02-02-2023 (Important News Clippings)

02 Feb 2023
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A Budget without a vision for agriculture

Despite the adverse factors in agriculture, the government has cut food and fertilizer subsidies and allotted little for animal husbandry, dairy and fisheries

R. Ramakumar is Professor at the Tata Institute of Social Sciences, Mumbai

Globally, there is a twin crisis in agriculture: in food and in fertilizers. On the one hand, there are fears of a fall in the global production and availability of food. The rise in food inflation has been an area of serious concern for the government and the Reserve Bank of India. On the other, global fertilizer prices have risen by about 200% over the past two years. Consequently, the prices of fertilizers and other farm chemicals in India have also shot up.

Domestically, the Union government has the unenviable task of explaining why it failed to double the real incomes of farmers between 2015 and 2022. Official data show that real incomes from cultivation have fallen in absolute terms after 2015. Between 2020-21 and 2022-23, annual growth rates in agriculture and allied sectors have been stagnant between 3% and 3.5%. Agricultural exports have risen, but the impact of this has been insignificant outside a handful of commodities.

Thus, the objectives of the Budget could be formulated as two-fold: one, it must have protected farmers and consumers from the food and fertilizer crises; and two, it must have taken steps to raise net incomes from cultivation.

Disappointing allocations
It was widely expected that food and fertilizer subsidies would be retained or increased. The restructuring of the food distribution guidelines, which effectively ended a part of the free supply of food grains under the Pradhan Mantri Garib Kalyan Anna Yojana, was a disappointment even prior to the Budget. The Budget has reaffirmed that stance and cut food subsidy from ₹2.87 lakh crore in 2022-23 (RE) to ₹1.97 lakh crore in 2023-24 (BE). Fertilizer subsidies have also been cut from ₹2.25 lakh crore to ₹1.75 lakh crore. In effect, these cuts will expose farmers to the vagaries of the global market and render the economics of agriculture more fragile. Landless households in rural areas are also likely to be affected adversely, as the allocation for the Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Scheme has been cut from ₹73,000 crore in 2022-23 (BE) to ₹60,000 crore in 2023-24 (BE).

The cut in fertilizer subsidies will increase the costs of cultivation for farmers, but there is no amelioration to be expected from a compensatory rise in output prices. The rise in minimum support prices between 2020-21 and 2021-22 just covered for the rise in input costs and did not leave any space for higher net incomes.

There has been no solace on the production front too. Yields in agriculture remain low. Rising fertilizer prices have led to lower consumption of fertilizers in farms, leading to imbalanced nutrient application and even poorer prospects of yield rise. The government, on the other hand, has been promoting variants of “natural farming”. The Budget has even allocated ₹459 crore to a new National Mission on Natural Farming. But natural farming has no scientific validation and is likely to reduce crop yields by 25-30%. If yields fall, how can farming stay viable in the face of rising input prices and stagnant output prices?

Capital expenditure
Amidst all the talk of raising capital expenditure, agriculture presents us with a story of utter neglect. Capital investment is required in agriculture not just for irrigation but also to build/improve agricultural markets (mandis). The total capex of the government in 2022-23 was ₹7.5 lakh crore, but allocation under the capital accounts of crop husbandry, animal husbandry, dairy and fisheries was just ₹119 crore. In 2023-24, this is expected to fall to ₹84.3 crore. Under the capital account of irrigation and flood control, the budgeted allocation in 2022-23 was only ₹350 crore, which is slated to fall to ₹325 crore in 2023-24. The Agriculture Infrastructure Fund (AIF) is another much-touted scheme. The budgeted allocation for AIF in 2022-23 was ₹500 crore, of which only ₹150 crore was spent. In 2023-24, the allocation of ₹500 crore has been retained.

The Finance Minister made a series of other announcements on agriculture in her speech, but the allocations for these schemes or scheme components are not listed in the Budget documents. Essentially, all these are fragmented allocations thinly spread across diverse departments with only an indirect or marginal impact on the agricultural sector. Good examples are the Agriculture Accelerator Fund, PM-Pranam, GOBARdhan, Bhartiya Prakritik Kheti Bio-Input Resource Centres, Mishti, and Amrit Dharohar. There was much time spent in the speech on millets too, but without any explicit allocation other than in upgrading a Centre for Excellence in Hyderabad. There was yet another announcement on a targeted investment of ₹6,000 crore under the Pradhan Mantri Matsya Sampada Yojana, but the actual increase in allocation in the Budget papers is only ₹ 121 crore.

The Budget fails to address the most pressing problems in Indian agriculture. The lack of a scientific and grounded vision, which must have ideally driven the quantum and direction of allocations, is telling.


