21-07-2021 (Important News Clippings)

21 Jul 2021
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Surveillance Breeds Public Distrust

ET Editorials

No one likes being snooped upon. Not politicians, not businessmen, not journalists, all of whom happen to be citizens with rights to privacy in a democratic State. But as the Pegasus exposé reveals, this goes ‘beyond rights’, especially in a country where privacy breaches are not seen as seriously as they should by the general public. Being spied upon — or having a climate where one suspects one is being spied upon — is a recipe for distrust that grinds all public enterprise if not to a halt, then to shadow play. It makes doing business a very uneasy job. If data is the new oil, all the more reason no one wants it siphoned. For this purpose, if not any other, it is essential India gets serious about the Personal Data Protection Bill 2019, which is still gestating in the oven in a draft stage.

Three issues need to be sorted out. One, the legal vacuum that attends on protection of privacy in India. While the Supreme Court has ruled that the right to privacy is a fundamental right derived from a number of other fundamental rights taken together, India still does not have a law on data protection. The line between authorised State surveillance and unauthorised State surveillance — much like being more specific on what amounts to ‘national security threat’ — remains glaringly fuzzy. This must change. Any decision to surveil someone must have the backing of a judicial order. The finding and the action taken on it must be laid before a committee of the legislature, and the executive held to account for acts of breach of privacy. The second issue is the abundance of privately produced and procured spyware. Spyware must be treated as an instrument of cyber warfare, and regulated accordingly.

Finally, technological defence against spyware and cyberattacks must be strengthened, with operating system producers taking the lead and startups seeing it as a promising field of innovation and riches. India as a country, as well as an economy, cannot afford surveillance to become normalised. It must ensure that we mind our own business.


Spy in hand

The Govt. must come clean on the issues raised by revelations of phone surveillance


At least a 1,000 Indian phone numbers are in a list of potential targets of surveillance using the Pegasus spyware sold by Israeli company the NSO Group to “vetted governments” with the approval of the Israeli government. Of these, 300 numbers have been verified; 22 phones were subjected to forensic analysis by Amnesty International and peer reviewed by University of Toronto’s Citizen Lab. Of these, 10 were clearly established as being targeted by Pegasus; eight of the other 12 yielded inconclusive results. The evidence is strong, and the credibility of these revelations is extremely high. Indian citizens were indeed targets of a vicious, abominable and uncivil surveillance campaign by a government entity, Indian or foreign. The buck stops with the Government of India. Instead of coming clean and explaining what it intends to do to protect citizens, the GoI has fallen back on a disingenuous claim that no illegal surveillance is possible in India. There are legal provisions for intercepting communication and accessing digitally stored information in the interests of national security and public safety. The capture of a handheld machine by Pegasus turns that into a real-time spy on the target who can be watched over and followed every step. This surveillance is total, into their private and intimate lives, which have no bearing on any public interest.

The cohort of people who were potential targets — journalists, politicians, probably a Supreme Court judge and a former Election Commissioner — does not indicate that the surveillance was necessitated by national security or public safety concerns. It is safe to assume that no information regarding terrorism or Chinese intrusion can be obtained by spying on a woman who complained of sexual harassment by a former CJI. On the contrary, the composition suggests that private craving, turpitude and even voyeurism motivated the perpetrators. This violation is about privacy and much more. Information obtained illegally may have been used to compromise institutions, to steal elections, sabotage Opposition campaigns, and even dislodge an Opposition government. That the accused in the Bhima Koregaon case had their computers breached by unknown entities to plant evidence that the prosecution is now using against them is notable in this context. That state agencies can trample upon the lives of citizens in such manner while elected representatives plead ignorance is unsettling for a democracy. This is antithetical to the basic creed of democracy. The truth about these revelations must be unearthed through an investigation by a JPC or by the Supreme Court or any other credible mechanism. A starting point for the Government must be in clearing the air on the foremost question it is skirting around — has any Indian agency bought Pegasus?


