15-03-2023 (Important News Clippings)

15 Mar 2023
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Something Brewing?

Three bank collapes in the US are a matter of global concern. Indian policymakers should keep close watch.

TOI Editorials

It was a crisis foretold. A week ago, all was well in the US financial system. Since then, three banks have collapsed, with Silicon Valley Bank being the most consequential one. American regulators, aware of the gravity of the situation, have invoked “exception” clauses in their play book to insure deposits that weren’t earlier covered. Their hope is that it will tamp down on the panic and prevent a contagion. Given the size and influence of the US financial system, all regulators must harbour the same hopes.

Two Indian reports warned of the risks. In December 2022, RBI’s bi-annual financial stability report flagged it. Next month, the Economic Survey highlighted the risks of financial contagion. Step back and look at the context. Last year, the world witnessed the most synchronised monetary tightening in 50 years by way of interest rate increases. The tightening also happened to be faster than commonly seen in earlier episodes. It took place on the heels of a build-up of private debt when interest rates were low, and a surge in inflation in 2022. In short, it was the recipe for a perfect storm as these conditions make it more likely that poor investment decisions will be caught out.

On the face of it, India is not vulnerable. In the second quarter of 2022, the average core debt of the non-financial sector for the world was 248% of GDP. In the case of India, it was 170% of GDP, with only government debt at 82% close to the global average of 88%. But it would be unwise to drop one’s guard based on historical data. For example, IMF had pointed out that 2022 was a year in which many debt ratios improved globally. It was mainly because nominal GDP grew fast following a surge in inflation.

Moreover, one of the lessons of 2008 is that there are often invisible links between the balance sheets of tightly regulated entities and others operating in a lax environment. The convulsions in the Indian money market in 2008 took policymakers by surprise. Since the heightened risk to financial stability in the backdrop of increasing rates is a phenomenon backed by considerable evidence, it’s important for India’s policymakers to be prepared. Financial markets are increasingly interconnected and it’s hard for any country, let alone a large emerging market like India, to decouple from the world.


Inertia, intervention

Legislative inaction on social issues will legitimise judicial intervention.


The Supreme Court’s decision to refer to a Constitution Bench the issue of granting legal recognition to same-sex marriages can be seen as an important step towards ensuring gender equality, despite apprehension that it is encroaching on the legislative domain. Petitioners before the Court view the idea of giving of legal status for marriages between people belonging to the same sex as a natural consequence of the 2018 judgment decriminalising homosexuality. The government, however, contends that there is no need to depart from the heteronormative understanding of marriage. And even if there ought to be such a change, it must come from the legislature. The question before the Court is whether it should interpret provisions of marriage laws in India, especially the Special Marriage Act, 1954, as permitting marital unions between same-sex couples. The Act allows the solemnisation of a marriage between any two persons and is used by those who are unable to register their marriages under their respective personal laws. The Union government has argued that the decriminalisation of consensual relations between adults of the same sex has removed the stigma attached to homosexuality, but has not conferred the right of marriage. And that the state is entitled to limit its recognition to marriages involving heterosexual couples. There is no discrimination, it claims, in keeping same-sex couples out of the definition of marriage.

In terms of the equality norm, the central question is not very complicated. It can be recognised that no civil right available to married heterosexual couples ought to be denied to those who belong to the same gender. The incidental consequences on issues of property and succession may not pose insurmountable difficulties. The Centre’s other argument, invoking religious norms and cultural values, against recognising same-sex marriages is weak and inadequate. It is futile to argue that it will undermine faith or rock societal values. The mere fact that many people consider marriage to be a sacrament or a holy union is not enough to deny equal status to the union of people of the same sex or to undermine its essential character as a social and economic contract. Whether the remedy ought to take the form of recognition of same-sex marriages, and, if so, whether it should be through judicial intervention or legislative action, is the question. That the legislature should be involved in bringing about far-reaching changes that may impact the personal laws of all religions is indeed an acceptable proposition. A responsive government that wants to treat this as a matter of policy and not cede space to the courts would act on its own to consider the right of any two people, regardless of gender, to marry or found a family. Legislative inaction on burning social issues will legitimise and invite judicial intervention.