घरेलू इकोनॉमी को मजबूत बनाने पर ज्यादा फोकस रहा

डॉ. पूनम गुप्ता, ( डायरेक्टर जनरल, एनसीएईआर )

वित्त वर्ष 2023-24 का आम बजट घरेलू उपभोग पर विकास के मुख्य इंजिन की तरह फोकस करता है। दूसरे क्रम पर सार्वजनिक निवेश को रखा गया है। यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि बजट ने इतना ही समर्थन निजी निवेश या निर्यातों को नहीं दिया है। उन्हें आर्थिक विकास या रोजगार निर्माण के लिए उत्प्रेरक नहीं समझा गया है। घरेलू मांग के प्रति सरकार का उत्साही समर्थन वाजिब और न्यायोचित है। क्योंकि आज भारत की कुल जीडीपी का 55 प्रतिशत हिस्सा घरेलू उपभोग का है। बीते एक दशक में इसने 7 प्रतिशत की औसत विकास दर दर्ज की है। बजट में महत्वपूर्ण राजकोषीय समर्थन कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, घरेलू पर्यटन को दिया गया वहीं नेट इनकम टैक्स के बोझ को कम किया गया है। इससे घरेलू मांग में बूम आने की सम्भावना है।

बीते तीन सालों में बजट में जो महत्वपूर्ण बदलाव देखा गया था, वह मौजूदा बजट में भी जारी रहा है। और वह है केंद्र सरकार के पूंजीगत व्यय में भारी बढ़ोतरी | 2019-20 में यह जीडीपी का 1.7 प्रतिशत था, जो इस वर्ष बढ़कर 2.7 प्रतिशत हो गया है। अगले साल के बजट में यह बढ़कर 3.3 प्रतिशत हो जाएगा। जब सरकार पूंजीगत व्यय बढ़ाती है तो विभिन्न संसाधनों के द्वारा वित्तपोषण मिलता है, इससे विकास- वृद्धि में मदद मिल सकती है। दूसरी तरफ अगर यह बढ़ोतरी राजकोषीय घाटे को बढ़ाकर की जाती है तो इससे निजी बचतों के लिए निजी क्षेत्र से प्रतिस्पर्धा निर्मित होती है और परिणामस्वरूप वे इससे दूरी बना सकते हैं।

राजकोषीय एकीकरण की ओर बढ़ते हुए पूंजीगत व्यय में इजाफा करने का प्रस्ताव राजस्व व्यय पर निर्भर करता है। इसके बावजूद अतीत में राजस्व व्यय प्राप्त करना कठिन रहा है। मिसाल के तौर पर, पिछले साल के बजट में राजस्व व्यय को लगभग समतल बनाए रखने का प्रस्ताव रखा गया था, लेकिन अब नए अनुमानों में इनमें 8 प्रतिशत की बढ़ोतरी बताई जा रही है। इससे दो सम्भावनाएं सामने आती हैं। एक, राजकोषीय घाटा बढ़ाते हुए पूंजीगत व्यय में वृद्धि की जाएगी। दो, पूंजीगत व्यय बजट में आवंटित राशि से कम रह जाएंगे और इससे विकास को अपेक्षित प्रोत्साहन नहीं मिल सकेगा। जो भी हो, केंद्र और राज्य दोनों के ही द्वारा सार्वजनिक निवेश भारत की जीडीपी का एक छोटा हिस्सा रहे हैं। बीते दशक में यह औसतन जीडीपी का 7 प्रतिशत ही रहे थे। इसकी तुलना में निजी निवेश इससे तीन गुना अधिक है। निजी निवेश और निर्यात मिलकर जीडीपी का 40 प्रतिशत हिस्सा हैं। लेकिन बजट में विकास के इन दो महत्वपूर्ण उत्प्रेरकों के लिए कोई स्पष्ट नीतिगत निर्देशन या सहायता नहीं प्रदान की गई है।

कुछ उदाहरण देखिए । भारत के अधिक औद्योगीकरण और सेवा क्षेत्र की वैल्यू चेन में प्रगति के लिए कौशल विकास अत्यंत आवश्यक है। इसके अलावा विशेषकर उम्रदराज हो रही विकसित अर्थव्यवस्थाओं को स्किल्स का निर्यात करना भी विकास को बढ़ावा देने वाला हो सकता है। बजट में विभिन्न लक्षित योजनाओं के माध्यम से कौशल- विकास को प्राथमिकता दी गई है। लेकिन अभी यह स्पष्ट नहीं है कि इस उद्यम में निजी क्षेत्र का कैसे लाभ उठाया जाएगा या शोध एवं विकास को बढ़ाने के साथ ही पर्यटन क्षेत्र को कैसे विकसित किया जाएगा। एक और उदाहरण है वर्ष 2021-22 के आम बजट में दिए गए प्रस्तावों पर किसी तरह के फॉलो-अप्स की अनुपस्थिति। बजट विकास के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्रों, जिनमें बैंकिंग भी शामिल हैं, में निजी क्षेत्र की सहभागिता बढ़ाने के लिए कोई रोडमैप नहीं मुहैया कराता है।

एक और क्षेत्र जिसकी स्पष्ट उपेक्षा की गई है, वह है प्राइवेट इक्विटी और वेंचर कैपिटलिस्टों के लिए एक इकोसिस्टम को बढ़ावा देना। 2021-22 के बजट में नोट किया गया था कि गत वर्ष वेंचर कैपिटल और प्राइवेट इक्विटी ने 5.5 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का निवेश किया था, जिससे स्टार्ट-अप के इकोसिस्टम को बढ़ावा मिला। इसी तरह प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को देश में आकृष्ट करने के लिए भी ताजा प्रयास नहीं किए गए हैं। जबकि पूर्वी एशिया को मैन्युफेक्चरिंग हब बनाने में विदेशी निवेश का ही हाथ रहा है, क्योंकि विदेशी निवेशक अपने साथ पूंजी, तकनीक और वैश्विक बाजारों तक पहुंच लेकर आते हैं।


