03-09-2026 (Important News Clippings)
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Date: 03-09-26
Hormuz Card? Not Quite
Iran’s chokehold over the critical energy route may wane as world builds alternatives
TOI Editorials
Following a brief lull, US and Iran are back to skirmishes. American military struck targets along Iran’s southern coast, and Tehran retaliated by firing missiles at Jordan, Bahrain, and Kuwait. Oil prices have again begun to trend upwards, with Brent crude hovering around the $92 per barrel mark on Tuesday, before somewhat easing to $91 on Wednesday. For the world, this is a movie it has seen on loop since Feb.
What’s crucial here is Iran’s chokehold on Strait of Hormuz. It targets shipping – including those flagged by neutral countries such as India – in the critical waterway. It has been Iran’s ‘Trump’ card in this war. However, like with any leverage, if used repeatedly, people find ways around it. So, it isn’t surprising that countries are already devising alternatives to reduce their dependence on Hormuz. US treasury secretary Scott Bessent said that Hormuz will be a “worthless piece of water” in a couple of years. He may not be wrong. UAE is already furiously building a second pipeline to Fujairah, which will allow almost all of Abu Dhabi’s oil to be transported out without using Hormuz. Similarly, Saudi Arabia is expanding its East-West pipeline to ship out oil through its Red Sea ports. Iraq and Jordan have revived plans for a pipeline that will carry up to 1mn barrels per day to Port of Aqaba off Red Sea. Baghdad is also repairing an old pipeline to the Mediterranean via Syria.
The calculation is clear: Iran can’t be allowed to have permanent control over Hormuz. It can’t hold to ransom global energy supplies. And given there is no immediate solution to the US-Iran deadlock, and with the Israel problem not going away – there is no telling when Tel Aviv will again initiate another round of conflict with Tehran – countries can’t leave their energy security in the hands of Trump, Netanyahu, and IRGC. Plus, major producers have roughly a decade to rake in oil revenues. With electrification and renewables steadily increasing their share in global energy mix, the days of petro-dollars are numbered. Hence, the pills – pipelines and storage – for alleviating Hormuz headache. Iran may have overplayed its hand. Hormuz may soon be a footnote.
A Plane Plan for China to Consider
BRICS is a good platform to float it
ET Editorials
It’s no surprise that Air India’s mounting losses and request for additional funds have riled up the likes of Singapore’s opposition leader Kenneth Tiong, who is baulking at future bailouts by Temasek through Singapore Airlines (SIA). Temasek, Singapore’s multinational investment firm, is SIA’s largest shareholder. SIA, in turn, owns a fourth of Air India, already facing turbulence after the June 2025 crash, high jet fuel prices, wars in West Asia and Europe, and airspace blockades.
The upcoming New Delhi BRICS summit may be the unlikely, but best, platform to negotiate better deals to use Chinese — and Russian — airspace, especially for long-haul flights. China and India are cautiously traipsing to stabilise relations. Direct flights between the two resumed last October, ending a 5-yr suspension. A regulatory relief to offset Pakistan’s airspace blockade can create a new waypoint that’s only a minor detour with minimum distance penalty. It will suit Air India the most. Its existing wide-bodied 787s, 777s, and incoming A-350s are best suited for executing this high-altitude turn over the Himalayas, east of Pakistan.
This selective blockade on Indian carriers since 2025, Iran and Iraq shutouts during peak escalation of the West Asian conflict, and soaring fuel bills are hurting India’s aviation industry. Planes are flying longer, incurring higher fuel burn and paying more for it. Throw in added maintenance cost, passenger inconvenience and secondary knock-on effects, and the entire network goes into a tailspin. Having the largest US- and Europe-centric long-haul fleet, Air India has been hit much more than global rivals flying through Pakistan, and bypassing a direct West Asian conflict zone. Flying over the Himalayas may not be an all-encompassing fix-it. Technical challenges persist. Planes need special certification and specifications to handle flying over such trying terrain. Yes, it will come at the cost of passenger payloads. But the high trade and tourism potential between China and India can soften that blow.