किसान की खेती से आय बढ़े तभी फायदा


महाकवि घाघ ने पेशे का वर्गीकरण किया था, ‘उत्तम खेती, मध्यम बान, निकृष्ट चाकरी, भीख निदान’ यानी खेती, व्यापार, नौकरी और भिक्षावृत्ति को क्रमशः ऊपर से नीचे की श्रेणी में रखा था। आज की स्थिति पर गौर करें। एनएसएसओ के सिचुएशन एनालिसिस सर्वे की रिपोर्ट के अनुसार पिछले आठ वर्षों में किसानों की कुल आय खेती से लगातार घटी है, जबकि मजदूरी से बढ़ी है। सन् 2014 की सर्वे रिपोर्ट के अनुसार औसत किसान खेती से कुल आय का 48% कमाता है, जबकि मजदूरी से 32%, लेकिन सन् 2021 की रिपोर्ट में बताया गया कि उसकी आय खेती से 37% रह गई है और मजदूरी से 40 प्रतिशत । तीसरा साधन है पशु-पालन, जिससे आय इसी काल में 12% से 15% हुई। यानी कुल मिलाकर खेती लगातार लाभकर होती जा रही है और किसानों को मजबूरन अपने श्रम को बेचने का सहारा लेना पड़ रहा है। वर्ष 2020-21 में कृषि पर संसदीय स्थाई समिति की एक रिपोर्ट ने चिंता व्यक्त की कि बजट में कृषि पर खर्च के लिए जो राशि निर्धारित की गई, पिछले दस वर्षों में उससे काफी कम खर्च किया गया। उदाहरण के लिए वर्ष 2019-20 में कुल बजट राशि से 28% कम खर्च हुआ, जो आ तक के दस वर्षों में सबसे कम था। चौंकाने वाली बात यह कि इसी वर्ष फरवरी 2019 में केंद्र सरकार ने किसान सम्मान निधि के नाम पर 11 करोड़ किसानों को हर साल छह हजार रु. की आर्थिक मदद देना शुरू की। विशेषज्ञों की चिंता यह है कि बजट राशि से किसानों की कृषि और उत्पादकता में दीर्घकालीन बेहतरी होती, लेकिन आज बजट का 55% नकदी के रूप में दिया जा रहा है। यानी किसान उपरोक्त कवि को गलत ठहराता हुआ अंतिम पायदान पर याचक बन गया है।


संस्थागत सुधारों का सही समय

जीएन वाजपेयी, ( लेखक सेबी और एलआइसी के पूर्व चेयरमैन हैं )