सवाल का माकूल जवाब सभ्य समाज की बुनियादी शर्त है


संसद दूसरे दिन ठप रही। पूरी दुनिया में पारस्परिक, संस्थागत या वैज्ञानिक संवाद का आधार है तर्क। अगर कोर्ट ने अ से पूछा ‘क्या ब की हत्या की, और की तो क्यों ?’ तो जवाब यह नहीं हो सकता ‘स की भैंस ने दूध क्यों नहीं दिया ?’ सरकार से सवाल पूछे जा रहे हैं, ‘क्या उसने पेगासस स्पाईवेयर खरीदा है? अगर हां, तो क्या इसका प्रयोग लोगों की जासूसी में हो रहा है?’ यहां देखिए सरकार का जवाब भी प्रश्ननुमा आता है- ‘कहीं सरकार की कोरोना से लड़ने में सफलता, लोगों को फ्री टीका और दुनिया में पीएम मोदी के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए बदला तो नहीं लिया जा रहा ? जब करीब 45 देश पेगासस प्रयोग कर रहे हैं, तो सिर्फ भारत ही टारगेट क्यों ?’ यह जवाब हाल ही में आईटी मंत्री के पद से हटाए गए रविशंकर प्रसाद का था, जिन्हें सरकार ने इस मुद्दे पर जबाब देने को कहा था। वर्तमान आईटी मंत्री का जवाब भी सुनिए, ‘देश में जिस तरह की कानूनी और संस्थागत पाबंदियां हैं उसमें किसी भी किस्म का गैर-कानूनी सर्विलांस ( जासूसी ) संभव नहीं है।’ देश के गृहमंत्री का जवाब सुनें, ‘आप क्रोनोलॉजी समझिए। ये शक उठाया गया जब संसद का पहला दिन था ताकि बवाल हो। भारत के लोग घटना का समय और तारतम्य बखूबी समझते हैं।’ इन सारे जबाब में कहीं भी यह नहीं बताया कि पेगासस खरीदा गया कि नहीं और उसका प्रयोग जासूसी के लिए हुआ या नहीं। दो साल पहले भी तत्कालीन आईटी मंत्री और गृह-राज्य मंत्री ने अपने लिखित जवाब में संसद को यही बताया था कि सरकार के पास देश की संप्रभुता और सुरक्षा के मुद्दे पर किसी की निजता भंग करने के अधिकार हैं। यानी दो साल बाद भी जवाब वही है ‘स की भैंस ने दूध क्यों नहीं दिया?’


अफगान संकट में अब भारत की पहल जरूरी

डॉ. वेदप्रताप वैदिक, ( भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष )

काबुल सरकार और तालिबान के बीच ईद के बावजूद युद्ध-विराम नहीं हुआ। जबकि क़तर की राजधानी दोहा में दोनों पक्षों के बीच बातचीत चल रही थी। इसका मूल कारण यह है कि अफगानिस्तान के लगभग 400 जिलों में ज्यादातर में तालिबान आगे बढ़ते जा रहे हैं। वे हेरात, कंधार और काबुल के काफी नजदीक पहुंच चुके हैं। अफगानिस्तान की सरकार भी उनका डटकर मुकाबला कर रही है। उसके प्रवक्ता का दावा है कि अफगान फौजों ने कई जिलों को वापिस हथिया लिया है। ईद के मौके पर यदि तालिबान अपने हमलों को रोक देते तो हो सकता है कि उन्हें मात खानी पड़ती।

दोहा में अफगानिस्तान के सीईओ (प्रधानमंत्री-सम) डॉ. अब्दुल्ला अब्दुल्ला तालिबान के नेताओं से दो दिन तक बात करते रहे। इससे यह उम्मीद बंधी कि दोनों पक्ष बीच का रास्ता शायद निकाल लेंगे लेकिन कोई ठोस रास्ता निकलना तो दूर, दो-तीन दिन का युद्ध-विराम भी नहीं हुआ। नतीजा यह हुआ कि आज सुबह ही काबुल के राष्ट्रपति भवन के पास तीन रॉकेट दागे गए। ये उस वक्त तालिबान ने दागे, जबकि ईद की नमाज़ पढ़ी जा रही थी।

दूसरे शब्दों में तालिबान का संदेश बिल्कुल साफ है। वह यह है कि सिंहासन खाली करो कि तालिबान आते हैं। तालिबानी नेता बिल्कुल नहीं चाहते कि वे काबुल की अशरफ गनी सरकार के साथ कोई अस्थायी मंत्रिमंडल बनाएं और आम चुनाव के बाद अफगान जनता की पसंद के मुताबिक सरकार बनाएं। काबुल में बनी सरकारों को मुजाहिदीन और तालिबान योद्धा रूसी और अमेरिकी कठपुतलियां कहकर पुकारते रहे हैं।

