30-09-2022 (Important News Clippings)

30 Sep 2022
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Well Done, SC

Parliament must measure up to court seeking to reform laws on marital rape and divorce.

TOI Editorials

Parliament must follow up on Supreme Court’s dissection of bad laws and pass better laws. When both Houses passed the Medical Termination of Pregnancy Act last year, MPs rightly made no distinction between married and unmarried women and substituted the word “husband” in the earlier Act with “partner”. But the MTP Act’s rules seemed to miss the point. They had the effect of excluding unmarried women among the seven categories of women with a right to have an abortion for pregnancies between 20-24 weeks. SC fixed this “oversight”. But much more important, the court in effect called into question IPC’s marital rape exception. Marking a huge shift in judicial thought, SC ruled that the category of “survivors of sexual assault or rape or incest” eligible for abortion includes married women subjected to sexual assault by husbands.

“We would be remiss in not recognising that intimate partner violence is the reality and can take the form of rape,” SC noted.

Ignoring marital rape in the MTP Act essentially meant compelling a woman to give birth even if she’s a victim of rape – an unconscionable legal position and one that’s now struck down. IPC’s marital rape exception is also before SC, and hopefully, after years of judicial prevarication and executive inaction and/or unwillingness this provision will soon become history. But the point is Parliament could have changed the law.

Both Houses should also see what SC has said about India’s divorce law. Divorces shouldn’t have to travel beyond district-level family courts. But many divorce cases end up in SC because the court’s powers under Article 142 to render “complete justice” is the only recourse available for those facing a legal vacuum when the ground is irretrievable breakdown of marriage. On Wednesday, SC pointed out that Indian divorce laws compel couples to show each other’s faults. Many countries have moved towards no-fault divorces. The Marriage Laws (Amendment) Bill Rajya Sabha passed in 2013 recognised irretrievable breakdown. That bill needs more work, including working in provisions of no-fault divorce. Or take the 1954 Special Marriage Act, which needs serious amending. The 30-day public notice of intended marriage is an absurd provision that infringes privacy. Parliament must proactively modernise these laws. MPs across party lines should champion them. If there’s cross-party support, these amended laws will pass. Just as Parliament replaced SC’s Vishaka guidelines with the POSH Act.


New Delhi Needs to Call Out Moscow

ET Editorials

New Delhi will need to work out where it stands on Moscow’s sham referenda in four regions of Ukraine. So far, India has been able to, with minor hiccups, avoid taking sides. In Samarkand, Prime Minister Narendra Modi told Vladimir Putin that this is not an era of war but of sovereign nations working together to address existential challenges. Moscow’s referendum does little to end the war and start the talking. India is no stranger to illegal occupation of territory thanks to Pakistan and China. Despite this, India tacitly supported Russia’s ‘annexation’ of Crimea in March 2014.

Much has changed since in India’s foreign policy. New Delhi’s engagement with the US, Japan, France, Germany, the EU and others has deepened. India has stronger ties with G7 and is now part of the Quad. China has also grown as an aggressive, expansionist power that seeks to dominate open societies like India. Then there is the broader geopolitics — the growing partnership between Russia, China and Pakistan. The Ukraine war has strengthened the Russia-China links with Moscow as a junior partner.

India has been doing a juggling act, managing its interests, and acting as a pivotal bridge. It will now need to reassess its interests. A recalibration is already evident in India’s vote at the UN Security Council in Ukraine’s favour, and Modi’s frank ‘this is not the era of war’ to a warmonger. India has reiterated its commitment to a rules-based world order and sovereignty of nations. This precludes India from abstaining and not calling out Russia’s clear infringement. New Delhi will have to take a decision. Will it run out the clock? Or will it do what great powers do — consider trade-offs and take a position. In this case, against Russian referenda in Ukraine.


मानव विकास सूचकांक का केंद्र अपने गांवों को बनाएं

अर्जुन मुंडा, ( केंद्रीय मंत्री, जनजातीय कार्य मंत्रालय )

द्रौपदी मुर्मू का राष्ट्रपति के पद पर निर्वाचन देश के जनजातीय समाज के लिए गौरवपूर्ण है, जो यकीनन स्वर्णाक्षरों में अंकित हो चुका है। आजाद भारत के स्वर्णिम इतिहास में 75 वर्षों में किसी जनजाति समूह के व्यक्ति का राष्ट्रपति पद पर सुशोभित होना एक नए भारत के उदय की परिकल्पना को साकार करने की ओर एक निश्चित कदम है।

भारत की संस्कृति, स्वाभिमान और स्वायत्तता को आंदोलन की नींव को जनजातीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने अपने संघर्ष और बलिदान से रखा था, आज आजादी के अमृत काल में उसके सुखद परिणाम देखने को मिल रहे हैं। ब्रिटिश सरकार की शोषणकारी एवं दमनकारी नीतियों के विरुद्ध बिरसा मुंडा, तिलका मांझी, टंट्या भील, भीमा नायक, वीर खाज्या नायक, सिद्धो मुर्मू, कान्हो मुर्मू जैसे वीरों ने अपना बलिदान दिया। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में जतरा भगत जैसे नेताओं के नेतृत्व में उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया। देश के सर्वोच्च पद पर एक जनजातीय महिला का आसीन होना सम्पूर्ण भारत के लिए एक अविस्मरणीय एवं गौरवशाली पल है। यह दर्शाता है कि भारतीय लोकतंत्र की जड़ें कितनी मजबूत हैं। यह हमारे देश की महानता को दर्शाता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए सरकार समाजिक असमानता और बहिष्कार को मिटाने, जनजातीय समुदायों को सामाजिक सुरक्षा और सामाजिक बीमा प्रदान करने उद्देश्य से भारत में जनजाति समुदायों के समग्र विकास के लक्ष्य के साथ काम कर रही है। सरकार का प्रयास है कि जनजातीय समुदायों के लिए सुलभ, सस्ती स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली, युवाओं को कौशल कशल बनाने और राष्ट्र निर्माण में योगदान करने के लिए प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाए। भारत में आदिवासी समुदाय की पिछली स्थितियों के साथ, उनकी समस्याओं को दूर करने और उन्हें समाज की मुख्यधारा में ले जाने की एक बड़ी चुनौती है। मोदी सरकार ने अपनी पूरी ताकत और प्रतिबद्धता के साथ इन समस्याओं का समाधान किया है और देश के सदर क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों के सामने आने वाले प्रमुख मुद्दों को संबोधित करने पर ध्यान केंद्रित किया है। जहां जनजातीय क्षेत्रों में सड़क, बिजली, पानी की आपूर्ति आदि जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी बड़े पैमाने पर मुद्दों में शामिल थी, वहीं वन अधिकार अधिनियम, आजीविका, शिक्षा, और कई अन्य महत्वपूर्ण मुद्दे थे। भारत में डिजिटल इंडिया क्रांति के आगमन के साथ, मंत्रालय ने प्रमुख मुद्दों की पहचान करने, अंतराल का विश्लेषण करने और (आउटपुट) परिणामी दृष्टिकोण पर काम किया है।