हमने विश्व मंच पर अडिग रवैये का प्रदर्शन किया
संपादकीय
बिश्केक ( किर्गिस्तान) में आयोजित एससीओ (शंघाई सहयोग संगठन) के 26वें शिखर सम्मलेन में घोषणा-पत्र और 27 अन्य दस्तावेज जारी तो हुए, लेकिन हर देश के विदेश मंत्रालय ने अपनी राजनीतिक कूटनीतिक सुविधा के हिसाब से प्रेस नोट भी जारी किए। एक साल पहले की घोषणा से अलग इस बार ईरान पर हमले की निंदा तो थी, लेकिन अमेरिका-इजरायल का नाम गायब था। साथ ही रूस- यूक्रेन युद्ध की चर्चा नहीं थी। परोक्ष रूप से पाकिस्तान को लक्षित करते हुए राज्य प्रायोजित आतंकवाद का जिक्र पत्र में शामिल करना भारत की जीत रही भारत हमेशा से पीओके में चीन के बीआरआई के तहत सड़कें बनाने का विरोध करता रहा है, लिहाजा 2017 से भारत के इस संगठन में शामिल होने के बाद से यह अलिखित सहमति बनी कि बीआरआई से संदर्भित किसी भी बिंदु में भारत का नाम शामिल नहीं किया जाएगा। यह नई दिल्ली की भावना का स्थायी सम्मान बताता है। भारत हर देश की सम्प्रभुता अक्षुण्ण रखने की नीति के तहत बीआरआई के नाम पर पीओके में चीन की दखलंदाजी का विरोध करता है। भारत की जीत यह भी रही कि राज्य – प्रायोजित आतंकवाद का जिक्र पाक पीएम की मौजूदगी में करना परोक्ष रूप से इस्लामाबाद पर आक्षेप था, फिर भी इसे मूल दस्तावेज में लाया गया। अलग करेंसी में व्यापार की चर्चा की भी हमने अनदेखी की। देखना होगा कि भारत की अगुवाई में आगामी ब्रिक्स इस पर क्या रुख लेता है।
Date: 03-09-26
स्कूलों की हकीकत बयान कर रहे हैं “जेन-अल्फा” के प्रदर्शन
आरती जेरथ, ( राजनीतिक टिप्पणीकार )
‘स्कूल ठीक करो’ अभियान के चलते पहली बार हमें उस भयावह वास्तविकता का सामना करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है, जिसके साथ देशभर के कई प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों के विद्यार्थी हर दिन जीते हैं। इनमें से कुछ स्कूलों की हालत इतनी खस्ता है कि स्कूली बच्चे- या कहें जेन अल्फा- हाल के सीजेपी-नेतृत्व वाले जेन-जी प्रदर्शनों से प्रेरित होकर सड़कों पर उतर आए हैं और टॉयलेट, पेयजल, कक्षाओं, पक्की सड़कों और सबसे बढ़कर शिक्षकों जैसी बुनियादी सुविधाओं की मांग कर रहे हैं।
जेन-अल्फा के विरोध-प्रदर्शन यूपी, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, महाराष्ट्र और बिहार तक पहुंच चुके हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक को लेकर जेन-जी ने देशभर के प्रमुख शहरों को ठप कर दिया था और शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देने के लिए मजबूर कर दिया था। इससे सरकार पहले ही बैकफुट पर थी। लेकिन स्कूली बच्चों का प्रदर्शन करना तो सरकार के लिए दुःस्वप्न जैसी स्थिति है। इन बच्चों पर पुलिस भी बलप्रयोग नहीं कर सकती।