अमेरिका की जबर्दस्त कोशिशों की वजह से तालिबान बातचीत के लिए तैयार हुए, वरना उन्हें पूरा विश्वास है कि वे काबुल पर कब्जा कर लेंगे। काबुल पर कब्जे के लिए उन्हें अफगान फौजों का डर नहीं है। वे सिर्फ यह चाहते थे कि किसी तरह अमेरिकी फौजें वापस चली जाएं। जैसी रूसी फौजों की वापसी के साथ ही नजीबुल्लाह सरकार धराशायी हो गई थी, वैसे ही तालिबान का गणित है कि अब गनी सरकार के दिन भी गिने-चुने ही हैं।

तालिबान का यह सपना सच होता लग रहा है। इसीलिए अमेरिका उन 2500 अफगान नागरिकों को अपने देश ले आया है, जो पिछले 20 साल से अफगानिस्तान में अमेरिकी फौजों की मदद कर रहे थे। बाइडेन-प्रशासन को पता है कि काबुल की अगली सरकार के राज में इन नागरिकों की जान को पूरा खतरा है।

दुनिया के कई शक्तिशाली राष्ट्रों ने मिलकर तालिबान की इस घोषणा के विरुद्ध बयान दिया कि तालिबान मिल-बैठकर अफगान-संकट को हल करना चाहते हैं। उन्होंने तालिबान पर आरोप लगाया कि वे निहत्थे लोगों पर हमले कर रहे हैं, संपत्तियां लूट रहे हैं और पिछले कई हफ्तों से दोहा में बातचीत का ढोंग रचाए हुए हैं। जिन 15 राष्ट्रों ने यह संयुक्त बयान जारी किया है, उनमें ज्यादातर वे हैं, जिन्होंने अमेरिकियों के साथ-साथ अपनी फौजें भी काबुल में डटा रखी थीं या अफगानिस्तान में काफी पैसा लगाया था। तुर्की को भी आश्चर्य है कि काबुल हवाई अड्डे को संभालने के उसके इरादे का तालिबान ने विरोध किया है।

ध्यान देने लायक बात यह है कि अफगानिस्तान के दो पड़ोसियों की हवा खिसकी हुई है। भारत और पाकिस्तान, दोनों की बोलती बंद है। दोहा बातचीत के बारे में तालिबान नेता हिबतुल्लाह अखुंदजादा ने कहा है कि अभी काबुल सरकार से बातचीत टूटी नहीं है। शीघ्र फिर मिलेंगे। लेकिन होगा क्या? दोहा में बातचीत चलती रहेगी और काबुल की तरफ तालिबान का कब्जा बढ़ता चला जाएगा। न पाकिस्तान कुछ करता दिख रहा है और न ही भारत!

पाकिस्तान किसी भी हालत में तालिबान को नाराज़ नहीं करना चाहता। उसने अमेरिका को जरूरत पड़ने पर तालिबान पर हवाई हमले की सुविधाएं देने से साफ़ मना कर दिया है लेकिन वह घबराया हुआ है कि काबुल में तालिबान काबिज हो गए तो पहले की तरह लाखों अफगान पाकिस्तान में पसर जाएंगे। साथ ही यदि तालिबान सफल हो गए तो वे डूरेंड लाइन की भर्त्सना करेंगे और पेशावर को अफगानिस्तान में मिलाने की मांग भी कर सकते हैं।

इस बीच तालिबान ने अमेरिका, रूस, चीन, तुर्की, सऊदी अरब आदि देशों के साथ अपने संबंध सहज बनाने की कोशिश की है। भारत ने अफगानिस्तान में 3 बिलियन डॉलर लगाकर लोकप्रियता अर्जित की है। भारत चाहे तो वह गनी सरकार और तालिबान के बीच सार्थक मध्यस्थता कर सकता है लेकिन उसे इस वक्त अपने पाकिस्तान-विरोधी तेवरों को काबू करना होगा। यदि वह ऐसा कर सके तो अफगानिस्तान के साथ-साथ कश्मीर-समस्या के हल का रास्ता भी निकल सकता है।


