15-11-2022 (Important News Clippings)

15 Nov 2022
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Making G20 Relevant

The body works best when best when it makes an enabling global economic environment its focus. India should take note.

TOI Editorials

The ongoing G20 leaders’ summit in Bali is of special significance to India. Tomorrow, Indonesian President Joko Widodo will formally ask India to take over G20 presidency. From next month, India will officially assume the presidency, host next year’s G20 meetings and most importantly set the agenda for the next annual leaders’ summit. G20 is a unique global body. Comprising 19 countries and the EU, it represents 85% of global GDP and 66% of the world’s population. In terms of composition, it’s well represented.

Formed in 1999 in the wake of the Asian financial crisis, it got its heft in 2008 when the G20 leaders’ summit was added in the midst of the challenges posed by the global financial crisis. Designed to be a flexible body, without a permanent secretariat, decisions are based on consensus. It was most effective in 2008 and 2009, when coordination in policymaking mitigated the economic fallout of the financial crisis and also laid the platform for subsequent agreements on sharing tax data to curb tax evasion. Since then, the core goal of improving the economic policy environment has expanded to tackling climate change and terrorism, among other things. But recent results are disappointing.

India has the opportunity to get the G20 back on track. It’s far too important a platform to be allowed to sink into irrelevance like some other global governance bodies with a permanent secretariat. Framing an appropriate agenda that can be realised through concrete measures will bring back the spirit of 2008-09. Given the last decade’s failures with an ever-expanding agenda, it’s best to stick to the founding aim of creating a more positive environment for the global economy.

The long-term implications of the strategic rivalry between US and China, and the events since 2020 have cast a shadow on global trade. Dismantling protectionism was perhaps the single most important reason that more than 1 billion people globally escaped extreme poverty in the three decades before Covid. India’s G20 presidency can contribute to preserving those gains and finding a way to build on it. An agenda that revolves around preserving an enabling environment for world trade is more likely to meet with success than one with issues where solutions require painstaking negotiations over years. A unique feature of G20 is the rotating presidency. This is India’s moment – and it must make something substantive of it.


Sustain Development, Develop Sustainability

ET Editorials

India’s long-term low-emission development strategy (LTLeds), released at COP27 on Monday, provides a glimpse into how it proposes to transform its economy. For low-middle income countries such as India, the shift away from carbon-intensive, high-emission choices presents a series of complex options. India’s emissions are rising and will do so as it develops. LT-Leds sets out India’s plan to conduct this tricky, but possible, balancing act.

According to the Global Carbon Budget, India accounted for 7% of global CO 2emissions in 2021, with China at 31%, the US 14% and the EU 8%. The projections for 2022 show that while the EU’s emissions will reduce by 0. 8%, India’s will increase by 6%, and the US’ by 1. 5%, while China’s will decrease by 0. 9%. Much of India’s increased emissions will be on account of its coal use. While LT-Leds does not provide any clarity on India’s emissions trajectory or timelines, it details the options being pursued — green hydrogen expansion, increase in nuclear capacity, acceleration of renewable energy deployment and use of biofuels. LTLeds deep-dives into other contributing sectors such as transport, industry, urbanisation and India’s efforts to bend its emissions trajectory towards zero in these sectors. In this context, it focuses on forestry, carbon removal options and adapting to the impacts of climate change.

India is one of the most vulnerable countries to climate change. So, a shift away from carbon-intensity is in its interest. However, it will require support. In 2019-20, green finance was $44 billion against an annual requirement of $170 billion a year. More than 80% of the funds are from domestic sources. Financial flows into India must increase for it to accelerate its transition.