वंचितों को प्राथमिकता में रखती सरकार

हर्ष वर्धन त्रिपाठी, (वरिष्ठ पत्रकार)

वितमंत्री निर्मला संतारमण का यह पांचवां आम बजट था, लेकिन अमृत काल का पहला । इस लिहाज से इस बजट को अधिक बारीकी से देखने की आवश्यकता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बार-बार अमृत काल को भारत के लिहाज से सर्वाधिक अवसरों वाला समय बता रहे हैं। ऐसे में अमृत काल में आया यह पहला बजट क्या बता रहा है ? प्रधानमंत्री मोदी ने इसे एक ऐसा बजट बताया, जो विकसित भारत की पक्की बुनियाद रखने जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि यह बजट बंचितों-गरीबों को प्राथमिकता दे रहा है कमाल की बात यह भी है कि पारंपरिक संदर्भों में बंचितों- गरीबों का बजट कहने का सीधा सा अर्थ यहाँ होता था कि सरकार ढेर सारी लौक लुभावन योजनाओं को प्रस्तुत कर रही है, लेकिन बजट में नई कर प्रणाली में कर छूट की सीमा पांच लाख से सीधे क सात लाख रुपये वार्षिक करने के अलावा कोई भी दूसरी लोक लुभावन पेजना नहीं दिखती। फिर प्रधानमंत्री मोठे इसे विकसित भारत की पक्की बुनियाद के साथ वंचितों-गरीबों का बजट क्यों कह रहे हैं? इसे समझने के लिए वित्त मंत्री के बजट की शुरुआत को ठीक से सुनना होगा। निर्मला सीतारमण ने बजट शुरू करते प्राथमिकताएँ गिनाई और इसे सप्तर्षि का नाम दिया। ये सात प्राथमिकताएं हैं- समावेरी विकास, अंतिम व्यक्ति तक पहुँच, ईफ्रास्ट्रक्चर एवं इन्वेस्टमेंट, अपनी क्षमता को विकसित करना, हरित विकास को बढ़ाना, युवा शक्ति और वित्तीय क्षेत्र को प्रोत्साहन ये सात 月 प्राथमिकताएं अमृत काल के पच्चीस वर्षों में देश को परिवर्तित करके कैसे दि विकासशील से विकसित करने वाली हैं? इस का बजट है, जिसे वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने प्रस्तुत किया है।

मोदी सरकार के पहले बजट के बाद से अब तक कर सीमा में छूट नहीं दी गई थी। लंबे समय से ढाई लाख रुपये सालाना पर टिकी कर छूट को बढ़ाने का दबाव हर बजट में रहता था। इससे पहले नि सरकार ने नई और पुरानी कर प्रणाली वि में इस तरह से परिवर्तन किया कि लोग के धीरे-धीरे नई कर प्रणाली का हिस्सा बन जाएं, लेकिन मध्यम वर्ग के लिए घर के खरीदने से लेकर दूसरे ढेर सारे जरूरी खर्ची पर किसी तरह की छूट न होने से नई कर प्रणाली को बहुत कम लोगों ने चुना। इस बजट में नई कर प्रणाली में त सीधे सात लाख रुपये वार्षिक कमाई के पर कर छूट देकर निर्मला सीतारमण ने स स्पष्ट कर दिया कि बेहतर होगा, अब लोग इसी को चुनें। सात लाख तक की कमाई वालों का शून्य कर करके मोदी सरकार ने लंबे समय से मध्यम वर्ग की मांग भी मान ली और सात लाख तक की कमाई वाला एक वर्ग तैयार किया, जो राजनीतिक तौर पर भी उपयोगी हो सकता हैं। सरकार ने प्रधानमंत्री आवास योजना मैं बजट आवंटन 66 प्रतिशत बढ़ाकर 79 हजार करोड़ रुपये कर दिया है। दरअसल सरकार अब नहीं चाहती है कि बेतहाशा और बेतरतीब घरों को बनाने का काम बिल्डर करें। बेहद जरूरतमंद लोगों को सरकार प्रधानमंत्री आवास योजना में घर बनाकर देगी और लोगों को उनकी जरूरत के लिहाज से ही घर खरीदने के लिए प्रेरित करेगी। सिर्फ कर छूट के लिए दूसरा घर लेने वालों को हतोत्साहित करना भी सरकार के लक्ष्य के तौर पर दिख रहा है। इससे देश के हर छोटे- बड़े शहर में बिल्डरों के बेतरतीब बनते रियल एस्टेट प्रोजेक्ट पर रोक लगाने की कोशिश भी साफ दिखती है। सरकार ने 80 करोड़ लोगों को राशन देने की योजना पहले ही एक और वर्ष के लिए बढ़ा दी है। बहुत दबाव के बावजूद किसान सम्मान निधि न बढ़ाने का साहसिक निर्णय सरकार ने लिया और किसानों को विकास के रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ाने के लिए एग्रीकल्चर एक्सेलरेटर फंड का एलान किया है। सरकार ने पूंजीगत व्यय के लिए आवंटन इस वर्ष के बजट में 33 प्रतिशत बढ़ाकर दस लाख करोड़ का रखा है। रेलवे के लिए किया गया बजट आवंटन भी बुनियादी ढांचे को तेजी से तैयार करने की मंशा दिखा रहा है। रेलवे के लिए दो लाख चालीस हजार करोड़ रुपये का आवंटन मनमोहन सरकार के आखिरी बजट से नौ गुना अधिक है। प्रधानमंत्री विश्वकर्मा कौशल सम्मान योजना एक तीर से दो शिकार जैसा हैं। रोजगार के लिए कुशल श्रमिकों को तैयार करने की मोदी सरकार की बुनियादी बात को ही यह आगे बढ़ाता है। साथ ही विश्वकर्मा नाम से यह योजना शुरू करने से जाती विभाजन की राजनीति करने वाले विपक्षी दलों को भी उत्तर देने के लिए एक हथियार तैयार हो रहा है। विकसित भारत के लिए आवश्यक है कि युवाओं को रोजगार मिले और आधुनिक तकनीक के मामले में भी हमारे युवा अव्वल हों। एकलव्य विद्यालयों में 38 हजार शिक्षकों की भर्ती की बात उसी का उत्तर देने की कोशिश है। देश भर में कौशल विकास के लिए 30 भारत के अंतरराष्ट्रीय कौशल विकास केंद्र तैयार किए जाने की बात बजट में कही गई है। अमृत काल में अगले 25 वर्षों की तैयारी में बुनियादी ढांचे पर कितनी जबरदस्त कार्य योजना है, इसे इसी बात से समझा जा सकता है कि 45 लाख करोड़ रुपये के बजट में 13.30 लाख करोड़ रुपये का निवेश आधुनिक बुनियादी सुविधाएं तैयार करने पर होना है।