सांस्कृतिक विरासत, साहित्य और कला के संरक्षण और संरक्षण के लिए देश भर में जनजातीय अनुसंधान संस्थानों और संग्रहालयों की स्थापना पर विशेष ध्यान दिया गया ताकि जनता को प्रेरित किया जा सके और भारत के आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों की वीरता को प्रदर्शित किया जा सके। देश भर में 27 जनजातीय अनुसंधान संस्थानों की स्थापना की गई है। प्रधानमंत्री ने हर साल 15 नवंबर को आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी बिरसा मंडा की जयंती पर जाति गौरव दिवस मनाने की घोषणा की। प्रधानमंत्री आदर्श आदि ग्राम योजना के माध्यम से सरकार का प्रयास है कि ग्रामीण आदिवासी क्षेत्रों में सभी मूलभूत सुविधाएं पहुंचाई जाएं।

भारत के ग्रामीण और दूर-दराज के कोनों में फैले आदिवासी समुदायों का सर्वांगीण विकास सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है, हालांकि हमने इसे जमीनी स्तर पर जनजातीय समुदायों के जीवन पर प्रभाव पैदा करने के मिशन के रूप में लिया है। आज जब हम महिला जनजाति राष्ट्रपति को देखते हैं तो अंतोगत्वा संविधान की इन कमियों को पूर्ण करने का अवसर देखते हैं। द्रौपदी मुर्मू जी के भारत की राष्ट्रपति बनने से न केवल इस सर्वोच्च संवैधानिक पद की गरिमा को एक नया कीर्तिमान स्थापित हुआ है, बल्कि हमारी राष्ट्रीय पहचान भी मजबूत हुई है अब समय आया है कि हम मानव विकास सूचकांक का केंद्र अपने गांव को बनाएं। माननीय प्रधानमंत्री जी के सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास के आहवान को जागो और जगाओ, पढो और पढ़ाओ, बनो और बनाओ, करो और करवाओ एवं अपना गांव, अपना विकास की नीति के साथ आत्मनिर्भर भारत का निर्माण करें।


पड़ोसियों को साधने में सफल हो सकती हैं सरकारी पहल

श्याम सरन, ( लेखक पूर्व विदेश सचिव और सीपीआर में सीनियर फेलो हैं )

भारत सरकार ने सुधार के मोर्चे पर दो उल्लेखनीय पहल की हैं। इनका आगाज तो बहुत सफलतापूर्वक हुआ है और यदि इन्हें अपेक्षित रूप से अंजाम देने में भी सफलता मिल जाए तो इनमें भारत को उत्पादक, सक्षम और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था बनाने की भरपूर संभावनाएं हैं। सुधारों से जुड़ी इनमें से एक पहल है गति शक्ति, जिसे नैशनल इन्फ्रास्ट्रक्चर मास्टर प्लान नाम भी दिया गया है। इसे 13 अक्तूबर, 2021 को पेश किया गया था। वहीं दूसरी पहल नैशनल लॉजिस्टिक्स पॉलिसी है, जिसकी घोषणा 17 सितंबर को हुई। वास्तव में, ये एक दूसरे से जुड़े हुए दो ऐसे स्तंभ हैं, जिनके आधार पर 21वीं सदी की अर्थव्यवस्था के निर्माण की योजना है।

इन दोनों पहल के मुख्य पहलू क्या हैं? पहले गति शक्ति की बात करते हैं। यह सौ लाख करोड़ रुपये की महत्त्वाकांक्षी परियोजना है, जिसका लक्ष्य समग्रता की दृष्टि से बुनियादी ढांचे का विकास करना है, जिसमें 16 केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों की अवसंरचना विकास से जुड़ी गतिविधियों को एक केंद्रीकृत डिजिटल पोर्टल के तहत लाना है। इनमें से ‘सात इंजन’ चिह्नित कर लिए गए हैं, जिनमें रेलवे, सड़क, बंदरगाह, जलमार्ग, हवाई अड्डे, सार्वजनिक परिवहन और लॉजिस्टिक्स इन्फ्रास्ट्रक्चर शामिल हैं। गति शक्ति में भारतमाला (राजमार्ग), सागरमाला (तटीय नौवहन), उड़ान (वायु सेवाओं), भारत नेट (दूरसंचार सेवाओं), रेलवे विस्तार और अंतर्देशीय जलमार्ग विस्तार जैसी महत्त्वपूर्ण योजनाओं का समावेश होगा।