समान नागरिक संहिता पर प्रगतिशील सोच रखें


नैसर्गिक नियमों को छोड़कर कोई भी कानून समय स्थिति के सापेक्ष होता है। एक काल में किसी समाज के लिए कोई कानून अच्छा और उपादेय हो सकता है। गुलाम परंपरा, नस्ल भेद एक समय में कई समाजों में उचित माने जाते थे। पर ऐसी सोच से जुगुप्सा होती है। कई बार विधायिकाएं ऐसे कानून बनाने की जरूरत समझने में असफल रहती हैं तो कई बार समाज रूढ़िवादिता से बाहर नहीं निकल पाता। प्राणियों से प्रेम, करुणा और सबको विकास के लिए उन्मुक्त वातावरण देना नैसर्गिक कानून हैं। धर्म की भी सीमा केवल नैसर्गिक कानून तक ही सीमित रहनी चाहिए। ऐसे में समान नागरिक संहिता आधुनिक समाज की एक बड़ी जरूरत है। हजारों साल पहले समाज की सोच और आज की समझ में अंतर है, लिहाजा शादी-ब्याह या विरासत के मुद्दे इसी नई समझ के मुताबिक तय होने चाहिए। समान नागरिक संहिता लाने का उपक्रम हो रहा है। विधि आयोग अगले 100 दिनों में एक रिपोर्ट सरकार को सौंपेगा, जिसके बाद लोगों की प्रतिक्रिया ली जाएगी। कुल मिलाकर लंबे समय से विवाद में रहा यह मुद्दा कानून बनने की दहलीज पर है। अपराध के मामले में गणतंत्र बनने के पहले से ही समान न्याय व्यवस्था है। समान नागरिक संहिता को संविधान निर्माताओं के नीति निर्देशक तत्व वाले खंड में अनुच्छेद 44 के रूप में रखते हुए राज्य को दायित्व दिया गया था समय और स्थिति के साथ इसे अमल में लाने की कोशिश की जाए। इस खंड में रखने की वजह से न्यायपालिका इसे अमल में लाने के लिए सरकार को बाध्य नहीं कर सकती थी। अनुच्छेद 25 (2) में धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार को पुनर्परिभाषित करते हुए इसे नैसर्गिक कानूनों क सीमित रखा जाना चाहिए। संविधान सभा में केएम मुंशी ने मुस्लिम देश तुर्की और मिस्र का उदाहरण दिया था।


साइबरक्राइम का नया रूप है ओटीपी से हो रही धोखाधड़ी

मकरंद परांजपे, ( लेखक, चिंतक, जेएनयू में प्राध्यापक )

अगर किसी देश का नाम एक घपले के साथ जोड़ा जा चुका है तो यह नाईजीरियन 419 स्कैम कहलाया था, जो नाईजीरियन पेनल कोड की धारा 419 पर आधारित था। यह आईपीसी की धारा 420 से मिलती-जुलती है, जो धोखाधड़ी के मामलों पर लगती है। इसके तहत किसी व्यक्ति को बड़े फायदे का लालच देकर बदले में उससे थोड़ी-सी राशि उगली जाती है। यह धोखाधड़ी ईमेल, फोन नम्बर, सोशल मीडिया अकाउंट्स के माध्यम से होती है। इसका एक उदाहरण तब देखा गया था, जब एक शख्सियत को हार्वर्ड से फर्जी नौकरी का प्रस्ताव मिला था।

मैं भी इसका शिकार बनते-बनते रह गया। लेकिन नाईजीरियन 419 के कारण नहीं, बल्कि देशी इंडियन ओटीपी स्कैम के कारण, जो इन दिनों बहुत फैल रहा है। मेरे एक वरिष्ठ नागरिक मित्र चाहते थे कि मैं उन्हें कुछ खरीदकर दूं। उन्हें एक ऑनलाइन प्रस्ताव मिला था। मैंने कहा यह धोखाधड़ी का मामला हो सकता है। फिर भी मैंने प्रस्ताव देने वाले व्यक्ति को फोन लगाया। उसने कहा कि वह मेरे मित्र से काफी समय से बात कर रहा है और पैसा मिलने के बाद उनके घर पर सामान भिजवा देगा। मूल्य ज्यादा नहीं था, इसलिए मैंने कहा कि भुगतान कैसे होगा? उसने कहा, आप मुझे ओटीपी बता देना। क्रेडिट कार्ड डिटेल्स और सीवीवी लेने के बाद उसने मुझे एक ओटीपी भेजा, जो मैंने उसे बताया। तुरंत कुछ पैसा कट गया। तब उसने कहा कि सर, मैं जीएसटी जोड़ना भूल गया, क्या आप 100 रुपए का और भुगतान करेंगे? जब मुझे नया ओटीपी आया तो मैंने ध्यान से पढ़ा। वह 1 लाख 85 हजार रुपयों के भुगतान के लिए था। मैंने तुरंत कार्ड को ब्लॉक करवाया। मेरा ज्यादा नुकसान नहीं हुआ, लेकिन बैंक को कॉल करके कार्ड ब्लॉक करवाने और नया कार्ड लेने में मुझे खासी मशक्कत करनी पड़ी।

