08-10-2025 (Important News Clippings)

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08 Oct 2025
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Date: 08-10-25

भरी अदालत में सीजेआई की अवमानना निंदनीय

संपादकीय

देश में पहले भी वैचारिक असहिष्णुता रही है। लेकिन किसी टिप्पणी से नाराज हो कर सीजेआई पर भरी कोर्ट में एक रजिस्टर्ड वकील द्वारा जूता फेंकना इसका एक डरावना पहलू है। वकील को शिक्षित माना जाता है। और वैचारिक मतभेद के लिए तमाम प्रजातांत्रिक – शालीन विकल्प संविधान में उपलब्ध हैं। वकील को यह भी मालूम था कि उसकी हरकत का अंजाम क्या होगा। भले ही सीजेआई ने उदारता दिखाई हो लेकिन कानून को अपना काम करना चाहिए वरना इसकी पुनरावृत्ति देश के तमाम कोट्र्स में होने लगेगी। ऐसी ही वैचारिक असहिष्णुता की परिणति थी कि हमने गांधी को खोया। दरअसल हाल के वर्षों में इस असहिष्णुता का अधोपतन सड़क पर फैसला करने की प्रवृत्ति में हुआ । और यह बढ़ता गया क्योंकि कानून अपना काम नहीं कर सका। उलटे पुरस्कार के रूप में कुछ अपराधियों को राजनीतिक लाभ के लिए महिमामंडित तक किया गया। अनेक मामलों में ऐसे तत्वों को टिकट देकर कानून बनाने वाली विधायिकाओं में भेजा जाने लगा। जनता ने भी इन्हें अपना वैचारिक प्रतिनिधि मानते हुए वोट दिया। पीएम सहित हर राजनीतिक दल के मुखिया ने एससी में हुई इस घटना की निंदा की है और बार कौंसिल ने उपद्रवी वकील को तत्काल सस्पेंड करते हुए देश की किसी भी अदालत में प्रैक्टिस करने पर रोक लगा दी। लेकिन जनता के अलावा राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों को भी सोचना होगा कि ऐसी मानसिकता वाले लोगों को महिमामंडित करने से संदेश क्या जाता है ?


Date: 08-10-25

प्रतिस्पर्धा में हो सुधार

संपादकीय

केंद्र सरकार को नीति आयोग के मुख्य कार्याधिकारी बीवीआर सुब्रह्मण्यम की सलाह पर ध्यान देना चाहिए। सोमवार को सुब्रह्मण्यम ने कई दिलचस्प और महत्त्वपूर्ण बातें कहीं जो बताती हैं कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार को लेकर भारत के नीतिगत विचार में क्या कमियां हैं और इस मामले में क्या करने की आवश्यकता है। कुछ अन्य बातों के अलावा उन्होंने कहा कि भारत को चीन सहित एशिया पर करीबी नजर रखनी होगी और पड़ोसियों के साथ मजबूत कारोबारी रिश्ते कायम करने होंगे।

साफ कहें तो व्यापक तौर पर पड़ोसी देशों के साथ भारत की व्यापार व्यवस्थाएं भूराजनीतिक हालात पर निर्भर करती हैं जो अक्सर प्रतिकूल ही रहते हैं। बहरहाल, भारत शेष एशिया के साथ जुड़ाव स्थापित कर सकता है जो आने वाले वर्षों में वैश्विक वृद्धि का अधिक महत्त्वपूर्ण वाहक सिद्ध होगा। लेकिन चीन की मौजूदगी और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के संघ (आसियान) के साथ हुए अपने व्यापार समझौते के परिणामों के कारण भारत अब तक अनिच्छुक बना हुआ है।

बहरहाल, जैसा कि सुब्रह्मण्यम ने उचित ही कहा कि चीन की अनदेखी करना संभव नहीं है। आखिर वह दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश है। कुछ देश चीन के साथ व्यापार अधिशेष की अवस्था में हैं। भारत द्वारा अपनी अर्थव्यवस्था में खुलापन नहीं लाने की बुनियादी वजह प्रतिस्पर्धी क्षमता की कमी है। यह कमी भी हमारी व्यापार नीति का ही परिणाम है। घरेलू कारोबारों के संरक्षण के लिए उच्च शुल्क दर लागू करने से कच्चे माल पर कर लगता है जो सीधे तौर पर भारतीय निर्यातकों की प्रतिस्पर्धी क्षमता को प्रभावित करता है। भारत को इस मसले को तत्काल संबोधित करने की जरूरत है।