वहीं नैशनल लॉजिस्टिक्स पॉलिसी या एनएलपी का उद्देश्य एक निर्बाध मल्टी-मोडल कनेक्टिविटी नेटवर्क की स्थापना है, जो देश भर में वस्तुओं, सेवाओं और लोगों की सुगम आवाजाही सुनिश्चित कर सके। इस प्रकार यह गति शक्ति के साथ अभिन्न रूप से जुड़ी हुई है और इसीलिए उसके साथ समन्वय कर ही इसे सिरे चढ़ाया जाना चाहिए। एनएलपी मुख्य रूप से डिजिटल तकनीक के उपयोग पर निर्भर रहेगी, जिसमें यूनिफाइड लॉजिस्टिक्स इंटरफेस प्लेटफॉर्म (यूलिप) की सहायता से देश भर में कार्गो की आवाजाही से जुड़ी सूचनाओं का स्रोत होगा और उसी के आधार पर ऐसी आवाजाही की राह में अवरोध दूर कर उसे सुगम बनाया जाएगा। भारत में लॉजिस्टिक्स और आपूर्ति श्रृंखला लागत जीडीपी की करीब 12 प्रतिशत है और इस पहल के माध्यम से उसे घटाकर आठ प्रतिशत कर वैश्विक औसत के दायरे में लाने का लक्ष्य है। विश्व बैंक एक लॉजिस्टिक्स सूचकांक भी तैयार करता है, जिसे वैश्विक मानदंड माना जाता है। भारत इस सूचकांक में 35वें स्थान पर है। इन सूचकांकों में उल्लेखनीय सुधार लाए बिना भारत वैश्विक प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था के रूप में नहीं उभर सकता। एनएलपी में इसे स्वीकार भी किया गया है, जिसका एक उद्देश्य ही ‘स्थानीय आपूर्ति श्रृंखलाओं का अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखलाओं के साथ एकीकरण’ के रूप में उल्लिखित है। हालांकि तमाम अपेक्षित परिणामों में से एक के रूप में इस बिंदु को शामिल करने के बजाय यह कहीं अधिक प्रासंगिक होता यदि उसके ढांचे के केंद्रीय भाव में ही इसे जोड़ा जाता। असल में गति शक्ति और एनएलपी दोनों को साथ लाने के लिए उन्हें पुनर्गठित किया जाना चाहिए। पहले चरण में तो भारतीय उपमहाद्वीप में क्षेत्रीय आर्थिक एकीकरण के स्तर पर, फिर उसे व्यापक एशियाई और वैश्विक अर्थव्यवस्था तक विस्तारित किया जाए। आर्थिक एवं तकनीकी दृष्टि से भी भारत दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा और शक्तिशाली देश है और केवल उसके नेतृत्व में ही क्षेत्रीय एकीकरण की कोई ऐसी कवायद पूरी हो सकती है। गति शक्ति और एनएलपी के प्रत्येक घटक को भारत के पड़ोस तक विस्तार देकर उन्हें उनके आर्थिक एवं सामाजिक विकास का शक्तिशाली उपकरण बनाया जा सकता है। इस आरंभिक चरण में अनुभव प्राप्त करके उन्हें बिम्सटेक (बंगाल की खाड़ी बहु-क्षेत्रीय तकनीकी एवं आर्थिक सहयोग पहल) मंच तक ले जाया जा सकता है, जिसका उद्देश्य दक्षिण एशिया और दक्षिणपूर्व एशिया के बीच जुड़ाव की कड़ी जोड़ना है। परिवहन कनेक्टिविटी के साथ इसकी सबसे स्वाभाविक शुरुआत होगी। वैसे तो दक्षेस सदस्य देशों ने 2010-20 के दशक में मल्टी-मोडल ट्रांसपोर्ट कनेक्टिविटी को लेकर प्रतिबद्धता दिखाई, लेकिन कई परियोजनाएं द्विपक्षीय स्तर पर आगे बढ़ीं तो क्षेत्रीय फोकस पृष्ठभूमि में चला गया। मैं पहले भी यह दलील देता रहा हूं कि अपने परिवहन और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क तक पहुंच के मामले में अपने पड़ोसियों के साथ भारत को ‘राष्ट्रीय आचरण’ के अनुरूप ही व्यवहार का विस्तार करना चाहिए।

भारत को भारतीय उपमहाद्वीप के सभी देशों का सबसे तरजीही विकास साझेदार और पसंद का पारगमन देश बनना चाहिए। गति शक्ति और एनएलपी इस दिशा में उत्साहजनक संभावनाएं बनाती हैं। उदाहरण के रूप में बांग्लादेश, भूटान, भारत और नेपाल (बीबीआईएन) उप-क्षेत्रीय सहयोग मंच के माध्यम से तमाम पार-देशीय नदियों को जोड़कर एकीकृत स्वरूप में जलमार्गों का विकास किया जा सकता है। नदी परिवहन नेटवर्क को मौजूदा और नए विकसित किए जा रहे बंदरगाहों के साथ ही आगे बढ़ाया जा सकता है और इसमें तटीय शिपिंग (सागरमाला के जरिये) और सामुद्रिक व्यापार दोनों को प्रोत्साहन की गुंजाइश है।

जहां तक एनएलपी की बात है तो उसके अंतर्गत देश भर के नोडल पॉइंट्स पर आधुनिक गोदाम और लॉजिस्टिक्स सुविधाएं विकसित होनी हैं। इनमें से कुछ को साझा उपयोग के लिए पड़ोसी देशों में क्यों नहीं स्थापित किया जाता? गति शक्ति और एनएलपी में डिजिटल तकनीकों का उपयोग दोनों का अभिन्न पहलू है तो क्या इन पोर्टलों को हमारे पड़ोसियों की भागीदारी के लिए नहीं खोला जा सकता है? उदाहरण के लिए, उन्हें यूलिप में शामिल किया जा सकता है।

इन दोनों पहल के कुछ ऐसे कुछ और पहलू भी हैं, जो क्षेत्र में अन्य देशों के लिए प्रासंगिक होंगे। जैसे कि रेल सेवाओं का विस्तार और जल परिवहन का व्यापक उपयोग एवं सड़क परिवहन की बड़ी हिस्सेदारी को घटाना ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ाने और जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध संघर्ष में महत्त्वपूर्ण हैं। ये सभी सामूहिक लक्ष्य हैं और इन पहल को क्षेत्रीय आयाम देकर साझा प्रतिक्रिया के लिए प्रेरित किया जा सकता है। अब इस दिशा में विचार किया जाए कि भारत द्वारा गति शक्ति और एनएलपी को कैसे क्षेत्रीय आयाम देना चाहिए? पहला यही कि इन पहल से जुड़ा खाका नए सिरे से खींचा जाए, ताकि यह स्पष्ट रूप से हमारे पड़ोसी देशों तक विस्तारित हो सकें। शुरुआती स्तर पर बीबीआईएन देशों और श्रीलंका और मालदीव जैसे द्वीपीय देशों के साथ यह राजनीतिक रूप से भी व्यवहार्य हो सकता है। जब पाकिस्तान में ऐसे सहयोग के लिए अनुकूल राजनीतिक माहौल बन जाए तो उसे भी इसमें शामिल करने की संभावनाएं बन सकती हैं। दूसरा यही कि आरंभ में बीबीआईएन और द्वीपीय पड़ोसियों के बीच नदी परिवहन और तटीय नौवहन पर ध्यान केंद्रित करें। सुरक्षित नदी नेविगेशन की एकीकृत योजना तैयार की जाए। नदी पर बंदरगाह और गोदाम-भंडारण सुविधाओं के विकास के साथ उन्हें मौजूदा एवं प्रस्तावित तटीय बंदरगाहों से जोड़ें, जिससे तटीय नौवहन को प्रोत्साहन मिले। तीसरा यही कि भारत के यूलिप में दिलचस्पी रखने वाले पड़ोसी देशों को भागीदारी की पेशकश करें, जिससे उन्हें कम लेनदेन और आपूर्ति श्रृंखला लागत के मोर्चे पर लाभ मिलेगा।

