03-01-2023 (Important News Clippings)

03 Jan 2023
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Finally, End Notes

SC right in saying policies like demonetisation are executive preserve. But dissenting judge makes good points too

TOI Editorials

Demonetisation has achieved judicial closure. The 4-1 Supreme Court constitution bench verdict termed the November 8, 2016 announcement as an executive decision, where the judiciary does not have the expertise to supplant economic policies, unless manifest arbitrariness requires intervention. The bench majority also refrained from identifying an alternative measure that would have constrained citizens’ rights less, saying these are “areas purely within the domain of experts and beyond the arena of judicial review”.

This is a principle SC needs to consistently uphold, given the number of frivolous PILs it entertains and the intrusion into policy they entail. But the diversity of public opinions on demonetisation was mirrored in SC too. Justice BV Nagarathna in the minority ruled the exercise unlawful but said the status quo ante can’t be restored as the event happened in 2016. She ruled that the Constitution empowers Centre to demonetise currency but the exercise should have been implemented through a law of Parliament. She faulted its implementation by a gazette notification saying that route is available only when RBI is proposing demonetisation under Section 26 (2) RBI Act. Additionally, she faulted RBI for lacking “independent application of mind” while “recommending” what Centre desired.

Neither the majority nor minority verdicts examined whether demonetisation met its stated objectives – because that wasn’t the bench’s job. Demonetisation is hard to support in terms of economic policy logic. The economic impact was negative, even if subsequent research showed that the quantum was less than initially feared. It’s doubtful whether it dealt a body blow to the black economy or to the cash-based transactions that support such activities. Cash in hand of the public now is double that of 2016. Even if only for some weeks, it put a lot of people through immense hardship. One positive consequence was that digital payments got a big boost, and the habit stayed with Indians even after new currency notes became plentiful. But an economic shock is not the best way to encourage digital payments. The considerable economic slowdown in 2018 and 2019 was probably a combination of demonetisation, GST introduction, which unlike demonetisation was a necessary reform, and the NBFC meltdown.

None of that matters for SC, of course. But the successful conclusion of the demonetisation hearings should act as an incentive to set up more constitution benches for other long pending matters.


Mountainous Question

China’s growing influence in Nepal means India’s diplomacy and project delivery will need to improve

TOI Editorials

A Nepal government dominated by that country’s communist parties isn’t the poll outcome India was hoping for. The best response would be a certain degree of course correction by New Delhi. Nepal holds great strategic significance for India. And bilateral ties are unmatched – an open border, Nepalese citizens having the freedom to stay and work in India, deep trade and economic linkages. Yet, certain misunderstandings and suspicions have crept into the relationship.

First, there is a perception in Nepalese quarters that India only supports certain Nepalese politicians and parties. Add to this the long-held suspicions about India’s connection to the Madhesi movement in Nepal. Together, they open the door for interests that don’t align with the New Delhi-Kathmandu relationship. China’s growing footprint in Nepal needs to be seen in this context. To counter this India needs to reach out and build equally robust ties with all political stakeholders in Nepal, be they on the left, right or centre.

Second, given its geographic position, it is natural for Nepal to seek infrastructure investment from both India and China. The recent inauguration of the international airport in Pokhara, built with Chinese assistance, is a case in point. India’s response should be to compete and prove to Nepal that Indian projects are best suited for the Himalayan nation. However, many such projects in the past were marred by delays due to local environmental objections, cost overruns and selection of poor local contractors. India should help Nepal correct these and deliver on big-ticket infrastructure like the Arun III hydro-electric project by the scheduled deadlines. This, along with close political communication to avoid disputes like the one over territory in the Kalapani region, will address New Delhi’s worries.