अगस्त में संसद में एक सवाल का जवाब देते हुए वित्त राज्यमंत्री भागवत कराड़ ने कहा था कि 1 अप्रैल 2020 से 31 मार्च 2022 तक भारत में फिशिंग, विशिंग, स्विशिंग और ओटीपी स्कैम के 9 लाख मामले दर्ज किए जा चुके हैं और इसमें 1500 करोड़ रुपयों का नुकसान हो चुका है। मुम्बई स्थित मेरे एक दोस्त के पिता से तो ऐसे ही किसी ओटीपी स्कैमर के द्वारा 8 लाख रुपए लूट लिए गए। उस मामले में डेबिट कार्ड के जरिए धोखाधड़ी हुई। एक बार पैसा बैंक से निकल जाए तो उसे वापस पाना नामुमकिन हो जाता है। तब तक मुझे नहीं पता था कि नेटफ्लिक्स पर ओटीपी-स्कैम पर केंद्रित एक सीरिज दिखाई जा रही है- जमतारा। यह झारखंड के एक जिले का नाम है, जो इस तरह के फरेब के लिए बदनाम है। सीरिज का सबटाइटिल है- सबका नम्बर आएगा। अब कोलकाता का एक एरिया इसका गढ़ बना है। बड़े पैमाने पर ठगी के कारण भारत को साइबरक्राइम के अड्‌डे के रूप में देखा जाने लगा है। तो क्या नाइजीरिया की तरह भारत के साथ भी ओटीपी फरेब का नाम जुड़ेगा?

फिशिंग अटैक में क्रेडिट कार्ड डिटेल्स, पासवर्ड आदि मांगे जाते हैं। विशिंग अटैक में कोई व्यक्ति बैंकर, आयकर अधिकारी या कम्पनी का कर्मचारी बनकर आपसे बात करता है। स्मिशिंग मुख्यतया एसएमएस फ्रॉड होता है, जिसमें आपसे ओटीपी पूछा जाता है। इनमें से कुछ फरेबी आपसे किसी लिंक को क्लिक करने या एप्प डाउनलोड करने को कहते हैं। कुछ अन्य आपके ईमेल अकाउंट या ब्राउजर को हैक कर लेते हैं। पकड़े जाने पर इन ठगों के पास से सैकड़ों सिम कार्ड बरामद होते हैं और उनके अनेक ईमेल आईडी, फेक आधार इत्यादि अकाउंट होते हैं। क्या सिम लेने और बैंक खाते बनाने की प्रक्रिया को कड़ा नहीं किया जा सकता? सरकारी एजेंसियां ऐसी ठगी के बारे में जानती हैं, लेकिन इन्हें रोकने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं हुए हैं। साइबरक्राइम का पता लगाकर उस पर मुकदमा चलाना मुश्किल होता है और इसमें अपराधी भी सजा पाने से बच सकता है। जब केंद्र में राजीव चंद्रशेखर और अश्विनी वैष्णव जैसे टेक्नो-सैवी मंत्री बैठे हैं और खुद प्रधानमंत्री तकनीकी-प्रेमी हैं तो धोखाधड़ियों की नकेल कसने के प्रयास क्यों नहीं किए जा सकते?


