पर ही आक्रमण करने लगे, गाली-गलौज की भाषा का इस्तेमाल करने लगे तो माना जाना चाहिए कि उसका अंत करीब है। यों भी इतिहास से अब तक देखें तो किसी भी विचार-विमर्श की उम्र 70-100 साल से अधिक नहीं होती, क्योंकि कोई भी विचार और विमर्श अपना प्रतिपक्ष साथ लेकर आता है। जिस अमेरिका और यूरोप से स्त्रीवादी विचार चला था, वहां ही अब इस पर सवाल उठाए जा रहे हैं। ट्रंप प्रशासन भी अतिवादी स्त्रीवाद का बड़ा आलोचक है। ट्रंप का कहना है कि रेडिकल फेमिनिज्म और एलजीबीटीक्यू की अमेरिका में कोई जगह नहीं है।
अपने देश में भी स्त्रीवादी विचार की अति अगर देखनी हो तो हाल में हुए सिया-केतन मामले में देखी जानी चाहिए। महिलाओं के एक वर्ग ने इंटरनेट मीडिया में जोर-शोर से कहा कि ऐसे पुरुषों को यही सजा मिलनी चाहिए। एनसीआरबी के आंकड़े दिखा कहने लगीं कि बड़ी संख्या में पुरुष स्त्रियों को मारते रहे हैं। ऐसे में यदि किसी स्त्री ने पुरुष को मार दिया तो क्या गलत किया। वे अपने साथ हुए अपराधों का बदला ले रही हैं। ऐसी स्त्रीवादियों से कहना चाहूंगी कि चाहे कोई स्त्री मरे या पुरुष, किसी की भी हत्या हो, वह दुखद है। यदि आप जीवन दे नहीं सकतीं तो लेने का क्या अधिकार। किसी को भी किसी की हत्या का अधिकार नहीं है। किसी भी तरह उसे वैध नहीं ठहराया जा सकता है। आखिर केतन की हत्या से पुरुष और स्त्रियां सभी परेशान हुए। याद रखें कि कोई पुरुष या स्त्री अकेली नहीं होती, उसके परिवार में स्त्री-पुरुष दोनों होते हैं। किसी हत्या को वैधता प्रदान करना और उसे सेलिब्रेट करना बताता है कि हम कितना अनैतिक हो गए हैं।
Date: 18-07-26
भारत और भू-अर्थशास्त्र की मौजूदा चुनौतियां
लवीश भंडारी, ( लेखक सेंटर फॉर सोशल ऍड इकनॉमिक प्रोग्रेस के प्रमुख हैं। )
लंबे समय से आर्थिक नीति दुनिया भर में ज्यादा मूल्य तैयार करने और लोगों की भलाई को बढ़ावा देने का एक जरिया रही है। लेकिन अब सरकारों को विवश होकर आर्थिक नीति को सुरक्षा या यहां तक कि प्रभुत्व हासिल करने के साधन के रूप में इस्तेमाल करना पड़ रहा है। भू-राजनीतिक दबावों ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि मूल्य सृजन के लिए बनाए गए आर्थिक साधन अब संपदा तक पहुंचने या उससे भी बुरा कहें तो उसे नष्ट करने के लिए उपयोग किए जा रहे हैं।
सरल शब्दों में कहें तो भू-अर्थशास्त्र का अर्थ है राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आर्थिक साधनों का उपयोग चीन तथा अमेरिका के मामले में तो यह वैश्विक प्रभुत्व तक जाता समस्या यह है कि मूल्य सृजन के लिए बनाए गए ये उपकरण न तो सुरक्षा प्रदान करने में अच्छे हैं और न ही आर्थिक प्रभुत्व सुनिश्चित करने में। इन्हें सही ढंग से लक्षित करना कठिन है और इन्हें सीमित करना असंभव सबसे बुरी बात यह है कि इनकी प्रवृत्ति उपयोगकर्ता और लक्ष्य दोनों को नुकसान पहुंचाने की होती है।
अपनी तमाम स्वघोषित सफलताओं के बावजूद अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप अपनी ही जनता को संतुष्ट नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि उनकी नीतियों ने महंगाई के हालात बना दिए हैं। यही स्थिति शी चिनफिंग की भी है क्योंकि चीनी प्रभुत्व जताने की उनकी जल्दबाजी ने भारत समेत कई देशों को व्यापार और निवेश के मोर्चे पर सख्ती बरतने पर मजबूर कर दिया है। आज चीन को सबसे अधिक जरूरत वैश्विक बाजारों की है और उसकी नीतियों ने उसे उन्हीं बाजारों से वंचित कर दिया है जिनकी उसे सबसे अधिक आवश्यकता है।