विडम्बना तो यह है कि सरकार का अपना आधिकारिक आंकड़ा ही ग्रामीण इलाकों में शिक्षा की बदहाल स्थिति की तस्वीर पेश करता है। नीति आयोग के एक हालिया सर्वेक्षण से पता चला है कि पिछले एक दशक में 94,000 से अधिक स्कूल बंद हो चुके हैं। इनमें अकेले यूपी के 26,000 स्कूल शामिल हैं। सरकारी स्कूलों को चलाए रखने के लिए घटते वित्तीय संसाधनों के अलावा, उच्च माध्यमिक स्तर पर पढ़ाई छोड़ने की ऊंची दर का मतलब है कि कक्षाएं खाली हो रही हैं। करीब 73 प्रतिशत विद्यार्थी उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी करने से पहले ही स्कूल छोड़ देते हैं।
नीति आयोग के सर्वेक्षण में इस ऊंची ड्रॉप-आउट दर के कई कारण बताए गए हैं। जिन अभिभावकों की आर्थिक क्षमता है, वे अपने बच्चों को अपेक्षाकृत महंगे निजी स्कूलों में भेजना पसंद करते हैं, जहां शिक्षा की गुणवत्ता बेहतर होती है। जो ऐसा नहीं कर सकते, वे माध्यमिक स्तर पर अपने बच्चों को स्कूल से निकाल लेते हैं, क्योंकि सरकारी संस्थानों में भी यूनिफॉर्म, किताबों, परीक्षा शुल्क आदि जैसे खर्च हैं, जिन्हें वहन करना उनके लिए संभव नहीं होता। इसके विपरीत, प्राथमिक शिक्षा लगभग पूरी तरह निःशुल्क है।
गरीब परिवारों पर आर्थिक दबाव भी ऐसे हैं कि बच्चों को परिवार की आय बढ़ाने के लिए स्कूल छोड़कर कामकाज में लगना पड़ता है। वर्ष 2020-21 के पीरियोडिक लेबर-फोर्स सर्वे में पाया गया कि 14 से 17 वर्ष उम्र के 31 प्रतिशत किशोर काम कर रहे थे, जबकि 25 प्रतिशत लड़कियों ने घरेलू कामों में अपनी मांओं की मदद करने के लिए पढ़ाई छोड़ दी थी।
जहां केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय का स्कूली बुनियादी ढांचे पर वार्षिक ट्रैकर एक बेहद अच्छी तस्वीर पेश करता है, वहीं राजस्थान सरकार के 2025 के एक सर्वेक्षण के अनुसार जमीनी हकीकत इससे अलग है। सर्वेक्षण में राज्य के हजारों स्कूल परिसरों में गंभीर संरचनात्मक और बुनियादी ढांचे से जुड़ी कमियों को उजागर किया गया है। मसलन, करीब 87,000 कक्षाएं जर्जर हालत में थीं, जिसके बाद न्यायपालिका को हस्तक्षेप करना पड़ा और उनके इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई। राज्य के 64,000 स्कूलों में से 2,000 से अधिक में टॉयलेट्स नहीं थे, जबकि 1,000 से अधिक में पीने के पानी की व्यवस्था नहीं थी। 600 से अधिक स्कूलों के पास अपने भवन तक नहीं थे और छात्रों को टिन की छतों के नीचे या पेड़ों के नीचे पढ़ने के लिए मजबूर होना पड़ता था।
हाल ही में लखनऊ में सर्वोदय स्कूल की 250 छात्राओं ने शिक्षक की कमी और खराब सुविधाओं के खिलाफ भारी बारिश में भी विरोध-मार्च निकाला। गया में छात्रों ने खराब गुणवत्ता वाले मध्याह्न भोजन, खराब पड़े हैंडपंपों और गंदे टॉयलेट्स के विरोध में स्थानीय अधिकारियों के कार्यालयों तक मार्च किया। क्या यही वह युवा आबादी है, जिसे विकसित भारत के लिए हमारा डेमोग्राफिक डिविडेंड माना जा रहा है?