खाद्य सुरक्षा महज अनाज एक सिमित न रहे, पोषण भी जरूरी

रीतिका खेड़ा, ( दिल्ली आईआईटी में पढ़ाती हैं )

इन तीन विकल्पों का मूल्यांकन कीजिए- बाजार में अनाज 20 रु. प्रति किलो है। पहला विकल्प, 5 किलो अनाज आपको 2 रु. प्रति किलो मिले। दूसरा, 2 रु. प्रति किलो की दर पर 5 किलो अनाज के साथ 5 किलो मुफ्त मिलने लगे। तीसरा, आपको 5 किलो अनाज मुफ्त मिले। पहले में आपको प्रति किलो रु. 18 का लाभ है, यानी कुल 90 रु. की बचत होती है। दूसरे में अनाज की मात्रा दोगुनी है, जिसमें से 5 किलो मुफ्त होने से आपकी बचत 190 रु. है। तीसरे में बचत 18 रु. प्रति किलो से बढ़कर 20 रु. प्रति किलो है। यानी कुल 100 रुपए की बचत होगी। यही है खाद्य सुरक्षा से संबंधित हाल ही में हुई घोषणा का लेखा-जोखा। पहला विकल्प है कोरोना से पहले की राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के 80 करोड़ लोगों की स्थिति, दूसरा विकल्प है कोरोना काल में उनकी स्थिति और तीसरा है जनवरी से लागू नया हाल। जनवरी से दिसम्बर 2023 तक सरकार ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून का 5 किलो अनाज मुफ्त कर दिया है। अप्रैल 2020 से पीएम गरीब कल्याण अन्न योजना में दिया जाने वाला मुफ्त अतिरिक्त 5 किलो बंद होगा।

जिस घोषणा को जनहितैषी माना जा रहा है, वास्तव में लोगों को उससे न के बराबर फायदा है। लोगों की नजरों से देखें तो कोरोना से पहले की तुलना में अब से उनको 10 रु. की अधिक बचत होगी, लेकिन कोरोना की तुलना में उन्हें 90 रु. का नुकसान है। सरकार की नजरों से देखें तो लेखाजोखा कुछ अलग है। एक तरफ प्रति किलो 2 से 3 रु. खर्च बढ़ेगा (खाद्य सुरक्षा कानून में राज्यों को अनाज 2 से 3 रु. प्रति किलो बेचा जाता था; अब यह मूल्य नहीं वसूला जाएगा), दूसरी तरफ 5 किलो अनाज की बचत है। नोट करें तो सरकारी खर्च में बड़ी बचत है लगभग डेढ़ लाख करोड़! अनाज आधा करने से हुई बचत पर किसका हक होना चाहिए? खाद्य सुरक्षा कानून 2013 में जन वितरण प्रणाली के साथ-साथ बच्चों की दो योजनाएं हैं और मातृत्व लाभ का प्रावधान भी है। सरकारी बचत के कई योग्य विकल्प हैं।

पहला, जन वितरण प्रणाली का दायरा बढ़ाने की जरूरत है। खाद्य सुरक्षा कानून के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में 75% और शहरी क्षेत्रों में 50% लोगों को शामिल करना है। लेकिन जब से कानून लागू हुआ है, तब से आज तक जनसंख्या बढ़ी है और उसके अनुसार जन वितरण प्रणाली में शामिल लोगों की संख्या नहीं बढ़ी। एक अनुमान के अनुसार लगभग 10 करोड़ लोग छूट रहे हैं। लेकिन सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में जन वितरण प्रणाली में शामिल लोगों की संख्या बढ़ाने के खिलाफ जवाब तैयार किया है। उनका कहना है 2021 की जनगणना होने तक उनके हाथ बंधे हैं। जनगणना में देरी गरीबों की जिम्मेदारी नहीं है, लेकिन उन्हें सरकारी नाकामी का ज़ुर्माना भरना पड़ रहा है। दूसरा, कई वर्षों से जन वितरण प्रणाली में दाल और तेल सप्लाई करने की मांग रही है, क्योंकि लोगों की खुराक में इनकी कमी है। इसका मुख्य कारण है लोगों की खरीदने की आर्थिक क्षमता नहीं है। कुछ राज्यों (जैसे तमिलनाडु और हिमाचल) में राज्य सरकारें इन्हें अपने बजट से दे रहे हैं। अब केंद्र को इसमें योगदान देना चाहिए। तीसरा, कुछ वर्षों से बच्चों की खाद्य सुरक्षा की योजनाओं (जैसे मध्याह्न भोजन और आंगनवाड़ी) के बजट में कटौती हुई है। अच्छे पोषण के लिए बचपन में पौष्टिक खाना मिलना जरूरी है। लेकिन हमारे देश के बच्चों की डाइट में प्रोटीन-रिच आहार की सख्त कमी है। चौथा, खाद्य सुरक्षा कानून में प्रति बच्चे पर मां को- मातृत्व लाभ के रूप में- 6000 रु. देने का भी प्रावधान है। प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के तहत इसे घटाकर 5000 कर दिया गया है, वो भी केवल पहले बच्चे तक सीमित है। यह ठीक नहीं है।

