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10-07-2021 (Important News Clippings)

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10 Jul 2021
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10-07-2021 (Important News Clippings)

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Date:10-07-21

Undead section

The invalid Section 66A is often invoked out of ignorance, but it serves as a tool of harassment

Editorial

It is quite disconcerting that the Supreme Court has been informed for the second time in two years that Section 66A of the IT Act, which was struck down as unconstitutional six years ago, is still being invoked by the police and in some trial courts. One can see why the Court deemed it “a shocking state of affairs” when a petition by the People’s Union for Civil Liberties (PUCL) came up for hearing. Section 66A made messages deemed by the police to be offensive or menacing to anyone, or those that caused “annoyance”, a criminal offence if these were sent through a computer or computer resource. It prescribed a prison term of up to three years on conviction. In its landmark judgment in Shreya Singhal (2015), the Court ruled that the provision was vague and violated the freedom of free speech. It was so broadly defined that it took into its sweep protected speech also, and therefore upset the balance between the exercise of the free speech right and the imposition of reasonable restrictions on it. In January 2019, too, the Court’s attention was drawn to the same problem of the invalidated provision being used by the police to register cases based on complaints. Not much seems to have changed since then, and it is quite surprising that the police headquarters and prosecutors in the various States had not disseminated the effect of the Court ruling among officers manning police stations.

There were also instances of courts framing charges under Section 66A even after lawyers had cited the 2015 judgment. The PUCL has said as many as 745 cases are still pending in district courts in 11 States. It is not difficult to surmise that police officers who receive complaints and register them as First Information Reports may not be aware of the judgment, though one cannot rule out instances of the section being invoked deliberately as a tool of harassment. Ignorance of the law is no excuse for the citizen, and it must equally be no excuse for police officers who include invalidated sections in FIRs. Recently, police in Uttar Pradesh booked a journalist for defamation under Section 500 of the IPC, even though the Supreme Court has ruled that defamation can be pursued only by way of private complaints and there can be no FIR. The current hearing may result in directions to States and the police, as well as the court registries, for appropriate advisories to both station-house officers and magistrates, but it is not necessary for those concerned to wait for such orders. Police chiefs and the directorates of prosecution must proactively begin a process of conveying to the lower courts and investigators all important judgments and their effect on the practices relating to investigation, prosecution and the framing of charges from time to time.


Date:10-07-21

राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी खतरा है मतांतरण

दिव्य कुमार सोती, ( लेखक काउंसिल ऑफ स्ट्रेटजिक अफेयर्स से संबद्ध सामरिक विश्लेषक हैं )

पिछले दिनों एक बड़े मतांतरण रैकेट का पता चला। इस्लामिक दावा सेंटर के साये में चल रही मतांतरण की इस मुहिम में लगे इस्लामिक कट्टरपंथियों ने सैकड़ों की संख्या में मूक-बधिरों तक का मतांतरण करा डाला। मतांतरण में लिप्त लोग ‘दावा’ की उसी इस्लामी संकल्पना पर काम कर रहे थे, जिसे आगे बढ़ाने के लिए हाफिज सईद जमात उद दावा चलाता है। यह चौंकाने वाला रहस्योद्घाटन इस ओर इंगित करता है कि मतांतरण के अंतरराष्ट्रीय अभियान से जुड़ी संस्थाएं समाज के उन वर्गों का भी गहराई से सर्वेक्षण करती रहती हैं, जिनकी ओर आम जनमानस और सरकारों का ध्यान कम ही जाता है। यह पूरा मामला यह भी दिखाता है कि मतांतरण को अपना मिशन बनाने वाली संस्थाएं मूक-बधिर, दिव्यांग और अनाथ बच्चों के बीच में जो भी काम करती हैं, वह मानवीयता से प्रेरित होकर नहीं, बल्कि अपने मत-मजहब के अनुयायियों की संख्या थोक के भाव बढ़ाने के मकसद से करती हैं। इस्लामिक दावा सेंटर को विदेशी फंडिंग मुहैया कराने वाली कई संस्थाएं तथाकथित रूप से शिक्षा के क्षेत्र में काम करती हैं, लेकिन मतांतरण से जुड़े प्रश्न यहीं तक सीमित नहीं हैं।