महिलाओं को अपने साथ लाने में नरेन्द्र मोदी पहले से बहुत योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़ते रहे हैं। तीन तलाक के खात्मे के बाद मुस्लिम महिलाएं भी मोदी के समर्थन में दिखीं। इसीलिए महिलाओं के स्व सहायता समूह को हर बार की तरह इस बार भी बढ़ावा दिया गया है । सुकन्या समृद्धि लड़कियों के बालिग होने तक थी तो इस बजट में सभी महिलाओं के लिए दो लाख रुपये तक बचत पर महिला सम्मान बचत पत्र के लिए जरिये साढ़े सात प्रतिशत ब्याज का प्रविधान किया गया है। सबसे बड़ी बात कि चुनावी साल के ठीक पहले का पूर्ण बजट होने के बावजूद मोदी सरकार वित्तीय अनुशासन को ध्यान में रखा है। अगले वर्ष वित्तीय घाटा 5.9 प्रतिशत और उसके अगले वर्ष 2025-26 में वित्तीय घाटे को 4.5 प्रतिशत के नीचे लाने का लक्ष्य भी सरकार की तरफ से आना बता रहा है कि यह बजट अमृत काल का पहला बजट भले हो, मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के पहले बजट का ही स्वाभाविक विस्तार हैं।


बचत नहीं निवेश


वित्त मंत्री हर वर्ष केंद्रीय बजट की प्रस्तुति के बाद शुरुआती प्र​तिक्रियाओं के प्रबंधन में सिद्धहस्त हो चुके हैं। इससे शेयर बाजारों और टीवी स्टूडियो में भी हल्काफुल्का उत्साह पैदा होता है और जब तक वह ठंडा होता है, लोग बजट के बारीक अध्ययन से निकले संदेशों की अनदेखी करके आगे बढ़ चुके होते हैं। निर्मला सीतारमण भी आय कर कटौती को लेकर उत्साह पैदा करके ऐसा करने में सफल रहीं। अगर विभिन्न कर रियायत योजनाओं को हटाए जाने का आकलन कर लिया जाए तो करदाताओं को उतना लाभ नहीं होगा जितना शुरू में घो​षित किया गया था। वित्त मंत्री ने जहां कहा कि उन्हें 35,000 करोड़ रुपये की राजस्व हानि हुई है, वहीं अगले वर्ष के आयकर राजस्व में प्रतिशत वृद्धि का उनका अनुमान उतना ही है जितना कि कॉर्पोरेशन कर राजस्व के लिए यानी 10.5 प्रतिशत। ऐसे में देखा जाए तो व्यावहारिक तौर पर 2023-24 में राजकोष को कोई नुकसान नहीं होगा। बहरहाल, कर व्यवस्था में गंभीर खामी है और दुनिया में कुछ ही ऐसे देश हैं जहां कर रियायत की सीमा इतनी अ​धिक है।