किसी समाज में शासन की शैली ही एक राष्ट्र-राज्य के ढांचे को आकार देती है। विविधतापूर्ण समाज वाले भारत ने विदेशी दमनकारी शक्ति से स्वतंत्रता के बाद सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार वाले प्रतिनिधिमूलक लोकतंत्र की राह चुनी। महान राजनीतिक दार्शनिक अरस्तू ने कहा था, ‘जहां तक स्वतंत्रता और समानता का प्रश्न है तो कुछ व्यक्तियों की दृष्टि में ये मुख्य रूप से लोकतंत्र में ही पाई जाती हैं और इनकी प्राप्ति तभी संभव है, जब सरकार में सभी लोगों की समान हिस्सेदारी होगी।’ संभवत: इसी पहलू से प्रभावित होकर हमारे संविधान निर्माताओं ने ‘एक व्यक्ति-एक वोट’ जैसी संकल्पना का सूत्रपात किया। वस्तुत:, भारतीय राष्ट्र राज्य समतावादी मूल्यों के तानेबाने पर बुना हुआ एक न्यायपूर्ण राज्य है। संविधान की प्रस्तावना में सभी आदर्श लोकतांत्रिक मूल्यों का समावेश भी इसकी पुष्टि करता है। नि:संदेह, संविधान निर्माताओं की इन मूल्यों में अगाध आस्था थी। संविधान सभा में अपने एक भाषण में डा. बीआर आंबेडकर ने लोगों से ‘अराजक तौर-तरीकों और नायक पूजा के परित्याग के साथ ही केवल राजनीतिक ही नहीं, अपितु सामाजिक लोकतंत्र की दिशा में कार्य करने का’ आह्वान भी किया था। ऐसे में इसकी पड़ताल आवश्यक हो जाती है कि स्वतंत्रता के 75 वर्षों में भारत ने न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व सुनिश्चित करने में कितनी प्रगति की है। स्मरण रहे कि अपेक्षित नीतिगत परिणामों की प्राप्ति के लिए प्राधिकारों और प्रतिनिधियों के साथ एक संस्थागत ढांचे के निर्माण की भी आवश्यकता होती है। प्रतिष्ठित ब्रिटिश राजनेता बेंजामिन डिजरायली ने यथार्थ ही कहा है, ‘व्यक्तियों से समुदाय का निर्माण हो सकता है, किंतु यह संस्थान ही होते हैं जो किसी राष्ट्र का निर्माण करते हैं।’ इन समतावादी मूल्यों को साकार रूप देने के लिए हमारे संविधान ने न्यायपालिका, नागरिक और पुलिस प्रशासन जैसे संस्थानों के गठन की राह दिखाई है। न्यायपालिका में चुने हुए जनप्रतिनिधि नहीं होते। उनके समक्ष जनप्रतिनिधियों की तरह हर पांच वर्ष के बाद नए जनादेश की अनिवार्यता नहीं होती। न्यायपालिका स्वतंत्र एवं अधिकारों से सशक्त है, लेकिन उसमें स्पष्ट जवाबदेही का अभाव है। उसकी स्वतंत्रता या अधिकारों में सेंध के किसी भी प्रयास का समाज की ओर से जोरदार प्रतिरोध होता है।

नागरिक प्रशासन पर जीवन की गुणवत्ता, आजीविका और अवसर उपलब्ध कराने का दारोमदार होता है। नागरिक प्रशासन के कामकाज से आम जन खिन्न हैं। ऐसा महसूस किया जाता है कि कुछ विशेष लोगों के पास अथाह संसाधनों और अवसरों तक पहुंच की सुविधा है, जबकि एक बड़े वर्ग को समानतापूर्वक व्यवहार के लिए संघर्ष करना पड़ता है। यह बात पानी, स्वच्छता, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी सामाजिक अवसंरचनाएं सुनिश्चित करने से लेकर कामकाज और व्यावसायिक प्रशिक्षण तक पर लागू होती है। इसी प्रकार, जीवन, स्वतंत्रता एवं संपत्ति की रक्षा को लेकर आम आदमी के प्रति पुलिस प्रशासन का व्यवहार भी संतोषजनक नहीं। साधन संपन्न लोग अक्सर जघन्य अपराध करके भी बच निकलते हैं और आम आदमी को बुरे व्यवहार के साथ ही उत्पीड़न का दंश भी झेलना पड़ता है। न्यायिक तंत्र द्वारा न्याय देने में देरी होती है। अंतिम फैसला आने में वर्षों बीत जाते हैं। ‘न्याय में देरी अन्याय के समान है’ वाली कहावत भारत में अधिकांश अदालती मामलों पर सटीक बैठती है। न्याय प्रक्रिया में विलंब वित्तीय रूप से भी बहुत महंगा पड़ता है, क्योंकि आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए उसका व्यय वहन करना आसान नहीं। संस्थागत ढांचे की कमियां तमाम तरह की गड़बड़ियों और भ्रष्टाचार के लिए द्वार खोलती हैं। तंत्र में पारदर्शिता एवं जवाबदेही के अभाव के साथ-साथ अनुचित आचरण का बोलबाला है। इन संस्थानों के परिचालन का व्यापक विश्लेषण दो मूलभूत बाधाओं की ओर संकेत करता है। पहला तो यही कि इन संस्थानों का ढांचा औपनिवेशिक काल की विरासत से जुड़ा है। दशकों से इन संस्थानों से मांग और अपेक्षाएं बढ़ने के साथ ही उनके स्वरूप में भी विविधता आई है। इन संस्थानों के ढांचे और परिचालन में अभी तक किए गए मामूली परिवर्तन अपेक्षित परिणामों की दृष्टि से अपर्याप्त रहे हैं। दूसरा संकेत यही है कि ये संस्थान भ्रष्टाचार के केंद्र बन गए हैं। जवाबदेही के अभाव ने भ्रष्टाचार को बेलगाम और व्यापक बना दिया है। ऐसे में यह आवश्यक ही नहीं अनिवार्य हो चला है कि इन संस्थानों का नए सिरे से कायाकल्प किया जाए। इसमें कोई संदेह नहीं कि भ्रष्टाचार एक मानवीय प्रवृत्ति है, जिसे पूरी तरह समाप्त करना तो संभव नहीं, किंतु शिक्षा, जवाबदेही, पारदर्शी और तकनीक के उपयोग से उस पर लगाम अवश्य लगाई जा सकती है। इस दिशा में यदि समय रहते दृढ़ इच्छाशक्ति और पर्याप्त उत्साह के साथ काम नहीं किया गया तो जनता का जो विश्वास पहले ही डगमगाया हुआ है, वह पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। अमेरिकी राजनेता हेनरी क्ले ने उचित ही कहा है कि, ‘सरकार एक न्यास है एवं अधिकारी उसके न्यासी और न्यास एवं न्यासी लोगों के लाभ के लिए ही गठित होते हैं।’