हमारे पड़ोसियों को इन पहल से परिचित कराने और उन्हें इनमें भागीदारी एवं सहयोग के अवसर प्रदान करने के लिए लक्ष्य-केंद्रित कूटनीतिक प्रयासों की दरकार होगी। वस्तुतः, थोड़ी सी रचनात्मकता और प्रयोगधर्मिता के दम पर गति शक्ति और एनएलपी में हमारी पड़ोसी प्रथम नीति का अहम स्तंभ बनने की भरपूर संभावनाएं हैं।


चुनौतियों के बीच


देश के पहले रक्षा प्रमुख यानी सीडीएस जनरल बिपिन रावत के एक हेलिकाप्टर हादसे में असमय निधन के बाद इस पद पर नई नियुक्ति में करीब दस महीने लग गए। इससे इस पद की अहमियत, जिम्मेदारी और संवेदनशीलता का भी अंदाजा लगाया जा सकता है। अब सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल अनिल चौहान को इस पद का दायित्व सौंपा गया है तो जाहिर है उनके सामने इस मोर्चे की पहले से मौजूद चुनौतियों के साथ-साथ नई परिस्थितियां भी हैं। यों सैन्य मोर्चे पर अब तक का उनका जो अनुभव और प्रदर्शन रहा है, उसे देखते हुए यह कहा जा सकता है कि सरकार ने काफी सोच-समझ कर उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपी है। फिलहाल वे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय के सैन्य सलाहकार के तौर पर काम कर रहे थे। अब सीडीएस की नई जिम्मेदारी के साथ वे रक्षा मंत्रालय में सैन्य मामलों के विभाग के सचिव का भी काम देखेंगे और इस पद से जुड़ी कुछ अन्य जरूरी भूमिकाएं भी निभाएंगे।

गौरतलब है कि अपने चालीस साल के अनुभवों के दौरान उन्हें चीन से संबंधित मामलों की विशेषज्ञता के अलावा खासतौर पर बालाकोट हवाई हमले के दौरान कामयाब अभियान के लिए भी जाना जाता है। इसके अलावा, उन्होंने जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर भारत में उग्रवादी और अलगाववादी आंदोलनों के खिलाफ सैन्य अभियानों का भी नेतृत्व किया। स्वाभाविक ही अपने लंबे अनुभवों का लाभ उन्हें अपनी नई भूमिका को मजबूत तरीके से निभाने में मिलेगा। मौजूदा विश्व जिस दिशा में बढ़ रहा है, इसमें अनायास ही अलग-अलग तरह के तनाव और टकराव सामने खड़े हो रहे हैं। इसके मद्देनजर सैन्य मोर्चे पर पूरी मजबूती भारत के लिए भी सर्वोच्च प्राथमिकता का मामला बन गया है। यों हमारे देश के पास पहले से ही सेना के तीनों अंगों का एक व्यापक मोर्चा है और वह हर स्तर पर अभेद्य ताकत रखता है। लेकिन युद्ध के मोर्चों पर खड़ी हो रही नित नई परिस्थितियों में नए सीडीएस के रूप में अनिल चौहान के सामने सबसे जरूरी काम थल सेना, जल सेना और वायुसेना के बीच सामंजस्य स्थापित करते हुए भारत की सैन्य क्षमता को कई गुना बढ़ाने का होगा, ताकि एकीकृत नियंत्रण के जरिए संसाधनों का बेहतरीन इस्तेमाल हो सके। यह काम देश के पहले सीडीएस जनरल बिपिन रावत ने शुरू किया था, मगर अचानक हुए हादसे में उनके निधन के बाद यह बाकी रह गया था।

सही है कि नए सीडीएस के सामने एक मुश्किल सीमित बजट में सेना का आधुनिकीकरण करने की होगी। मगर उम्मीद है कि इसका हल वे अपने अनुभव और प्रबंध कौशल के दम पर आसानी से निकाल लेंगे। अनिल चौहान की इस पद पर नियुक्ति इसलिए भी अहम है कि उन्हें चीन से जुड़े मामलों का विशेषज्ञ माना जाता रहा है। यह कोई छिपा तथ्य नहीं है कि पिछले कुछ सालों से चीन की ओर से भारत सामने किस तरह की चुनौतियां खड़ी की जा रही हैं। चीन भारत को उकसाने से लेकर घुसपैठ तक करता रहा है, उसके मद्देनजर उस पर भरोसा करना एक जोखिम का ही काम है। दूसरी ओर, सीमा पर आतंकियों को शह देने से लेकर अन्य शक्लों में पाकिस्तान की हरकतें जगजाहिर रही हैं और इसके पीछे भी चीन की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ऐसे में अगर सीमा पर गतिविधियों के साथ-साथ खासतौर पर चीन के चक्रव्यूह की अच्छी समझ रखने वाली शख्सियत के तौर पर अनिल चौहान अब सीडीएस के रूप में सामने आए हैं तो इसकी अपनी अहमियत है।


क्यों नहीं आते विदेशी विद्यार्थी भारत

विजय प्रकाश श्रीवास्तव

कुछ दिनों पहले खबर आई थी कि इस वर्ष पढ़ाई के लिए भारत से अमेरिका जाने वाले विद्यार्थियों की संख्या एक नई ऊंचाई तक पहुंच गई है। इस साल (2022) कुल लगभग बयासी हजार विद्यार्थियों ने उच्च शिक्षा के लिए अमेरिकी शिक्षण संस्थानों में दाखिला लिया है। भारत से विद्यार्थी अन्य देशों खासतौर से आस्ट्रेलिया, कनाडा, ब्रिटेन, न्यूजीलैंड आदि में भी पढ़ने के लिए जाते हैं। अभी तक के आंकड़ों के अनुसार विदेश में अध्ययनरत भारतीय विद्यार्थियों की संख्या ग्यारह से बारह लाख के बीच है और अनुमान है कि वर्ष 2024 तक यह अठारह लाख से ऊपर निकल जाएगी।

इस खबर को दूसरी खबर के साथ देखने की भी जरूरत है। इस साल अगस्त में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने घोषणा की कि देश के विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों को उनके स्नातक व स्नातकोत्तर कार्यक्रमों में विदेशी विद्यार्थियों के लिए पच्चीस फीसद तक अतिरिक्त सीटें उपलब्ध कराने की अनुमति होगी। इन सीटों के लिए कोई प्रवेश परीक्षा आयोजित नहीं की जाएगी। निश्चित रूप से हमारा देश बड़ी संख्या में विदेशी विद्यार्थियों को आकर्षित करना चाहता है। लेकिन वास्तविकता यह है कि दुनिया का दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला देश जो अब विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का दावा कर रहा है, उच्च शिक्षा के लिए वैश्विक मंच पर अपनी जगह बनाने में कामयाब नहीं हो पाया है। साल 2021 में केवल 23,439 विद्यार्थी विदेश से भारत पढ़ने आए थे। इस समय देश में विदेशी विद्यार्थियों की कुल संख्या पचास हजार से ज्यादा नहीं है। वर्ष 2020 में जारी राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भारतीय उच्च शिक्षा के अंतरराष्ट्रीयकरण की बात कही गई है। यहां आशय भारतीय उच्च शिक्षण संस्थानों को उच्च शिक्षा हेतु वरीय केंद्र बनाने और इनमें विदेश से आए विद्यार्थियों की संख्या बढ़ाने से है। इससे शिक्षण संस्थानों की आय में तो वृद्धि होगी ही, सांस्कृतिक आदान-प्रदान भी बढ़ेगा।

यह विचारणीय विषय है कि पढ़ाई के लिए भारत से बाहर जाने वालों की संख्या की तुलना में भारत को उच्च शिक्षा के लिए चुनने वालों की संख्या इतना कम क्यों है? एक कारण तो साफ है कि अगर हम आइआइटी, आइआइएम और इंडियन इंस्टीट्यूट आफ साइंस जैसे संस्थानों को छोड़ दें, तो भारत के उच्च शिक्षण स्थानों का दुनिया में कोई खास नाम नहीं है। इसके अलावा ढंग के संस्थानों में प्रवेश मिलने की राह भी काफी मुश्किल है। नौकरशाही का आलम उच्च शिक्षा जगत में भी छाया हुआ है। कुछ निजी विश्वविद्यालय भले ही आसानी से प्रवेश दे देते हों, पर उन में से बहुतों की गुणवत्ता पर प्रश्न चिह्न लगे हैं।

एक उदाहरण से यह बात स्पष्ट होगी। देश में ऐसे विद्यार्थियों की संख्या काफी बढ़ी है जो चिकित्सा की पढ़ाई के लिए एमबीबीएस में प्रवेश लेना चाहते हैं और उनमें से बहुतों में इस हेतु आवश्यक प्रतिभा भी है, पर सीटें कम होने की वजह से इन विद्यार्थियों में से कम को ही प्रवेश मिल पाता है, शेष अपना रास्ता बदल लेते हैं या फिर चीन, यूक्रेन, रूस जैसे देशों का रुख करते हैं जहां खर्च बहुत ज्यादा नहीं है और प्रवेश आसानी से मिल जाता है। आइआइटी और आइआइएम में भी जितने लोग आवेदन करते हैं, उसमें भी बहुत ही कम छात्रों को प्रवेश मिल पाता है। हालांकि विगत वर्षों में इन संस्थानों के नए केंद्र भी खोले गए हैं। कुल मिला कर यह कहा जा सकता है कि भारत में गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा प्राप्त करने की राह उतनी आसान नहीं है जितनी कि होनी चाहिए। कुछेक सरकारी संस्थानों को छोड़ दें तो उच्च शिक्षा अब पहले की अपेक्षा काफी महंगी भी हो चली है।

भारत को आजादी मिलने से पहले और इसके ठीक बाद के दशकों में भी लोग पढ़ाई करने भारत से विदेश जाते थे। पर तब यह संख्या बेहद कम हुआ करती थी। आज की स्थिति बिल्कुल भिन्न है। तमाम मध्यवर्गीय और उच्च मध्यम वर्गीय परिवार अपने बच्चों को विदेश में पढ़ाने का सपना रखते हैं। यहां सभी का दृष्टिकोण एक जैसा नहीं होता। कुछ परिवारों या विद्यार्थियों के लिए यह फैशन और सामाजिक प्रतिष्ठा की बात गई है। कुछ विद्यार्थी इस उम्मीद से जाते हैं कि उन्हें आला दर्जे की शिक्षा मिलेगी और वे इस पढ़ाई के बल पर शानदार भविष्य बना पाएंगे। इन सबसे अलग एक बड़ा वर्ग उन विद्यार्थियों का है जो विदेश में पढ़ाई का रास्ता इसलिए चुनते हैं कि उन्हें इससे विदेश में रहने और कमाने का अवसर मिल जाए। भारत से विकसित देशों को जाने वाले विद्यार्थियों में से बहुत कम ही वापस भारत का रुख करते हैं। प्रवासी कामगारों के लिए कुछ देशों की नीतियां सख्त हैं और कुछ की उदार। फिर भी रोजगार के अवसरों की उपलब्धता की दृष्टि से इन देशों में हालात भारत से बहुत ज्यादा बेहतर हैं।