हाल की घोषणा से सरकार की जो बचत होगी, उससे इन चारों विकल्पों को आजमाना मुमकिन है। 10 करोड़ लोगों को शामिल करने में लगभग 20,000 करोड़ रु. खर्च होंगे; आंगनवाड़ी बच्चों को प्रोटीन आहार खिलाने में 6500 रु. करोड़ और स्कूल के मध्याह्न भोजन में 6000 रु. करोड़ खर्च होंगे। मातृत्व लाभ को कानून अनुसार लागू करने के लिए 6000 करोड़ रु. की जरूरत है। इस सब के बाद, प्रति माह दाल और तेल के लिए एक लाख करोड़ रु. राशि बच जाती है। आने वाले बजट से स्पष्ट हो जाएगा कि सरकार खाद्य सुरक्षा के प्रति कितनी प्रतिबद्ध है- उसकी कल्पना में खाद्य सुरक्षा की परिभाषा रूखे अनाज तक सीमित है या उसमें पोषण भी शामिल है। आने वाले आम बजट से यह स्पष्ट हो जाएगा कि केंद्र सरकार खाद्य सुरक्षा के प्रति कितनी प्रतिबद्ध है- उसकी कल्पना में खाद्य सुरक्षा की परिभाषा रूखे अनाज तक सीमित है या उसमें पोषण भी शामिल है।


नोटबंदी पर निर्णय


सुप्रीम कोर्ट की ओर से नोटबंदी के फैसले को वैध करार दिया जाना केंद्र सरकार के लिए एक बड़ी जीत जैसा है। सुप्रीम कोर्ट को मूलतः नोटबंदी के लिए अपनाई गई प्रक्रिया पर विचार करना था। उसने यह पाया कि इस फैसले के पहले केंद्र सरकार ने रिजर्व बैंक से व्यापक विचार-विमर्श किया था और इस कारण यह नहीं कहा जा सकता कि संबंधित प्रक्रिया में कोई खामी थी। हालांकि एक न्यायाधीश ने पांच सदस्यीय पीठ के चार न्यायाधीशों के निर्णय से असहमति जताई, लेकिन उसका कोई विशेष मूल्य नहीं। इसलिए और नहीं, क्योंकि एक तो बहुमत का निर्णय ही मायने रखता है और दूसरे, नोटबंदी जैसे फैसले कानून बनाकर नहीं किए जा सकते। निःसंदेह नोटबंदी का फैसला एक बड़ा और कड़ा फैसला था। यह एक फैसला था, जिसने हर किसी को प्रभावित किया था। सुप्रीम कोर्ट ने यह सही कहा कि किसी फैसले को केवल इसलिए गलत नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि वह सरकार ने लिया है। विडंबना यह है कि कुछ विपक्षी दलों ने सरकार के हर फैसले का विरोध करने को अपना एकसूत्रीय कार्यक्रम बना लिया है। ऐसा ही रवैया अन्य लोगों ने भी अपना लिया है। इसे इससे समझा जा सकता है कि नोटबंदी के फैसले के खिलाफ 50 से अधिक याचिकाएं दायर की गईं।