मध्य एशिया में भारत की बढ़ती पैठ

हर्ष वी पंत, ( लेखक नई दिल्ली स्थित ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में रणनीतिक अध्ययन कार्यक्रम के निदेशक हैं )

कोरोना के कहर से कुछ मुक्ति मिलने के बाद भारतीय विदेश नीति ने भी यकायक रफ्तार पकड़ी है। इसी सिलसिले में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने हाल के दिनों में कई महत्वपूर्ण देशों की यात्रा की। बीते दिनों वह शंघाई सहयोग संगठन यानी एससीओ की बैठक में भाग लेने के लिए ताजिकिस्तान की राजधानी दुशांबे भी गए। दरअसल अफगानिस्तान में तेजी से बदल रहे घटनाक्रम के बीच एससीओ बैठक की महत्ता और बढ़ गई। एससीओ बैठक के एजेंडे से यह सिद्ध भी हो गया, जहां अफगानिस्तान का मसला ही चर्चा के केंद्र में रहा। यह बहुत स्वाभाविक भी था, क्योंकि अफगानिस्तान से अमेरिकी सेनाओं की विदाई के बाद अब यह उसके पड़ोसी देशों का दायित्व बन जाता है कि वे आतंक और अस्थिरता से पीड़ित इस देश पर विशेष रूप से ध्यान दें। अन्यथा अफगान धरती से निकली आतंक की चिंगारी रूस और चीन से लेकर मध्य एवं दक्षिण एशिया में अशांति की भीषण आग लगा सकती है। स्पष्ट है कि अफगानिस्तान को लेकर आस-पड़ोस के देशों पर दबाव बन रहा है। यह दबाव दुशांबे में भी महसूस किया गया। वहां बनी यह सहमति महत्वपूर्ण रही कि अफगानिस्तान में तालिबान को तब तक वैधानिकता और मान्यता मिलने से रही, जब तक कि वह सभी अफगान पक्षों और अंशभागियों के साथ एक मंच पर नहीं आता। इससे तालिबान पर एक प्रकार का दबाव तो बनेगा। इसकी पुष्टि अफगान सरकार के साथ उसकी वार्ता से भी हुई है।

अपने मध्य एशिया के दौरे पर जयशंकर कनेक्टिविटी से जुड़ी चर्चा के मंच पर भी सक्रिय रहे। न केवल अफगानिस्तान, बल्कि मध्य एशिया के अधिकांश देश लैंड लॉक्ड यानी भू-आबद्ध हैं। ऐसे में उनके समक्ष कनेक्टिविटी की बहुत बड़ी चुनौती है। इससे पाकिस्तान और चीन जैसे देशों पर उनकी निर्भरता और बढ़ जाती है। इसके अपने दुष्परिणाम हैं। इस ओर ध्यान आकर्षित कराते हुए जयशंकर ने उचित ही कहा कि कनेक्टिविटी की सुविधा के साथ ही देशों की संप्रभुता का भी ध्यान रखा जाए। उन्होंने चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे यानी सीपैक के संदर्भ में ऐसी परियोजनाओं के जोखिमों की ओर ध्यान आकर्षित कराया। भारत की संवेदनाओं को दरकिनार कर ही चीन इस परियोजना पर आगे बढ़ा। भारत के प्रति चीन का बिगड़ैल रवैया केवल इसी परियोजना तक ही सीमित नहीं रहा है। इसके बावजूद वह अपने हितों को देखते हुए भारत को साधने में भी लगा है। दुशांबे में चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने जयशंकर से संवाद का प्रयास भी किया, लेकिन भारतीय रुख चीन को लेकर एकदम स्पष्ट रहा कि तकरार और प्यार साथ नहीं चल सकते। चीन के ऐसे प्रयासों पर भारत ने उचित ही दोहराया कि जब तक सीमा पर पूर्व की यथास्थिति कायम नहीं हो जाती तब तक र्बींजग को वार्ता के लिए प्रतीक्षा करनी होगी।