फिलहाल भारत में पढ़ाई के लिए बाहर से आने वाले विद्यार्थी अफ्रीकी तथा अरब देशों के हैं जिनमें उच्च शिक्षा का ढांचा बहुत ज्यादा मजबूत नहीं है। करीब के एशियाई देशों नेपाल, भूटान और बांग्लादेश के विद्यार्थियों के लिए भी भारत उच्च शिक्षा हेतु प्राथमिकता प्राप्त देश है। पर इन सारे देशों और बाकी देशों को मिला कर भी भारत में विदेशी विद्यार्थियों की संख्या कम ही है। इस प्रकार देश में विदेशी विद्यार्थियों का देश के विद्यार्थियों से अनुपात बहुत थोड़ा है।

उच्च शिक्षा के लिए देश और संस्थान का चयन आमतौर पर संबंधित देश में जीवन की गुणवत्ता, पढ़ाई करने व रहने के खर्च, शिक्षा के स्तर तथा यहां से पहले पढ़ाई कर चुके विद्यार्थियों की राय पर निर्भर करता है। यह स्वीकार करने में हमें हिचक नहीं होनी चाहिए कि जीवन की गुणवत्ता के मामले में भारत विकसित देशों की बराबरी नहीं कर सकता। इस आधार पर कह सकते हैं कि विदेश के वे विद्यार्थी जो अमेरिका आदि जैसे देशों में पढ़ाई का खर्च उठा सकते हैं, वे उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए भारत को शायद ही वरीयता देंगे।

विदेशी विद्यार्थियों को आकर्षित करने के लिए 2016 में सरकार ने ‘स्टडी इन इंडिया’ नाम के कार्यक्रम की घोषणा की थी, जिसे 2018 में लागू किया गया था। इस कार्यक्रम को कोई अपेक्षित प्रतिक्रिया नहीं मिली। सिर्फ अतिरिक्त क्षमता उपलब्ध कराने से विदेशी विद्यार्थी भारत आने लगेंगे, इसकी संभावना कम ही है। अधिक से अधिक विदेशी विद्यार्थी भारत पढ़ने आएं, इसके लिए एक व्यापक रणनीति बनानी होगी और इसके लिए हमें उन देशों तथा संस्थानों से सीखना होगा जो इस मामले में अपनी पहचान पहले ही बना चुके हैं।

एक और दृष्टिकोण यह कहता है कि पहले हम अपने ही देश के विद्यार्थियों के लिए अपनी उच्च शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करें। थोड़ी देर के लिए बाजार शब्द के प्रयोग की छूट लेते हुए हम कह सकते हैं कि हमारे देश में उच्च शिक्षा का बाजार जितना बड़ा है, उसमें विदेशी विद्यार्थियों का योगदान फिलहाल बहुत ज्यादा नहीं जोड़ सकता। देश से जितनी संख्या में विद्यार्थी बाहर पढ़ने के लिए जा रहे हैं, उन्हीं में से अधिकांश को हम अपने देश में ही अत्यधिक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देकर रोक सकें तो देश को उनकी प्रतिभा का लाभ मिलेगा और विदेशी मुद्रा भी बचेगी। साथ-साथ हमें विदेशी विद्यार्थियों को आकर्षित करने के प्रयास जारी रखने चाहिए।


चुनौतियों भरी जिम्मेदारी


देश को लेफ्टिनेंट जनरल अनिल चौहान (सेवानिवृत्त) के रूप में दूसरा चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) यानी चार सितारा रैंक का जनरल मिल गया। जनरल बिपिन रावत की हेलीकॉप्टर हादसे में मृत्यु के बाद नौ महीने से अधिक से इस तैनाती का इंतजार था। 61 वर्षीय चौहान सैन्य मामलों के सचिव के रूप में भी जिम्मेदारी संभालेंगे। वह 2019 में बालाकोट हवाई हमलों के दौरान सेना के सैन्य अभियान के महानिदेशक (डीजीएमओ) थे। वह पिछले साल पूर्वी सेना कमांडर के रूप में अपनी सेवानिवृत्ति के बाद से राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोभाल की अध्यक्षता में राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय में सैन्य सलाहकार की भूमिका निभाते रहे हैं। 1981 में 11 गोरखा राइफल्स में कमीशन प्राप्त करने वाले चौहान का जन्म 18 मई, 1961 को हुआ था। 40 साल के करियर में वह कई कमान का नेतृत्व कर चुके हैं। उन्हें जम्मू कश्मीर और पूर्वोत्तर भारत में आतंकवाद विरोधी अभियानों का लंबा अनुभव हैं। उन्होंने अंगोला में संयुक्त राष्ट्र मिशन में भी सेवाएं दी हैं। अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के साथ भारत की समग्र युद्ध तैयारी को मजबूत करने में उनकी अहम भूमिका रही है। वह परम विशिष्ट सेवा पदक, उत्तम युद्ध सेवा पदक, अति विशिष्ट सेवा पदक, सेना पदक और विशिष्ट सेवा पदक से सम्मानित हैं। जनरल रावत के बाद देश को दूसरा सीडीएस भी गोरखा राइफल्स से ही मिला है। चौहान पहले लेफ्टिनेंट जनरल हैं, जो अब तीनों सेनाओं के प्रमुखों के ऊपर होंगे। अनुभव और वरिष्ठता के हिसाब से वे मौजूदा तीनों सेना प्रमुखों से सीनियर हैं। सीडीएस के रूप में उनके सामने चुनौतियों का पहाड़ खड़ा है। सबसे बड़ी चुनौती थलसेना, वायुसेना और नौसेना के एकीकरण को पूरा करना है। उन्हें पांच थिएटर कमान बनाने के काम को भी अंजाम देना होगा। सेना में निजी भागीदारी और स्वदेशी रक्षा खरीद को बढ़ावा देना है। सबसे महत्वपूर्ण चुनौती हाल ही शुरू की गई सेना भर्ती की। अग्निपथ योजना को सफल बनाना है, जिसका खासा विरोध देश में देखने को मिला था। उन्हें चीनी और पाकिस्तानी गतिरोध से भी निपटना होगा। उम्मीद है कि वह इन सब चुनौतियों से सफलतापूर्वक निपटेंगे।