इसमें संदेह है कि नोटबंदी पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद सरकार के हर फैसले का अंधविरोध करने और सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने वाले हतोत्साहित होंगे, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय का एक सीमित और वह भी अकादमिक महत्व ही है। आखिर जो फैसला छह वर्ष पूर्व लिया गया और जिसके अच्छे-बुरे परिणाम सामने आ चुके हैं, उस पर सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ की ओर से विचार किया जाना कितना सार्थक है? नोटबंदी पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद विपक्ष का निहत्था होना स्वाभाविक है। इसके बाद भी वह नोटबंदी के असर की अपनी तरह व्याख्या करता रहेगा। इसके साथ ही यह बहस भी चलती रहेगी कि नोटबंदी के जो उद्देश्य थे, वे कितने पूरे हुए-कितने नहीं? इस प्रश्न पर सरकार को भी चिंतन-मनन करना होगा, क्योंकि जिन उद्देश्यों को लेकर पांच सौ और एक हजार रुपये के नोटों को चलन से बाहर करने का फैसला लिया गया, वे सभी सही तरह पूरे नहीं हुए। यह सही है कि टैक्स चोरी पर एक हद तक लगाम लगी और फौरी तौर पर काले धन वालों को झटका लगा, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा। उचित यह होगा कि रिजर्व बैंक के साथ सरकार इस पर विचार करे कि वे सभी उद्देश्य कैसे पूरे हों, जो नोटबंदी को लेकर तय किए गए थे। नोटबंदी से जो अनुभव मिले, उनसे भविष्य के लिए सीख भी ली जानी चाहिए।


नोटबंदी पर बहस की प्रासंगिकता


सरकार द्वारा नवंबर 2016 में उच्च मूल्य वाले नोट बंद करने के फैसले पर हो रही प्रक्रियागत बहस अब समाप्त हो गई है। सर्वोच्च न्यायालय के एक संवैधानिक पीठ ने सोमवार को 4:1 के बहुमत से प्रक्रिया का समर्थन किया और कहा कि नोटबंदी की पूरी कवयद वैध तथा समानता के परीक्षण को संतुष्ट करने वाली थी। पीठ में न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर, बी आर गवई, वी रामासुब्रमण्यन, एएस बोपन्ना और बीवी नागरत्ना शामिल थे। इस निर्णय को पढ़ते हुए न्यायमूर्ति गवई ने कहा कि केंद्र सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के बीच इस बारे में छह महीने तक चर्चाओं का दौर चला तथा ऐसे उपाय को लागू करने के लिए समुचित संपर्क था। उन्होंने कहा कि निर्णय लेने की प्रक्रिया को केवल इसलिए गलत नहीं ठहराया जा सकता कि प्रस्ताव केंद्र सरकार की ओर से आया था।

सर्वोच्च न्यायालय के सामने बुनियादी दलील यह थी कि नोटबंदी का प्रस्ताव रिजर्व बैंक के केंद्रीय बोर्ड की ओर से सामने नहीं आया जबकि आरबीआई ऐक्ट की धारा 26(2) के मुताबिक ऐसा ही होना चाहिए। इस दलील को बहुत वैध नहीं माना जा सकता है क्योंकि रिजर्व बैंक और सरकार के बीच इस विषय पर लंबी चर्चा हुई थी। सवाल तो यह है कि क्या इस प्रश्न को इस स्तर तक उठना चाहिए था क्योंकि निर्णय को बदला नहीं जा सकता है। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने बहुमत से अलग मत दिया और कहा कि अगर प्रस्ताव केंद्र सरकार की ओर से उत्पन्न हुआ तो वह धारा 26 (2) के अंतर्गत नहीं आता। यह काम विधायी ढंग से किया जा सकता था और अगर गोपनीयता आवश्यक थी तो इसे अध्यादेश के जरिये अंजाम दिया जा सकता था। यहां यह दोहराना आवश्यक है कि उक्त मामला केवल प्रक्रिया से संबं​धित था, न कि लक्ष्यों से।