जिला प्रशासन अब जेन-अल्फा द्वारा उठाए गए मुद्दों के समाधान के लिए भाग-दौड़ कर रहा है। लेकिन लगता है कि जेन-अल्फा अब जेन-जी की ही तरह आगे बढ़ चुका है। और दोनों में से कोई भी पीढ़ी तब तक नहीं रुकेगी, जब तक सरकारें काम करना शुरू नहीं करतीं।
Date: 03-09-26
एआई मुफ्त नहीं है, डेटा सेंटरों का महंगा सौदा भी उसमें शामिल है
विराग गुप्ता, ( सुप्रीम कोर्ट के वकील और ‘डिजिटल कानूनों से समृद्ध भारत’ के लेखक )
अमेरिका में आगामी नवम्बर में होने जा रहे मध्यावधि चुनावों में डेटा सेंटरों से पानी, ऊर्जा और पर्यावरण को हो रही क्षति का मुद्दा जोर पकड़ने लगा है। भारी विरोध के बाद सिर्फ 3 महीनों में ही लगभग 75 डेटा सेंटर्स में 130 अरब डॉलर के प्रोजेक्ट्स पर काम रुक गया है। चूंकि एआई क्रांति से भारी मुनाफा कमाने के लिए बड़े डेटा सेंटर्स जरूरी हैं, लिहाजा इन्हें अब भारत में लगाने की कोशिश हो रही है। यानी अमेरिका में जिन पर रोक लगाई जा रही है, उन्हीं को लेकर भारत में उत्साह का माहौल है।
शहरों में बड़े पैमाने पर कचरा होता है, लेकिन कोई भी अपने घर के नजदीक कचराघर नहीं बनने देना चाहता। अमेरिका के डेटा सेंटर्स भी “लाक्षागृह’ की तरह हैं। उन्हें हतोत्साहित करने के बजाय भारत में उन्हें सस्ती जमीन, टैक्स और पर्यावरण कानूनों से छूट मिलना खतरनाक हो सकता है। डिजिटल क्रांति के नाम पर चल रहे डेटा सेंटर से जुड़े 5 पहलुओं को समझना जरूरी है।
1. पब्लिक रिकॉर्ड्स एक्ट के अनुसार सरकारी डेटा, रिजर्व बैंक के 6 अप्रैल 2018 के नियमों के अनुसार डिजिटल पेमेंट डेटा और 2023 के डेटा सुरक्षा कानून के अनुसार डेटा की सुरक्षा और स्थानीयकरण जरूरी है। देश की सीमाओं के भीतर महत्वपूर्ण और गैर-महत्वपूर्ण डेटा का संग्रहण स्थानीयकरण कहलाता है। इसका सबसे महत्वपूर्ण पहलू है, हमारे डेटा पर हमारा नियंत्रण, जो देश को सूचना लीक होने, पहचान की चोरी, सुरक्षा आदि समस्याओं के प्रति अधिक प्रतिरोधी बनाता है। लोकसभा में 11 फरवरी और 18 मार्च 2026 को सरकारी जवाब से लगता है कि इन डेटा सेंटरों में भारत के डेटा का स्थानीयकरण होगा। लेकिन यह धारणा गलत है।
2. जनता और किसान बिजली की कमी से जूझ रहे हैं। लेकिन डेटा सेंटरों को रियायती दरों पर 24 घंटे बिजली देने के नियम बन रहे हैं। केंद्रीय मंत्री प्रहलाद जोशी के अनुसार गैर-जीवाश्म ईंधन की 500 गीगावाट जरूरत को पूरा करने के लिए 30 लाख करोड़ का निवेश चाहिए। लोगों से पेट्रोल और डीजल बचाने के लिए कहा जा रहा है, लेकिन भीमकाय जनरेटर सेट से चलने वाले डेटा सेंटरों के लिए डीजल की खपत और पर्यावरण को हो रही क्षति का कोई मूल्यांकन सामने नहीं आ रहा।
3. आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम में एक स्थानीय मंदिर की 160 एकड़ भूमि को विवादित रूप से गूगल के एक डेटा सेंटर के लिए आवंटित किया गया है। प्रोजेक्ट स्थल के बगल में जलाशय और कम्बलकोंडा वन्य जीव अभयारण्य भी है। लेकिन कानून की अनदेखी करके 1 किमी दायरे में डेटा सेंटर के निर्माण की राज्य सरकार ने अनुमति दे दी है। बड़े उद्योगों और व्यावसायिक निर्माण के लिए 2006 के कानून के अनुसार पर्यावरण की ईआईए अनुमति जरूरी है। लेकिन गूगल की आड़ में एसपीवी कम्पनियों ने 1.5 लाख मीटर से कम आकार के बिल्डिंग प्रोजेक्ट के नाम पर डेटा सेंटर के लिए पर्यावरणीय-अनुमति हासिल कर ली है।