महिलाओं का अधिकार


देश की सर्वोच्च अदालत ने अपने शरीर पर महिलाओं के अधिकार को फिर एक बार पुष्ट किया, तो यह स्वागतयोग्य होने के साथ ही आगे के फैसलों के लिए अनुकरणीय भी है। न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने साफ फैसला सुनाया है कि किसी भी महिला, विवाहित या अविवाहित, को 24 सप्ताह तक बिना किसी मंजूरी के गर्भपात कराने का अधिकार है। इसके साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि किसी विवाहित महिला को जबरन गर्भवती करना ‘मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी ऐक्ट’ के तहत बलात्कार माना जा सकता है। गुरुवार को आए इस फैसले से महिला सशक्तीकरण को बहुत बल मिलेगा। मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी ऐक्ट के तहत गर्भपात के नियम स्पष्ट रूप से वर्णित हैं, उन्हीं के अनुरूप सर्वोच्च अदालत ने फैसला सुनाया है।

यह दुखद तथ्य है कि देश में अभी भी महिलाओं से जुड़े ज्यादातर फैसले पुरुष ही करते हैं। महिलाओं को अपने शरीर से जुड़े मुद्दों पर भी पुरुषों की मंजूरी लेनी पड़ती है, जबकि सर्वोच्च न्यायालय पहले ही महिलाओं के इस अधिकार पर रोशनी डाल चुका है। असल में, भारत जैसे सामाजिक रूप से जटिल पुरुषवादी देश में न्यायालयों को ऐसे फैसले बार-बार दोहराने या परिभाषित करने पड़ते हैं। ध्यान रहे, इस अधिकार तक पहुंचने में महिलाओं को लंबा समय लगा है। अपने इस अधिकार के प्रति सभी महिलाओं को जागरूक रहना चाहिए। पुरुषों को भी यह पता होना चाहिए कि उनका अधिकार क्षेत्र कहां खत्म हो जाता है। ऐसे फैसलों से प्रेरणा मिलनी चाहिए और महिलाओं के साथ किसी भी तरह की ज्यादती का अंत होना चाहिए। न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने यह भी कहा है कि विवाहित महिलाएं भी बलात्कार पीड़ित हो सकती हैं। बलात्कार का अर्थ है, बिना सहमति के संबंध बनाना। अगर ऐसा होता है, तो वैवाहिक रिश्ते में भी इसे दुष्कर्म ही माना जाएगा। महिला की सहमति सबसे जरूरी है। मौजूदा नियमों के अनुसार, तलाकशुदा, विधवा महिलाएं 20 सप्ताह के बाद गर्भपात नहीं करा सकतीं, लेकिन अन्य सभी महिलाओं के लिए 24 सप्ताह तक गर्भपात की अनुमति का प्रावधान है। अदालत का यह फैसला 25 साल की गर्भवती अकेली युवती की अर्जी पर आया है। इस युवती को उच्च न्यायालय से राहत नहीं मिली थी, लेकिन सवार्ेच्च न्यायालय में न्याय के साथ ही नियमों को नई व्याख्या भी मिली है। शीर्ष अदालत ने साफ कर दिया कि किसी महिला से यह अधिकार छीनना उसकी गरिमा को कुचलने जैसा काम है।

गर्भपात और महिलाओं के अधिकार के मामले में भारत सामान्य रूप से दुनिया में बहुत आगे है। अनेक देश अभी भी गर्भपात को मंजूरी नहीं देते हैं। गर्भपात को मंजूरी देने वाले देशों की संख्या 100 भी नहीं है। लीबिया, इंडोनेशिया, नाइजीरिया, ईरान और वेनेजुएला सहित लगभग 50 देश तब गर्भपात की अनुमति देते हैं, यदि किसी महिला का स्वास्थ्य जोखिम में हो। कई अन्य देश बलात्कार, अनाचार या भ्रूण असामान्यता की स्थिति में ही गर्भपात को मंजूरी देते हैं। अमेरिका में भी गर्भपात के अधिकार को लेकर विवाद चलता रहता है और वहां राज्यों के कानून अलग-अलग हैं। इस मोर्चे पर भारत के कानून काफी पुख्ता हैं, लेकिन यहां समाज में लोगों की सोच बदलने में समय लग रहा है। महिलाओं की सुरक्षा का दायरा बढ़ना चाहिए और यह तभी बढ़ेगा, जब उन्हें वास्तविक रूप से अधिकार दिए जाएंगे।


हरेक दल में आलाकमान की हनक

विजय विद्रोही, ( वरिष्ठ पत्रकार )

आलाकमान के खिलाफ बगावत, आलाकमान की चेतावनी, आलाकमान नाराज…। कुल मिलाकर आलाकमान शब्द पिछले कई दिनों से सुर्खियों में है। आलाकमान शब्द अंग्रेजी के हाई कमांड का पत्रकारिता की भाषा में किया गया अनुवाद है। हाई कमांड का मतलब सेना के सर्वोच्च अधिकारी से है, मतलब जो थल, वायु और नौसेना का कमांडिग अफसर हो। आला मतलब सबसे अच्छा और कमान यानी धनुष, तो क्या कहा जा सकता है कि आलाकमान वह होता है, जो सबसे अच्छा धनुर्धर हो और जिसके तरकश में ऐसे-ऐसे तीर हों कि दुश्मनों के साथ-साथ जरूरत पड़ने पर दोस्तों के भी दिल छलनी किए जा सकें या अपना मतलब साधा जा सके या अपने कहे अनुसार चलने-करने को मजबूर किया जा सके? मतलब, आलाकमान ऐसा कोई शख्स या संगठन या व्यक्तियों का समूह होता है, जिससे उसके प्रभाव क्षेत्र में आने वाले डरते हैं, जो ठसक के साथ फैसले करता है; जिसका रौब, इकबाल, खौफ होता है; जिसकी हनक होती है। अब ऐसे शख्स या संगठन से जब सब डरते हैं, तो फिर राजस्थान के विधायकों में इतनी हिम्मत कहां से आ गई कि वे सीधे-सीधे आलाकमान से भिड़ गए?