जो बात ट्रंप और शी चिनफिंग तथा उनके प्रभुत्व की आवश्यकता पर लागू होती है वही छोटे देशों पर भी लागू होती है जिन्हें अपनी सुरक्षा के लिए ऐसे ही उपकरणों या साधनों का उपयोग करना पड़ेगा । औद्योगिक नीति और इसी तरह के उपायों का गलत उपयोग उसी अर्थव्यवस्था को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है जिसे हम बढ़ावा देना चाहते हैं। दुनिया भर में ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं। भारत का स्वयं का 1991 से पहले का अनुभव इस बात से भरा पड़ा है कि सरकार द्वारा बड़े पैमाने पर संसाधन डालने के बावजूद नतीजे में केवल राजकोषीय दबाव ही सामने आया।
कई लोगों का मानना है कि संभावित नुकसान के बावजूद भू-अर्थशास्त्र भारत के लिए बड़े अवसर ला सकता है। वे पूरी तरह गलत भी नहीं हैं। वर्तमान और उभरती हुई कई संभावनाएं हैं जहां भारत सामरिक आर्थिक उपकरणों का उपयोग करके अधिक आजीविका और कल्याण पैदा कर सकता है। साथ ही वह भू-राजनीतिक लक्ष्यों को भी हासिल कर सकता है। लेकिन ऐसा करने के लिए भारत को एक सुसंगत दृष्टि की आवश्यकता है जिसमें सरकार और बाहर के कई हितधारकों की सहमति शामिल हो।
दूसरे शब्दों में कहें तो अब समय आ गया है कि भारत के पास एक आर्थिक सुरक्षा रणनीति हो। लेकिन सामान्य सुरक्षा सिद्धांतों का उद्देश्य जहां सुरक्षा और प्रभाव होता है वहीं भारत की आर्थिक सुरक्षा रणनीति का उद्देश्य सभी के लिए बेहतर खुशहाली पैदा करते हुए वैसी ही सुरक्षा हासिल करना होना चाहिए। यह अंतर महत्त्वपूर्ण है। यदि आजीविका और कल्याण को स्पष्ट रूप से ऐसे सिद्धांत में शामिल नहीं किया गया तो खतरा है कि संसाधनों और प्रयासों का बड़ा हिस्सा सुरक्षा उद्देश्यों में लग जाए। सुरक्षा तो हासिल हो सकती है लेकिन विकास प्रक्रिया पर इसकी एक दीर्घकालिक लागत भी नजर आ सकती है। इसमें कोई संदेह नहीं कि गंभीर बहुक्षेत्रीय सुरक्षा आवश्यकताएं मौजूद हैं और भविष्य में इनके बढ़ने की संभावना है।
हमें दो मोर्चों पर अधिक मेहनत करनी होगी। पहला, उन सामान्य तत्वों को खोजना जहां सुरक्षा और कल्याण के उद्देश्य मिलते हों। उदाहरण के लिए जैब ईंधन भारत के खेतों से मिलने वाले जैव ईंधन अधिक ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित कर सकते हैं और किसानों को आय भी दे सकते हैं। लेकिन यदि वे खाद्य पदार्थों का उपभोग करें या उन्हें प्रतिस्थापित करें तो इससे खाद्य सुरक्षा कमजोर पड़ जाएगी। ऐसी नीति जो कृषि अपशिष्ट से कम लागत वाले जैव ईंधन विकल्पों को बढ़ावा दे वह दोनों उद्देश्यों को हासिल करने में मदद कर सकती है। हालांकि ऐसे कम लागत वाले कृषि अपशिष्ट विकल्पों के लिए प्रारंभ में अधिक शोध एवं विकास, अलग प्रकार का बुनियादी ढांचा और पर्यावरणीय उद्देश्यों के अनुरूप आपूर्ति श्रृंखला की आवश्यकता होगी।
