16-09-2026 (Important News Clippings)

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16 Sep 2026
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Date: 16-09-26

Worldly Wise to Pick Up Languages Early

ET Editorials

Amit Shah is right about language being a fundamental way by which we understand a country, especially the cultural-geogra­phic region one lives in. A child raised speaking, hearing, read­ing and writing, say, Gujarati, encounters a slightly different India from one raised in Tamil, Marathi, Malayalam or Punjabi. Words arrive carrying luggage. They contain information, jok­es, hierarchies, affections, insults, histories and social arrangements. The Bengali ‘adda’, Hindi ‘jugaad’ and Tamil ‘anbu’ don’t merely label things but also illuminate various shades of Indian — indeed, human — experience. Which is why Shah’s argument for the ‘mother tongue’ — and for learning other Indian languages — should be extended beyond Indian languages.

If knowing Kannada can make an Assam­ese child’s India larger, knowing French, Arabic, Mandarin, Spanish or Japanese can make her world larger still. Translation provides the map, while language lets you walk the streets. The sensible educational ambition, therefore, should not be to replace English with Indian languages, or Indian languages with English, but to produce children who are promiscuously comfortable with several tongues. And start early.

Young children acquire languages with an enviable lack of ceremony: no terror of accents, adult mortification at getting a pronunciation or gender wrong, or baggage. They listen, imi­tate, blunder, proceed. By adolescence, language-learning too often becomes ‘homework’. By adulthood, a KRA. India’s multilingualism shouldn’t be treated as sombre duty but as collect­ing language skills. Have children hone their mother tongue. Then give them several stepmothers. The more languages they inhabit, the less foreign the world becomes, and the more they grow confident.


Date: 16-09-26

ट्रम्प याशी के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है एआई

संपादकीय

अमेरिकी एआई कंपनी एन्थ्रोपिक के मुखिया सहित कई अन्य एआई विशेषज्ञों ने कहा है कि जनेरेटिव एआई के विकास की रफ्तार पर अंकुश लगाया जाए। लेकिन चीनी राष्ट्रपति शी ने इसे हास्यास्पद बताया। उसी स्वर में ट्रम्प ने भी कहा कि यह दुष्प्रचार अमेरिकी एआई दौर को रोकने की साजिश है और इससे चीन को फायदा होगा। एन्थ्रोपिक प्रमुख ने तो इसे पूरी दुनिया के मानव-जीवन के लिए खतरा बताते हुए तत्काल इस पर कंट्रोल करने के उपाय तैयार करने पर जोर दिया था। टेक दिग्गज आल्टमैन ने भी इसका अनुमोदन किया था। दरअसल एन्थ्रोपिक के वैज्ञानिकों ने एक लैब जांच में पाया कि उसके एआई जनेरेटिव सवालों के जवाब तलाशने में एक नया स्पेस पैदा कर उसमें कुछ नए शब्द स्वतः गढ़ रहे हैं। यानी एआई अपना मालिक स्वयं बनने की क्षमता तैयार कर रहा है। जाहिर है अगर एआई को रचने वाली कंपनियां या उसके टेक दिग्गज यह कह रहे हैं तो गंभीरता और बढ़ जाती है। हमने देखा है कि वायरस के जेनेटिक म्यूटेशन पर शोध को खतरनाक और संहारक बनने से बचाने के लिए निगोया प्रोटोकॉल बना, फिर भी चीन के वुहान में गुप्त रूप से किए जा रहे शोध में एक वायरस लीक हो गया, जिसने कोरोना के नाम पर तबाही मचाई। परमाणु और जेनेटिक म्यूटेशन की तरह एआई के विकास को रोकना असंभव है, लेकिन इसके नियंत्रण के टूल्स अगर नहीं विकसित किए गए तो यह परमाणु बम से ज्यादा विध्वंसक होगा। फैसला किसी ट्रम्प या शी पर नहीं छोड़ा जा सकता।


Date: 16-09-26

4 विचारों से समझें कि हम पर्यावरण को लेकर कहां गलती कर रहे हैं

प्रो. चेतन सिंह सोलंकी, ( आईआईटी बॉम्बे में प्रोफेसर )