वैसे हनक आलाकमान की भी बची रहे और राज्य के क्षत्रपों का सम्मान भी बना रहे, लगता है, इसका बेहतरीन उदाहरण सोनिया गांधी और अशोक गहलोत ने पेश करने की कोशिश की है। माफी मांगकर और शर्मिंदगी व्यक्त करके अशोक गहलोत ने आलाकमान की नाराजगी भी शायद दूर कर दी है और अपना मुख्यमंत्री पद भी फिलहाल सुरक्षित कर लिया है। इससे यह भी साफ हो गया है कि अगर आलाकमान के पास केंद्रीय सत्ता नहीं है, तो राज्यों पर बहुत ज्यादा दबाव डालने के बजाय बीच का रास्ता निकालना ही सही राजनीति है। अब आलाकमान के तरफदार दावा कर सकते हैं कि गहलोत को झुका दिया गया, तो वहीं दूसरी ओर, गहलोत खेमा भी यह कह सकता है कि मकसद हासिल हो गया। मकसद शायद यही था कि गहलोत मुख्यमंत्री बने रहें और सचिन पायलट थोड़ा इंतजार कर लें। अब आलाकमान के लिए जरूरी हो जाता है कि पायलट के लिए दिल्ली में कोई जगह तलाशे। इससे राजस्थान में कांग्रेस की कलह को वह पूरी तरह रोक सकेगा।

सियासत की नजर से देखा जाए, तो पहले सिर्फ कांग्रेस के लिए ‘हाईकमान कल्चर’ का इस्तेमाल होता था। अब सभी दलों का अपना-अपना हाईकमान है। कांग्रेस का हाईकमान अगर नेहरू-गांधी परिवार है, तो भाजपा का संघ परिवार। हालांकि, अब भाजपा में हाईकमान नरेंद्र मोदी-अमित शाह की जोड़ी ही मानी जाती है। तृणमूल कांग्रेस की हाईकमान ममता बनर्जी हैं, तो बसपा की मायावती, बीजद के नवीन पटनायक। दक्षिण में तो द्रमुक से लेकर टीआरएस व वाईएसआर कांग्रेस तक, हर दल में एक मजबूत हाईकमान है। यहां तक कि एक वामपंथी पार्टी के आलाकमान मतलब पोलित ब्यूरो ने ज्योति बसु के प्रधानमंत्री बनने की संभावनाओं पर पानी फेर दिया था।

बहरहाल, इन दिनों सबसे बड़ी मुसीबत से कांग्रेस हाईकमान गुजर रहा है। कहा जा रहा है, राजस्थान की घटना से एक बार फिर सिद्ध हो गया है कि कांग्रेस हाईकमान कमजोर पड़ गया है, लेकिन ध्यान रहे, इसी हाईकमान के कहने पर पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने गद्दी छोड़ी थी। इसी हाईकमान के कारण छत्तीसगढ़ में टी एस सिंहदेव मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के खिलाफ इक्का-दुक्का बयानों के अलावा कुछ नहीं बोल पाते हैं। कर्नाटक में शिव कुमार और सिद्धारमैया एक-दूसरे की परदे के पीछे आलोचना तो करते हैं, लेकिन आलाकमान का डर उन्हें तलवार म्यान से निकालने नहीं देता। गुलाम नबी आजाद भी आलाकमान का कुछ बिगाड़ नहीं पाए और मजबूरी में मैदान ही छोड़ गए। सवाल उठता है कि ऐसे में, राजस्थान के 90 विधायकों में इतनी हिम्मत कहां से आ गई? आलाकमान को आला संकट में क्यों डाल दिया?

साफ है कि आलाकमान आला दर्जे का तभी होता है, जब केंद्र में उसकी सत्ता होती है। जब तक वह चुनाव जितवाता है, जब तक वह वोट दिलाने की क्षमता रखता है, जब तक वह चुनाव का खर्च उठाने का बीड़ा उठाता है, तब तक ही ठसक होती है। अगर हाईकमान चुनाव नहीं जितवा सकता, तो फिर उसकी उपयोगिता भी कम हो जाती है। दुधारू गाय की लात भली, तो क्या हाईकमान का सबसे बड़ा सबक यही है। अगर आपके पास केंद्रीय सत्ता नहीं है, तो आपको राज्यों की सत्ता पर निर्भर रहना पड़ेगा और सियासी लात-घूंसे चलाने बंद कर देने चाहिए।

अब छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को हिमाचल प्रदेश और अशोक गहलोत को गुजरात चुनावों का मुख्य पर्यवेक्षक किस वजह से बताया गया, इसे बताने की जरूरत नहीं है। भारतीय राजनीति में अक्सर यह आग्रह किया जाता है कि स्थानीय क्षत्रपों को भले ही आप सिर पर मत चढ़ाइए, लेकिन उन्हें अपनी अंगुलियों पर भी मत नचाइए। जो आला नेता अपने दल में आंतरिक लोकतंत्र की उम्मीद करते हैं, उन्हें पार्टी विधायकों से एक पंक्ति का प्रस्ताव पारित करने की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। अपने नेताओं को बार-बार दिल्ली या अपने राज्य की राजधानी बुलाने में समय क्यों बर्बाद किया जाए? यह बीमारी सभी दलों में है। होना तो यह चाहिए कि विधायक अपने नेता का चुनाव करें और आलाकमान इसकी घोषणा करे। आर के लक्ष्मण का एक कार्टून याद आता है- एयरपोर्ट पर विधायक पंक्ति में खडे़ हैं, इंदिरा गांधी आगे से गुजर रही हैं, एक विधायक के सामने रुकती हैं, कहती हैं कि आप नए मुख्यमंत्री होंगे, आपका नाम क्या है? तमाम मौजूदा आलाकमानों को समझ जाना चाहिए कि तब से लेकर अब तक बहुत पानी बह चुका है। कोई मुख्यमंत्री या नेता छोटे-छोटे फैसलों के लिए बार-बार आलाकमान के पास क्यों जाए? बड़े झगड़े होने पर ही आलाकमान का निर्णय अंतिम होना चाहिए।

हकीकत यह है कि कुछ नेता अपनी पूरी जिंदगी आलाकमान की जी-हुजूरी में काट देते हैं- बना है साहब का मुसाहिब फिरे है इतराता, वरना इस शहर में गालिब की आबरू क्या है, जबकि नेताओं की अपनी जमीन होगी, तो बड़े शान से वे कह सकेंगे, दाग इतराए फिरते हैं आज, शायद उनकी आबरू होने लगी।


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