राष्ट्रघाती मतांतरण


सुप्रीम कोर्ट ने छल-बल और लोभ-लालच से कराए जाने वाले मतांतरण को बहुत गंभीर बताते हुए केंद्र सरकार से इस पर रोक लगाने का जो निर्देश दिया, उस पर उसे तत्काल प्रभाव से सक्रिय होना चाहिए। इस सक्रियता के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर मतांतरण रोधी कोई प्रभावी कानून भी सामने आना चाहिए। इससे संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि कुछ राज्य सरकारों ने प्रलोभन देकर कराए जाने वाले मतांतरण को रोकने के लिए कानून बना रखे हैं, क्योंकि ये कानून उन संगठनों को हतोत्साहित करने में समर्थ नहीं, जो मतांतरण अभियान में लिप्त हैं। ऐसे कानूनों के बाद भी मतांतरण कराने वालों के दुस्साहस का दमन होता नहीं दिख रहा है। देश के उन क्षेत्रों में जहां अनुसूचित जाति-जनजाति समुदाय की संख्या अधिक है, वहां ईसाई मिशनरियों की सक्रियता किसी से छिपी नहीं। ईसाई मिशनरियों जैसा तौर-तरीका कई इस्लामी संगठनों ने भी अपना रखा है। वे दीन की दावत देने के नाम पर लोगों को बहलाने-फुसलाने का ही काम करते हैं। मतांतरण के लिए वे लोगों को प्रलोभन भी देते हैं। मतांतरण में लिप्त तत्वों के निशाने पर आम तौर पर निर्धन लोग होते हैं, जिनकी विवशता का लाभ उठाना कहीं आसान होता है। यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि अपने मत-मजहब के प्रचार की स्वतंत्रता का अनुचित लाभ उठाया जा रहा है। मत-मजहब के प्रचार की स्वतंत्रता के नाम पर लोगों को बरगलाने का अधिकार किसी को भी नहीं दिया जा सकता। केंद्र सरकार इससे अनभिज्ञ नहीं हो सकती कि कुछ ईसाई संगठन किस तरह भगवा वस्त्र धारण कर गरीब आदिवासियों और दलितों को बरगलाने का काम करते हैं।

छल-छद्म से कराए जाने वाले मतांतरण पर अंकुश लगाना इसलिए आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है, क्योंकि जब देश के किसी क्षेत्र का सामाजिक ताना-बाना बदलता है तो वहां राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौतियां पैदा हो जाती हैं। वास्तव में इसी कारण सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा कि यदि छल-कपट से होने वाले मतांतरण को नहीं रोका गया तो बहुत मुश्किल स्थिति पैदा होगी। ऐसी स्थिति देश के कुछ हिस्सों में पैदा भी हो गई है। इस मुश्किल स्थिति का सामना सरकार के साथ समाज को भी करना होगा, क्योंकि मतांतरण एक तरह से राष्ट्रांतरण की खतरनाक प्रक्रिया है। मतांतरण के माध्यम से समाज के सांस्कृतिक चरित्र को बदलने की जो कोशिश हो रही है, वह राष्ट्रघाती है। केंद्र सरकार यह कहकर कर्तव्य की इतिश्री नहीं कर सकती कि उसने मतांतरण में लिप्त संगठनों पर अंकुश लगाने के लिए विदेश से चंदा लेने संबंधी नियम-कानूनों में परिवर्तन किया है, क्योंकि तथ्य यही है कि इन नियम-कानूनों से बच निकलने की कोई न कोई जुगत भिड़ा ली जाती है। विदेश से चंदा लेने के नियम-कानून वैसे ही होने चाहिए, जैसे आतंकी फंडिंग पर लगाम लगाने के लिए बनाए जा रहे हैं।


‘राष्ट्र हित’ की पहेली


सरकार ने कहा है कि देश में सैटेलाइट चैनलों की अपलिंकिंग और डाउनलिंकिंग से जुड़े उसके नए दिशानिर्देश जिन्हें 11 वर्ष के बाद संशो​धित किया गया है, उनके जरिये लाइसेंस धारकों के लिए ‘अनुपालन की सहजता’ और ‘कारोबारी सुगमता’ में इजाफा हुआ है। उदाहरण के लिए नए दिशानिर्देशों में आयोजनों के सीधे प्रसारण के लिए पूर्व अनुमति की आवश्यकता को समाप्त किया गया है हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि सरकार का ‘आयोजनों के पूर्व पंजीयन’ से क्या तात्पर्य है। सरकार ने कुछ अन्य पूर्व अनुमतियों की आवश्यकता को समाप्त किया है तथा कुछ मंजूरियों के लिए जरूरी अव​धि को बढ़ाया है।