दूसरा, भारत के आर्थिक सुरक्षा उद्देश्यों को सबसे अच्छी तरह तब पूरा किया जा सकता है जब विभिन्न क्षेत्र मिलकर काम करें। जिन विशिष्ट बिंदुओं पर कार्रवाई की आवश्यकता है उनमें आपूर्ति श्रृंखला, महत्त्वपूर्ण बुनियादी ढांचा, डेटा केबल और पाइपलाइन आदि शामिल हैं। सरकार के भीतर अंतर- विभागीय समन्वय स्पष्ट रूप से आवश्यक है। साथ ही कूटनीति को भी वैश्विक साझेदारियां बनाने और नए प्रकार की सहयोगी आर्थिक व्यवस्थाएं विकसित करने में अपनी भूमिका बढ़ानी होगी। हाल ही में द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौतों में मिली सफलताएं इसका उदाहरण हैं।
भारत पहले से ही अपनी सुरक्षा और संरक्षण के लिए कई साधनों का उपयोग कर रहा है। कुछ वर्तमान और संभावित साधनों में व्यापार नीति उपाय जैसे शुल्क, निर्यात नियंत्रण, मुक्त व्यापार समझौते, चयनात्मक निवेश नियंत्रण, दोहरे उपयोग वाली तकनीक की सीमाएं और कुछ क्षेत्रों को प्राथमिकता देने वाली औद्योगिक नीति शामिल हैं। इसके साथ ही हमें एक व्यापक शोध एवं विकास ढांचा जोड़ना होगा जिसमें कहीं अधिक संसाधन हों और शोध विकास संस्थानों से बहुत विशिष्ट मांगें की जाएं। साथ ही, अधिक चयनात्मक प्रतिस्पर्धा की आवश्यकता होगी। विशेषकर उन क्षेत्रों में जहां भारत वैश्विक नेतृत्व की आकांक्षा रखता है।
दूसरे शब्दों में भारत जितना अधिक हासिल करना चाहता है और उसे जितने अधिक भू-राजनीतिक लाभ की आवश्यकता है, अर्थव्यवस्था के स्तर पर उतना ही ज्यादा तालमेल जरूरी है। प्रस्तावित आर्थिक सुरक्षा रणनीति इसी आवश्यकता को संबोधित करती है क्योंकि यह विभिन्न संस्थाओं के लिए एक साझा ढांचा सार्वजनिक करती है ताकि वे समन्वय कर सकें।
भविष्य की बात करें तो आर्थिक समृद्धि पहल की तुलना में सुरक्षा से कहीं अधिक गहराई से जुड़ी होगी। लेकिन बढ़ती सुरक्षा आवश्यकताएं दक्षता और उत्पादकता की कीमत पर नहीं होनी चाहिए। इसलिए भारत के लिए यह महत्त्वपूर्ण है कि वह ऐसी आर्थिक सुरक्षा नीति विकसित करे जो दोनों उद्देश्यों यानी सुरक्षा और कल्याण को हासिल करने का प्रयास करे।
कसौटी पर सरोकार
संपादकीय
किसी भी लोकतंत्र में जनता की ओर से अगर सरकार के रुख या उसकी नीतियों पर सवाल उठाया जाता है, तो एक स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह स्वाभाविक स्थिति है। ऐसे में सरकार का दायित्व होता है कि वह उन सवालों पर विचार करे, हर संभव और संतुष्ट करने वाला उचित उत्तर दे। विडंबना यह है कि कई बार सरकार की ओर से जन- आंदोलनों को लेकर उदासीनता या फिर उपेक्षा का भाव दिखाया जाता है और इसी वजह से कोई समस्या सुलझने के बजाय और ज्यादा जटिल हो जाती है। नीट परीक्षा में गड़बड़ी के विरोध में जब युवाओं ने दिल्ली के जंतर मंतर पर आंदोलन शुरू किया, तभी सरकार को उनके साथ बातचीत करके कोई समाधान निकालने की कोशिश करनी चाहिए थी। मगर सरकार की अनदेखी के बाद भी जिस तरह लोगों ने इस मसले पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को उठाना जारी रखा है, उससे साफ है कि वे फिलहाल इसे एक प्रतीकात्मक हल की तरह देख रहे हैं। हैरानी की बात है कि सरकार को आंदोलनकारियों के साथ संवाद स्थापित करके कोई रास्ता निकालना जरूरी नहीं लग रहा।