भारत की विदेश नीति के दृष्टिकोण से मध्य एशिया एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है, लेकिन नीतिगत मोर्चे पर उसे उसकी महत्ता के अनुरूप स्थान नहीं मिल सका। जयशंकर इस विसंगति को दूर करने में लगे हैं। उनके नेतृत्व में भारत मध्य एशिया के साथ अपनी ऐतिहासिक कड़ियों को फिर से जोड़कर संबंधों को पुनर्जीवित करने में जुटा है। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने एससीओ बैठक में भाग लेने के अतिरिक्त ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान का दौरा भी किया। मध्य एशियाई देशों के मामले में जहां भारत के लिए व्यापक संभावनाएं बनी हुई हैं वहीं भू-राजनीतिक स्थितियों को देखते हुए इन संभावनाओं को भुना पाना उतनी ही कठिन चुनौती भी है। यह क्षेत्र प्राकृतिक संसाधनों से संपन्न है। गैस जैसे संसाधन के विपुल भंडार पर बैठे मध्य एशियाई देश भारत की ऊर्जा जरूरतों की दीर्घकालिक पूर्ति करने में सक्षम है। इस दिशा में अभी तक अपेक्षित प्रयास नहीं हुए हैं और जो हुए, वे भी अपेक्षा के अनुरूप सिरे नहीं चढ़ पाए। तापी गैस परियोजना को ही लें। तुर्कमेनिस्तान से भारत तक गैस आपूर्ति से जुड़ी यह परियोजना अफगानिस्तान और पाकिस्तान जैसे साझेदारों के कारण अटकी हुई है। मध्य एशिया के साथ अपनी साझेदारी की राह में आने वाली ऐसी धरातलीय बाधाओं के बावजूद भारत ने अपनी कोशिशों की रफ्तार कम नहीं की है। जयशंकर का हालिया मध्य एशियाई दौरा इसी दिशा में एक अहम पड़ाव था। मध्य एशिया में कट्टरपंथ और अतिवाद का बढ़ता जोखिम भी मध्य एशिया और भारत को एक मंच पर लाता है, क्योंकि ये दोनों के समक्ष एक साझा चुनौती हैं, जिससे उन्हें मिलकर निपटना होगा।

बात अफगानिस्तान और पाकिस्तान जैसे अस्थिर देशों से जुड़ी बाधाओं की ही नहीं है। इस क्षेत्र में चीन और रूस अत्यंत अहम खिलाड़ी हैं। दोनों ने यहां पश्चिमी देशों को अपने पैर नहीं जमाने दिए हैं। वहीं भारत के लिए एससीओ में मिले प्रवेश ने यहां एक राह जरूर बना दी है, लेकिन आगे की मंजिल उतनी आसान नहीं है। इसका कारण चीन का भारत के प्रति जगजाहिर रवैया है। रूस भारत का सदाबहार मित्र तो है, लेकिन मौजूदा हालात में यह देखने वाली बात होगी कि वह भारत का कितना और किस हद तक समर्थन जारी रखता है? इसकी वजह यही है कि पिछले कुछ समय से मास्को का पलड़ा एक हद तक बीजिंग की ओर झुका है। चीन भी दुनिया भर में आक्रामक तेवर दिखाने के बावजूद इस क्षेत्र में ऐसा कुछ नहीं करना चाहता, जिससे रूस को कोई नाराजगी हो। हालांकि रूस के साथ लगी चीनी सीमा से लेकर अन्य मध्य एशियाई देशों के मामले में चीन की दबी-छिपी मूल मंशा दिखती तो है, पर उसके कारण अभी तक किसी तनाव के संकेत नहीं दिखे हैं।

ऐसे जटिल समीकरणों में भारत के लिए यही सही होगा कि वह मौके के हिसाब से अगला कदम उठाए। कुल मिलाकर मध्य एशिया दौरे पर जयशंकर अफगानिस्तान पर आमसहमति बनाने, मध्य एशिया में कनेक्टिविटी के मोर्चे पर स्पष्ट रुख अपनाने और इन देशों के साथ द्विपक्षीय और बहुपक्षीय हितों को आगे बढ़ाने के साथ ही उन संभावनाओं के द्वार भी खोलने में सफल रहे, जो अभी तक बंद थे। चूंकि चीन इस क्षेत्र का एक अहम खिलाड़ी है इसलिए इसे उल्लेखनीय उपलब्धि कहा जाएगा कि यह सब बीजिंग के साथ तनातनी के दौर में भी संभव हो सका।