4. ट्रम्प और टेक कम्पनियों के दबाव के बाद केंद्र सरकार ने डेटा सेंटरों के लिए 20 साल की टैक्स छूट दी है। उसी तर्ज पर आंध्र प्रदेश सरकार ने राज्य जीएसटी और स्टैम्प ड्यूटी जैसे सभी टैक्सों में छूट का ऐलान किया है। विदेशों से आ रही समुद्री केबल से इन डेटा सेंटरों की कनेक्टविटी रहेगी। संचार और रक्षा से जुड़े मामलों में केंद्र सरकार की अनुमति जरूरी है, जिसकी अनदेखी की जा रही है। डेटा सेंटर स्थापित करने वाली गूगल, मेटा और अमेजन जैसी विदेशी कम्पनियों की भारत में कानूनी जवाबदेही तय करना जरूरी है।
5. आंध्र प्रदेश सरकार एक हजार मेगावाट के 3 डेटा सेंटरों के लिए जमीन और सिंगल विंडो क्लियरेंस के साथ 22 हजार करोड़ से ज्यादा की छूट दे रही है। लेकिन डेटा सेंटर की प्रोजेक्ट रिपोर्ट में निवेश और रोजगार सृजन का कोई रोडमैप नहीं दिख रहा।
महाभारत में द्रोणाचार्य को भ्रमित करने के लिए युधिष्ठिर से “नरो वा कुंजरो’ का अर्धसत्य वाला संदेश भिजवाया गया था। इसी तर्ज पर बिल्डिंग की अनुमति की आड़ में डेटा सेंटर का संचालन पर्यावरण के साथ कानून के शासन के लिए खतरनाक हो सकता है।
Date: 03-09-26
पश्चिम एशिया के बदलते समीकरण और भारत
श्याम सरन, ( लेखक पूर्व विदेश सचिव हैं। )
सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान ने गत 7 अगस्त को सऊदी अरब के पवित्र इस्लामी शहर मक्का में एक संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते का पूरा पाठ सार्वजनिक नहीं किया गया है इसलिए विश्लेषण उस संयुक्त बयान पर आधारित है जो हस्ताक्षर के बाद जारी किया गया। समझौते में यह प्रावधान है कि किसी एक सदस्य देश पर सशस्त्र हमला तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। इसके अलावा यह तीनों देशों को संयुक्त रक्षा निर्माण, क्षेत्रीय सुरक्षा को बढ़ाने और सामूहिक प्रतिरोध को समर्थन देने के लिए प्रतिबद्ध करता है।
तीनों देशों की ओर से जो टिप्पणियां की जा रही हैं उनमें से ज्यादातर में जोर दिया गया है कि यह समझौता तुर्किये की सैन्य औद्योगिक क्षमता, सऊदी अरब की वित्तीय ताकत और पाकिस्तान की परमाणु क्षमता को एक साथ लाता है जिससे एक प्रभावी प्रतिरोधक शक्ति तैयार होती है। तीनों देशों ने स्पष्ट किया है कि यह समझौता किसी खास देश के खिलाफ नहीं है बल्कि इसका उद्देश्य सामूहिक प्रतिरोधक क्षमता उपलब्ध कराना है। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि यदि किसी एक साझेदार के मामले में यह प्रतिरोधक क्षमता विफल हो जाती है तो बाकी दोनों देश किस तरह प्रतिक्रिया देंगे।
यह घोषणा भी की गई है कि मक्का संधि का मुख्यालय सऊदी अरब के रियाद में होगा लेकिन अभी तक ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि इसमें नाटो जैसी संयुक्त संचालन कमान या युद्ध की स्पष्ट रणनीति और सिद्धांत मौजूद है। तीनों देशों के सुरक्षा खतरे अलग-अलग हैं। पाकिस्तान के लिए यह भारत है, सऊदी अरब के लिए ईरान और अब इजरायल हैं। तुर्किये के लिए यह इजरायल और सीरिया तथा दक्षिणी लेबनान पर प्रभुत्व कायम करने की उसकी कोशिश हो सकती है।