हालांकि सरकारी उदासीनता के बावजूद प्रश्नपत्र लीक होने और परीक्षा रद्द होने के मुद्दे पर शुरू हुआ आंदोलन अभी जारी है और अब कई नेता भी वहां अपनी उपस्थिति दर्ज कर रहे हैं। मगर इस बीच पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के आंदोलन के साथ जुड़ने और अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठने के बाद जंतर मंतर पर युवाओं के आंदोलन को नई गति मिली है और वे अपनी मुख्य मांग पूरी करने पर जोर दे रहे हैं। मगर यह चिंता की बात है कि करीब तीन हफ्ते से लगातार अनशन पर रहने की वजह से जहां सोनम वांगचुक की सेहत में लगातार गिरावट आ रही है, वहीं सरकार को उनसे बातचीत करना और अनशन खत्म कराना जरूरी नहीं लग रहा है। सवाल है कि सरकार के ऐसे रुख को लोकतंत्र के आईने में किस नजरिए से देखा जाएगा। क्या यह सरकार के लिए एक शर्मिंदा करने वाली स्थिति नहीं होनी चाहिए कि दिल्ली उच्च न्यायालय को यह याद दिलाना पड़ रहा है कि अनशन पर बैठे एक आंदोलनकारी को लेकर सरकार का क्या दायित्व होना चाहिए ?
गौरतलब है कि गुरुवार को दिल्ली हाई कोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे सोनम वांगचुक के स्वास्थ्य पर हर रोज नजर रखें और जरूरत पड़ने पर उन्हें चिकित्सीय मदद मुहैया कराएं। अदालत ने एक अहम टिप्पणी की कि जिंदगी अनमोल है और उसे बचाने के लिए अधिकारियों को सारे चिकित्सीय प्रयास करने चाहिए। साथ ही वांगचुक की स्वास्थ्य स्थिति की नियमित रूप से जांच करनी चाहिए। दिल्ली हाई कोर्ट के ये निर्देश निश्चित रूप से भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक के जीवन को बचाने के लिहाज से अहम हैं, लेकिन यह सरकार का भी दायित्व है कि वह बिना देर किए इस मसले पर वांगचुक सहित आंदोलनकारियों से संवाद स्थापित करे और कोई ठोस हल निकाले । विचित्र यह है कि विद्यार्थियों के भविष्य को बेहतर बनाने के मुद्दे पर भूख हड़ताल करने वाले वांगचुक की बिगड़ती सेहत से फिक्रमंद विपक्षी दलों के नेता अपना समर्थन देने उनके पास पहुंच रहे हैं, जबकि सरकार की यह जिम्मेदारी होनी चाहिए कि वह अपनी ओर से अनशन खत्म कराने के लिए ठोस पहल करे। इसे लोकतंत्र और जन सरोकारों के प्रति ईमानदारी दर्शाने के लिहाज से सरकार की इच्छाशक्ति की कसौटी के तौर पर भी देखा जाएगा।
Date: 18-07-26
हिंसा का सिलसिला
संपादकीय
मणिपुर में राष्ट्रपति शासन के बाद सरकार के फिर से कमान संभालने पर यह माना जा रहा था कि राज्य में स्थायी तौर पर शांति बहाली की दिशा में प्रयास तेज होंगे। मगर इन अपेक्षाओं के विपरीत हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। जातीय संघर्ष से उपजी विरोध की चिंगारी आए दिन हिंसक घटनाओं के रूप में सामने आ रही है। स्थिति यह है कि राज्य में तैनात सुरक्षाबलों को भी अब अपनी सुरक्षा की चिंता सताने लगी है। इसी कारण सुरक्षा कर्मियों की तैनाती और आवाजाही के लिए रणनीतिक तौर पर बदलाव किए जा रहे हैं। सेनापति जिले में हाल ही में असम राइफल्स के एक शिविर पर भीड़ के हमले के बाद केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल ने अपनी सुरक्षा के लिए करीब सौ बुलेटप्रूफ वाहनों को अपने काफिले में शामिल किया है। ऐसे में सवाल है कि जब सुरक्षाबलों की सुरक्षा को ही खतरा पैदा हो गया है, तो आम लोग खुद को कैसे सुरक्षित महसूस कर पाएंगे? आखिर क्या वजह है कि राज्य में सामाजिक सौहार्द और अमन-चैन कायम करने के प्रयासों में सरकार की इच्छाशक्ति एवं गंभीरता नजर नहीं आ रही है ?