मतांतरण रैकेट का मास्टरमाइंड उमर गौतम नामक एक व्यक्ति स्वयं पहले हिंदू धर्म से इस्लाम में मतांतरित हुआ था। उसके बाद उसने जो कुछ किया, वह स्वामी विवेकानंद के भारतीय परिप्रेक्ष्य में मतांतरण पर दिए उस वक्तव्य को ही चरितार्थ करता है कि हिंदू धर्म छोड़कर जाने वाला व्यक्ति अपने मूल धर्म के प्रति शत्रुता का भाव रखने लगता है। इस शत्रुता भाव ने भारत के इतिहास में नृशंस नरसंहारों से लेकर देश के बंटवारे तक को घटित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। दक्षिण भारत के मंदिरों को ध्वस्त करने वाले मलिक काफूर से लेकर मजहब के नाम पर देश का विभाजन कराने वाले मोहम्मद अली जिन्ना तक इसके असंख्य उदाहरण हैं। आज भी कश्मीर में बड़े आतंकी कमांडरों के हिंदू उपनाम बताते हैं कि उनके पूर्वजों का मतांतरण कुछ पीढ़ी पहले ही हुआ है। पूर्वोत्तर भारत में दशकों से सक्रिय एनडीएफबी, एनएलएफटी जैसे उग्रवादी संगठन पूरी तरह ईसाई कट्टरपंथी संगठन ही हैं। इन प्रदेशों का ईसाईकरण और इन अलगाववादी आंदोलनों का जन्म साथ-साथ हुई घटनाएं हैं। मध्य भारत के नक्सल प्रभावित भागों में भी ईसाई मिशनरी बेहद सक्रिय हैं। ऐसे में मतांतरण के राष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ने वाले प्रभाव को भला कैसे नकारा जा सकता है, विशेषकर भारत जैसे देश में, जिसका मजहब के आधार पर विभाजन हुए सात दशक ही बीते हों। आखिर भारत इतने योजनाबद्ध तरीके से कराए जा रहे मतांतरण को कैसे नजरअंदाज कर सकता है?

आखिर भारत के वही प्रदेश अलगाववादी मुहिम के चलते हिंसाग्रस्त क्यों हैं, जहां पिछली कुछ सदियों में बड़े पैमाने पर मतांतरण हुआ? स्वतंत्र भारत का इतिहास यह पाठ पढ़ाता है कि देश में दो बार बड़े पैमाने पर लोगों का पलायन हुआ। एक बार 1990 में इस्लामिक कट्टरपंथ के चलते कश्मीर से हिंदुओं को सब कुछ छोड़कर भागना पड़ा और दूसरी बार 1997 में रिआंग या ब्रू हिंदुओं को मिजोरम से ईसाई कट्टरपंथियों के हमलों के चलते भागना पड़ा। दोनों ही मामलों में यह पलायन लगभग स्थायी ही बन गया और ये लोग कभी वापस नहीं लौट पाए। मतलब भारत के बहुसंख्यक समाज को उन प्रदेशों से पलायन करना पड़ा, जहां पिछले कुछ सौ वर्षों में बड़े पैमाने पर मतांतरण के चलते वे अल्पसंख्यक हो गए थे।

भारत विश्व का अकेला देश है, जहां अल्पसंख्यक मतों के लोग मतांतरण अभियान चलाने का संवैधानिक अधिकार बनाए रखना चाहते हैं और बहुसंख्यक मतांतरण पर रोक लगाना चाहते हैं। अन्यथा स्वाभाविक प्रक्रिया यह होती है कि अपने अनुयायियों को बहुसंख्यकों द्वारा मतांतरण कराए जाने से बचाने के लिए अल्पसंख्यक समुदाय मतांतरण पर प्रतिबंध की मांग किया करते हैं, जो स्वाभाविक भी है। यह सामान्य समझ की बात है कि विदेश से मतांतरण कराने के लिए अरबों रुपये यूं ही कोई क्यों भेजेगा? दरअसल मतांतरण ईसाई और इस्लामिक देशों द्वारा अपना प्रभाव बढ़ाने के प्रयासों का हिस्सा है और अक्सर भूराजनीतिक बिसात पर इसका उपयोग किया जाता है। उदाहरण के लिए नेपाल में पैर पसारते माओवाद और उसके माध्यम से बढ़ते चीनी प्रभाव को कम करने के लिए पश्चिमी देशों की खुफिया एजेंसियां ईसाई मिशनरियों का उपयोग करती आई हैं, जिसका असर नेपाल में बढ़ते मतांतरण और घटते भारतीय प्रभाव के रूप में दिखता है।

चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की बढ़ती ताकत को काबू करने के लिए पश्चिमी देश खुद चीन के भीतर ईसाई मिशनरी गतिविधियों को प्रोत्साहन देते आए हैं। कुछ वर्ष पहले अमेरिका के तत्कालीन उपराष्ट्रपति माइक पेंस ने सार्वजनिक रूप से इस पर प्रसन्नता जताई थी कि 13 करोड़ चीनी ईसाई बन चुके हैं। अमेरिकी उपराष्ट्रपति के इस व्यवहार की तुलना नेपाल के हिंदू राष्ट्र न रह जाने को लेकर भारतीय उदासीनता से देखते ही बनती है। बहरहाल यह संख्या (13 करोड़) चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों की संख्या से चार करोड़ ज्यादा है और आने वाले कुछ दशकों में चीन विश्व की सबसे बड़ी ईसाई आबादी का घर बन सकता है। इससे चिंतित चीनी कम्युनिस्ट पार्टी कन्फ्यूशियस के उन आध्यात्मिक विचारों पर आधारित प्राचीन चीनी संस्कृति को पुनर्जीवित करने पर करोड़ों डॉलर खर्च करने में लगी हुई है, जिन्हें ध्वस्त करने के लिए एक समय माओ ने सांस्कृतिक क्रांति जैसा खूनी अभियान चलाया था।

अमेरिका के जाने माने सामरिक चिंतक रॉबर्ट कापलान लिख चुके हैं कि किस तरह अमेरिकी खुफिया एजेंसियां अमेरिकी फौज से सेवानिवृत्त हुए लोगों को ईसाई मिशनरी बनाकर उनका उपयोग म्यांमार जैसे देशों में आदिवासियों का मतांतरण कराने और उन्हें सशस्त्र संघर्ष में सहायता करने के लिए करती आई हैं। अपने चारों ओर मतांतरण के जरिये चल रहे इस भूराजनीतिक खेल की हम अनदेखी नहीं कर सकते। मतांतरण में लिप्त जिन शक्तियों से हमारा मुकाबला है उनके लिए मजहब न तो राजनीति से अलग है और न ही भू-राजनीति से। दूसरे देशों में मतांतरण कराना इन शक्तियों की विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।


Date:10-07-21

सरकारी मनमानापन

संपादकीय

भारतीय राज्य की प्रवृत्ति अपने नागरिकों के साथ बंधुआ जैसा व्यवहार करने की हो गई है। उनके साथ सत्ताधारी वर्ग का व्यवहार मनमाना होता है। केंद्र और राज्यों की सत्ता में चाहे जिस दल की सरकार हो, सत्ता का यह स्वभाव नहीं बदलता। इसके तीन प्रमाणों पर बात करते हैं। पहली बात, देश की जेलों में बंद दो तिहाई से अधिक लोगों पर कोई अपराध प्रमाणित नहीं है, वे दशकों नहीं तो भी वर्षों से अदालती प्रक्रिया के चलते जेल में बंद हैं। स्टेन स्वामी की तरह उनमें से कई इंतजार करते हुए ही इस दुनिया से गुजर जाते हैं।

दूसरा, कर अधिकारियों को कर वसूली के 85 फीसदी मामलों में उच्च न्यायालयों में तथा 74 फीसदी मामलों में सर्वोच्च न्यायालय में हार का सामना करना पड़ता है। क्या किसी को अदालतों का समय बरबाद करने के लिए जवाबदेह ठहराया जाता है? और इस बात के लिए भी कि यह करदाताओं के लिए प्रताडऩा और आर्थिक क्षति का सबब बनता है? यकीनन नहीं। तीसरे उदाहरण की बात करें तो शेयर बाजार नियामक नोटिसों के जरिये जो जुर्माना लगाता है, उसका बमुश्किल एक फीसदी से थोड़ा अधिक ही वसूल पाता है। इस समाचार पत्र में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड द्वारा सन 2013 से अब तक 81,086 करोड़ रुपये के नोटिस जारी किए गए परंतु वह बमुश्किल 887 करोड़ रुपये ही वसूल कर पाया।

तीनों उदाहरण मनमानेपन की ओर संकेत करते हैं। या कहें तो सरकार की विभिन्न शाखाओं द्वारा ऐसे उत्साह का जो अंतत: नुकसानदेह साबित होता है। इस दौरान प्रताडि़त होने वाले नागरिकों के बारे में कुछ नहीं सोचा जाता। उनके लिए तो यह पूरी प्रक्रिया ही दंड के समान है। यदि आपने 20 वर्ष जेल में बिता दिए या कानूनी वजहों से दिवालिया हो गए तो फिर आप मामला जीतें या हारें, क्या फर्क पड़ता है? हमारे अपरिपक्व लोकतंत्र में इस बात को निराशा के साथ स्वीकार कर लिया गया है कि व्यवस्था ऐसे ही काम करती है। परंतु जब राज्य सत्ता बाहरी लोगों के साथ भी इसी तरह पेश आने लगती है तो उसे ऐसे प्रतिरोध का सामना करना पड़ता है जो आमतौर पर देश में देखने को नहीं मिलता। इसके भी तीन तात्कालिक उदाहरण हमारे सामने हैं- केयर्न, वोडाफोन और देवास मल्टीमीडिया। इनमें से पहले दो मामले अतीत से प्रभावी कराधान के हैं और इनमें भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एकमत से दिए गए निर्णयों में परास्त हो चुका है। अपील की प्रक्रियाएं चल रही हैं लेकिन केयर्न ने कई देशों में भारत की परिसंपत्तियां जब्त करने की पहल कर दी है। इनमें अचल संपत्ति, एयर इंडिया के विमान और सरकारी बैंकों की नकदी आदि शामिल हैं। देवास मल्टीमीडिया को एंट्रिक्स कॉर्पोरेशन (भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी की अनुषंगी) के खिलाफ एक अनुबंध को मनमाने ढंग से रद्द करने के मामले में जीत हासिल हो चुकी है।

यह विडंबना ही है कि इन तीनों मामलों की शुरुआत मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल में हुई। इनमें से दो की वजह बना अतीत से प्रभावी कराधान जो 2012 के बजट में प्रस्तुत किया गया था। ऐसा नहीं है कि इस प्रकार का कर केवल भारत ने लगाया है। प्रतिष्ठित कर प्रक्रिया वाले देशों ने भी विभिन्न परिस्थितियों में ऐसे कर कानून लागू किए हैं। लेकिन हमारे यहां एक संप्रभु कर मसले को निवेश का मुद्दा बना दिया गया और माना गया कि इनमें द्विपक्षीय निवेश गारंटी संधियों का उल्लंघन हुआ है। इसके चलते मोदी सरकार ने 50 ऐसी संधियांसमाप्त कर दीं। देवास एंट्रिक्स सौदा भी मनमोहन सिंह की सरकार ने विभिन्न आधारों पर समाप्त कर दिया था और इसरो के एक पूर्व चेयरमैन को किसी भी सरकारी पद पर प्रतिबंधित कर दिया गया था। देवास ने अमेरिकी अदालत में मामला उठाया और नौ मध्यस्थों तथा तीन अंतरराष्ट्रीय पंचाटों ने इस सौदे को समाप्त किए जाने को गैर कानूनी बताया। इनमें से हर मामले में एक अरब डॉलर से अधिक राशि शामिल है।

भाजपा ने 2014 के आम चुनाव में ‘कर आतंक’ को मुद्दा बनाया था और उसने इसरो के पूर्व चेयरमैन को सदस्यता देकर एक तरह से उनका पुनर्वास किया। परंतु सात वर्ष बाद भी जारी यह ‘आतंक’ सरकार के लिए शर्मिंदगी का सबब बना है। घरेलू कर मामलों की तरह सरकार यह मान सकती है कि अदालत में हारने के बावजूद उसका दावा बनता है लेकिन एक अंतर स्पष्ट है। घरेलू स्तर पर सरकार प्रक्रिया को दंड में तब्दील करने के लिए कोई जुर्माना नहीं चुकाती परंतु अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यदि एक बार आपके खिलाफ निर्णय हो गया तो सरकार को अपने कदमों का परिणाम भी सहन करना पड़ता है।

यदि ये झटके भी राज्य को अलग तरह से व्यवहार करने के लिए प्रेरित करे तो शायद वह अपने नए डिजिटल मीडिया नियमों पर पुनर्विचार करे क्योंकि यह मूल विधान के दायरे का उल्लंघन करता है और इसमें मनमानेपन की पूरी गुंजाइश है।


Date:10-07-21

मनमानी के मंच

संपादकीय

इंटरनेट पर संचालित सोशल मीडिया मंचों की कार्यपद्धति और उनके शक्ति विस्तार को लेकर कई बार अंगुलियां उठ चुकी हैं। पिछले दिनों जिस तरह नए सोशल मीडिया नियामक कानूनों को लेकर केंद्र सरकार और ट्विटर के बीच अप्रिय विवाद छिड़ा उससे साफ हो गया कि इन मंचों की ताकत काफी बढ़ चुकी है और वे सरकार को चुनौती तक देने से परहेज नहीं करते।

अभी सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि सोशल मीडिया के दुरुपयोग से चुनाव प्रक्रिया पर गलत प्रभाव पड़ सकता है। इस चिंता का संदर्भ हालांकि दिल्ली दंगों के मामले में दिल्ली विधानसभा की एक समिति द्वारा भारत में फेसबुक के मुखिया को तलब किए जाने पर उसकी तरफ से दायर याचिका थी, मगर इसे पिछले कई विवादों को इससे जोड़ कर देखा जा सकता है। जब सरकार ने नया नियामक कानून बनाया और सभी सोशल मीडिया मंचों को एक तय अवधि में उनका पालन करने को कहा, तो इस कानून को अभिव्यक्ति की अजादी पर हमला करार देकर उन्होंने इसे मानने से इनकार कर दिया। हालांकि फेसबुक और गूगल ने कुछ अनाकानियों के बावजूद उसे मान लिया, मगर ट्विटर का रुख अब भी अड़ियल बना हुआ है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस बयान के जरिए एक बार फिर रेखांकित किया है कि सोशल मीडिया मंच बेशक अभिव्यक्ति की अजादी का पोषण करते हैं, पर वे निरंकुश कतई नहीं हो सकते।

पिछले कुछ सालों में हुए चुनावों के दौरान सोशल मीडिया मंचों ने जनमत तैयार करने में कैसी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, यह किसी से छिपा नहीं है। कई मौकों पर यह तथ्य उजागर हो चुका है कि इन मंचों का संचालन करने वाली कंपनियां लोगों की व्यक्तिगत जानकारियां इकट्ठा करती और फिर उनका सौदा करती हैं। यानी राजनीतिक दलों, व्यावसायिक घरानों को वे जानकारियां बेच देती हैं। फिर वे कंपनियां लोगों का मानस बनाने के भी उपाय आजमाती हैं। उनके जरिए भ्रामक खबरें और अंकड़े भी खूब प्रसारित किए जाने लगे हैं।

अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में सोशल मीडिया मंचों के व्यापक दुरुपयोग के आरोप लगे। कई राजनीतिक दलों ने बकायदा इन मंचों पर सक्रिय रहने वाले अपने विभाग खोल लिए हैं, जो निरंतर संबंधित पार्टी के पक्ष में और प्रतिद्वंद्वी पार्टी के खिलाफ तथ्य परोसते रहते हैं। उन पर उनके नेताओं के बयानों और पलटवार की होड़ भी दिखती है। मुख्यधारा मीडिया के समांतर इन मंचों पर डिजिटल मीडिया का तेजी से प्रसार हुआ है, जिस पर दलगत झुकाव वाले चैनल, पोर्टल, फेसबुक पेज आदि बड़े पैमाने पर संचालित हो रहे हैं।

हालांकि डिजिटल मीडिया ने लोगों की अभिव्यक्ति को एक नया आयाम दिया है और जिस दौर में मुख्यधारा मीडिया पर पक्षपातपूर्ण पत्रकारिता के आरोप लग रहे हैं, उसमें इन मंचों ने निष्पक्ष और बेबाक पत्रकारिता को बचाए रखने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। कुछ लोगों की दलील है कि इन मंचों की बेबाक अभिव्यक्ति की वजह से कई बार सरकार को असहज स्थिति का सामना करना पड़ता है, इसलिए वह इन पर नकेल कसने के मकसद से नए नियामक कानून लेकर आई है। मगर उससे बड़ा सवाल यह है कि अगर इन मंचों की वजह से लोकतांत्रिक प्रक्रिया ही बाधित होती हो, तो उन पर अंकुश लगाने में क्यों गुरेज होना चाहिए।अगर इन मंचों को संचालित करने वाली कंपनियां अभिव्यक्ति की आजादी की आड़ में अपने व्यावसायिक हितों को साधने का प्रयास करती पाई जाएं, तो इसे भला कहां तक उचित कहा जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय की चिंता को इस संदर्भ में देखने की जरूरत है।


Date:10-07-21

नये संकट में अफगानिस्तान

संजीव पांडेय

अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने अफगानिस्तान को अधर में छोड़ दिया है। उसके और नाटो देशों की सैनिकों की वापसी जारी है। इस बीच अफगानिस्तान में घट रही घटनाएं अफगानी जनता के साथ-साथ एशियाई मुल्कों को भी परेशान कर रही हैं। विदेशी सैनिकों की वापसी के साथ ही तालिबान ने हमले तेज कर दिए हैं। कई इलाकों को अफगान सेना से छीन लिया है। इससे तालिबान की रणनीति अब स्पष्ट हो गई है। तालिबान ने काफी चालाकी से दोहा शांति वार्ता को धीमा रखा था। वह अमेरिकी सैनिकों की वापसी का इंतजार कर रहा था। दोहा में बातचीत अभी रुकी हुई है। पर तालिबान की इस बढ़ती ताकत से पाकिस्तान खुश है। हालांकि चीन और ईरान परेशान हैं। इसीलिए अफगानिस्तान की शांति प्रक्रिया में ईरान और चीन सक्रिय हो गए हैं क्योंकि दोनों मुल्कों को अलग-अलग कारणों से पाकिस्तान नियंत्रित तालिबान पर भरोसा नहीं है।

अफगानिस्तान के मौजूदा हालात 2001 से अलग हैं। बीस साल पहले अफगानिस्तान में अमेरिका और सहयोगी नाटो देशों का जो जोश देखते बनते था, वह हताशा में बदल चुका है। अफगानिस्तान में दो दशक से फंसे अमेरिका की स्थिति हर तरह से कमजोर हो गई है। दो दशकों में बड़ी संख्या में अमेरिकी सैनिक मारे गए। अफगानिस्तान के अभियान पर अब तक के सैन्य खर्च ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था को भी भारी नुकसान पहुंचाया। अमेरिका यह अच्छी तरह से समझ चुका है कि अफगानिस्तान की जमीन पर भी उसका वही हाल हो रहा है जो वियतनाम और इराक में हुआ। और आखिरकार इन देशों से भी उसे अपना बोरिया-बिस्तर समेटना ही पड़ा। इसीलिए अमेरिका अफगानिस्तान से बच कर भाग निकला।

आज अफगान सरकार लाचार नजर आ रही है। अफगान फौज कमजोर पड़ चुकी है। अब तक उसे अमेरिकी सैनिकों की ओर से ताकत मिली हुई थी। अत्याधुनिक हथियार थे और साथ ही अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी से मनोबल भी बना हुआ था। यह मनोबल अब टूट चुका है। तालिबान के खिलाफ लड़ने के बजाय अफगान सैनिक जान बचाने के लिए दूसरे देशों में भाग रहे हैं या फिर तालिबान के साथ ही मिल जा रहे हैं। इससे तालिबान लड़ाकों की ताकत बढ़ रही है। तालिबान का दावा है कि उसने देश के एक तिहाई जिलों पर पूरी तरह से नियंत्रण कर लिया है। इसलिए अब आने वाले दिनों में तालिबान और अफगान सैनिकों के बीच जंग और तेज होगी। इस खतरे से कोई इनकार नहीं करेगा कि अब तालिबान के आत्मघाती हमले बढ़ेंगे और इस हिंसा में बड़ी संख्या में निर्दोष नागरिक मारे जाएंगे। इन हालात में अफगानिस्तान में लंबा गृह युद्ध भी छिड़ सकता है।

अगर इसमें पड़ोसी मुल्कों ने हस्तक्षेप किया तो तालिबान की भी मुश्किलें ज्यादा बढ़ेंगी। कई जगहों पर स्थानीय अफगान आबादी ने तालिबान के खिलाफ हथियार उठा लिए हैं। वे अफगानिस्तान की सरकारी सेना को सहयोग दे रहे हैं। हालांकि तालिबान अभी भी रणनीतिक तौर पर चालाकियां बरत रहा है। उसे कई पड़ोसी देशों के अफगानिस्तान से जुड़े हितों की जानकारी है। इसलिए उसने चालाकी से कहा है कि वह जल्द ही लिखित शांति योजना अफगान सरकार को देगा। लेकिन तालिबान के तमाम दावों पर अफगान सरकार को कोई भरोसा नहीं है।

अफगानिस्तान में भविष्य की समस्या सिर्फ गृह युद्ध तक ही सीमित नहीं है। अगर संघर्ष बढ़ा तो इस मुल्क की माली हालत और बिगड़ती चली जाएगी। अफगान वित्त मंत्रालय के ताजा आंकड़े बता रहे हैं कि तालिबान के हमलों में तेजी की वजह से सरकार के राजस्व संग्रह को भारी नुकसान पहुंचा है। सीमा शुल्क की वसूली में कमी आई है। तालिबान ने अफगानिस्तान में दूसरे दर्जे वाले कुछ सीमा शुल्क केंद्रों पर अफगान सरकार के नियंत्रण को कमजोर कर दिया है। इस समय सीमा शुल्क संग्रहण पचास करोड़ अफगानी के बजाय पंद्रह करोड़ अफगानी प्रतिदिन रह गया है, यानी इसमें दो तिहाई रोजाना की गिरावट आई है। हालांकि एक तर्क यह भी दिया जा रहा है कि तालिबान के हमले को सिर्फ बहाना बनाया गया है। दरअसल सीमा शुल्क विभाग के अधिकारियों ने भ्रष्टाचार को बढ़ाया है। अधिकारी तालिबान का बहाना बना खुद पैसा बटोर रहे हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि अफगानिस्तान सरकार की आय कैसे बढ़ेगी, देश को चलाने के लिए पैसे आएंगे कहां से? जाहिर ऐसे हालात में अगर गृह युद्ध बढ़ा तो अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था ढह जाएगी।

सरकार की आमद कैसे बढ़े और देश का विकास कैसे हो, इस पर कोई ठोस योजना बना पाने में अमेरिका ने कोई काम नहीं किया। यह उसकी प्राथमिकता में कभी रहा भी नहीं। अमेरिकी नीति ऐसे देशों को फंसाए रखने की ही रही है। तभी अमेरिकी हित पूरे होते हैं। पिछले दो दशक से काबुल पर राज करने वाले अफगान नेताओं पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगते रहे हैं। हालांकि आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष के नाम पर पश्चिमी देशों ने अफगानिस्तान को खासी आर्थिक मदद दी। अफगानिस्तान में विकास कार्य तेज करने की कोशिशें भी की गईं। अफगानिस्तान सरकार को सैन्य सहयोग राशि भी दी गई। लेकिन इन सबका कोई लाभ दिखा नहीं। आज तालिबान लड़ाके अफगान सेना पर भारी पड़ रहे है। ऐसे में भविष्य में अफगानिस्तान को कहां से आर्थिक मदद मिलेगी, यह समय बताएगा। अफगानिस्तान को लेकर ईरान काफी सक्रिय है। उसने कुछ बातें स्पष्ट कर दी हैं। ईरान का कहना है कि तालिबान अफगानिस्तान का अकेला चेहरा नहीं है। अफगानिस्तान में तमाम जनजातियों की समावेशी सरकार बननी चाहिए।

ईरान किसी भी कीमत पर उज्बेक, ताजिक और हजारा जनजातियों को कमजोर नहीं होने देगा। हालांकि ईरान और तालिबान के बीच पिछले कुछ सालों में बेहतर संबंध विकसित हो गए हैं। लेकिन काबुल पर तालिबान के एकछत्र कब्जे को ईरान कतई पसंद नहीं करेगा। यही कारण है कि ईरान अब सीधा हस्तक्षेप शुरू कर चुका है। पिछले दिनों ईरान ने तेहरान में तालिबान के वरिष्ठ नेता शेर मोहम्मद अब्बास स्तानकजाई और अफगानिस्तान के पूर्व उपराष्ट्रपति युनूस कानूनी की वार्ता करवाई। इस वार्ता में ईरान ने अपनी मंशा साफ कर दी है कि वह काबुल में ईरान सारी जातियों की सम्मिलित सरकार चाहता है। ईरान कई कारणों से अफगानिस्तान को लेकर गंभीर है। ईरान की लंबी सीमा अफगानिस्तान से लगती है। इस सीमा पर वे राज्य हैं जहां तालिबान मजबूत है। ये अफगानी राज्य ईरान के लिए सामरिक और आर्थिक महत्त्व वाले हैं क्योंकि इन राज्यों से ही पाकिस्तान के क्वेटा से तुकेर्मेनिस्तान तक जाने वाला आर्थिक गलियारा गुजरता है। ईरान को पता है कि अगर काबुल पर तालिबान का एकछत्र राज्य हुआ तो इस इलाके में पाकिस्तान का सीधा प्रभाव बढ़ेगा और इससे ईरान के हित प्रभावित होंगे।

चीन भी अफगानिस्तान में सक्रिय हो गया है। वह अपने हित देख रहा है। चीन के स्वायत क्षेत्र शिनजियांग में सक्रिय उइगर अलगाववादियों के तालिबान और अलकायदा से करीबी संबंध है। चीन की सीमा भी अफगानिस्तान से मिलती है। इसलिए चीन को आशंका है कि अगर तालिबान काबुल को नियंत्रित करने में सफल हो गया तो उइगुर अलगाववादियों का मनोबल बढ़ेगा। चीन अफगानिस्तान में सैन्य अड्डा बनाने पर भी विचार कर रहा है। इसके अलावा वह अफगानिस्तान में आर्थिक निवेश और तेज करने की योजना बना रहा है। दरअसल तालिबान चीन की सबसे महत्त्वपूर्ण परियोजना बेल्ट एवं रोड इनीशिएटिव में भी बाधा बन सकता है। ऐसे हालात में अफगान सरकार, तालिबान और अपने हितों को देख कर विदेशी मुल्क अफगानिस्तान को कहां पहुंचाएंगे, यह वक्त ही बताएगा।


Date:10-07-21

जल्द सुलझे विवाद

संपादकीय

विदेशी कंपनियां व्यवसाय के लिए भारत आती हैं तो उन्हें भारत के कानूनों का पूरी तरह पालन करना चाहिए और भारतीय कानूनों के तहत होने वाले फैसलों का बिना ना नुकुर किए पालन करना चाहिए। भारत सरकार को भी इन कंपनियों से निपटते समय अंतरराष्ट्रीय कानूनों के बारे में सतर्क रहना चाहिए ताकि केयर्न एनर्जी जैसे विवाद न हों। ब्रिटेन की पेट्रोलियम कंपनी केयर्न एनर्जी के साथ जारी कर विवाद में भारत सरकार को भारी झटका लगा है। समझा जाता है कि केयर्न एनर्जी ने एक फ्रांसीसी अदालत से भारत सरकार से हर्जाने की वसूली के लिए पेरिस स्थित 20 भारतीय सरकारी संपत्तियों को जब्त करने का आदेश हासिल कर लिया है। दरअसल‚ एक मध्यस्थता अदालत ने दिसम्बर में भारत सरकार को आदेश दिया था कि वह केयर्न एनर्जी को ब्याज और जुर्माने की रकम मिलाकर 1.7 अरब ड़ॉलर (12, 580 करोड़़ रुपए) लौटाए। भारत सरकार ने इस आदेश का पालन करने से इनकार कर दिया था। तत्पश्चात केयर्न एनर्जी ने भारत सरकार की संपत्तियां जब्त करके इस राशि की वसूली के लिए विदेश में अनेक न्यायालयों में अपील की थी। इस पर एक फ्रांसीसी अदालत ने भारत सरकार की संपत्ति जब्त करने का आदेश दे दिया। कोर्ट ने 11 जून को केयर्न एनर्जी को भारत सरकार की संपत्तियों का टेकओवर करने की इजाजत दी। सात जुलाई को इसकी कानूनी प्रक्रिया पूरी हो गई। इन संपत्तियों में ज्यादातर फ्लैट हैं जिनकी कीमत लगभग 177 करोड़़ रुपये है। उधर भारत सरकार का कहना है कि उसे फ्रांस की किसी अदालत से कोई नोटिस‚आर्ड़र या संदेश नहीं मिला है। सरकार तथ्यों की जांच कर रही है और कोई नोटिस मिला तो जानकारों से चर्चा कर आगे कदम उठाए जाएंगे। इससे पहले दिसम्बर‚ 2020 के द हेग कोर्ट ऑफ अपील के आदेश को खारिज करने के लिए सरकार ने 22 मार्च को अनुरोध किया है। भारत सरकार विवाद के सर्वमान्य और शातिपूर्ण समाधान के लिए केयर्न के पदाधिकारियों से खुलकर बातचीत के लिए तैयार है। ऐसे ही एक अन्य मामले में भारत सरकार देवास मल्टीमीडि़या के निवेशकों की कानूनी चुनौती का सामना कर रही है‚ जो एयर इंडि़या की विदेश स्थित संपत्तियों को जब्त कर अपना बकाया वसूलना चाहते हैं। इन विवादों का जल्द से जल्द निपटारा होना जरूरी है।