ऐसे में नोटबंदी को लेकर नीतिगत बहस जारी रहनी चाहिए। सरकार ने एक झटके में 85 फीसदी मूल्य की प्रचलित मुद्रा को चलन से बाहर करने को लेकर कई तर्क दिए थे। सबसे बड़ा लक्ष्य था काले धन को सामने लाना। अन्य लक्ष्यों में नकली मुद्रा के इस्तेमाल को समाप्त करना, आतंकवादियों को वित्तीय मदद बंद करना और अर्थव्यवस्था को औपचारिक बनाकर कर आधार को बढ़ाना शामिल था। उम्मीद यह भी थी कि यह निर्णय डिजिटल अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देगा। नतीजों की बात करें तो जहां बहुत बड़ी तादाद में ऐसे बैंक खाते सामने आए जिनमें बहुत बड़ी तादाद में नकदी जमा थी। बंद की गई नकदी में से 99 फीसदी रिजर्व बैंक के पास वापस आ गई। कर संग्रह के संदर्भ में देखें तो यह निर्णय कोई खास प्रभाव नहीं डाल सका। उदाहरण के लिए चालू वर्ष में केंद्र सरकार की सकल कर प्रा​प्तियों के सकल घरेलू उत्पाद के 10.7 फीसदी रहने का अनुमान है जबकि 2015-16 में यह 10.6 फीसदी थी।

हालांकि भारतीय अर्थव्यवस्था का डिजिटलीकरण जोर पकड़ रहा था लेकिन नोटबंदी ने इसे गति प्रदान की। कोविड-19 महामारी ने इसे और तेज किया। नोटबंदी के बाद से जीडीपी के प्रतिशत के रूप में प्रचलित नकदी भी बढ़ी है। इसके अलावा हाल के वर्षों में कारोबारी क्षेत्र का प्रदर्शन भी बताता है कि आ​र्थिक गतिवि​धियां संगठित क्षेत्र की ओर केंद्रित हुई हैं। बहरहाल, ऐसा असं​गठित क्षेत्र की कमजोर ​स्थिति के कारण भी हुआ होगा, खासकर महामारी के बाद। आलोचकों का यह भी कहना है कि नोटबंदी और वस्तु एवं सेवा कर के क्रियान्वयन ने भी असंगठित क्षेत्र को प्रभावित किया। अर्थव्यवस्था में डिजिटलीकरण के इजाफे और उसके औपचारिक होने से समय के साथ उत्पादकता और कर संग्रह में सुधार होगा। हालांकि प्रगति के लिए एकबारगी प्रचलित मुद्रा बंद करने से अ​धिक तकनीकी तरक्की और उसे अपनाने की आवश्यकता है।


भारतीय रुपये का डिजिटलीकरण

जैमिनी भगवती, ( लेखक पूर्व भारतीय राजदूत, वर्ल्ड बैंक ट्रेजरी के विशेषज्ञ और सेंटर फॉर सोशल ऐंड इकनॉमिक प्रोग्रेस के विशिष्ट फेलो हैं )

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने 1 दिसंबर को एक डिजिटल रुपये (डीआर) की पेशकश की जिसे केंद्रीय बैंक की डिजिटल मुद्रा (सीबीडीसी) के नाम से भी जाना जाता है। आरबीआई ने चार अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों को डिजिटल रुपये का प्रायोगिक परीक्षण करने के लिए अधिकृत किया है। भुगतान के लिए नकदी जमा करने के बजाय भारतीय लोग अन्य व्यक्तियों और संस्थाओं के साथ हिसाब चुकता करने के लिए डीआर का उपयोग करने में सक्षम होंगे।

इसके बाद नकद रकम का भुगतान करने के लिए किसी व्यक्ति, सूक्ष्म, मध्यम और लघु उद्यमों (एमएसएमई) या अन्य को अपने खातों से अपने बैंकों या एटीएम में जाकर नकद रकम निकालने की आवश्यकता नहीं होगी। इसके बजाय वे इस सुविधा को देने के लिए अधिकृत बैंकों के साथ इस सेवा के लिए पंजीकरण कराने के बाद डीआर भेज सकते हैं या हासिल कर सकते हैं। अच्छी बात यह है कि डिजिटल रुपये के उपयोगकर्ताओं को किसी भी बैंक में खाता खोलने की आवश्यकता नहीं है।