गौरतलब है कि मणिपुर में हाल के दिनों में हिंसक घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। पिछले सप्ताह उखरुल जिले में उग्रवादियों के घात लगाकर किए गए हमले में असम राइफल्स के दो जवान शहीद हो गए थे। इसके कुछ दिन बाद सेनापति जिले में स्थानीय लोगों की भीड़ ने सैन्य बल के शिविर पर हमला कर वहां आगजनी और तोड़फोड़ की। ये घटनाएं बताती हैं कि राज्य में आम लोगों के असंतोष के बीच उग्रवादी संगठनों की सक्रियता भी बढ़ती जा रही है। हालांकि, कुछ विरोधी संगठनों ने सरकार के साथ समझौता कर शांति बनाए रखने की प्रतिबद्धता जताई है, लेकिन इनसे इतर नए समूह खड़े हो गए हैं, जो अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए हिंसक वारदात को अंजाम देने का कोई मौका नहीं चूकते। राज्य में जटिल होते हालात के पीछे एक कारण यह भी है कि स्थानीय लोगों का व्यवस्था पर भरोसा कमजोर हो रहा है। ऐसे में सबसे पहले सरकार की प्राथमिकता यही होनी चाहिए कि आम लोगों में विश्वास बहाली के लिए गंभीरता से प्रभावी कदम उठाए जाएं।
Date: 18-07-26
जवाबदेही पर निर्भर निर्भर लोकतंत्र की धुरी
देवेंद्र सिंह असवाल
राष्ट्रीय समर स्मारक में आपरेशन सिंदूर के शहीद छह बहादुर सैनिकों के नाम शिलालेख पर होने पर एक नया विवाद उत्पन्न हो गया है। इसका कारण है रक्षा मंत्री का 28 जुलाई 2025 को संसद में दिया गया वक्तव्य, जिसमें उन्होंने सदन को आश्वस्त किया था कि आपरेशन सिंदूर’ में हमारे सैनिकों को कोई क्षति नहीं हुई। इस मसले पर उठे विवाद के बाद विपक्ष ने रक्षा मंत्री पर आरोप लगाया कि उन्होंने संसद को गुमराह किया है। अब लोकसभा अध्यक्ष इस संबंध में रक्षा मंत्री से सफाई मांग सकते हैं या मामले को जांच करने और रिपोर्ट देने के लिए विशेषाधिकार समिति के पास भेज सकते हैं। आरोप सही है या नहीं, इसके बारे में निष्कर्ष उचित प्रक्रिया के तहत जांच के बाद संसद में उजागर होगा।
यहां विवेचना का प्रश्न यह है कि अगर कोई मंत्री जानबूझकर संसद को गुमराह करता है या अर्ध सत्य बोलता है, तो उसे किस रूप में देखा जाएगा और उसके क्या नतीजे होंगे। संसद में मंत्रियों द्वारा दिए गए बयान या जवाब सत्य माने जाते हैं, जब तक कि कोई सदस्य तथ्यों को चुनौती नये, या मंत्री स्वयं ही उसे अपनी त्रुटि बताए और उसमें अध्यक्ष की अनुमति से ‘सुधार करे दी गई सही और तथ्यात्मक जानकारी के आधार पर ही राष्ट्र की विधायिका समुचित चर्चा कर सकती है, सुचिंतित निर्णय ले सकती है या उपयुक्त विधान पारित कर सकती है। सही और पूर्ण जानकारी के आधार पर ही संसद कुशलतापूर्वक और प्रभावी ढंग से काम कर सकती है। हमने जिस संसदीय लोकतांत्रिक ढांचे को अपनाया है, उसमें मंत्रिपरिषद संसद के प्रति जवाबदेह है। इसलिए संसद को दी जाने वाली जानकारी हमेशा सही, पूरी और समय पर मिलनी चाहिए। इसके बिना जवाबदेही का सिद्धांत महज एक कोरी कल्पना मात्र रह जाएगा। संसद के प्रति कार्यपालिका की जवाबदेही हमारे संसदीय लोकतंत्र की धुरी है और इसलिए मंत्रियों का यह कर्तव्य है कि वे संसद और उसकी समितियों को सही, पूरी और समय पर जानकारी दें।