इन अलग-अलग सुरक्षा संबंधी धारणाओं के कारण सामूहिक रक्षा की कोई भी व्यवस्था जटिल और समस्यापूर्ण हो जाती है। लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि यह समझौता पश्चिम एशिया में सुरक्षा समीकरणों के एक महत्त्वपूर्ण पुनर्गठन का संकेत देता है। इसका संदर्भ इस समय चल रहे ईरान युद्ध और क्षेत्र में इजरायली सैन्य आक्रामकता के विस्तार से जुड़ा है जो गाजा युद्ध से आगे बढ़ चुकी है। इसके पीछे सबसे बड़ी वास्तविकता अमेरिका की घटती सैन्य क्षमता और खाड़ी के अपने सहयोगियों को लंबे समय से दिए जा रहे सुरक्षा आश्वासनों को कायम रखने में उसकी विफलता है। खबर है कि मिस्र भी इस समझौते में शामिल हो सकता है। जिससे यह और प्रभावी हो जाएगा। तुर्किये और पाकिस्तान दो किनारों की तरह हैं। जिनके बीच सऊदी अरब एक रणनीतिक रूप से बेहद महत्त्वपूर्ण स्थान पर स्थित है। एक ओर लाल सागर है और दूसरी ओर होर्मुज स्ट्रेट | तेल समृद्ध देश के रूप में सऊदी अरब की आर्थिक समृद्धि इन समुद्री मार्गों तक सुरक्षित पहुंच पर निर्भर करती है।
मक्का संधि से पहले 14 देशों का एक समुद्री गठबंधन बनाया गया था। इसकी शुरुआत सऊदी अरब ने 30 जुलाई को की थी। इसका उद्देश्य वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षा करना, ऊर्जा आपूर्ति के मार्गों को सुरक्षित रखना और लाल सागर, अदन की खाड़ी तथा बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट में व्यापारिक मार्गों को खुला रखना था। इसमें होर्मुज स्ट्रेट को शामिल नहीं किया गया था। तुर्किये और पाकिस्तान इस गठबंधन के सदस्य हैं। जहां तक जानकारी है भारत को इसमें शामिल होने के लिए आमंत्रित नहीं किया गया था।
इससे भी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि सऊदी अरब और पाकिस्तान ने 17 सितंबर 2025 को द्विपक्षीय सामरिक पारस्परिक रक्षा समझौते को सार्वजनिक किया था। इसमें भी एक प्रावधान है जिसके तहत दोनों देश इस बात के लिए प्रतिबद्ध हैं। कि किसी एक पक्ष पर हमला दोनों पर हमला माना जाएगा। बाद में हुए त्रिपक्षीय मक्का समझौते में भी यही प्रावधान शामिल किया गया। द्विपक्षीय समझौते की घोषणा कतर पर इजरायल के हवाई हमले के बाद हुई थी। उस समय कुछ हमास नेता गाजा में शांति स्थापित करने के लिए कतर द्वारा किए जा रहे मध्यस्थता प्रयासों के सिलसिले में वहां मौजूद थे। यह हमला सऊदी अरब समेत खाड़ी देशों के लिए एक बड़ा झटका था।
यहां भी समझौते का पूरा पाठ सार्वजनिक नहीं किया गया है। लेकिन घटनाक्रम से संकेत मिलता है कि इजरायली आक्रामकता का खतरा भी इन हालिया समझौतों को आगे बढ़ाने वाला उतना ही महत्त्वपूर्ण कारण है जितना ईरान से उत्पन्न खतरा। अमेरिका ने मक्का समझौते का स्वागत किया है और इसे जिम्मेदारियों के बंटवारे तथा अपने सहयोगियों और साझेदारों द्वारा अपनी रक्षा की अधिक जिम्मेदारी खुद उठाने के एक सकारात्मक उदाहरण के रूप में देखा है। अमेरिका इन देशों का एक अपरिहार्य रक्षा साझेदार बना रहेगा।