जलवायु परिवर्तन शायद मानवता द्वारा स्वयं के लिए पैदा की गई सबसे गंभीर समस्याओं में से एक है। तापमान बढ़ रहा है, बारिश का स्वरूप बदल रहा है और प्राकृतिक आपदाओं के कारण दुनिया भर में नुकसान बढ़ता जा रहा है। सरकारें इससे जूझने के लिए नीतियां तो बना रही हैं, उद्योग नई तकनीक विकसित कर रहे हैं, सौर ऊर्जा बढ़ रही है और पेड़ भी लगाए जा रहे हैं। फिर भी ग्लोबल वार्मिंग लगातार बढ़ रही है। हम कहां गलती कर रहे है? शायद हमें केवल अधिक समाधान नहीं, बल्कि समस्या की गहरी समझ की भी जरूरत है।

इस लेख में अलग-अलग समय और पृष्ठभूमि के 4 लोगों द्वारा दिए गए ये 4 विचार यह समझने में हमारी मदद कर सकते हैं कि हम कहां गलती कर रहे हैं और जलवायु सुधार की सही दिशा क्या हो सकती है।

सऊदी अरब के पूर्व तेल मंत्री शेख अहमद जकी यमानी ने कहा था, “पाषाण युग पत्थरों की कमी के कारण समाप्त नहीं हुआ था और तेल युग (पेट्रोल, डीजल, गैस का युग) भी दुनिया में तेल समाप्त होने से बहुत पहले खत्म हो जाएगा।’ जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में इसका अर्थ बहुत स्पष्ट है। हम कोयला, पेट्रोल और गैस के खत्म होने का इंतजार नहीं कर सकते। हमें उनका उपयोग इसलिए कम और अंततः बंद करना है, क्योंकि उन्हें जलाने से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड पृथ्वी को लगातार गर्म कर रही है।

तेल युग को कब समाप्त करना चाहिए, उसके लिए बराक ओबामा ने एक प्रसिद्ध कथन दिया था- “हम जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को महसूस करने वाली पहली पीढ़ी हैं और इसके बारे में कुछ कर सकने वाली आखिरी पीढ़ी।’ यानी जलवायु परिवर्तन अब आने वाली पीढ़ियों की समस्या नहीं है, हमें अभी, इसी समय, प्राथमिकता के साथ इस पर कार्रवाई करनी होगी।

लेकिन तेजी से कार्रवाई करना भी पर्याप्त नहीं होगा, यदि हमारी सोच वही बनी रहे, जिसने समस्या पैदा की है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था, “जिस चेतना के स्तर ने किसी समस्या को जन्म दिया है, उसी चेतना के स्तर से उस समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता।’ अधिक उत्पादन, अधिक उपभोग और लगातार आर्थिक वृद्धि को हमने प्रगति का आधार बनाया, जिसके कारण जलवायु परिवर्तन हुआ है। उनके अनुसार हम अधिक सौर ऊर्जा, अधिक इलेक्ट्रिक वाहन या नई तकनीक के सहारे इस समस्या को हल नहीं कर सकते। हमे अलग दिशा में सोचना पड़ेगा।

सही दिशा के लिए गांधी जी का एक प्रसिद्ध विचार शायद सबसे महत्वपूर्ण है, “पृथ्वी पर हर व्यक्ति की आवश्यकता पूरी करने के लिए पर्याप्त संसाधन हैं, लेकिन हर व्यक्ति के लालच के लिए नहीं।’ पृथ्वी सीमित है। उसकी जमीन, पानी, जंगल, खनिज सीमित हैं। इसलिए हमारा उपभोग भी सीमित होना चाहिए।

हमें जरूरत और लालच के अंतर को फिर से समझना होगा। बिजलीघर अपने लिए बिजली नहीं बनाते और कारखाने अपने लिए सामान नहीं बनाते। वे इसलिए बनाते हैं, क्योंकि हम भोजन, कपड़े, वाहन, मकान, मोबाइल, यात्रा और हजारों वस्तुओं व सेवाओं को खरीदते हैं और उसकी डिमांड करते है। चाहे गाड़ी हो, कपड़े हों, या लाइट या पंखा हो, हमारे हर उपभोग के पीछे प्रकृति को कुछ ना कुछ नुकसान होता है।

इन चार विचारों को साथ रखें तो जलवायु परिवर्तन का कारण और सुधार की दिशा स्पष्ट दिखाई देती है। जीवाश्म ईंधन से बाहर निकलें। अभी कार्रवाई करें। अपनी सोच बदलें। उपभोग सीमित करें। जीवन और व्यवस्थाओं को जहां संभव हो, छोटा, सरल और स्थानीय बनाएं।