आंकड़ों पर गौर किया जाए तो यह स्पष्ट हो जाता है कि जिस राजकोषीय सुधार की घोषणा की गई थी उसे एक महीना पहले ही अंजाम दिया गया जब कोविड के समय शुरू की गई नि:शुल्क खाद्यान्न आपूर्ति को बंद किया गया। इसके अलावा उर्वरक स​ब्सिडी में बचत के कारण ही घाटे में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की तुलना में 0.5 फीसदी के बराबर कमी प्रस्तावित की जा सकी। संसद में बुधवार को पेश बजट में कोई अतिरिक्त राजकोषीय सुधार नहीं ​हुआ है। नि​श्चित तौर पर अब जबकि आ​र्थिक उत्पादन कोविड के झटके से उबर चुका है और आगे बढ़ रहा है तो यह समझना होगा कि घाटा 2019-20 के कोविड पूर्व के स्तर पर क्यों नहीं आया। तब यह जीडीपी का 4.6 फीसदी था और अगले वर्ष इसके 5.9 फीसदी रहने की बात कही गई है।

दरअसल सरकार बड़ा पूंजी निवेश कर रही है और गैर ब्याज राजस्व व्यय में कमी कर रही है। सार्वजनिक निवेश मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल की पहचान रहा है और पांच वर्षों में पूंजी आवंटन 150 फीसदी बढ़ा है। घाटे की भरपाई खपत से नहीं अधोसंरचना आदि में निवेश से ही होनी चाहिए। यानी घाटे को ऊंचा रखने की एक कीमत है जो बढ़ते ब्याज बिल में नजर आती है। सार्वजनिक ऋण भी बढ़ रहा है। घाटे को कम करने, ब्याज तथा सार्वजनिक ऋण को थामने के लिए पूंजीगत व्यय पर थोड़ा अंकुश लगाना होगा।

मिसाल के तौर पर अरसे बाद रेलवे के पूंजी आवंटन में भारी इजाफा स्वागतयोग्य है लेकिन यह पूंजी निवेश के लिए अ​धिशेष तैयार नहीं करता और पूरी तरह बजट समर्थन पर​ निर्भर है। माल भाड़े से आने वाले राजस्व का ज्यादातर हिस्सा कोयला, लोहा, अनाज सीमेंट आदि से आता है जबकि यात्री किराये में ज्यादा हिस्सा दूसरे दर्जे, शयनयान और तृतीय वातानुकूलित श्रेणी से आता है। वंदे भारत जैसी उच्च श्रेणी वाली ट्रेनों की नई श्रे​णियों से अभी सार्थक आय होनी है।

सरकार का कहना है कि निजी निवेश के आने तक आर्थिक गति बढ़ाने के लिए उसका पूंजी निवेश आवश्यक है। बजट में राष्ट्रीय ​शिक्षा मिशन और प्रधानमंत्री आवास योजना का बजट बढ़ाया गया है लेकिन जल जीवन मिशन में सबसे अ​धिक बढ़ोतरी नजर आ रही है क्योंकि चालू वर्ष में बजट खर्च नहीं हो सकेगा। रक्षा क्षेत्र के आवंटन में मामूली इजाफा हुआ है जबकि प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना तथा ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रम में कटौती हुई है। सूचना प्रौद्योगिकी और दूरसंचार में दिखाई गई उदारता पर कोई सवाल नहीं है लेकिन पूरी तस्वीर देखें तो थोड़ा संतुलन बेहतर होता।

सरकार को यह श्रेय दिया जाना चाहिए कि घाटे में फिर कटौती हुई और सार्वजनिक उधारी पर नियंत्रण रहा। इससे संसाधनों पर नियंत्रण बना रहेगा और निजी क्षेत्र के लिए अधिक पूंजी बचेगी। ब्याज दरें भी कम हो सकती हैं। इससे निजी निवेश और खपत बढ़ेगी तथा आ​र्थिक वृद्धि के मामले में हम औरों से बेहतर रहेंगे। इसके अलावा अगर कर राजस्व अनुमान से बेहतर होता है तो उसका इस्तेमाल घाटा कम करने में किया जा सकता है। उसे चुनाव पूर्व तोहफों में खर्च नहीं किया जाना चाहिए। 2025-26 तक के बाकी दो वर्षों में घाटे में 1.4 फीसदी कमी करने की जरूरत है तभी उस वर्ष 4.5 फीसदी का लक्ष्य हासिल होगा।


समावेशी विकास पर बल


वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने बुधवार को आम बजट 2023-24 पेश किया । इसे अमृत काल में राह दिखाने वाली प्राथमिकताओं वाला बजट बताया और कहा कि यह ‘सप्तऋषि’ बजट है, जिसमें सात बातों को महत्त्व दिया गया है। प्राथमिकताओं में समावेशी वृद्धि, हरित विकास, युवा शक्ति, वित्तीय क्षेत्र, अंतिम छोर तक पहुंच, बुनियादी ढांचे का विकास और क्षमताओं का पूरा इस्तेमाल शामिल हैं। बजट नागरिकों के लिए अवसरों को सुविधाजनक बनाने, विकास और रोजगार सृजन करने के साथ व्यापक आर्थिक स्थिरता मजबूत करने पर केंद्रित है। कृषि स्टार्टअप के लिए कृषि त्वरित कोष स्थापित किया जाएगा। पशुपालन, डेयरी और मत्स्य पालन पर ध्यान देने के साथ कृषि ऋण लक्ष्य को बढ़ाकर 20 लाख करोड़ रुपये किया जाएगा। आयकर छूट की सीमा बढ़ाकर सात लाख रुपये की गई है। महिला सम्मान बचत पत्र मार्च, 2025 तक उपलब्ध होगा जिसमें महिला या लड़की के नाम पर दो लाख रुपये तक का निवेश किया जा सकेगा। शहरी बुनियादी ढांचा विकास कोष के लिए हर साल 10,000 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। कर्मचारियों एवं पेंशनधारकों के लिए नई कर व्यवस्था में मानक कटौती को बढ़ाकर 52,500 रुपया करने का प्रस्ताव है। बजट प्रस्तावों को देखें तो यह संतुलित बजट है। हालांकि कुछ लोग इसे चुनावी बजट करार दे सकते हैं, लेकिन इसमें अर्थव्यवस्था को स्थिरता प्रदान करने पर तवज्जो है । सभी वर्गों का ध्यान रखा गया है। बजट रोजगार सृजन, आर्थिक विकास और निवेश को प्रोत्साहन देगा। पूंजीगत व्यय बढ़ाया गया है, हरित विकास की बात कही गई, मध्यम वर्ग को राहत दी गई है और आयकर स्लैब में राहत दी गई है। बजट में किसान, महिला, युवा, उद्योग सहित सभी वर्गों को कुछ न कुछ दिया गया है। अब मध्यम वर्ग से सरकार कम पैसे लेगी। इससे उनके पास डिस्पोजेबल इनकम बढ़ेगी और वे ज्यादा खर्च करने को तैयार होंगे जिससे मांग बढ़ेगी और फलस्वरूप अर्थव्यवस्था और ज्यादा मजबूत होगी। पर्यटन क्षेत्र के विकास पर तवज्जो दी गई है। इस कड़ी में पचास और पर्यटन केंद्र विकसित किए जाएंगे। तकनीकी को ज्यादा तवज्जो मिली है। ई-अदालतों के गठन और कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि वाले कैदियों को आर्थिक मदद, जमानत – जुमनि आदि के लिए, से जाहिर हो जाता है कि यह बजट आर्थिक समावेशी होने के साथ ही समाज के हर वर्ग की चिंता और सरोकार पर ध्यान देने वाला है।


संतुलन की कोशिश


आजाद भारत के अमृत काल का पहला बजट लगभग अपेक्षा के अनुरूप ही रहा है। सबसे अपनी दोस्ती, ना काहू से बैर के भाव के साथ इस बजट में चुनावी वर्ष की छाया भी साफ तौर पर महसूस हो रही है। वैश्विक मंदी और रूस-यूक्रेन युद्ध का अपना असर है, इसके बावजूद वित्त मंत्री ने अपनी सीमाओं के अंदर एक सकारात्मक भविष्योन्मुख बजट पेश किया है। कुछ योजनाओं को पूरा करने के लिए तीन साल से पांच साल तक का समय लिया गया है, मतलब सरकार अपनी घोषणाओं में किसी भी तरह के बड़बोलेपन से बचने में कामयाब रही है। आज के समय में अर्थव्यवस्था जिस मोड़ पर है, वहां किसी भी विशेष वर्ग को निशाने पर नहीं लिया जा सकता। एक ओर, जरूरतमंदों को राहत पहुंचाने के लिए विभिन्न मदों में बजट की बढ़ोतरी हुई है, वहीं बड़ी कंपनियों और निवेशकों की चिंता भी सरकार स्पष्ट रूप से कर रही है। कंपनियों और निवेशकों की तात्कालिक खुशी को इस बात से समझा जा सकता है कि बजट आते ही शेयर बाजार में बढ़त का क्रम दिखा। हालांकि, कुछ समय बाद गिरावट हुई, पर तब भी बाजार ने समग्रता में नुकसान का संकेत नहीं दिया। यह सरकार के लिए एक राहत की बात हो सकती है।

नौकरीपेशा लोगों के लिए आयकर स्लैब में वृद्धि एक खुशखबरी है। आयकर स्लैब को तार्किक बनाने की मांग विगत चार-पांच साल से ज्यादा हो रही थी, लेकिन आयकर वसूलने में सहजता की वजह से सरकार किसी नई रियायत के लिए तैयार नहीं थी। साल 2014 के बाद अब जो परिवर्तन हुआ है, उसके अनुसार, नई आयकर स्कीम को स्वीकार करने वाले लोगों को सात लाख वार्षिक आय पर अब आयकर भुगतान की जरूरत नहीं पड़ेगी। दूसरा परिवर्तन यह है कि यदि आप पुरानी आयकर स्कीम को नहीं चुनेंगे, तो आप पर स्वत: नई आयकर स्कीम लागू हो जाएगी। हालांकि, जिन लोगों की वार्षिक आय 15.5 लाख से ज्यादा है, उन्हें 30 प्रतिशत आयकर चुकाना पड़ेगा। संकेत स्पष्ट है कि पुरानी आयकर स्कीम की विदाई होने वाली है। इसका एक अर्थ यह भी है कि आयकर बचाने के लिए होने वाले निवेश में कमी आएगी। वैसे भी आयकर चुकाने वाले लोग ज्यादा नहीं हैं और जो सक्षम वर्ग है, वह आयकर बचाने में सबसे आगे रहता है। आयकर फॉर्म को सरल बनाने के साथ ही आयकर से जुड़े भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए भी ज्यादा सक्रिय होने की जरूरत है।

प्रधानमंत्री आवास योजना के बजट का 66 प्रतिशत बढ़ना उन गरीबों के लिए सुखद है, जिन्हें अभी तक घर नसीब नहीं हुआ है। एकलव्य विद्यालय के तहत आदिवासियों के विकास की पहल प्रशंसनीय है, तो महिलाओं के लिए विशेष बचत स्कीम व बचत बढ़ाने की अन्य कोशिशें भी सराहनीय हैं। बुनियादी ढांचे के विकास के लिए 10 लाख करोड़ रुपये का बजट, राज्यों को पचास साल के लिए ब्याज मुक्त ऋण देने का प्रस्ताव भी समयानुकल है। किसानों को राहत देने की कोशिश हुई है, तो सहकारिता में फिर प्राण फूंकने का इरादा भी जाहिर है। गांव और शहर के बीच यह बजट संतुलन साधने की कोशिश करता दिख रहा है। अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए अभी भी बहुत गुंजाइश है, क्योंकि ज्यादातर पैसा उधार से ही आ रहा है। सर्वाधिक पैसा रक्षा पर खर्च हो रहा है। सरकार ने शिक्षा और स्वास्थ्य का बजट बढ़ाया है, लेकिन अभी और की उम्मीद है।


सबको कुछ न कुछ देता जिम्मेदार बजट

एन के सिंह, ( पूर्व सांसद और पूर्व केंद्रीय सचिव)

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आम चुनावों से पहले का केंद्र सरकार का अंतिम पूर्ण बजट संसद में पेश कर दिया और उस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी टिप्पणी की है। इस बजट के छह-सात विशेष पहलू हैं और दो शब्दों में कहें, तो यह रिस्पॉन्सिव (तत्पर) और रिस्पॉन्सिबल ( जिम्मेदार) बजट है। रिस्पॉन्सिव या तत्पर इसलिए कि मुझे ऐसे किसी बजट की याद नहीं, जिसने समाज के सभी वर्गों को कुछ न कुछ लाभ दिया हो । अनुमान नहीं था कि बजट 2023-24 ऐसे व्यापक रूप से सभी पक्षों के लिए इतना सकारात्मक होगा। उदाहरण के लिए, कृषि क्षेत्र, जिस पर बल दिया गया है कि कृषि विकास में तकनीक का कैसे प्रयोग बढ़ाया जाए, कृषि उत्पादन में कैसे वृद्धि लाई जाए। महिला, युवा, ग्रामीण शिल्पकार, लघु-मध्यम उद्योग, मध्यम वर्ग इत्यादि पहलुओं पर गौर किया गया है, तभी इसे रिस्पॉन्सिव बजट कह रहा हूं।

आज विकास की इच्छा एक वास्तविकता है। केंद्र सरकार अभी सिर्फ 6.5 प्रतिशत की विकास दर लेकर चल रही है। सरकार 6.8 या 7 प्रतिशत का लक्ष्य लेकर भी चल सकती थी। इससे जीडीपी व टैक्स भी बढ़ता, राजकोषीय घाटे को कम करने में सहूलियत होती, पर सरकार ने ऐसा नहीं किया। जितने भी गैर-बजटीय उधार हैं, सबको पारदर्शिता से पेश किया। सरकार टैक्स अनुमान भी बढ़ा सकती थी, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया, ताकि लोगों को ऐसा न लगे कि सरकार अवास्तविक लक्ष्य रखकर चल रही है।

सरकार ने दूरगामी आर्थिक स्थिरता को ध्यान में रखते हुए फैसले लिए हैं। विकास और महंगाई, दोनों के प्रति उसने उत्तरदायी होने का परिचय दिया है। युवा और रोजगार वृद्धि इत्यादि पर ध्यान दिया गया है। सरकार का जोर स्वयं सहायता समूहों पर भी है। इससे आने वाले दिनों में विशेष रूप से महिला रोजगार में ज्यादा वृद्धि होगी। ग्रामीण शिल्पकार एक उपेक्षित वर्ग रहा है, जिसे विश्वकर्मा कहा गया है। पर्यटन की दिशा में भी नई पहल हुई है। मैं वर्षों से कहता रहा हूं कि भारत में पर्यटन में जो असीम क्षमता है, उसके एक प्रतिशत का भी हमने अभी तक उपयोग नहीं किया है। कई ऐसे छोटे देश हैं, जिनकी पूरी अर्थव्यवस्था ही पर्यटन पर चलती है। सरकार ने पचास पर्यटन केंद्र विकसित करने की घोषणा की है। हरित विकास या हरित हाइड्रोजन, हरित ऊर्जा प्रसारण, ऊर्जा भंडारण, कृषि में हरित व्यवहार, हरित ऋण पर जो व्यय की घोषणा हुई है, उससे भारत के विकास को प्रोत्साहन मिलेगा।

स्वास्थ्य क्षेत्र की बात करें, तो मानव संसाधन का अभाव रहा है। वित्त मंत्री ने 157 नर्सिंग कॉलेज खोलने की घोषणा की है, ये सभी कॉलेज अस्पतालों से जुड़े रहेंगे। एलायड सर्विसेज का जो कानून सरकारने पारित किया है, उसका लाभ स्वास्थ्य क्षेत्र, उसमें भी जो ग्रामीण स्वास्थ्य क्षेत्र, प्राथमिक स्वास्थ्य क्षेत्र, पालिका स्वास्थ्य क्षेत्र को मिलेगा । यह बहुत जरूरी है। महामारी अपनी जगह है, पर इन स्वास्थ्य केंद्रों को युद्ध स्तर पर सुधारने की जरूरत है, मैंने भी पंद्रहवें वित्त आयोग के अध्यक्ष के नाते ऐसे प्रस्ताव दिए थे। एलायड सर्विसेज या नर्सों की जो प्रतिभा क्षमता हमारे पास होगी, उसका उपयोग स्वास्थ्य तंत्र को सुधारने पर किया जाएगा। सरकार ने इस ओर कदम बढ़ा दिए हैं। आईसीएमआर लैब और फार्मा ट्रांजिशन भी इस बजट के दो महत्वपूर्ण पक्ष हैं। शिक्षक प्रशिक्षण सुधारने के लिए भी बजट में और बल दिया गया है।

एक और खास पहलू है पूंजीगत व्यय, इससे विकास को चार गुना मदद मिलती है। इसके लिए सकल घरेलू उत्पाद का 3.3 प्रतिशत खर्च करने का लक्ष्य रखा गया है। इसका सीधा लाभ मूलभूत ढांचे की गुणवत्ता पर होगा और कार्य क्षमता, निर्यात व रोजगार में वृद्धि होगी।

ईज ऑफ डुइंग बिजनेस अर्थात व्यवसाय में सुविधा पर भी ध्यान दिया गया है। कहा जाता है, भारत में मुक्त अर्थव्यवस्था तो है, लेकिन व्यवसाय करना आसान नहीं है। जो दस्तावेजी औपचारिकताएं हैं, उनको कम करने और प्रक्रियाओं के गैर- अपराधीकरण पर जोर दिया गया है।

बजट पर कई लोगों के बयान मैंने देख हैं कि तेलंगाना के लिए कुछ नहीं है, कई अन्य राज्यों के लिए कुछ नहीं है। देखिए, यह राज्यों का बजट नहीं है, यह केंद्र का बजट है। अच्छी बात है, सरकार पंद्रहवें वित्त आयोग की सिफारिशों को लागू करती जा रही है। वैसे कोई जरूरी नहीं था कि राज्यों को फिर 1.3 लाख करोड़ रुपये पचास साल तक के लिए बिना ब्याज ऋण स्वरूप दिए जाते। राज्यों के पास बहुत सी ऐसी वित्त क्षमता है, जिसका उपयोग नहीं हुआ है, क्योंकि उन्हें जो पहले उधार का प्रस्ताव दिया गया था, उसका ही उन्होंने पूरी तरह इस्तेमाल नहीं किया है। अब राज्यों को जो अतिरिक्त धन प्राप्त हो सकता है, उसका भरपूर सदुपयोग उन्हें करना चाहिए।

यह एक अद्भुत बजट है, जिसमें कराधान को और सरल करने की कोशिश हुई है। अप्रत्यक्ष कर संग्रह में भारी वृद्धि हुई है। वैसे अभी भी टैक्स स्लैब पर काम करना चाहिए। स्लैब कम करने की जरूरत है। जीएसटी में भी बदलाव की जरूरत है। जहां तक प्रत्यक्ष कर की बात है, तो स्लैब कम कर दिया है, टैक्स दर में भी कमी हुई है। लोगों के पास खर्च के लिए ज्यादा राशि होगी, जिससे अर्थव्यवस्था को ही प्रोत्साहन मिलेगा।

आगामी चुनावों को देखते हुए सरकार के पास यह मौका था कि वह कुछ मुफ्त योजनाओं की घोषणा कर सकती थी, लेकिन सरकार ने रेवड़ी बांटने से बचते हुए एक विकासोन्मुखी जिम्मेदार बजट पेश किया।
संक्षेप में कहूं, तो आम लोगों को इस बजट से तीन चीजें मिली हैं- नौकरी के साधन, पूंजीगत व्यय का इसमें बड़ा योगदान रहेगा। पूंजीगत व्यय से आम आदमी को और बेहतर बुनियादी सुविधाएं मिलेंगी । शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में भी लाभ मिलेगा। दूसरा, महिलाओं, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति को फायदा होगा। तीसरा, टैक्स में लाभ मिलेगा, इससे आम लोगों की आय भी बढ़ेगी और उनका खर्च भी बढ़ेगा।

वैसे सरकारों का यह विरासती अधिकार है। उन्हें किसी घोषणा के लिए बजट का इंतजार नहीं करना पड़ता है, पर इस बजट के बाद ऐसा लगता नहीं है कि सरकारको अतिरिक्त घोषणा की जरूरत पड़ेगी। संभव है, अगले वर्ष वह लेखानुदान की घोषणा न करते हुए कुछ घोषणाएं करे, पर फिलहाल ऐसा लगता नहीं है।

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