तुर्किये नाटो का सदस्य और सहयोगी है। पाकिस्तान गैर नाटो प्रमुख सहयोगी है। और अमेरिका का सऊदी अरब के साथ द्विपक्षीय सुरक्षा गठबंधन है। हालांकि अगर इन साझेदार देशों के लिए इजरायल ही निशाना बनता है तो अमेरिका का रुख अलग हो सकता है। आधिकारिक बयान में ईरान ने मक्का समझौते की आलोचना करने से परहेज किया है लेकिन इस बात पर जोर दिया है कि इस्लामी देशों को क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए आपस में सहयोग करना चाहिए और बाहरी शक्तियों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। यह ईरान की रणनीतिक चाल है क्योंकि वह खाड़ी में अमेरिकी मौजूदगी कम होने का स्वागत करेगा।
मक्का समझौते के पीछे तीन घटनाक्रम महत्त्वपूर्ण हैं। पहला, खाड़ी में अपने सहयोगी देशों को दी जाने वाली अमेरिकी सुरक्षा गारंटियों की विश्वसनीयता में कमी और ईरान पर प्रभावी ढंग से काबू पाने में अमेरिका की असमर्थता। दूसरा, सऊदी अरब और तुर्किये के बीच चली आ रही प्रतिद्वंद्विता और यहां तक कि परस्पर विरोध की भावना का खत्म होकर दोनों के बीच सैन्य गठबंधन में बदल जाना। यह क्षेत्र में हुआ अधिक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक बदलाव है। तीसरा, तुर्किये और सऊदी अरब दोनों के साथ लंबे समय से द्विपक्षीय सैन्य संबंध रखने वाले देश के रूप में पाकिस्तान ने उनके बीच एक भरोसेमंद सेतु की महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह समझौता पाकिस्तान की भूराजनीतिक स्थिति और क्षेत्र में उसकी भूमिका को मजबूत करता है। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इस समझौते को अमेरिका का समर्थन प्राप्त है।
चीन इस बदलते हुए भू-राजनीतिक समीकरण में अब तक बहुत ज्यादा दिखाई नहीं दिया है, जबकि इस क्षेत्र में उसके महत्त्वपूर्ण आर्थिक ऊर्जा और सुरक्षा संबंधी हित हैं। क्षेत्र में पाकिस्तान की बढ़ती हैसियत और प्रभाव का लाभ चीन, पाकिस्तान के साथ अपनी गहरी सुरक्षा साझेदारी के जरिये उठा सकता है। जब इस क्षेत्र में एक नई सुरक्षा व्यवस्था आकार लेने लगेगी जिसमें ईरान की भागीदारी भी जरूरी होगी तो चीन एक बार फिर सुविधाकर्ता की भूमिका निभा सकता है। अतीत में भी उसने ईरान और सऊदी अरब के बीच समझ कायम कराने में मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी। चीन अब अमेरिका द्वारा छोड़ी गई खाली जगहों को भरने की कोशिश करेगा।
भारत के पास इस घटनाक्रम में गहरी रुचि रखने के पर्याप्त कारण हैं। खाड़ी देशों में रहने और काम करने वाले 90 लाख भारतीयों की सुरक्षा और कल्याण सर्वोच्च चिंता का विषय है। भारत की ऊर्जा सुरक्षा भी इस क्षेत्र से गहराई से जुड़ी हुई है क्योंकि उसके तेल और गैस की आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है।
खाड़ी क्षेत्र भारत के लिए पश्चिमी सुरक्षा मोर्चा भी है। हालिया घटनाक्रम भारत को हाशिये पर धकेल सकते हैं। क्षेत्र में पाकिस्तान के बढ़ते प्रभाव और उसके बढ़ते सैन्य कद को लेकर भारत के लिए चिंतित होना स्वाभाविक है। कम से कम पाकिस्तान की ओर से होने वाले किसी सीमा पार आतंकवादी हमले के जवाब में भारत को सैन्य कार्रवाई करते समय क्षेत्र में आकार ले रहे नए गठजोड़ों को ध्यान में रखना होगा।
इन चुनौतियों का समाधान यह नहीं है कि खाड़ी देशों और तुर्किये के साथ हमारे संबंधों को पाकिस्तान के साथ उनके संबंधों के आधार पर तय किया जाए। ऐसा करने से पहल करने का अवसर पाकिस्तान के हाथ में चला जाएगा।