ऐसे में एक विवादास्पद सवाल यह उठता है कि कोई भी डिजिटल रुपये में एक बड़ी राशि क्यों रखेगा जबकि यह नकद रकम के ही बराबर है लेकिन बचत खातों की शेष राशि की तरह इस पर कोई ब्याज नहीं मिलेगा? हालांकि दूसरी ओर डीआर का उपयोग करने का एक फायदा यह है कि बैंक खाते के बिना भी इसे हासिल किया जा सकता है। लेकिन बैंकों को इसमें फायदा होगा क्योंकि उन्हें डीआर बैलेंस पर कोई ब्याज नहीं देना होगा। डीआर के इस्तेमाल से आरबीआई की वित्तीय लागत की बचत के साथ-साथ नोटों की छपाई में और समय-समय पर इन्हें हटाने में लगने वाले निरीक्षण समय की बचत होगी।

नवंबर 2016 में की गई नोटबंदी के कुछ उद्देश्यों में से एक बेहिसाब नकदी की जमाखोरी को खत्म करना भी था। उस समय देश में भारतीय रुपये की कुल मात्रा लगभग 15 लाख करोड़ रुपये थी जबकि 2 दिसंबर, 2022 तक, देश में रुपये वाली मुद्रा की कुल नकद राशि 32 लाख करोड़ रुपये थी। दूसरे शब्दों में दिसंबर 2022 में भारतीय अर्थव्यवस्था में नकदी नवंबर 2016 की तुलना में 2.13 गुना थी।

इसी अवधि में भारत में मौजूदा बाजार दर पर आधारित सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 1.7 गुना बढ़ गया। इसका मतलब यह दर्शाना नहीं है कि नवंबर 2016 और दिसंबर 2022 के बीच जीडीपी में वृद्धि की तुलना में प्रचलन वाले रुपये की मात्रा में अधिक वृद्धि कहीं से भी अनुचित है। इस तुलना का मकसद यह बताना है कि नोटबंदी के कुछ उद्देश्य पूरे नहीं हुए हैं जिनमें से एक अर्थव्यवस्था में नकदी की मात्रा को नियंत्रित करके अवैध मौद्रिक हस्तांतरण कम करना है।

डिजिटल रुपये का उपयोग करने के फायदों की बात करें तो नकद रुपये के वर्तमान उपयोगकर्ता फटे नोटों या नकली नोटों और रकम नहीं मिलने से जुड़ी शिकायत किए बिना ही डीआर में बड़े पैमाने पर भुगतान करने या पाने में सक्षम होंगे। बेशक नकदीरहित लेनदेन पेटीएम और गूगल पे जैसे आसानी से इस्तेमाल होने वाले माध्यमों के जरिये ही संभव हैं। डिजिटल रुपया और पूंजी हस्तांतरण के अन्य साधनों के बीच अंतर यह है कि डिजिटल रुपया के माध्यम को छोड़कर अन्य सभी माध्यमों के लिए पैसा भेजने वाले और भुगतान पाने वाले दोनों का बैंक खाता होना जरूरी है।

जो लोग डिजिटल रुपये का इस्तेमाल करना चाहते हैं उन्हें केवल बैंकों के साथ डिजिटल रुपया बैलेंस रखने की आवश्यकता होगी, जिसे पूंजी का भुगतान करने या प्राप्त करने के लिए इस सुविधा का इस्तेमाल करने के साथ ही डेबिट या क्रेडिट किया जाएगा। बैंकों को इसके लिए भरोसे का माहौल बनाने के लिए डीआर के आदान-प्रदान के लिए एक सुरक्षित प्रणाली तैयार करने की आवश्यकता होगी। हालांकि, यह सुविधा तभी काम करेगी जब उपयोगकर्ताओं के पास आसानी से इंटरनेट की बाधारहित सुविधा मौजूदा हो। हालांकि यह भी बताया जा रहा है कि इंटरनेट कनेक्टिविटी के बिना लेनदेन की अनुमति दी जा सकती है लेकिन इसके परिणामस्वरूप पर्याप्त डीआर क्रेडिट बैलेंस के बिना भी कई डीआर भुगतान हो सकते हैं। डीआर के इस्तेमाल का प्रसार वास्तविक रूप से केवल तभी किए जाने की उम्मीद की जानी चाहिए जब यह पूरे देश में बेहतर बेहतर इंटरनेट कनेक्टिविटी के साथ मौजूद होगा।