परंतु ये तमाम लाभ उस अनिवार्यता के समक्ष फीके पड़ जाएंगे जिसमें कहा गया है कि सभी चैनलों को रोज 30 मिनट तक ‘राष्ट्रीय महत्त्व और सामाजिक प्रासंगिकता की थीम’ पर सामग्री प्रसारित करनी होगी। मदद के रूप में इन दिशानिर्देशों में आठ ऐसी थीम भी तय की गई हैं जिन पर आधारित कार्यक्रम ये सैटेलाइट चैनल प्रसारित कर सकते हैं। इन विषयों में ​शिक्षा, स्वास्थ्य, कृ​​​षि, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, महिला कल्याण, पर्यावरण, समाज के कमजोर वर्गों का संरक्षण आदि शामिल हैं। इनमें से अंतिम थीम है: ‘राष्ट्रीय एकीकरण’ जिसे संक्षेप में समझा पाना मु​श्किल है। सरकारी नोट में स्पष्ट किया गया है कि यह व्यवस्था इसलिए की जा रही है कि ये तरंगें एवं आवृ​त्तियां सार्वजनिक संप​त्ति हैं और इनका इस्तेमाल समाज के हित में किया जाना चाहिए। इस संदर्भ में कई प्रश्न उत्पन्न होते हैं।

सबसे पहले तो ‘सार्वजनिक संप​त्ति’ की अवधारणा ही दिक्कतदेह है। हालांकि सरकार की दलील इस मायने में सही हो सकती है कि ये संसाधन सैद्धांतिक तौर पर देश के लोगों की संपत्ति हैं लेकिन तथ्य यही है कि इन तक पहुंच नि:शुल्क नहीं है। प्रसारक सीधे प्रसारण के लिए लाइसेंस शुल्क के साथ प्रोसेसिंग शुल्क चुकाते हैं जो उस अव​धि का स्वामित्व उन्हें सौंप देता है और इस प्रकार उन्हें एक हद तक स्वायत्तता मिलती है। इसके अलावा यह भी स्पष्ट नहीं है कि आ​खिर निजी प्रसारक (केवल खेल प्रसारकों को छूट है) हर रोज आधे घंटे का राजस्व ‘राष्ट्रीय महत्त्व की थीम’ को कवर करने में क्यों गंवाएं जबकि यह काम करने के लिए सरकार के पास खुद एक बड़ा प्रसारक है। सरकार के पास दूरदर्शन तो है ही, साथ ही क्षेत्रीय चैनल भी हैं जो लगभग पूरे देश में अपना प्रसारण करते हैं। ऐसे में अगर सरकार को लगता है कि उसे स्वास्थ्य, ​शिक्षा आदि जैसे सामाजिक विषयों पर संदेश प्रसारित करने की आवश्यकता है तो उसके पास निजी चैनलों की तुलना में बेहतर नेटवर्क मौजूद हैं।

इस लिहाज से देखें तो इस बात को समझना मु​श्किल नहीं है कि सरकार निजी प्रसारकों की प्रसारण सामग्री पर अपना दबदबा और अ​धिक बढ़ाने का इरादा रखती है। यह बात इस तथ्य से भी स्पष्ट है कि सरकार ने कहा है कि वह चैनलों की निगरानी करेगी ताकि यह सुनि​श्चित किया जा सके कि वे उक्त सामग्री का प्रसारण कर रहे हैं अथवा नहीं। यदि अनुपालन नहीं किया जाता है तो चैनलों को स्पष्टीकरण देना होगा और बार-बार अवहेलना करने वालों के ​खिलाफ कदम उठाए जाएंगे। एक तथ्य यह भी है कि इस दौरान करीब 800 चैनलों की निगरानी करनी होगी। इससे पता चलता है कि निगरानी के दौरान चुनिंदा ढंग से ही काम करना होगा। बहरहाल सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि ये दिशानिर्देश अस्पष्ट हैं और इनकी कई तरह से व्याख्या की जा सकती है क्योंकि ‘राष्ट्रीय महत्त्व और सामाजिक दृ​ष्टि से प्रासंगिक’ तथा ‘राष्ट्रीय हित’ को तो सभी अपने-अपने ढंग से परिभा​षित कर सकते हैं। एक प्रावधान यह भी है कि सरकार समय-समय पर चैनलों को मशविरा दे सकती है कि वे राष्ट्रीय हित की सामग्री प्रसारित करें। इन अनुशंसाओं के साथ यह भी कहा गया है कि चैनलों को इसका अनुपालन करना चाहिए। इन बातों के बीच लगता नहीं कि चैनलों के लिए परिचालन परि​स्थितियां आसान होने वाली हैं।