Date: 16-09-26

यूपीआई पर फीस

संपादकीय

जिस समय महंगाई दर के आंकड़े मीडिया में सुर्खियां बटोर रहे हैं, उसी समय ‘यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस’ यानी यूपीआई लेन-देन से संबंधित अधिसूचना से देश के करोड़ों उपयोगकर्ताओं व छोटे कारोबारियों का चिंतित होना स्वाभाविक है। अभी तक किसी भी यूपीआई लेन-देन पर कोई फीस नहीं लगती थी। ऐसे में, उनकी चिंता निराधार नहीं कही जा सकती। हालांकि, सरकार ने 2,000 रुपये तक के यूपीआई लेन-देन पर किसी तरह की फीस-वसूली को प्रतिबंधित करके आम उपभोक्ताओं और छोटे कारोबारियों के हितों को संरक्षित करने का काम किया है। इसका सीधा सा मतलब है कि कोई भी बैंक या पेटीएम, फोनपे, गूगलपे जैसी सेवा प्रदाता कंपनियां घोषित सीमा तक के लेन-देन पर कोई चार्ज नहीं लगा सकेंगी। अलबत्ता, यह सवाल ज्यादा मौजूं हो गया था कि 2,000 रुपये से अधिक के लेन-देन पर सरकार कितनी फीस वसूल करेगी? नेशनल पेमेंट्स कौंसिल ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) ने देर शाम यह स्पष्ट कर दिया कि 15 अक्तूबर से कुछ कारोबारी लेन-देन पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर लगाया जाएगा।

डिजिटल भारत की कामयाबी की मुनादी में यूपीआई सिस्टम सबसे अग्रणी रहा है। इसकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि रोजाना 66 करोड़ से अधिक यूपीआई लेन-देन हो रहे हैं। भारत जैसे विशाल देश में इसकी सफलता को देखते हुए ही कई देशों ने इसे अपने यहां अपनाया है। ऐसे में, इसकी शुरुआत के एक दशक बाद अब सरकार ने इससे कुछ आमदनी कमाने के बारे में सोचा हो, तो आश्चर्य की बात नहीं। पिछले दिनों केंद्रीय वित्त मंत्री ने संसद में संकेत किया भी था कि अगर भविष्य में एमडीआर (मर्चेंट डिस्काउंट रेट) सिस्टम लागू हुआ, तो वह सिर्फ बड़े लेन-देन पर आंशिक रूप में लागू होगा, इससे आम लोगों के आपसी लेन-देन प्रभावित नहीं होंगे। सरकार ने देश में डिजिटल बुनियादी ढांचे की मजबूती के लिए इन बदलावों की उपयोगिता बताई है। निस्संदेह, सरकार अपनी जगह सही है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि यूपीआई जैसे डिजिटल माध्यमों को अचूक बनाने की जरूरत है। जिस बड़े पैमाने पर इसका इस्तेमाल होने लगा है, साइबर जालसाजी की घटनाएं भी बढ़ने लगी हैं। इसलिए इसकी सुरक्षा में निवेश की दरकार है।

दूसरी ओर, विपक्ष इसे अमेरिकी दबाव की परिणति बताने में जुट गया है। देश की अनेक विपक्षी पार्टियों और लोकसभा में नेता, प्रतिपक्ष ने इसे राष्ट्रपति ट्रंप को खुश करने के इरादे से उठाया गया कदम बताया है। यूपीआई की सफलता से अमेरिकी भुगतान नेटवर्क की ईर्ष्या जगजाहिर है। ऐसे में, कोई दोराय नहीं कि आने वाले दिनों में इस मसले पर राजनीतिक बयानबाजी बढ़ेगी। सरकार के लिए चुनौती दोहरी है। एक तरफ, उसे विपक्ष के राजनीतिक हमलों का जवाब देना होगा, तो दूसरी ओर इस बात की भी निगरानी रखनी होगी कि एमडीआर का भार आम यूपीआई उपयोगकर्ताओं पर न पड़े। हमारे देश में कारोबारी घरानों की जो स्थिति है, उसमें कोई भोला ही यकीन करेगा कि कारोबारी इसका भार अपने ऊपर लेंगे। किसी भी किस्म के आर्थिक बोझ को वे जनता के कंधों पर डालने में सिद्धहस्त हैं। अब जब सरकार ने एमडीआर लागू करने की घोषणा कर दी है, तो उसे जनता को संतुष्ट करना होगा कि उसकी जेब सुरक्षित है। सियासत अपनी जगह, मगर देश के वित्तीय ढांचे में अगर किसी दीर्घकालिक बदलाव की शुरुआत होती है, तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए।