10-06-2021 (Important News Clippings)

10 Jun 2021
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Coast Isn’t Clear

Sundarbans exodus shows why GoI needs cash and a plan to help those fleeing climate change

TOI Editorials

India’s 8,118 km coastline is a playground for adverse events engendered by climate change. GoI estimates the sea level along the coastline is rising on average by 1.7 mm a year. The rise is not uniform. Some parts are under greater threat. For example, as TOI’s reports show, the Sundarbans in Bengal is at the receiving end of both rising sea levels and extreme events. Battered by four cyclones in two years, with Yaas being the last one, people have begun leaving two islands, Mousuni and Ghoramara.

Sundarbans is the world’s largest contiguous mangrove forest, with about 40% of its 10,200 sqkm area in India. Its vulnerability to tropical cyclones was brought out in a World Bank study last year. The cumulative impact of these events may lead to a situation in 30 years where in many areas water salinity will almost equal ocean salinity. This poses a larger challenge for India. Without freshwater, retreat of habitat in some areas is inevitable. Sundarbans is just one case of potentially many that shows why we need a sharper focus on climate change adaptation.

GoI set up a National Adaptation Fund for Climate Change six years ago. Some of the money is spent on cyclone defences such as embankments. But in the Sundarbans they have been repeatedly breached, leading to seawater ingress. At this stage, the fund needs greater focus on the next stage of adaptation, managed retreat. A retreat is happening in the Sundarbans, but without adequate state support. A transition to new livelihoods can only be eased through state handholding. India has 4 million people who depend on marine fishing. Some will need serious help during relocation, which comes with loss of critical assets. Millions can’t just be left to deal with extreme weather events.


Encouraging accord

The political will shown by G7 to ensure fairness in revenue sharing is a good augury


The Finance Ministers of the G7 nations appear to have heeded the advice to ‘never let a good crisis go to waste’ when they agreed last week to set a global minimum tax of at least 15%. With the COVID-19 pandemic having caused the world economy to shrink by an estimated 3.5% in 2020 and forced most countries to dip into their coffers to mitigate the fallout, the seven richest nations opted to use the opportune moment to plug a key loophole in the international tax regime. In a communique, the G7 Ministers stressed that as part of efforts to secure a ‘Safe and Prosperous Future for All’ they would strongly back the broader efforts under way through the G20/OECD to address tax challenges arising from globalisation and digitalisation of the economy. The rapid and relentless march of technological advancement, especially in the domain of global communications and connectivity, has resulted in a world economy where the digital sphere, estimated in 2016 at $11.5 trillion or over one-sixth of global GDP, is exponentially outpacing overall economic growth. The increasing digitalisation has, however, exacerbated the challenges to taxing multinational corporations, which have sought to minimise their total tax outgo by recognising a bulk of their revenue in low-tax jurisdictions.

The OECD, which is with the G20 spearheading the ‘Inclusive Framework on Base Erosion and Profit Shifting’ initiative aimed at ending tax avoidance, estimates that countries are collectively deprived of as much as $240 billion in tax revenue annually due to avoidance by MNCs. As the OECD’s Secretary-General noted in a statement welcoming the G7 deal, such distortions “can only be effectively addressed through a multilaterally agreed solution”. The G7 also agreed on “an equitable allocation of taxing rights, with market countries awarded taxing rights on at least 20% of profit exceeding a 10% margin for the largest and most profitable multinational enterprises”. For India, estimated to be losing more than $10 billion in revenue each year to “global tax abuse” by MNCs according to the Tax Justice Network and one of the more than 90 countries that have joined the BEPS framework, a wider agreement at next month’s meeting of G20 Finance Ministers and central bank Governors could have far-reaching implications. India could benefit from the levy of taxes on MNCs including technology and Internet economy giants, which have taken advantage of the loopholes in the global tax system. While there are still wrinkles to be ironed out, including the issue of local levies on digital transactions, the political will to ensure greater fairness and equity in revenue sharing is a positive augury.


सोशल मीडिया व सरकार के बीच तनातनी गैरजरूरी और बेमतलब

टीसीए श्रीनिवास-राघवन

पिछले दिनों ट्विटर एवं व्हाट्सऐप जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को लेकर छिड़ी बेहद तीखी बहस के दौरान यह बात ध्यान देने लायक रही कि संप्रभु शक्ति के अर्थ एवं प्रभाव को शायद ही अहमियत दी गई। न केवल सरकार के बाहर के लोगों ने इसे नजरअंदाज किया बल्कि सरकार के भीतर के लोगों की भी यही राय सामने आई कि संप्रभु शक्ति के दम पर उन्हें कुछ भी करने का लाइसेंस मिला हुआ है।

हालांकि किसी भी राज्य की संप्रभु शक्ति अपने आप में पूर्ण है लेकिन व्यावहारिक स्तर पर इसका क्रियान्वयन तर्कसंगत ढंग से ही किया जाना चाहिए। मनमाने ढंग से बनाए गए और बेवकूफी भरे कानूनों से यह मकसद हासिल नहीं होगा और अदालतें भी उन कानूनों को निरस्त घोषित कर देती हैं। इस तरह भले ही संप्रभुता पूर्ण-सत्ता में निहित होती है लेकिन इसके उपयोग में पूर्ण समझदारी की भी जरूरत होती है। ऐसे में सरकार पर एकमात्र अंकुश सहज बुद्धि एवं आत्म-संयम का ही होता है।

दरअसल समाजों के भीतर इन मसलों पर इस तरह चर्चा होती है मानो लोकतंत्र के इस चारित्रिक गुण को नजरअंदाज किया जा सकता है। हमें बहस में शामिल दोनों ही पक्षों से सिर्फ ऐसे तर्क ही सुनने को मिलते हैं जो बेतुके हों और जो सिर्फ उनके हित की ही पुष्टि करते हों।

अगर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के साथ इस समय जारी भारत सरकार की तनातनी पर इसको परखते हैं तो हमें मुद्दों के परीक्षण का कहीं अधिक समझदारी-भरा तरीका पता चलता है। इसमें कोई संदेह नहीं दिखता है कि ट्विटर एवं व्हाट्सऐप के साथ जल्द ही कुछ और प्लेटफॉर्म भी जुड़ जाएं।

इस पूरी बहस में दिए जा रहे बुनियादी तर्क को सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी श्रीवत्स कृष्ण ने अपने एक हालिया लेख में स्वर दिया है। कृष्ण अपने इस लेख में कहते हैं, ‘क्या अमेरिका की बड़ी टेक कंपनियां दूसरे देशों में काम करते समय अमेरिकी कानूनों का सहारा ले सकती हैं? या फिर वे सरकार के अधिकृत प्रतिनिधि की तरफ से कानूनी अनुरोध के तहत मांगी गई जानकारी देने के लिए भारतीय कानूनों के तहत बाध्य हैं?’

इसका जवाब ही यह साफ कर देता है कि बहुत गैरजरूरी होते हुए भी यह तनातनी एक तरफ संप्रभु शक्ति और दूसरी तरफ नागरिक अधिकारों को लेकर है। आप खतरा देखकर इस मुद्दे को नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं।

दरअसल किसी भी सरकार को यह अधिकार है कि अपनी सीमा के भीतर काम कर रहे किसी भी शख्स या कंपनी को वह देश के कानूनों का पालन करने को कह सकती है। इस बात को समझने के लिए बहुत दिमाग की जरूरत नहीं है।

लेकिन इसी के साथ किसी भी सरकार को यह अधिकार नहीं है कि वह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म या मध्यवर्ती कंपनियों से अपने उपभोक्ताओं की पहचान एवं अन्य जानकारियों का खुलासा करने को कह सके। यह कुछ ऐसा ही है कि किसी डाकघर के पोस्ट-मास्टर से आप चिट्ठी खोलने के लिए कहें। साफ है कि वह ऐसा नहीं करेगा।

लेकिन हमें यह भी देखना होगा कि सबसे खुला समाज कहे जाने वाले अमेरिका में इस संबंध में क्या प्रावधान हैं? यहां पर हम फिर श्रीवत्स कृष्ण को उद्धृत करते हैं, ‘व्हाइट हाउस ने शासकीय आदेश संख्या 13925 के जरिये यह साफ कर दिया कि भले ही अभिव्यक्ति की आजादी अलंघनीय है लेकिन कुछ ट्वीट को चिह्नित करने या अकाउंट बंद करने की शक्तिया बड़ी टेक कंपनियों को प्रसारित सामग्री सेंसर करने के लिए कहना अस्वीकार्य है।’