आत्मनिर्भर होती जनजातियां

जी. किशन रेड्डी, ( लेखक केंद्रीय संस्कृति‚पर्यटन एवं पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्री हैं )

देश की समृद्ध संस्कृति की ध्वजा वाहक भारत की जनजातियां अपनी सभ्यता और विरासत की जड़ों को सहस्त्रों सदियों से रसातल से सींचती आई हैं। ‘निसर्ग का शोषण नहीं दोहन’ के मूल मंत्र को आत्मसात कर‚ निसर्ग तंत्र से अपना जीवन यापन करने वाले अत्यंत सीधे–साधे जनजाति लोग भारतीय विचार को अनवरत उन्नत करने में लगे हैं। जनजातीय समाज का प्रकृति की गोद में सहज ढंग से जन्म से मरण तक का संबंध और तारतम्य इतना गहरा है कि दोनों को अलग करके नहीं देखा जा सकता। जनजातीय समाज इस आधुनिक दिखावे के युग में और भौतिक विकास में बेशक पिछड़ गया लगता हो‚ लेकिन देश की उन्नति में जनजातियों का योगदान अतुलनीय है। स्वतंत्रता संग्राम में भी जनजाति समाज के हजारों क्रांतिकारियों ने अपना बलिदान दिया है।

15 नवम्बर 1857 को जनजातीय समाज में जन्में बिरसा मुंडा ने 24 दिसम्बर 1899 को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संग्राम का बिगुल फूंका। यह उन्होंने तब किया जब वो मात्र 19 वर्ष के थे और उस दौर में अंग्रेजों के सामने किसी की बोलने की हिम्मत नहीं होती थी। उस समय भगवान बिरसा मुंडा ब्रिटिश शासन से पूरी बहादुरी के साथ लड़े। एक वर्ष तक उन्हें यातनाएं सहनी पड़ी और अंततः जेल में ही उनका बलिदान हो गया। स्व–धर्म‚ स्व–शिक्षा और स्व–देश का नारा बुलंद करते हुए‚ भगवान बिरसा मुंडा ने मिशनिरयों द्वारा बिरसा से डेविड बनाए गए समाज को पुनः बिरसा बनाने का ऐतिहासिक कार्य किया। यह कोई सामान्य बात नहीं है कि25 वर्ष की आयु में एक गरीब परिवार में जन्में बिरसा मुंडा ने अपने कर्मों के आधार पर भगवान का दर्जा प्राप्त किया और उनका जीवन सैकड़ों वर्ष के बाद भी हमें प्रेरित कर रहा है।

उनके नेतृत्व के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए‚ विगत वर्ष आजादी के अमृत महोत्सव में जनजातीय क्रांतिकारियों के योगदान को याद करते हुए भगवान बिरसा मुंडा की जयंती को ‘राष्ट्रीय जनजाति गौरव दिवस’ (15 नवम्बर) के रूप में घोषित करके प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उनके अमर बलिदान को सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित की। नरेन्द्र मोदी का यह निर्णय न सिर्फ जनजाति समाज बल्कि देश की 135 करोड़ जनता के लिए गौरव का विषय है। जनजातीय समाज का इतिहास राम‚ रामायण और महाभारत काल से रहा है। वानर‚ राजा निषादराज‚ केवट‚ सबरी और माता भीलनी के उदाहरण हम सबके सामने हैं। महाभारत में भी ऐसा वर्णन आता है कि पूर्वोत्तर में कुंती पुत्र अर्जुन की यात्रा के दौरान उनका सामना नागा जनजाति की राजकुमारी उलूपी से हुआ‚ जिससे उन्होंने शादी की और उन्हे एक बेटा हुआ–इरावन। विश्व के सुप्रसिद्ध जगन्नाथ पुरी मंदिर का इतिहास इस बात का साक्षी है कि भगवान जगन्नाथ की मूÌत जनजातीय समाज के महान राजा विश्वासु भील को ही प्राप्त हुई थी। आज जब दुनिया विकास और आधुनिकता की अंधी दौड़ में अपनी संस्कृति‚ सभ्यता और विरासत को भूलती जा रही है‚ वहीं जनजातीय समाज आज भी अपनी परम्पराओं‚ रीति–रिवाजों और जीवन मूल्यों का सतत पालन कर रहा है। जनजाति समाज आज भी अपने उत्सवों को अपनी ही वेश–भूषा में मनाता है। जल‚ जंगल और जमीन के सबसे बड़े संरक्षक जनजातीय समाज में आज भी यदि कोई विवाह उत्सव होता है‚ तो जनजातीय समाज उसके लिए भी नदी और तालाब से हाथ जोड़कर विनती करते हुए अधिक पानी उपयोग की अनुमति लेता है।