नीति आयोग की ताजा तिमाही व्यापार निगरानी रिपोर्ट जो चमड़ा और जूते-चप्पल के निर्यात पर केंद्रित है, उसमें कहा गया है कि भारत जूते-चप्पल के निर्माण में लगने वाले कच्चे माल में करीब 10 फीसदी शुल्क लगाता है जबकि उसके प्रतिस्पर्धी मसलन वियतनाम आदि करीब शून्य कर लगाते हैं। भारत को अपना रुख बदलने की आवश्यकता है। मसलन खबरों के मुताबिक एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने हाल ही में सुझाव दिया कि भारत को उन देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जो अभी प्रतिस्पर्धी नहीं हैं। यह व्यापार का सही तरीका नहीं है। अगर भारत किसी गैर प्रतिस्पर्धी देश के साथ व्यापार करता भी है तो भी वह देश ऐसे स्रोतों से वस्तुएं खरीद सकता है जो भारत के मुकाबले अधिक प्रतिस्पर्धी हों।

भारत ने ब्रिटेन के साथ मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करके अच्छा किया है और वह यूरोपीय संघ के साथ ऐसे समझौते को लेकर चर्चा कर रहा है। भारत जितनी जल्दी यह समझौता करेगा, उतना ही अच्छा होगा। अमेरिका के साथ भी भारत एक साझा लाभकारी व्यापार समझौते के लिए प्रयासरत है।

बहरहाल, अमेरिकी प्रशासन की अनिश्चित प्रकृति को देखते हुए भारत को जल्द से जल्द अन्य व्यापारिक साझेदार देशों के साथ कहीं अधिक गहन समझौतों के प्रयास करने चाहिए। भारत विशाल क्षेत्रीय समझौतों का हिस्सा भी नहीं है। यही वजह है कि उसे वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं के साथ एकीकृत होने में भी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।

भारत ने व्यापक क्षेत्रीय आर्थिक साझेदारी समझौते (आरसेप) में शामिल होने को लेकर कुछ शको-शुबहे जाहिर किए हैं जो मुख्य रूप से चीन की मौजूदगी से संबंधित हैं। अब उसे अपने रुख की समीक्षा करनी चाहिए। भारत को प्रशांत-पार व्यापक एवं प्रगतिशील साझेदारी समझौते में शामिल होने पर भी विचार करना चाहिए।

भारत के लिए अपने निर्यात का विस्तार करना भी महत्त्वपूर्ण है। बाहरी मांग टिकाऊ उच्च वृद्धि का अहम स्रोत हो सकता है। हाल के दशकों में कई आसियान देश इसका उदाहरण रहे हैं। भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति में प्रकाशित ताजा शोध दिखाता है कि कंपनी के स्तर पर और समग्र स्तर पर भी निर्यात वृद्धि का सांख्यिकीय दृष्टि से तयशुदा निवेश वृद्धि पर महत्त्वपूर्ण असर पड़ता है। माना जाता है कि निजी निवेश में सुधार मध्यम अवधि में उच्च आर्थिक वृद्धि बनाए रखने के नजरिये से अहम है। अतः व्यापार की संभावनाओं में सुधार विभिन्न माध्यमों से वृद्धि को बढ़ावा दे सकता है और उसे टिकाऊ बना सकता है।


Date: 08-10-25

एक करोड़ महिलाओं की ताकत

संपादकीय

नई वैश्विक परिस्थितियों के बीच भारत के समकाल और देशकाल को देखना खासा दिलचस्प है। समाज, राजनीति और लोकतंत्र की बात करें तो देश आपातकाल से पांच दशक आगे निकल चुका है। यह भी कि इस वर्ष जब आखिरी विधानसभा चुनाव के रूप में बिहार में नई सरकार चुनी जानी है तो जयप्रकाश आंदोलन के भी पचास वर्ष पूरे हो रहे हैं। ऐतिहासिक रूप से विहार इस आंदोलन का एक तरह से पपिक सेंटर था। इन पांच दशकों में जरूर गंगा में वहुत पानी पानी वह चका है, पर समय के इस बहाव के बीच कुछ चीजें स्थिर भी हुई है और वे नई मिसालें और मानदंडों के साथ हमारे समय में लोकनीति और विकास को व्याख्यायित कर रही है। इस बात की बड़ी अहमियत है कि जिस विहार में आकर महात्मा गांधी ने सत्याग्रह का अमोघ अस्त्र देश-दुनिया को दिया, आज उस सूबे की धरती पर महिलाओं ने एक बड़ी मूक क्रांति को सच कर दिखाया है। यह क्रांति महिला सशक्तीकरण की इकहरी समझ 1 से आगे कई मायनों में सर्व समावेशी है और इससे इस प्रदेश की महिलाओं के साथ ग्रामीण इलाकों में विकास और बदलाव का एक सर्वधा नया दौर सामने आया है। इस लिहाज से इन दिनों मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना की खासी चर्चा है। आकार के लिहाज से यह देश की ऐसी सबसे बड़ी योजना है, जिसने न सिर्फ सामाजिक बदलाव की जमीन को मजबूत किया है, बल्कि इसे महिलाओं के आर्थिक स्वावलंबन का सर्वर्था नया दौर शुरू हुआ है।

गौरतलब है कि बीते 26 सितंबर को जब यह योजना शुरू हुई तो 75 लाख से उपाय महिलाओं के बैंक खाते में दस-दस हजार रुपए ट्रांसफर किए गए। इसके कुछ ही दिन बाद 25 लाख और महिलाओं को इसमें जोड़ा गया और उनके भी खाते में पैसे पहुंचे। इस तरह 75 लाख का आंकड़ा देखते-देखते एक करोड़ पर पहुंच गया। राज्य क्या देश के स्तर पर पर भी यह संख्या ऐतिहासिक तौर असाधारण है। महिलाओं को यह राशि स्वरोजगार और आत्मनिर्भरता के लिए दी जा रही है। वस्तुतः चुनाव से पूर्व होने वाली तमाम तरह की अव्यावहारिक और हवाई घोषणाओं से अलग बिहार सरकार ने कैबिनेट स्तर पर बीते कुछ महीनें में कई अहम फैसले लिए है। इस क्रम में जो बड़ा फैसला राज्य सरकार ने किया है, वह है मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना राज्य सरकार ने इस योजना को प्रदेश की महिलाओं की स्थिति और जरूरत को समझते हुए न सिर्फ फ्रेम किया, बल्कि इसके शीघ्र क्रियान्वयन को लेकर भी वह लगातार गंभीर रही। योजना के तहत जिन महिलाओं को दस हजार रुपए की मदद मिली है, उन्हें छह महीने बाद मूल्यांकन पर खरा उतरने पर दो लाख रुपए की अतिरिक्त सहायता दी जाएगी।

बात महिला सशक्तीकरण की हो रही है तो यह जान लेना जरूरी है बिहार में नीतीश सरकार की सबसे सफल योजनाओं में जीविका है। विश्व बैंक की मदद से वर्ष 2006 में इस योजना के आज राज्य में एक करोड़ 40 लाख से अधिक महिलाएं 11 लाँख स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से जीविका दीदी के रूप में पहचान बना चुकी है। ये महिलाएं सिलाई, बुनाई, कृषि, पशुपालन, किराना दुकान, मसाला निर्माण, मधुमक्खी पालन, बकरी पालन जैसे छोटे-छोटे उद्योगों के जरिए न केवल अपनी आमदनी बढ़ा रही है, बल्कि दूसरों को भी रोजगार दे रही है। आज की तारीख में जीविका देश में महिला स्वरोजगार का सबसे बड़ा समूह है।

मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना जीविका के ही मॉडल का विस्तृत रूप है। ऐसा इसलिए क्योंकि जीविका स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) से जुड़ी महिलाओं को ही इस योजना का लाभ मिल रहा है। इन महिलाओं को सरकार की आर्थिक मदद स्वरोजगार शुरू करने, छोटे-मोटे बिजनेस शुरू करने या वर्तमान में चल रहे व्यवसायों को बढ़ाने में सहायता के उद्देश्य से दी जा रही है। इससे बड़ी किसी योजना की सफलता और उपयोगिता क्या होगी कि इसके लिए 1.05 करोड़ जीविका दीदियों ने, जबकि 1.4 0 लाख से अधिक महिलाओं ने समूह से जुड़ने के लिए आवेदन किया।

जो लोग बिहार की राजनीतिक-सामाजिक स्थिति को कम से कम बीते दो दशकों से गौर से देख रहे हैं, वे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इस विवेक की जरूर दाद देते हैं। कि इन वर्षों में उन्होंने सूबे की महिलाओं को सिर्फ मतदाता नहीं रहने दिया, बल्कि उन्हें सामाजिक परिवर्तन की धुरी बनाया। भूले नहीं है लोग कि देश में मंडल और कमंडल की राजनीति के अश्वमेध का घोड़ा एक साथ दौड़ा तो बिहार की जनता ने राजनीति से जुड़े सामाजिक सरोकारों का तार्किक चुनाव किया। इस मॉडल के नायक निस्संदेह बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार है, जिनकी मौजूदगी आज प्रदेश में हर राजनीतिक गठजोड़ के लिए अपरिहार्ये बनी हुई है। उनकी मौजूदगी एक तरफ सांप्रदायिकता के खिलाफ सद्भाव की राजनीति का आश्वासन है, तो वहीं महिलाओं और अति पिछड़ों के कल्याण को लेकर बीते दो दशक में उन्होंने सफलता की एक लंबी पटकथा लिखी है।

नए विकासवादी अभिप्रायों और लक्ष्यों के साथ बिहार को लेकर इस रूम में चर्चा का आज की तारीख में महत्व इसलिए भी है कि इससे विकास के साथ सामाजिक बदलाव के लक्ष्य को साधने वाली राजनीति की भूमिका नए सिरे से रेखांकित होती है। यह भूमिका हमारा ध्यान उस मूक क्रांति की तरफ ले जाती है जिसके बारे में बीते दो दशक में कौन यूनिवर्सिटी से लेकर विश्व मुद्रा कोष तक ने विमर्श और समकालीन नैतिक दरकार के लिहाज से काफी कुछ कहाँ और लिखा है। यहां तक कि दुनियाभर की सरकारों के बीच कोरोना महामारी के बाद यह नैतिक दरकार उनकी नीतिगत प्राथमिकता की एक बड़ी कसौटी बन चुकी है। बिहार आज इस कसौटी पर खरा उतारता दिख रहा है तो यह देश में राज्यों के नए वर्ग चरित्र का भी उद्घाटन है। इस चरित्र के साथ हम बदलते देश समाज के साथ राज्यों की नई वन रही पहचान को देख सकते हैं। यह पहचान सामाजिक बदलाव के ऊंचे लक्ष्य को जिस तरह स्पर्श कर रही है, वह शानदार है। खासतौर पर बिहार के लिए यह गर्व की बात है कि देश में पंचायतीराज व्यवस्था और नगर निकायों में महिलाओं को 50 फीसद आरक्षण सबसे पहले देने वाले इस सूबे के पास आज महिला स्वावलंबन का अपना मॉडल तो है ही, सुशासन के रूम में नीति और राजकाज का साफ-सुधरा विवेक भी है।


Date: 08-10-25

गाजा में कैसे होगा अमन का आगाज

औसाफ सईद, ( पूर्व राजनयिक )

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की गाजा शांति योजना कूटनीतिक प्रयास से बढ़कर अब एक ऊंचे दांव वाली नाजुक हकीकत में तब्दील हो गई है। बीते 3 अक्तूबर को हमास द्वारा सभी इजरायली बंधकों को रिहा करने और गाजा के शासन से अलग रहने के सशर्त स्वीकार के बाद ट्रंप ने इजरायल को तत्काल बमबारी रोकने का आदेश दिया था। हालांकि, इसके बाद भी बमबारी हुई और इसमें दर्जनों लोग हताहत भी हुए। मगर आधिकारिक तौर पर पिछले दो साल से चल रहा युद्ध निर्णायक वार्ता के दौर में प्रवेश कर गया है। 7 अक्तूबर, 2023 को हमास ने इजरायल पर हमला किया था। इसकी दूसरी बरसी पर सभी की निगाहें मिस्र के शर्म अल-शेख पर टिकी हैं, जहां परदे के पीछे यह वार्ता चल रही है। इस वार्ता में अमेरिकी प्रतिनिधि के तौर पर ट्रंप ने अपने दामाद जेरेड कुशनर और दूत स्टीव विटकॉफ को भेज रखा है। इजरायल की ओर से रॉन डर्मर और हमास की ओर से खलील अल-हय्या के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल भी शामिल हैं।

राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा ‘तेजी से आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किए जाने के बावजूद अभी चर्चा प्रारंभिक चरण में ही है। इस बातचीत में बंधकों व कैदियों की अदला-बदली की रूपरेखा तय करने, दुश्मनी समाप्त करने और सुरक्षा गारंटी की व्यवस्था जैसे अहम मुद्दों पर बातचीत हो रही है। हालांकि, अब तक बंधकों या कैदियों की अदला-बदली पर कोई समझौता नहीं हुआ है। जहां तक प्रशासन के हस्तांतरण की बात है, तो ट्रंप की अध्यक्षता वाले ‘शांति बोर्ड’ की देखरेख में इसके लिए एक समिति गठित होनी है। इसके तहत एक 20- सूत्रीय योजना बनाकर ढांचा तैयार किया जाएगा, जो सुरक्षा, शासन और पुनर्गठन के तीन स्तंभों पर आधारित होगा । यह अस्थायी व्यवस्था फलस्तीनी प्राधिकरण (पीए) के सत्ता संभालने तक कायम रहेगी । इसपर अभी हमास की स्वीकृति नहीं मिली है, क्योंकि वह गाजा क्षेत्र से इजरायल की पूर्ण वापसी और निरस्त्रीकरण की शर्तों पर अंतरराष्ट्रीय गारंटी की मांग कर रहा है। खबरों के अनुसार, इस मुद्दे पर हमास के राजनीतिक और सैन्य महकमों के बीच मतभेद उभर आने के संकेत मिल रहे हैं। इन मुद्दों को सुलझाने के लिए मिस्र फलस्तीनी गुटों का व्यापक सम्मेलन कराने वाला है।

उधर, हमास की प्रतिक्रिया पर ट्रंप के सकारात्मक रुख ने इजरायली खेमे में विवाद खड़ा कर दिया है। उसके वरिष्ठ अधिकारी हमास की सशर्त स्वीकृति को ‘वास्तव में अस्वीकार’ मान रहे हैं। फिर भी, ट्रंप के इस आशावादी दावे ने कि हमास ‘स्थायी शांति के लिए तैयार है’ प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को चौंका दिया और इजरायल ने अधिक कठोर मुद्रा अपना ली है। नेतन्याहू ने चेतावनी दी है कि हमासको शस्त्रहीन करके ही रहेंगे, चाहे उंगली टेढी ही क्यों न करनी पड़े। उन्होंने यह भी दावा किया कि इजरायली सेना गाजा परनियंत्रण रखेगी। उन्होंने अलग फलस्तीन देश के वजूद को भी सिरे से नकार दिया। जाहिर है, इन सबसे इस योजना पर ग्रहण लगता नजर आ रहा है। ऐसा लगता है कि सत्तारूढ़ गठबंधन के अपने अति दक्षिणपंथी सहयोगियों को खुश करने के लिए नेतन्याहूइस तरह के बयान दे रहे हैं। उधर, तेल अवीवमें हजारों प्रदर्शनकारी युद्ध-विराम की मांग कर रहे हैं और इस अवसर को ‘अभी नहीं तो कभी नहीं’ बता रहे हैं।

बहरहाल, अगर शर्म अल-शेख वार्ता सफल होती है, तो यह सशर्त समझौता अल्पकालिक लाभ देने वाला साबित हो सकता है। दुश्मनी खत्म होने से विनाशकारी नुकसान झेल रही आबादी को तत्काल राहत मिलेगी, जबकि बंधकों और कैदियों की वापसी से त्रासद मुद्दों का समाधान होगा। राफा क्रॉसिंग को फिर से खोले जाने से बुनियादी ढांचे के पुनर्निर्माण के लिए गाजा में बड़े पैमाने पर सहायता आ सकेगी। अमेरिका के नेतृत्व वाला आईएसएफ आंतरिक सुरक्षा प्रदान करने, विसैन्यीकरण में सहायता करने और स्थानीयव क्षेत्रीय अधिकारियों के साथ समन्वय बैठाने के लिए तैयार है । इस्लामी देशों ने ट्रंप के दृष्टिकोण का स्वागत करते हुए संयुक्त बयान जारी किया, लेकिन आईएसएफ के सैन्यीकरणमें साझीदार बनने से उन्होंने परहेज ही बरता है।

ट्रंप की गाजा शांति योजना का वास्तविक महत्व इसके दीर्घकालिक भू-राजनीतिक नतीजों में निहित है । यह अब्राहम समझौते का रणनीतिक विस्तार है, जिसे फलस्तीनी संघर्ष को सुलझाने और इजरायल व खाड़ी के देशों के बीच पूर्ण क्षेत्रीय गठबंधन की मुख्य बाधा को दूर करने के लिए डिजाइन किया गया है। यदि यह सफल रहा, तो यह इजरायल और सऊदी अरब के बीच संबंध सामान्य बनाने का मार्ग प्रशस्त कर सकता है । यदि विफल हुआ, तो यही माना जाएगा कि क्षेत्र में फलस्तीनी अधिकारों को कुचलकर ही स्थिति सामान्य हो सकेगी।

फलस्तीनियों के लिए ‘राज्य के दर्जे का मार्ग’ एक संप्रभु देश की ओर ले जाने वाली संभावना नहीं है। यह वादा फलस्तीन प्राधिकरण सुधारों पर निर्भर है और इसके लागू होने की कोई समय-सीमा नहीं है । इसलिए आलोचक इसे एक अनिश्चितकालीन स्थगन ही मानते हैं। इसके अलावा, इजरायल की गाजा से वापसी का वादा भी बहुत साफ नहीं है। सबसे संभावित परिणाम जोदिखता है, वहलंबा संक्रमणकालीन चरण है, जिसमें गाजा का प्रशासन एक अंतरराष्ट्रीय निकाय के पास रहेगा ।

इस प्रकार ट्रंप की गाजा शांति योजना जोखिम भरे दांव में बदल गई है। शर्म अल-शेख वार्ता एक परीक्षा है। यह इस मसले को या तो एक व्यावहारिक युद्ध- विराम की ओर ले जाएगी या अपने विरोधाभासों के कारण ध्वस्त हो जाएगी। देखा जाए, तो इस मामले में स्थायी सफलता हमास की सियासी महत्वाकांक्षाओं और इजरायल के पूर्ण सुरक्षा नियंत्रण पर जोर वाले गहरे वैचारिक विभाजन के बीच पुल बनने पर निर्भर करती है। योजना की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि क्या इसके रचयिता इन असंगत मांगों को पूरा कर सकेंगे ?

भारत के लिए यह योजना रणनीतिक दुविधा वाली है। इसकी सफलता त्रासद घटनाओं को कम करेगी और ‘भारत, मध्य-पूर्व व यूरोप’ के बीच के आर्थिक गलियारे को सक्रिय करने लायक वातावरण तैयार करेगी। मगर ईरान पर ट्रंप की अधिकतम दबाव की नीति मध्य एशिया के इस वैकल्पिक प्रवेश द्वार में भारत के निवेश को खतरे में डालती है। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि ट्रंप ने चाबहार बंदरगाह के लिए प्रतिबंधों से छूट को हाल ही में रद्द कर दिया है।