Date:10-07-21

निजता के लिए

संपादकीय

आज के समय में निजता की रक्षा सबसे जरूरी है और किसी भी कंपनी या संस्थान को यह रियायत नहीं मिलनी चाहिए कि वह किसी की निजी सूचनाओं का उपयोग करे। निजता-नीति पर जारी विवाद के बीच वाट्सएप ने दिल्ली हाईकोर्ट में कहा है कि वह अपनी निजता-नीति पर रोक लगा चुका है। वाट्सएप ने लगे हाथ दिल्ली हाईकोर्ट को यह भी बताया है कि जब तक डाटा संरक्षण विधेयक प्रभाव में नहीं आ जाता, तब तक वह उपयोगकर्ताओं (यूजर्स) को नई निजता-नीति अपनाने के लिए बाध्य नहीं करेगा और इस नीति पर अभी रोक लगा दी गई है। एक बड़ी चिंता यह थी कि वाट्सएप की निजता-नीति को न मानने वाले यूजर्स को कुछ सुविधाओं से वंचित किया जाएगा। ऐसा अक्सर सोशल मीडिया कंपनियां करती हैं, यूजर्स से ज्यादा से ज्यादा जानकारी जुटाकर उसका व्यावसायिक उपयोग नई बात नहीं है। जैसे-जैसे यूजर्स अपनी सूचनाएं साझा करता है, वैसे-वैसे उसकी सुविधा बढ़ाई जाती है। लेकिन यह अच्छी बात है कि वाट्सएप ने अदालत के समक्ष यह भी साफ कर दिया है कि इस बीच वह नई निजता-नीति को नहीं अपनाने वाले यूजर्स के लिए उपयोग के दायरे को सीमित नहीं करेगा।

हालांकि, इसका सीधा संकेत है, भविष्य में यूजर्स को उतनी ही छूट मिलेगी, जितनी सूचना वे साझा करेंगे। सोशल मीडिया मंचों पर यह स्वाभाविक चलन है। कई सोशल मंच तो भरपूर सूचनाएं लेने के साथ ही यूजर्स का प्रत्यक्ष आर्थिक दोहन भी करते हैं या दोहन के बारे में सोचते हैं। आम लोगों व अदालतों को भी सजग रहना होगा कि आने वाले समय में कोई ऐसी चालाकी न हो कि यूजर्स चौतरफा ठगे जाएं। बहरहाल, अदालत में वाट्सएप के रुख का नरम पड़ना कुछ उत्साहजनक है। वाट्सएप की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने कहा है कि हम स्वत: ही इस (नीति) पर रोक लगाने के लिए तैयार हो गए हैं। हम लोगों को इसे स्वीकारने के लिए बाध्य नहीं करेंगे। वैसे वाट्सएप इसके बावजूद अपने यूजर्स के लिए अपडेट का विकल्प दर्शाना जारी रखेगा। मतलब, निजता की रक्षा की लड़ाई लंबी चलने वाली है। सोशल मीडिया कंपनियां बहुत मजबूत हो गई हैं और अपनी मनमानी आसानी से नहीं छोड़ेंगी। गौरतलब है कि अदालत फेसबुक और उसकी सहायक कंपनी वाट्सएप की अपीलों पर सुनवाई कर रही है, जो वाट्सएप की नई निजता-नीति के मामले में जांच के भारतीय प्रतिस्पद्र्धा आयोग के आदेश पर रोक लगाने से इनकार के एकल पीठ के आदेश के विरुद्ध दाखिल की गई हैं।

केंद्र सरकार को पूरी तरह से सतर्क रहना होगा। ये सोशल मीडिया कंपनियां इस कोशिश में हैं कि सरकार द्वारा डाटा संरक्षण विधेयक को लागू करने से पहले ही वे अपनी व्यावसायिक सुरक्षा का इंतजाम कर लें। अगर इन कंपनियों ने यूजर्स से पहले ही निजता संबंधी समझौता कर लिया, तो फिर सरकार का डाटा संरक्षण संबंधी कानून निरर्थक हो जाएगा। आज सजग नागरिकों पर सर्वाधिक जिम्मेदारी है। निजता को जिस तरह की सुरक्षा अमेरिका या यूरोपीय देशों में हासिल होती है, वैसी ही सुरक्षा भारतीयों को भी हासिल होनी चाहिए। भारत एक विशाल बाजार है, हम अपना डाटा आसानी से या मुफ्त में किसी को हाथ लगने नहीं दे सकते। सरकार को पूरी तेजी के साथ जरूरी कदम उठाने चाहिए, ताकि निजता संबंधी विवाद का पटाक्षेप जल्द से जल्द हो।


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