यह कहना उचित होगा कि आज जब विश्व जलवायु परिवर्तन जैसी भयावह समस्या से जूझ रहा है‚ तब जनजाति जीवन दर्शन हमें समाधान का मार्ग दे सकता है। निश्चित रूप से आज आधुनिक समाज में रहने वाले लोगों के लिए जनजातीय समाज एक शोध का विषय है। स्वयं पर गर्व करना‚ अपनी परंपराओं और संस्कृति पर गर्व करने का संदेश जनजातीय समाज सदैव देता रहा है। जनजातीय समाज अपनी कला‚ कौशल और कृति के आधार पर पुरातन काल से ही एक आत्मनिर्भर समाज रहा है। उनकी आत्मनिर्भरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जनजातीय समाज द्वारा इतिहास में बड़ी–बड़ी लड़ाइयों को भी स्वनिर्मित हथियारों (तीर‚ धनुष‚ दंड‚ भाला‚ पत्थर के नुकीले हथियारों) से ही लड़ा है। इसी परिप्रेक्ष्य में आचार्य चाणक्य ने सम्राटों से कहा था कि ‘आप वन्य क्षेत्र में बसे हुए योद्धाओं के साथ युद्ध का प्रयास न करें‚ इससे आपके राज्य को और आपकी सेना को भारी नुकसान का सामना करना पड़ सकता है’।

जनजातीय समाज के लोगों के पास आत्मविश्वास और प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। पिछली सरकारों में दुर्भाग्य यह रहा कि जनजातीय समाज को वो हक नहीं मिला‚ जिसके वो हकदार थे। मगर विगत 8 वर्षों से प्रधानमंत्री मोदी ‘सबका साथ–सबका विकास’ और ‘एक भारत–श्रेष्ठ भारत’ की मूल भावना से देश का नेतृत्व कर रहे हैं। इसी का परिणाम है कि जिस जनजातीय समाज को हमेशा हास्य पर रखा गया‚ उसे आज मुख्यधारा में जोड़कर विकास में भागीदारी बनाया जा रहा है। देश में रिवाज बदल रहा है‚ जो देश के सर्वोच्च सम्मान (पदम श्री‚ पदम भूषण‚ पदम विभूषण) गिने–चुने लोगों को या उनके ही परिवार को मिलते थे‚ आज देश के सैकड़ों आदिवासी लोगों को राष्ट्र निर्माण में उनके योगदान के प्रति वही सम्मान खोज–खोज कर दिया जा रहा है।

2014 में जनजातीय मंत्रालय ने अपने बजट में 3800 करोड़ों रु पये खर्च किए‚ मगर 8 वर्षों में वह बजट 8‚451 करोड़ रु पये हुआ है। आदिवासी बच्चों की बेहतर शिक्षा के लिए केंद्र सरकार 750 ‘एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों’ का निर्माण कर रही है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान लगभग 85 क्रांतियों में भाग लेने वाले जनजातीय स्वतंत्रता सेनानियों को पहचान दिलाते हुए‚ भारत सरकार देश भर में 10 जनजातीय संग्रहालयों का निर्माण कर रही है। विभिन्न कृषि केंद्रीय क्षेत्र की योजनाएं‚ जैसे राष्ट्रीय बेम्बू मिशन‚ राष्ट्रीय मधुमक्खी पालन और शहद मिशन से आदिवासी आबादी को लाभ हो रहा है। स्वयं सहायत समूह में मिलकर आज जनजातीय समाज की अनेक महिलाएं आत्मनिर्भर बनने की दिशा में काम कर रही हैं‚ और भी अनेक योजनाओं के साथ नरेन्द्र मोदी सरकार जनजातीय समाज के उत्थान के लिए संकल्पबद्ध है।


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