मंत्रियों, सदस्यों तथा संसदीय समितियों के सामने गवाही देने वाले गवाहों से सच और पूरा सच बोलने की अपेक्षा की जाती है। समितियों द्वारा तो गवाहों को हमेशा यह याद दिलाया जाता है कि उनकी गवाही साच होगी, वे कुछ भी छिपाएंगे नहीं और उनकी गवाही का कोई भी हिस्सा गलत नहीं होगा। सच छिपाना, घुमा-फिराकर जवाब देना या संसद या उसकी समितियों को गुमराह करने की कोशिश करना विशेषाधिकार का उल्लंघन माना जाता है और इसके लिए संसद सजा देने में सक्षम है। इसलिए मंत्रियों पर और भी बड़ी जिम्मेदारी है, क्योंकि वे संविधान के प्रति सच्ची निष्ठा और अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करने की शपथ से प्रतिबद्ध हैं।
संसद में दिए गए असत्य, अर्धसत्य या गुमराह करने वाले वक्तव्य या सूचना संसदीय लोकतंत्र को कमजोर करते हैं। तथ्यात्मक गलती या चूक अनजाने में हो सकती है। संसद की कार्यप्रणाली के नियमों और निर्देशों में यह प्रावधान है कि अगर किसी मंत्री द्वारा दिए गए जवाब या बयान में कोई गलती या चूक के बारे में पता चलता है, तो उसे अध्यक्ष की अनुमति से यथाशीघ्र सुधारा जाना चाहिए। मंत्रियों द्वारा बयान सुधारने के कई उदाहरण हैं, खासकर सवालों के जवाबों के मामले में, लेकिन जानबूझकर गुमराह करने वाला बयान देना या संसद से जानकारी छिपाना निंदनीय है और विशेषाधिकार का उल्लंघन असत्य या सचेतन भ्रमित करने वाला बयान देना पूरी तरह से अनैतिक है, सुस्थापित संसदीय परंपराओं के खिलाफ है। और दंडनीय भी कोई भी सांसद ‘सत्यमेव जयते’ और ‘यतो धर्मस्ततो जयः’ के उदात्त आदशों से अनजान या बेपरवाह नहीं हो सकता, जो भारत की महान सभ्यता- विरासत की नींव है प्राचीन भारतीय ग्रंथों में सत्य और धर्म पर बहुत जोर दिया गया है। संसद भवन में भारतीय ग्रंथों से लिए गए कुछ श्लोक उद्धृत हैं, जो याद दिलाते हैं कि सदन में सदस्यों को धर्माचरण से बोलना चाहिए, धर्म सत्य पर आधारित होना चाहिए। सत्य तब सत्य नहीं है, अगर वह धोखे की ओर ले जाता है। यह भी निर्देश है कि किसी सभासद को या तो सभा कक्ष में प्रवेश नहीं करना चाहिए, या वहां पूरी ईमानदारी और धर्म के साथ बोलना चाहिए, क्योंकि जो नहीं बोलता या जो झूठ बोलता है, वह समान रूप से अपराध में शामिल है।
प्राचीन ग्रीस और रोम के गणराज्यों में भी सत्य को कानून के शासन, न्याय और जनता के भरोसे की आधारशिला माना जाता था। सही जानकारी के आधार पर फैसले लेने के लिए सत्यनिष्ठ वक्तव्यों को बुनियादी जरूरत माना जाता था। शेक्सपियर के बहुचर्चित नाटक ‘जूलियस सीजर’ में जब जूलियस सीजर की पत्नी सीनेट में न जाने की विनती करती है, क्योंकि उसे उनकी सुरक्षा की चिंता होती है और वह सुझाव देती है कि सीनेट को संदेश भेजा जाए कि ‘वे बीमार हैं’, तो सीजर पूछता है और हैरान होता है कि ‘क्या सीजर सीनेट को झूठ भेजेगा ?” झूठ भेजने के बजाय वह सीनेट जाना बेहतर समझता है।