धूमिल उम्मीद


ऐसी खबरें हैं कि सरकारी क्षेत्र के बैंकों ने गत सात वर्षों में आठ लाख करोड़ रुपये मूल्य का ऋण बट्टे खाते में डाल दिया है। यह इसी अवधि में सरकार द्वारा इन बैंकों में डाली गई 3.37 लाख करोड़ रुपये की पूंजी के दोगुने से अधिक है। वित्त वर्ष 2018-19 में सर्वाधिक 1.83 लाख करोड़ रुपये मूल्य के कर्ज को बट्टे खाते में डाला गया। गत चार वर्ष सरकारी बैंकों के लिए खासतौर पर बुरे रहे क्योंकि इस अवधि में हर वर्ष एक लाख करोड़ रुपये की राशि को बट्टे खाते में डाला गया। यह अच्छी स्थिति नहीं है और सरकार बैंकिंग तंत्र में भारी भरकम धन राशि डालना जारी नहीं रख सकती। सरकार बीते कुछ वर्षों से बजट संबंधी दिक्कतों के कारण पुनर्पूंजीकरण बॉन्ड जारी कर रही है, परंतु इस माध्यम की भी अपनी सीमाएं हैं।

देश के बैंकिंग तंत्र में अधिकांश परिसंपत्तियों के हिस्सेदार सरकारी बैंकों की स्थिति ठीक नहीं है और यह बात लंबी अवधि में अर्थव्यवस्था पर असर डाल सकती है। भले ही महामारी की दूसरी लहर ने बैंकों पर सीमित असर डाला लेकिन रिजर्व बैंक के मुताबिक सरकारी बैंकों की सकल गैर निष्पादित परिसंपत्ति (जीएनपीए) के मार्च 2022 तक 12.52 फीसदी हो जाने का अनुमान है। चूंकि अधिकांश सरकारी बैंकों का मूल्यांकन कम है और वे बाजार से पूंजी जुटाने की स्थिति में नहीं हैं इसलिए सरकार को जब भी महामारी से त्रस्त अर्थव्यवस्था की मदद के लिए सार्वजनिक व्यय बढ़ाने की आवश्यकता होगी तब उसे इनमें पूंजी डालनी होगी। अगर बैंकों में पूंजी नहीं डाली गई तो अर्थव्यवस्था के उत्पादक क्षेत्रों को ऋण प्रवाह प्रभावित होगा। इससे आर्थिक सुधार पर असर होगा।

फंसा हुआ कर्ज बढ़ने की शुरुआत गत दशक के शुरुआती वर्षों में हुई। ऐसा इसलिए हुआ कि वैश्विक वित्तीय संकट के पहले और बाद में खूब जमकर ऋण दिया गया। परंतु बैंक संकटग्रस्त परिसंपत्तियों को चिह्नित नहीं कर रहे थे। ऐसे में आरबीआई ने वर्ष 2015-16 के दौरान परिसंपत्ति गुणवत्ता समीक्षा की जिससे फंसे हुए कर्ज में इजाफा हुआ। अनुमान के मुताबिक सरकारी बैंक इस फंसे कर्ज के सबसे बड़े हिस्सेदार थे और सरकार को इनका सुचारु परिचालन करने के लिए पूंजी डालनी पड़ी। सरकारी बैंकों के संकट की एक बड़ी वजह थी उनका कारोबारों का समुचित आकलन नहीं कर पाना। सरकारी क्षेत्र के बैंकर भी समय पर फंसे कर्ज को चिह्नित करने के अनिच्छुक थे क्योंकि जांच एजेंसियों का डर सता रहा था। इससे समस्या और विकराल हो गई। इनमें से अधिकांश विषयों पर काफी बहस हो चुकी है और सरकार ने सरकारी बैंकों का कामकाज सुधारने के लिए कई कदम भी उठाए हैं। परंतु लगता नहीं कि उनका कुछ खास असर हुआ है। मोटे तौर पर ऐसा इसलिए हुआ कि सरकारी बैंकों की प्रकृति और उनके ढांचे को अछूता छोड़ दिया गया।

सरकार ने एक ऋणशोधन कानून भी बनाया जिसने कर्जदाताओं की स्थिति मजबूत की लेकिन वसूली अब तक नगण्य ही रही है। चूंकि यह स्पष्ट है कि सरकारी बैंकों के सुधार की सीमा है और उनके सरकारी वित्त पर बोझ बने रहने की संभावना है तो ऐसे में सरकार को उनके निजीकरण की प्रक्रिया तेज करनी चाहिए। सरकार चालू वित्त वर्ष में दो सरकारी बैंकों के निजीकरण का इरादा जता चुकी है और नीति आयोग ने अपनी अनुशंसाएं भी कर दी हैं। इस दिशा में प्रगति के लिए तत्काल कदम उठाने की आवश्यकता है और आने वाले वर्षों में अधिक से अधिक बैंकों के निजीकरण का मार्ग प्रशस्त किया जाना चाहिए। इससे न केवल बैंकिंग तंत्र को मजबूत बनाने में मदद मिलेगी बल्कि सरकार द्वारा इस क्षेत्र में पैसा फंसाने पर भी रोक लगेगी।


पेगासस का बखेड़ा


संसद के मानसून सत्र से एक दिन पहले वेब पोर्टल पर भारतीय पत्रकारों‚ विपक्षी नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की कथित जासूसी की जो खबर प्रकाशित की गई‚ वह जार्ज ऑरवेल के प्रसिद्ध उपन्यास ‘1984’ की याद दिला रही है। जार्ज ऑरवेल ने अपने इस चर्चित उपन्यास में एक ऐेसे अधिनायकवादी शासन का खाका पेश किया था‚ जिसका मुख्य नारा था ‘बिग ब्रदर इज वॉचिंग यू’। शीतयुद्ध के दौरान अमेरिका और पश्चिमी देशों के मीडिया और बौद्धिक संस्थानों ने यह घोषित किया कि साम्यवादी शासन प्रणाली वाला सोवियत संघ जार्ज ऑरवेल के ‘1984’ का उदाहरण है। इसका जवाब देते हुए सोवियत संघ और कम्युनिस्ट देशों के मीडिया ने कहा कि वास्तव में अमेरिका और उसके सहयोगी देशों में ही ‘1984’ साकार है। इस आरोप–प्रत्यारोप के बीच यह एक मान्य तथ्य है कि दुनिया के बड़े देशों की खुफिया एजेंसियां दुनिया भर में जासूसी कराती हैं। भारत जैसे विकासशील देशों का न तो दुनिया पर दबदबा कायम करने का एजेंड़ा है न ही उसके पास इतने संसाधन हैं कि वह अपने राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित रखने के लिए देश–विदेश में खुफियागिरी कर सके। भारत में एक निश्चित कानूनी प्रक्रिया के तहत आतंकवादियों और देश विरोधी तत्वों की गतिविधियों पर निगरानी के लिए खुफियागिरी की सीमित व्यवस्था है। कानून के दायरे में की जाने वाली इस प्रक्रिया पर कड़ी निगरानी भी रखी जाती है। इन परिस्थितियों में पश्चिमी देशों के मीडिया और भारत के ऐसे ही कुछ संस्थानों द्वारा इजराइली सॉफ्टवेयर पेगासस के जरिये खुफियागिरी कराए जाने के आरोपों से बहुत से सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोपों में सचाई है या नहीं‚ यह बात पीछे छूट गई है। पिछले दिनों अमेरिका और पश्चिमी देशों के फ्रीड़म हाउस जैसे बौद्धिक संस्थानों ने भारत पर आंशिक रूप से आजाद लेकिन लोकतांत्रिक जरिये से अधिनायकवादी शासन चलाने का आरोप लगाया था। पेगासस विवाद के जरिये ये बौद्धिक संस्थान अपने भ्रामक और पूर्वाग्रह से भरे निष्कर्षों को सही साबित करने की कोशिश में हैं। प्रथम दृष्टया ये आरोप प्रमाणित नहीं लगते‚ लेकिन लोकतांत्रिक प्रणाली का तकाजा है कि सरकार और उसकी एजेंसियों को पूरी तरह पाक साफ होना चाहिए। देश की संसद पर यह जिम्मेदारी है कि वह इस संतुलन को कायम करने के लिए राष्ट्रीय मतैक्य कायम करे।


अश्लीलता के विरुद्ध


कारोबारी राज कुंद्रा का विवादों से पुराना नाता रहा है, लेकिन इस बार जिस जुर्म के आरोप में उनकी गिरफ्तारी हुई है, वह यकीनन बेहद संगीन और शर्मनाक है। कुंद्रा पर आरोप है कि वह अश्लील फिल्मों के अंतरराष्ट्रीय कारोबार से जुडे़ हुए हैं और मुंबई से लेकर लंदन तक उनका नेटवर्क इसमें सक्रिय रहा है। पुलिस ने इस गुनाह में लिप्त कुछ लोगों को पहले ही गिरफ्तार किया था और उन लोगों की निशानदेही पर ही कुंद्रा की कथित भूमिका का खुलासा हुआ। बहरहाल, अदालत ने कुंद्रा को 23 जुलाई तक पुलिस हिरासत में भेज दिया है और उम्मीद की जानी चाहिए कि अगली सुनवाई में मुंबई पुलिस इस मामले से जुडे़ ठोस साक्ष्य अदालत के सामने पेश कर सकेगी। इससे पहले साल 2012 में भी आईपीएल स्पॉट फिक्सिंग मामले में कुंद्रा की गिरफ्तारी हुई थी, और तब उनकी टीम राजस्थान रॉयल्स को दो साल का प्रतिबंध भी झेलना पड़ा था। अंतत: इस फ्रेंचाइजी के साझीदारों ने कुंद्रा से अपना दामन छुड़ाने में ही भलाई समझी।

राज कुंद्रा की गिरफ्तारी ने चकाचौंध भरी माया नगरी के स्याह पहलू से एक बार फिर हमें रूबरू कराया है, जिसमें नैतिकता के लिए कोई जगह नहीं, कायदे-कानूनों को लेकर कोई भय या सम्मान नहीं है। वरना सफेदपोश लोग ऐसे अपराध क्यों करते? यकीनन, इसके लिए पूरा तंत्र कुसूरवार है। सुशांत सिंह राजपूत की खुदकुशी के मामले में हमने देखा कि किस तरह उससे ड्रग्स पार्टियों, उसके कारोबार से जुड़ी कहानियों का सिलसिला सा चल पड़ा और वह मुकदमा अब तक किसी अंजाम पर नहीं पहुंचा। मामलों के यूं भटक जाने से ही शातिर अपराधियों के हौसले बढ़ते हैं। अश्लील सामग्रियों के बढ़ते कारोबार के पीछे पुलिस के इस दावे को न मानने की कोई वजह नजर नहीं आती कि लड़के-लड़कियों को बड़ी फिल्मों में काम दिलाने के नाम पर फंसाया जाता और फिर इस दलदल में धकेल दिया जाता था। ब्योरे हैं कि इस मामले के खुलासे के बाद कई लड़कियों, टीवी कलाकारों ने पुलिस में अपने बयान दर्ज कराए हैं।

दरअसल, लॉकडाउन के दौरान ओटीटी प्लेटफॉर्मों की बढ़ी लोकप्रियता और सेंसर बोर्ड जैसा इनका कोई मजबूत नियामक न होने की वजह से ऐसे लोगों का हौसला बढ़ता गया। स्मार्टफोन और इंटरनेट सुविधाओं के विस्तार ने अश्लील सामग्रियों के कारोबारियों के लिए अपार संभावनाएं पैदा कर दी हैं। दिसंबर महीने में ही विशेषज्ञों ने देश में ओटीटी के जरिये पोर्न उद्योग के लगभग 3,800 करोड़ रुपये सालाना की ऊंचाई छूने का अंदेशा जताया था। इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए ही सरकार ने हाल में ओटीटी के लिए नियम-कायदे तय किए हैं। ताजा घटना बताती है कि देश में पोर्न कारोबार में किस स्तर के लोग अब शामिल होने लगे हैं। रातोंरात देश-दुनिया में छा जाने की चाहत तो पहले भी हजारों नौजवानों को मुंबई की धूल फांकने के लिए बाध्य करती थी, लेकिन अब वह उन्हें एक खतरनाक रास्ता दिखा रही है। आसानी से पैसे कमाने का प्रलोभन हमारे समूचे सामाजिक ताने-बाने पर भारी पड़ सकता है। फिर बढ़ते यौन अपराधों में ऐसी सामग्रियों की भूमिका को लेकर भी विशेषज्ञ आगाह करते रहे हैं। ऐसे में, ‘मोरल पुलिसिंग’ और यौन अपराध के अंतर को समझते हुए अश्लीलता के कारोबारियों को सख्ती से हतोत्साहित करने की जरूरत है।

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