समय-समय पर तमाम सामाजिक-राजनीतिक पंडित दूसरी पीढ़ी के सुधारों की बात करते रहते हैं, लेकिन उनके सुझाव कतिपय आर्थिक कारकों जैसे पूरक सुधारों तक सीमित रह जाते हैं। वास्तव में, दूसरी पीढ़ी के सुधारों में समूचे संस्थागत ढांचे के पुनरुत्थान की बात होनी चाहिए। सुधारों के संबंध में पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जीआर फोर्ड का यह कथन सदैव प्रासंगिक रहेगा, जिसमें उन्होंने कहा था, ‘कोई महान राष्ट्र अपने दायित्वों से मुंह नहीं मोड़ सकता। जिन दायित्वों से आज मुंह मोड़ लिया जाए तो वे भविष्य में किसी विकराल संकट का रूप धारण कर लेते हैं।’ हम भी एक महान राष्ट्र का निर्माण चाहते हैं और ऐसा राष्ट्र समतावादी समाज की संकल्पना को साकार किए बिना आकार नहीं ले सकता। एक ऐसा समाज जिसे न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की पूर्णता प्राप्त हो।


घरेलू बचत का बदलता रुझान

परमजीत सिंह वोहरा

पिछले दिनों जब भारतीयों की बचत के आधिकारिक आंकड़े घोषित हुए, तो एक बार फिर यह प्रमुखता से स्थापित हुआ कि भारतीय अर्थव्यवस्था को सिर्फ लोगों की क्रय क्षमता से जोड़ कर देखना तर्कसंगत नहीं है। वैसे तो पुराने समय से ही भारतीय समाज में आर्थिक बचत करने की परंपरा रही है, लेकिन वैश्वीकरण के इस दौर में जब भौतिकवादी जीवन आर्थिक विकास का प्रतिबिंब माना जाता है, तब भी अगर आम भारतीय अपनी आर्थिक बचत के प्रति जागरूक है, तो यह निश्चित रूप से भारत के आर्थिक विकास के लिए एक अच्छा संकेत है।