भारत में अब तक किसी भी मंत्री ने संसद को गुमराह करने या संसद झूठ बोलने के आधार पर इस्तीफा नहीं दिया है, हालांकि कुछ मंत्रियों ने भ्रष्टाचार के आरोप लगने पर इस्तीफा दिया है। दूसरी ओर, ब्रिटेन में कई उदाहरण हैं, जहां मंत्रियों ने संसद को गुमराह करने के कारण इस्तीफा दिया। वर्ष 2023 में बोरिस जानसन ने यह जानने के बाद कि उन पर प्रतिबंध लग सकते हैं, सांसद पद से इस्तीफा दे दिया। इससे पहले, 2022 में भारी जन- दबाव के कारण उन्होंने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दिया था। हाउस आफ कामन्स (ब्रिटेन की प्रतिनिधि सभा) की विशेषाधिकार समिति ने पाया था कि उन्होंने ‘पार्टीगेट’ से जुड़े बयानों को लेकर जानबूझकर संसद को गुमराह किया था। 2018 में गृह मंत्री ने यह मानते हुए इस्तीफा दे दिया कि उन्होंने अनजाने में अप्रवासियों को हटाने के लक्ष्यों को लेकर सदन को गुमराह किया था। एक और ऐतिहासिक उदाहरण जान प्रोफुमो का है, जो युद्ध मामलों के मंत्री थे और जिन्होंने 1963 में सरकार और संसद से इस्तीफा दे दिया था, क्योंकि उन्होंने हाउस आफ कामन्स को गुमराह किया था। ये इस्तीफे जन- दबाव, पार्टी के भीतर के दबाव और मीडिया के हंगामे के कारण हुए थे। ब्रिटेन में यह एक सुस्थापित संसदीय परंपरा बन गई है। कि अगर कोई मंत्री जानबूझकर संसद को गुमराह करता है, तो उसे अपना मंत्रालय और संसद की सदस्यता दोनों गंवानी पड़ेगी।
बहरहाल, विशेषाधिकार हनन के नोटिस का भविष्य लोकसभा तय करेगी, रक्षा मंत्रालय को सुनने के बाद मामला गंभीर है, क्योंकि माननीय रक्षा मंत्री कई दशकों से राष्ट्रीय राजनीति के शीर्षस्थ नेताओं में से एक हैं, वरिष्ठतम और अनुभवी मंत्री हैं और संसदीय तथा संवैधानिक परंपराओं से अच्छी तरह वाकिफ हैं। ऐसी स्थिति में संसद को गुमराह करने वाले आरोप की अविलंब जांच विशेषाधिकार समिति से अनिवार्य है, ताकि वस्तुस्थिति स्पष्ट हो ।
हाइड्रोजन रेल
संपादकीय
भारतीय रेल भी अब हरित ऊर्जा की दिशा में दौड़ चली है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिंद जंक्शन से भारत की पहली स्वदेशी हाइड्रोजन-चालित ट्रेन को हरी झंडी दिखाकर एक शानदार आगाज किया है। यह स्वच्छ परिवहन के मोर्चे पर एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। जिंद स्टेशन पर ही एकीकृत हाइड्रोजन संयंत्र निर्मित हुआ है और भारत में हाइड्रोजन ऊर्जा उत्पादन और उपयोग की एक बेहतरीन शुरुआत हुई है। आसमानी नीले और सफेद रंग की ब्रॉड-गेज ट्रेन में दो हाइड्रोजन-चालित पावर कार और आठ ट्रेलर कोच जोड़े गए हैं। बताया जा रहा