इसके बाद, समय के साथ डिजिटल रुपये के इस्तेमाल का प्रसार भारत के भीतर और यहां तक कि नेपाल और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों में भी इन देशों के अधिकारियों के साथ तालमेल बिठाने के माध्यम से संभव है। अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों के विस्तार प्रयासों और केंद्र तथा राज्य सरकारों द्वारा किए जा रहे प्रचार-प्रसार के चलते डिजिटल रुपये के इस्तेमाल को बढ़ावा देने और नकली नकदी वाली गतिविधियों में कमी लाने में मदद मिल सकती है।

यह संभावना है कि जो व्यक्ति या अन्य लोग डीआर का उपयोग करना सीख सकते हैं, उनके पास शायद इन निर्दिष्ट बैंकों में बचत खाते भी होंगे और उन्हें यह पता भी होगा कि बैंक खातों के बीच पूंजी कैसे हस्तांतरित की जाती है। ऐसे व्यक्तियों और एमएसएमई को लग सकता है कि डीआर का उपयोग करने का कोई अतिरिक्त लाभ नहीं है और संभावित उपयोगकर्ता लेनदेन की निगरानी को लेकर सावधान हो सकते हैं हालांकि दावा यह किया जाता है कि डीआर के इस्तेमाल के कोई सबूत नहीं रहते हैं।

जांच एजेंसियों के लिए बड़े मूल्य वाले डीआर हस्तांतरण के प्रेषकों-रिसीवरों की निगरानी करने के कई तरीके भी हो सकते हैं। इस संदर्भ में नवंबर 2016 की नोटबंदी के बाद जमा की गई भारी मात्रा की नकदी से यह स्पष्ट हुआ कि कुछ व्यक्ति और छोटे कारोबार गुमनाम रहने और वस्तु तथा सेवा कर या अन्य कर देनदारियों से बचने के लिए नकदी का इस्तेमाल करना पसंद करते हैं।

दुर्भाग्य से भारत में कई लोग आमतौर पर चार्टर्ड अकाउंटेंट की सहायता से कर अधिकारियों की नजर में आने से बचने के लिए कई अनूठे तरीके ढूंढते हैं। नतीजतन, आरबीआई की डीआर पहल नकदी के इस्तेमाल को कम करने के पूरक कदमों के बिना अब भी बिलकुल नया कदम है।

बड़े नकदी हस्तांतरण को हतोत्साहित किया जा सकता है और सभी अधिक मूल्य वाले नोटों को क्रमिक आधार पर वापस लेकर डिजिटल रुपया को बढ़ावा दिया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर 100 रुपये से ऊपर के सभी नोटों को तीन साल की अवधि में वापस ले लिया जा सकता है। इसके बाद, 100 रुपये के नोटों के बड़े बंडलों को कहीं ले आना-ले जाना मुश्किल होगा और इसकी वजह से योजनाबद्ध तरीके से कैमरे की निगरानी का इंतजाम किया जा रहा है।

यह संभावना है कि पड़ोसी देशों में सब्सिडी वाले उर्वरकों की तस्करी में कमी जैसे फायदे मिलेंगे जिसका भुगतान संभवतः बड़े मूल्य वाले नकद नोटों में किया जाता है। नोटबंदी के दावे को हासिल करने में डिजिटल रुपया भी कारगर हो सकता है क्योंकि इसके बाधाकारी परिणाम नहीं देखने को मिलेंगे। दरअसल डिजिटल रुपया बड़े मूल्य वाली नकदी के बराबर भुगतान के लिए विकल्प देगा।

एमएसएमई और कोई भी व्य​क्ति जो बड़ी तादाद में नकद भुगतान करना चाहते हैं या देना चाहते हैं वे पूरे भरोसे के साथ इस बात का दावा नहीं कर पाएंगे कि जब उनके पास डिजिटल रुपया का विकल्प आसानी से मौजूद है तब उन्हें नकद रुपये का इस्तेमाल क्यों करना चाहिए।


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