भारतीय अर्थव्यवस्था में अगर हम आर्थिक बचत के आंकड़ों का विश्लेषण करें, तो 2004 से 2010 तक वर्ष-दर-वर्ष आर्थिक बचत और जीडीपी का प्रतिशत लगातार बढ़ता रहा। 2010 में आर्थिक बचत 36.9 प्रतिशत थी, जो आज तक का अधिकतम स्तर है। उस दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रतिवर्ष विकास दर भी तेजी से बढ़ रही थी। 2011 के बाद से आर्थिक बचत के आंकड़ों में कमी देखी गई है और इसके कारणों में आर्थिक विकास की दर में कमी आना, महंगाई का ऊपरी स्तर पर चले जाना तथा शुरुआती कुछ वर्षों में देश की राजनीतिक सत्ता के प्रति असंतोष की भावना मुख्य थी। इसी बीच कोरोना महामारी ने एक वैश्विक संकट के रूप में दस्तक दी, जिसने संपूर्ण समाज के लिए आर्थिक परेशानियां भी एकाएक पैदा कर दी। 2020-21 के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था में आर्थिक बचत जीडीपी का 28 प्रतिशत थी, क्योंकि पूर्णबंदी के दौरान बड़ी मात्रा में लोगों का रोजगार चला गया था। फिर भी सकारात्मक रुख इस बात से स्पष्ट होता है कि 2021-22 में आर्थिक बचत जीडीपी के तीस प्रतिशत से ऊपर रही। यानी भारतीयों में आर्थिक बचत का रुझान लगातार बरकरार है।

जब भी आर्थिक बचत की बात होती है, तो व्यक्ति के दिमाग में दो प्रश्न एक साथ उठते हैं। पहला, शायद प्रति व्यक्ति खर्चा कम हो रहा है, इसलिए आर्थिक बचत बढ़ रही है। दूसरा, प्रति व्यक्ति वित्तीय आय बढ़ रही है, जिससे आर्थिक बचत भी बढ़ रही है। ये दोनों प्रश्न परस्पर विरोधाभासी हैं। पहला प्रश्न नकारात्मक रुख लिए है, तो दूसरा सकारात्मक सोच का है। इन सबके बीच एक बात और चकित करती है कि भारतीयों का आर्थिक बचत करने का रुझान बड़ी तेजी से बदल रहा है। भारतीयों के रुख को किसी एक पक्ष पर अनुमानित करना बड़ा मुश्किल है। मसलन, पिछले एक दशक में घरेलू बचत का बैंकिंग जमाओं में हिस्सा बड़ी तेजी से गिरा है। यह बात वर्षों से चली आ रही इस सोच को एकाएक दरकिनार कर देती है कि भारतीयों के लिए आर्थिक निवेश की पहली प्राथमिकता बैंकों में जमा करना है। 2011 के दशक तक घरेलू बचत का अट्ठावन प्रतिशत बैंकों की जमाओं में सम्मिलित होता था, जो कि 2020-21 में घट कर अड़तीस प्रतिशत ही रह गया। अगले वर्ष 2021-22 में यह आंकड़ा तेजी से घट कर पच्चीस प्रतिशत के स्तर पर आ गया। इसका एक कारण बैंक की जमाओं पर मिलने वाले ब्याज में तेजी से आई गिरावट है। दूसरा कारण कोरोना प्रभावित वर्षों में प्रति व्यक्ति आय में आई गिरावट है।

गौरतलब है कि पिछले कुछ वर्षों से निवेश को लेकर बैंकिंग क्षेत्र मुख्य आकर्षण का केंद्र नहीं रहा है, लेकिन भारतीयों की घरेलू बचत लगातार बढ़ रही है। स्पष्ट है कि आर्थिक निवेश के कई दूसरे स्रोत लोगों की प्राथमिकता में शामिल हो रहे हैं। मसलन, कोरोना महामारी के दौरान बीमा की तरफ आकर्षण तेजी से बढ़ा। भारत में जीवन बीमा आर्थिक निवेश का सदा प्रमुख स्रोत रहा है। प्रत्येक भारतीय को जीवन बीमा में आर्थिक निवेश का विचार पारिवारिक सोच के रूप में प्राप्त होता है। कोरोना महामारी के दौरान चिकित्सा बीमा की तरफ लोगों का रुझान एकाएक तेजी से बढ़ा, पर यह स्थायी रूप नहीं ले पाया। अगले वित्तवर्ष में ही इसमें कमी देखी गई। बीमा व्यवसाय के लिए यह बड़ी चिंता का विषय है कि क्यों भारत में आज भी बीमा का चलन बहुत कम है? कोरोना महामारी के वर्ष में जरूर यह 3.8 प्रतिशत से एकाएक बढ़ कर 4.2 प्रतिशत हो गया था। गौरतलब है कि बीमा का वैश्विक औसत आंकड़ा सात प्रतिशत है और कई विकसित देशों- अमेरिका, ब्रिटेन आदि- में तो यह दस प्रतिशत से ऊपर रहता है। बीमा कंपनियों को इस संबंध में जरूर सोचना चाहिए कि भारत में प्रीमियम की लागत इस संदर्भ में अधिक तो नहीं है?

इस बात की तस्दीक इन दिनों प्रमुखता से हो रही है कि अब भारतीयों की आर्थिक बचत का रुख बड़ी तेजी से भारतीय पूंजी बाजार की तरफ हो रहा है। आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2021-22 में दस लाख नए निवेशक भारतीय पूंजी बाजार से जुड़े हैं, जिन्होंने म्यूचुअल फंड में सिप (सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान) के माध्यम से आर्थिक निवेश किया। इसमें एक वर्ष के दौरान ही घरेलू बचत का चार प्रतिशत से अधिक रुझान भारतीय पूंजी बाजार की तरफ देखने को मिला है। इसमें ‘हिस्सेदारी’ में प्रत्यक्ष निवेश तथा म्यूचुअल फंड दोनों एक मुख्य विकल्प के रूप में उभर कर सामने आए हैं। पिछले वित्तवर्ष में बड़ी संख्या में ‘आइपीओ’ में निवेश का विकल्प भी पूंजी बाजार में आर्थिक निवेश के लिए उपलब्ध था, जिनके माध्यम से कंपनियों ने बड़ी मात्रा में पूंजी जुटाई। एलआइसी का आइपीओ तो सबसे अधिक चर्चा में रहा। नए दौर के स्टार्टअप में ‘पेटीएम’ और ‘जोमैटो’ के आइपीओ ने भी खूब चर्चा बटोरी। शायद यही मुख्य कारण था कि कोरोना काल में जब आर्थिक मंदी का दौर था, तब भी भारतीय पूंजी बाजार ने लगातार बढ़त बनाए रखी, क्योंकि उस समय बड़ी संख्या में नए निवेशक भारतीय पूंजी बाजार से जुड़े। उस दौरान वैश्विक निवेशकों की पहली प्राथमिकता भी चीन के बजाय भारत ही रहा। यह भी देखने को मिला कि भारतीयों का पेंशन तथा भविष्य निधि (प्रोविडेंट फंड) में भी निवेश के प्रति रुझान खूब बढ़ा है।

एक बात, जो आर्थिक बचत के आंकड़ों के विश्लेषण के बीच में एक विकट स्थिति को इंगित करती है, कि भारतीय समाज में इन दिनों महंगी कारों और महंगे घरों (फ्लैट्स) की खरीदारी तेजी से बढ़ रही है। इससे इस चिंता को बल मिलता है कि कहीं भारत में अमीरों और गरीबों के बीच बढ़ रही आर्थिक असमानता ही तो नहीं इस आर्थिक बचत की तेजी का प्रतीक है? एक रिपोर्ट के मुताबिक 2020-21 और 2021-22 में करीब चार लाख करोड़ रुपए का वित्तीय निवेश भवन निर्माण की विभिन्न परियोजनाओं में भारतीयों द्वारा किया गया। इस संदर्भ में यह भी सोचा जा सकता है कि शायद कोरोना महामारी की वजह से कई अप्रवासी भारतीय अपने मुल्क लौटे हैं और उन्हीं द्वारा बहुतायत में इन घरों की खरीदारी की गई है। जमीन की तरह इस दौरान सोने और चांदी में भी निवेश के प्रति रुझान देखने को मिला है। यह भी समझना होगा कि पिछले वित्तवर्ष में महंगाई के आंकड़े हमेशा ऊपर ही रहे हैं, चाहे इसके पीछे कुछ वैश्विक कारण हों, जिनमें रूस-यूक्रेन युद्ध या रुपए के मुकाबले डालर का तुलनात्मक रूप से अधिक मजबूत होना। इन स्थितियों ने भारतीय निवेशकों को यह सोचने पर मजबूर किया है कि सात प्रतिशत से अधिक की महंगाई दर के सामने पांच प्रतिशत की बैंक जमाओं का ब्याज निश्चित रूप से नकारात्मक ही है। इसीलिए शायद उन्होंने अपने रुख को मोड़ते हुए शेयर बाजार आदि को प्राथमिकता देने की कोशिश की है।


समाज की सोच में आ रहा बदलाव

सुशील देव

भारत में यौन शिक्षा को लेकर अभी भी चर्चा रहस्यमयी या मायावी बनी हुई है। कोई भी इस विषय पर खुलकर चर्चा नहीं करना चाहता जबकि यह मसला सामाजिक तौर पर बेहद गंभीर है। विश्व की कई संस्थाएं इसे समाज के लिए अग्रणी मुददों में गिनती हैं। यूनेस्को के मुताबिक 39 फीसदी देशों के पास अभी यौन शिक्षा को लेकर राष्ट्रीय नीति बनी हुई हैं, वहीं दुनिया के मात्र 20 फीसदी देशों में यौन शिक्षा पर कानून है। चौंकाने वाली बात यह है कि जिस सेक्स एजुकेशन यानी यौन शिक्षा को लेकर लोग आपस में खुलकर बात नहीं करना चाहते, उसी यौन शिक्षा पर दुनिया के कुछ देशों में कानून भी लागू हो चुका है। यह कानून यौन शिक्षा के प्रति वहां जागरूकता का संदेश दे रहा है। यूनेस्को की एक रिपोर्ट के मुताबिक मात्र 20 फीसदी देशों में यह कानून लागू है जबकि 39 फीसदी देशों के पास इस शिक्षा को लेकर राष्ट्रीय नीति तैयार हो चुकी है। रिपोर्ट यह भी कहा गया है कि प्राथमिक शिक्षा में यौन शिक्षा 68 फीसदी देशों और माध्यमिक शिक्षा में 76 देशों में अनिवार्य हो गई है जबकि ज्यादातर देशों में यौन और घरेलू व्यवहार तथा लैंगिक हिंसा जैसे विषय शामिल हैं।

भारत की बात करें तो कुछ आंशिक पहल को छोड़कर यहां अभी इस मसले पर कोई ठोस नीति या कानून नहीं बन पाया है। दो तिहाई गर्भनिरोधक मुद्दे को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना अच्छा कदम माना जा सकता है। मगर खुलकर इसकी पैरवी सरकारी स्तर पर अभी भी नहीं हो पाई है । पाठयक्रम के अंर्तगत विस्तृत कामुकता शिक्षा, कामुकता के ज्ञान, भावनात्मक, शारीरिक और सामाजिक पहलुओं के बारे में पढ़ाने अथवा सीखने का पाठ्यक्रम शामिल है। इसका मकसद बच्चों में ज्ञान, दृष्टिकोण और मूल्यों को समझाना है। यह उनके स्वास्थ्य, सम्मान और कल्याण का अहसास कराने के लिए उन्हें सशक्त बनाएगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि कामुकता मानव जीवन का अभिन्न अंग है। हालांकि रिश्ते और सेक्स के बारे में युवाओं को वैज्ञानिकता के साथ विकसित करना थोड़ा मुश्किल है।

मगर यह भी सच्चाई है कि भ्रमित करने वाली जानकारी या संदेश बचपन से वयस्क होने तक उनके जीवन मूल्यों को और सहज बना देते हैं। बचपन में घरों के अंदर मां-बाप या बुजुर्गों के माध्यम से इस शिक्षा की नींव पड़नी चाहिए। फिर स्कूलों में शिक्षकों या गुरुजनों के माध्यम से यौन शिक्षा आधारित यौन शिक्षा ज्ञान का प्रसार होना चाहिए। हालांकि हमारे देश में ऐसे विचारों को लेकर विरोध भी हुए हैं। बुद्धिजीवियों का एक वर्ग इसकी आलोचना करता है, और कहता है कि भारतीय सभ्यता-संस्कृति के लिए यह उपयुक्त नहीं है। सनद रहे कि 2007 में हालांकि भारत सरकार ने किशोर शिक्षा कार्यक्रम की शुरुआत की थी। मगर तब भी अंतरंग संबंधों के बारे में खुलकर बातचीत नहीं हुई। स्थिति यह है कि आज भी हम बगैर शर्म या हिंचक के ‘सेक्स’ शब्द भी बोल नहीं सकते। मगर युवाओं में उनके शरीर में होने वाले परिवर्तनों की जानकारी के लिए भी यह शिक्षा जरूरी। इसकी पैरवी करने वाले, विरोध करने वालों से ज्यादा हैं। आज लड़कियों के मासिक धर्मचक्र के बारे में उन्हें समझाने की जरूरत है। सेक्स के बारे में जागरूकता इसलिए भी जरूरी है कि गर्भधारण के समय एचआईवी, एड्स जैसी बीमारियों से कैसे बचाव किया जाए, उन्हें पता होनी चाहिए या उन्हें निरोधक सामग्री खरीदने में शर्म महसूस न हो, इसलिए भी यह शिक्षा जरूरी है।

विशेषज्ञों के मुताबिक रेप या जबरदस्ती वाले शारीरिक संबंधों को समाप्त करने के लिए इस शिक्षा को महत्त्वपूर्ण माना गया है। महिला एवं बाल विकास विभाग के अध्ययन के मुताबिक ज्यादातर बच्चे आज इस तरह की शिक्षा के अभाव में यौन उत्पीड़न के शिकार हो रहे हैं। समाज में यौन उत्पीड़न के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। यौन अपराध बढ़ रहे हैं। भारत में आज भी यौन शिक्षा को लेकर खुलकर चर्चा नहीं हो रही है। इसे सार्वजनिक बोलचाल में आज भी भारी झिझक एवं बेचैनी के साथ प्रस्तुत किया जाता है। विरोध में तर्क है कि कामुकता के बारे में शिक्षा निजी मामला है, और यह भारतीय संस्कृति के खिलाफ जाती है। यह किशोरों को अनैतिकता और स्वच्छता की ओर ले जाती है, इसलिए सरकार को किसी भी रूप में इस शिक्षा को बढ़ावा दिए जाने का सुझाव नहीं दिया गया।

हालांकि भारत की हालिया नई शिक्षा नीति में इसे लेकर कुछ मामूली तब्दीली जरूर हुई है। इससे हमारे समाज का कितना भला होगा, कहना मुश्किल है। लेकिन हम दावे के साथ कह सकते हैं कि हमारी सामाजिक सोच के स्तर में भी इस विषय को लेकर बदलाव आया है, और बात ‘गुड टच और बैड टच’ से आगे निकली है। इससे हमारे देश के बच्चों में यौन शिक्षा के प्रति जागरूकता आएगी और हमारे युवाओं की सोच में बदलाव आएगा। जाहिर है कि इससे देश भी बदलेगा ।


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