है कि यह अब तक विकसित विश्व की सबसे लंबी हाइड्रोजन-चालित यात्री ट्रेन में से एक है। अगर यह प्रयोग सफल हुआ, तो देश में हाइड्रोजन ट्रेनों का उपयोग बढ़ेगा। नीलगिरी, दार्जिलिंग और कांगड़ा घाटी सहित अनेक चर्चित पहाड़ी मार्गों पर ऐसी 35 ट्रेनें चलाने की योजना सराहनीय है। ये ऐसे इलाके हैं, जहां ट्रेनों को बहुत तेज नहीं चलाया जा सकता, पर इस ट्रेन को 110 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से दौड़ने के लिए तैयार किया गया है। हालांकि, पहाड़ी रास्तों पर 75 किलोमीटर प्रतिघंटा की गति भी बहुत फायदेमंद रहेगी।
कोई दोराय नहीं, हरित ऊर्जा या हरित वाहन की दिशा में यह कदम पर्यावरण को लाभ पहुंचाएगा। जिंद और सोनीपत के बीच चली यह नमो ग्रीन रेल अपने लिए ऊर्जा स्वयं बनाएगी। हाइड्रोजन को ट्रेन के अंदर ही ऊर्जा में बदला जाएगा। डीजल गाड़ियों की तुलना में हाइड्रोजन गाड़ियां ज्यादा अनुकूल हैं, इनका रखरखाव भी किफायती है। हाइड्रोजन वाहन केवल वाष्प उत्सर्जन करते हुए शोर भी बहुत कम करते हैं। आज देश में ज्यादातर रेल गाड़ियों को दौड़ने के लिए सतत बिजली का प्रवाह चाहिए, जबकि हाइड्रोजन रेल को किसी बाहरी ऊर्जा के सहारे की जरूरत नहीं है। इसे चलाने की बुनियादी लागत भी कम आएगी। अगर किसी दुर्गम जगह पर ट्रेन चलाने की जरूरत है, तो रेल विभाग के पास बिजली संचार तंत्र का ढांचा खड़ा करने के अलावा भी एक विकल्प है। जैसे-जैसे हाइड्रोजन से चलने वाली रेलों की संख्या बढ़ेगी, वैसे-वैसे ताप विद्युत केंद्रों पर पड़ने वाला दबाव भी कम होता जाएगा। एक बड़ी खुशखबरी है कि यह तकनीक भारत में ही विकसित की गई है। यह ‘मेक इन इंडिया’ के तहत मिली ऐसी वैज्ञानिक कामयाबी है, जो इस क्षेत्र में भारत की महारत साबित करती है। अभी तक जर्मनी, चीन, जापान और अमेरिका ही अपने रेल नेटवर्क में हाइड्रोजन का उपयोग कर रहे थे।
हालांकि, इस तकनीक पर और काम करने की जरूरत है। क्या भारत जैसे देश में हाइड्रोजन आधारित परिवहन मुफीद है। भारत में बहुत लंबे प्रयास और संसाधनों के उपयोग से रेल लाइनों का विद्युतीकरण हुआ है। यह देखने वाली बात होगी कि हाइड्रोजन अनुकूल ढांचा बनाने में कितना खर्च होगा? क्या हाइड्रोजन में कम ऊर्जा दक्षता होती है? क्या इसमें रूपांतरण के दौरान काफी ऊर्जा नष्ट हो जाती है? हाइड्रोजन संबंधी सुरक्षा और भंडारण को बहुत चौकसी से संभालना पड़ेगा। एक आशंका यह भी जताई जा रही है कि व्यावसायिक हाइड्रोजन के निर्माण में भी जीवाष्म ईंधन का इस्तेमाल होने लगा है। अत: भारत में ऐसी अनेक सावधानियां हैं, जिन्हें सुनिश्चित करते हुए आगे बढ़ना होगा। वैज्ञानिकों को सचेत रहना होगा। लोग हाइड्रोजन रेल की ओर उम्मीद से देख रहे हैं कि यह ऊर्जा हर तरह से हरित हो, निर्दोष हो और परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से पर्यावरण पर प्रहार न करे।