लेकिन यह नियम सिर्फ ट्विटर पर लागू होता है। किसी भी अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर आप कुछ भी कहने के लिए आजाद हैं। वे कंपनियां आपकी स्वतंत्र अभिव्यक्ति पर लगाम नहीं लगा रही हैं, वे तो सिर्फ अपने प्लेटफॉर्म तक आपकी पहुंच पर अंकुश लगा रही हैं।

अगर आप इस पर गौर करेंगे तो नजर आएगा कि भारत में भी 1951 से ही इसी तरह की परिपाटी रही है। स्वतंत्र अभिव्यक्ति पर तर्कसंगत पाबंदियों को लेकर दर्ज आपत्तियों को ध्यान में रखते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को ही अलग-अलग मामले के आधार पर फैसला करना होता है। असल में हमारा संविधान भी तर्कसंगत पाबंदियां निर्धारित करने का जिम्मा सरकार पर डालता है। लेकिन इस शक्ति का अब तक कई बार दुरुपयोग हो चुका है।

आलोचना से समस्या?

अब प्रधानमंत्री की आलोचना का मुद्दा आता है। कहा जाता है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को किसी-न-किसी रूप में यह सुनिश्चित करने को कहा जा रहा है कि सत्ता में बैठे मौजूदा शख्स को उनके प्लेटफॉर्म पर बदनाम न किया जाए। यह कोशिश कुछ उसी तरह गैरवाजिब है जैसी 1988 में मानहानि विधेयक लाते समय थी। इस विधेयक को लाने का मकसद सिर्फ यही था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री पर कलंक लगाने से बचाया जा सके। लेकिन तत्कालीन सरकार को वह विधेयक आखिर में वापस लेना पड़ा था। उस समय की तरह इस बार भी यही मुद्दा है कि सरकार डराने-धमकाने की कोशिश कर रही है।

वैसे अगर सरकार का रुख गैरवाजिब रहा है तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म भी कुछ उसी तरह बेवकूफी दिखा रहे हैं जैसा रवैया 1987-88 के दौरान के कुछ संपादकों का रहा था। प्लेटफॉर्मों का यह कहना पूरी तरह उनके अधिकार-क्षेत्र में है कि वे अपने उपभोक्ताओं के बारे में नहीं बता सकते हैं। लेकिन उनकी यह सोच ठीक नहीं है कि उन्हें शिकायत निपटान के बारे में बने समाचार कानूनों का पालन करने की जरूरत नहीं है।

इस तरह हमारे सामने एक ऐसी स्थिति है जहां पर एक गैरवाजिब मांग और एक नासमझ प्रतिक्रिया है। मौजूदा समस्याओं के मूल में यही है। खास बात यह है कि दोनों ही पक्षों को एक-दूसरे की जरूरत है और यह मामला किसी तनातनी के बगैर भी हल किया जा सकता था।


त्रस्त है आमजन

प्रो. लललन प्रसाद

मई 2021 कीमतों में रिकॉर्ड बढ़ोतरी के लिए जाना जाएगा पेट्रोल छह प्रमुख शहरों में 100 रुपये प्रति लीटर के ऊपर पहुंच गया है, डीजल भी उसी राह पर है। अधिकांश दालें 100 रुपये प्रति किलो के ऊपर पहुंच गई हैं। खाने के तेल की कीमतें तो आसमान छू रही हैं।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार पिछले एक वर्ष में खाद्य तेलों की कीमतें 60% ऊपर गई हैं। सरसों के तेल की औसत कीमत खुदरा बाजार में पिछले साल के118 रुपये से बढ़कर 171 रुपये किलो हो गई है। चावल जो 80% आबादी का मुख्य भोजन है, वह भी महंगा होता जा रहा है। सब्जी विशेषकर प्याज और टमाटर महंगे होते जा रहे हैं। बढ़ती महंगाई की वजह से कितने घरों में दो की जगह एक बार ही चूल्हा जलता है। बेरोजगारी चरम पर है। पिछले वर्ष की अपेक्षा इस वर्ष का लॉकडाउन मजदूरों, किसानों और निम्न मध्यम आय के लोगों के लिए अधिक संकटपूर्ण रहा। आय गिरती जा रही है, खर्चे बढ़ते जा रहे हैं। कल-कारखाने बंद होने के कारण प्रवासी मजदूरों की सुध-बुध लेने वाला कोई नहीं। स्टेशन के कुली, रिक्शा चलाने वाले, दिहाडी मजदूर, घरों में छोटे-मोटे धंधे चला कर जीविका कमाने वाले कठिन दौर से गुजर रहे हैं। लाखों परिवार हैं, जिन्होंने घर के खर्चे चलाने वाले को कोरोना में खो दिया है, महिलाएं, बच्चे, बूढ़े अनाथ हो गए हैं, आमदनी का कोई जरिया नहीं रह गया है।

पेट्रोल और डीजल की कीमतें पिछले एक महीने में 15 बार बढ़ी हैं, जैसा पहले कभी नहीं हुआ। कीमतें सरकारी क्षेत्र की तेल की कंपनियां तय करती हैं, जिनका आधार अंतरराष्ट्रीय कीमत, वैट और स्थानीय कर, कंपनियों का मुनाफा और ढुलाई के खर्चे होते हैं। कई बार अंतरराष्ट्रीय कीमतें घटने पर भी देश में कीमतों पर असर नहीं पड़ता। पेट्रोल-डीजल राज्यों की आय के बड़े साधन हैं, विभिन्‍न राज्यों में टैक्स की दरें अलग-अलग हैं। राज्य सरकारें टैक्स घटाने को राजी नहीं होतीं, ना ही कंपनियां अपना मुनाफा कम करने को। कीमतें जितनी बढ़ती हें, राज्य सरकारों और कंपनियों को फर्क नहीं पड़ता, पिसा जाता है आम आदमी। परिवहन और यातायात के सभी साधन महंगे होते जाते हैं, जिसका असर सभी चीजों की कीमतों पर पड़ता है। ट्रैक्टर और वाटर पंप, मोटरसाइकिल, स्कूटर, ऑटो रिक्शा, कार, बस, ट्रक रेलवे, पानी और हवाई जहाज सभी के खर्चे बढ़ जाते हैं, जो सभी चीजों की कीमतें बढ़ाते हैं।

खाने का तेल रसोई की मुख्य चीज है, उस पर होने वाला खर्च तेजी से बढ़ रहा है। पिछले एक वर्ष में खाद्य तेलों की कीमतों में अप्रत्याशित बढ़ोतरी हुई हैः सनफ्लावर 56%, सोया बीन 52%, सरसों 44%, मूंगफली 21%। खाद्य तेलों की मांग और पूर्ति में बड़ा अंतर है। देश में कुल उत्पादन 8:00 से 11:00 मिलियन टन प्रति वर्ष होता है जबकि मांग 24 मिलियन टन के आसपास है। कुल जरूरत का लगभग 60% आयात करना पड़ता है, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने से आयात महंगा हो जाता है जो यहां भी कीमतों में उछाल ला देता है। हरित क्रांति की तर्ज पर सरकार ने निर्णय लिया है कि तिलहन की उन्नत किस्म के बीज किसानों को मुफ्त दिए जाएंगे। अभी तिलहन की खरीद सरकार बहुत कम मात्रा में करती है, जिसे बढ़ाने की जरूरत है। दालों के बिना भोजन नहीं। अरहर, मसूर, चना, मूंग, उड़द सभी दालों की कोमतों में वृद्धि हुई है। पिछले महीने अरहर 118 , मूंग 120, मसूर 89 उड़द 96 रुपये किलो के आसपास बिक रही थी।

कोरोना ने दवाइयों और इलाज पर खर्चे बढ़ा दिए हैं। प्राइवेट अस्पतालों में तो 500000 से 2500000 रुपये तक का खर्च आ जाता है जो आम आदमी के बस का नहीं है। सरकारी अस्पतालों में बेड, ऑक्सीजन, दवाइयों की कमी और अन्य सुविधाओं के अभाव है। संकट की घड़ी में दवाओं और ऑक्सीजन सिलिंडर जैसी आवश्यक चीजों की कालाबाजारी लोगों की मुसीबतें और बढ़ा रही है। पिछले वित्त वर्ष में कोरोना की वजह से लॉकडाउन के कारण जीडीपी विकास दर-7% था जो पिछले 7 दशकों का सबसे कम है। विश्वव्यापी महामारी में अन्य देशों की अपेक्षा भारत में मृत्यु दर कम अवश्य रही है, राहत पैकेज, दवाएं, ऑक्सीजन एवं वैक्सीन उपलब्ध कराने की सरकार की पहल का लाभ भी मिला किंतु अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ पड़ा। वर्तमान वित्त वर्ष में विकास दर 9% के लगभग अनुमानित है किंतु यह इस पर निर्भर करेगा कि कोरोना पर कितना नियंत्रण हो पाएगा और आर्थिक गतिविधियां कितनी तेजी से सामान्य होंगी। कोरोना के पहले चरण में शहरों में इसका प्रभाव अधिक था जबकि दूसरे चरण में गांव भी प्रभावित हुए। शहरों में मई 2021 में बेरोजगारी 18% दर्ज की गई जो एक रिकॉर्ड बन गया। गांव में 10% बेरोजगारी का अनुमान है। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के कारण गांवों में बेरोजगारी शहरों की अपेक्षा कम रही। शहरी बेरोजगारी कुछ महीनों तक बढ़ी रह सकती है क्योंकि आर्थिक गतिविधियों को पूरी तरह से पटरी पर लाने में समय लगेगा।

आईटी व संबंधित उद्योगों को छोड़कर बाकी सभी क्षेत्रों में उत्पादन में गिरावट आई है। तेजी से उपभोग में आने वाली वस्तुओं, ऑटोमोबाइल, टूरिज्म, होटल और रेस्टोरेंट एवं अधिकांश सेवाओं और व्यवसायों में स्थिति सामान्य नहीं हुई है। रिटेल बिजनेस बड़ी ई-कॉमर्स कंपनियों के हाथों में जा रहा है, जो छोटे दुकानदारों के लिए खतरे की घंटी है, रोजगार के अवसर इसके कारण भी घट रहे हैं। लॉकडाउन के समय ई कंपनियों के व्यापार में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है जिसके आगे भी जारी रहने की पूरी संभावना है।हस क्षेत्र में विदेशी कंपनियों के अलावा देश के बड़े उद्योगपति भी निवेश करने लगे हैं। अर्थव्यवस्था में पूंजी पतियों का प्रभाव बढ़ता जा रहा है, जो गरीबों और अमीरों की बीच की खाई बढ़ा रहा है।

शेयर बाजार में कीमतें उछाल पर हैं, जिसका सीधा लाभ बड़े निवेशकों को हो रहा है। औद्योगिक उत्पादन की दर नहीं बढ़ रही, कंपनियों का मुनाफा फिर भी बढ़ रहा है जो विरोधाभास है। कृषि क्षेत्र में पैदावार बढ़ी है फिर भी छोटे किसान बड़ी संख्या में गरीबी रेखा के नीचे हैं। गांवों में रोजगार के साधन पहले से भी कम हो गए हैं। बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर गांवों से शहर नहीं लौट रहे हैं क्योंकि कोरोना के संभावित अगले चरण के कारण अनिश्चितता बनी हुई है। आम आदमी की आमदनी घट रही है, किंतु खर्चे बढ़ रहे हैं, इस स्थिति में बदलाव लाना जरूरी है।


आईटी कंपनियों के सामंती ढर्रे पर जरूरी है लगाम

अभिनव प्रकाश सिंह, ( असिस्टेंट प्रोफेसर, श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स )

तकनीकी बाधाएं अर्थव्यवस्था, समाज और राजनीति में दूरगामी हलचल पैदा कर रही हैं। आईटी नियमों को लेकर भारत और विदेशी कंपनियों के बीच पनपा ताजा विवाद दुनिया भर में जारी चलन का ही एक हिस्सा है। यह तकनीकी कंपनियों की बढ़ती ताकत का संकेत है, जो राष्ट्र की शक्ति को निरर्थक बना देना चाहती हैं। इतिहास में असल क्रांतियां तो तकनीकी क्रांतियां ही मानी जाएंगी, जो किसी समाज के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक संस्था में बदलाव लाती हैं। औद्योगिकीकरण, व्यापारिक शहरों के उदय, श्रम की गतिशीलता व जमींदार वर्ग से आर्थिक ताकत के खिसककर औद्योगिक-मध्य वर्ग की तरफ जाने के कारण जो सामंतवाद पनपा है, पिछली कुछ सदियों में, तकनीकी प्रगति ने उसको काफी कमजोर कर दिया है। राष्ट्र व राष्ट्र-राज्य के साथ-साथ एक संघीय सरकार के उदय के रूप में यह हमारे सामने आया, जो सामंती और कुलीन ताकतों पर अंकुश लगाने में मजबूती से सक्षम है।

मगर अब यही तकनीकी प्रगति एक नए तकनीक-सामंत वर्ग को जन्म दे रही है, और राष्ट्र की ताकत को धीरे-धीरे कमजोर कर रही है। इस घटना को तकनीकी-सामंतवाद कहा जा सकता है। इसके तीन स्तंभ हैं- विशुद्ध कंप्यूटिंग ताकत, कुछ निजी हाथों में अभूतपूर्व आर्थिक शक्ति और समाज को आकार देने में तकनीक-अभिजात वर्ग की क्षमता। पुराने सामंतवाद में जमीन पर अधिकाधिक नियंत्रण अहम था, जबकि तकनीक के सामंतवाद में डिजिटल रियल एस्टेट पर कब्जा किया जाता है। पुराने सामंतवाद की तरह, तकनीक-सामंतवाद भी कानून व सरकार के तमाम अंगों को इस हद तक भ्रष्ट व बेकार बना देता है कि सरकारों के लिए ऐसा कोई कदम उठाना मुश्किल हो जाता है, जो सामंतियों के क्रूर व्यवहार को नियंत्रित करने में सक्षम हो। इतना ही नहीं, पुराने सामंतवादियों की तरह नया तकनीक-अभिजात वर्ग भी अधिक से अधिक डिजिटल रियल एस्टेट पर कब्जा करने और कृत्रिम बुद्धिमता, यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी उभरती प्रौद्योगिकियों को अपने काबू में रखने की जंग में शामिल है। इसमें कई बड़ी तकनीकी कंपनियां ईस्ट इंडिया कंपनी जैसी लगती हैं।

बड़ी और धनाढ्य तकनीकी कंपनियां न सिर्फ भ्रष्टाचार करती हैं और व्यवस्थाएं तोड़ती हैं, बल्कि संप्रभु राष्ट्र के कानूनों का पालन करने या करों के भुगतान से भी हीला-हवाली करती हैं। यह वर्ग समाज को नया आकार दे सकता है। इतने कम लोगों के पास जनता से अलग रहते हुए भी जनमत तैयार करने की इतनी ताकत इतिहास में कभी नहीं रही। इस तकनीक-अभिजात वर्ग के पास इतनी ताकत है कि वह स्थानीय राजनीति में दखल दे सके और डाटा व संचार के साधनों पर अपने नियंत्रण का लाभ उठाकर राजनीतिक विमर्श की दिशा बदल दे और सरकार को सत्ता से बेदखल कर दे। इस वर्ग ने अपना वैचारिक ब्रांड और तकनीकी रूप से दक्ष रणबांकुरे तैयार किए हैं।

बहरहाल, तकनीक-अभिजात वर्ग को अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर मनमानी शक्तियां हासिल हैं। यह अपने समान संकीर्ण सोच को दुनिया भर में थोपने का प्रयास करता है। इनकी मुखालफत सेंसरशिप, मानहानि, प्रतिबंध जैसी कार्रवाइयों को न्योता दे सकती है, जो आज की दुनिया में जंगल में अलग-थलग रहने जैसा है। यहां संविधान द्वारा मिले अधिकार व अपील करने या न्यायिक निवारण की मांग जैसे अधिकारों को निरर्थक बनाया जा रहा है, क्योंकि नया तकनीक-अभिजात वर्ग अपना कानून खुद बना रहा है, और खुद ही वकील, जज व जल्लाद की भूमिका निभा रहा है। यह दुनिया भर में फिर से मध्ययुगीन सामंतवाद के दौर जैसा माहौल लाना चाहता है।

हमें समझना होगा कि आज नौकरियां खत्म हो रही हैं। मध्य वर्ग को निचोड़ा जा रहा है। और, अधिकाधिक लोग गिग इकोनॉमी (स्थाई नौकरी के बजाय अनुबंध के काम को तवज्जो देने वाले श्रम बाजार) से बाहर निकलने की जद्दोजहद में हैं, क्योंकि यह उन्हें एक नए तरीके से गुलाम बना रही है। तकनीकी बदलाव रोके नहीं जा सकते। मगर अकादमिक व बौद्धिक रूढ़िवादिता और संकीर्ण राजनीतिक विवादों से परे इस पर गंभीर चर्चा करना एक सकारात्मक कदम हो सकता है।


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