01-09-2026 (Important News Clippings)
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More Substance to Beat Substance Abuse
Anti-drug slogans, campaigns can boomerang
ET Editorial
If history teaches us anything, it is that anti-drug campaigns often polish the very thing they seek to tarnish. Trying to chasten youth into sobriety is the right thing to do. But the unintended consequence is that they often glamourise drugs and the ‘bad boy’ lifestyle such campaigns condemn. Whether it’s films that highlight the terrible consequences of narcotics like the 2016 film, Udta Punjab, or ‘anti-drugs’ songs like the 1986 ‘Pack That Smack’ by Remo Fernandes, the image of transgression becomes the unintended appeal. A slogan like ‘Just Say No’ or ‘Choose Life’ — the latter a famous anti-drug activism slogan in 80s Britain that was subverted in the 90s film Trainspotting — became less a deterrent than a badge of irony worn by youngsters eager to prove their independence.
Prime Minister Narendra Modi is right to highlight India’s drug menace. Punjab alone offers a grim illustration as a hunting ground for heroin (‘chitta’) smuggled across the Pakistani border. Villages reel under addiction, families disintegrate and crime flourishes. But campaigns like ‘Yudh Nasheyan Virudh’ have been more theatre than cure, while collusion between traffickers and enforcement agencies continues to erode credibility. The US’ ‘War on Drugs’ is a global cautionary tale. Launched with Richard Nixon’s rhetoric in the 70s and fuelled by Ronald Reagan’s zeal in the 80s, it substituted punishment for treatment, swelling prisons while leaving communities hollowed out. Cocaine and heroin were demonised, yet opioids were overprescribed with abandon. The result was not eradication but adaptation: traffickers shifted routes, and addicts shifted substances.
What, then, is the alternative? Less theatre, more, well, substance. Invest in education that treats young people as rational actors. Replace scare tactics with mentorship and community spaces. Tackle structural despair — unemployment, alienation, corruption — that makes intoxication seductive. Otherwise, the next anti-drug slogan will be just another advert for the very thing it seeks to banish.
इस साल 14% अल्पवृष्टि का पैदावार पर असर पड़ेगा
संपादकीय

मौसम विभाग के अनुसार 1 जून से 29 अगस्त तक देश में 14% कम वर्षा हुई। कुल 12 राज्य ऐसे हैं, जहां 20 से 58% तक कम वर्षा हुई है। इनमें बिहार (42%), पंजाब (36%) और राजस्थान (22%) भी शामिल हैं। मुख्यतः चावल उत्पादक पूर्वी उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल में पिछले साल के औसतन 26-27% कम बारिश हुई, जिससे धान का रकबा 3% घटा है। खरीफ का रकबा पिछले साल से 2% कम रहा, लेकिन मक्के की बुवाई का करीब 4% कम होना चिंताजनक है। देश में आज भी 42% कृषि क्षेत्र ही सिंचित है, यानी बाकी खेती वर्षा पर निर्भर रहती है। भले ही कृषि का ग्रॉस वैल्यू एडेड (जीवीए) में योगदान 16-18% हो, लेकिन आबादी का 62% इससे अपना जीवनयापन करता है। बिहार जैसे गरीब राज्य में जहां आज भी 80% लोग कृषि पर निर्भर हैं, 42% कम बारिश होना उनकी गरीबी और बढ़ाने का संदेश है। यह राज्य मक्का उत्पादन में भी दूसरे स्थान पर रहता है, लेकिन किसानों का यह सहारा भी सूखे के कारण कम होता दिख रहा है। हालांकि संतोष की बात यह है कि एक माह पहले तक मोटे अनाज में कम पानी की खपत वाला बाजरा सबसे कम बोया गया था, लेकिन अगस्त में किसानों ने बड़े क्षेत्र में इसे बोया। दलहन की बुवाई भी पूर्ववत है। कुल मिलाकर अल्पवृष्टि से पैदावार पर असर पड़ेगा।
Date: 01-09-26
दुनिया में कम जॉब्स के बावजूद ग्रोथ के विरोधाभास को समझें
कौशिक बसु, ( विश्व बैंक के पूर्व चीफ इकोनॉमिस्ट )
आज दुनिया में एक खास तरह का आर्थिक-विभाजन दिखलाई दे रहा है। लोग दोहरे आर्थिक परिदृश्य का सामना कर रहे हैं। भारत की ही बात करें तो यहां युवाओं में बेरोजगारी की दर ऊंची है और कॉलेजों-विश्वविद्यालयों से निकलने वाले युवाओं के लिए नौकरियों की किल्लत है। युवाओं में बेरोजगारी दर 2025 में 2.1 प्रतिशत अंक बढ़कर 17.7 प्रतिशत हो गई।
नतीजतन, इनमें से कई युवा और उनके परिवार वास्तविक आय में गिरावट का सामना कर रहे होंगे। लेकिन दूसरी ओर अर्थव्यवस्था भी तेजी से बढ़ती जा रही है और 2025 में प्रति व्यक्ति जीडीपी में 6.6 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी। लेकिन यहां भी आंकड़े वास्तविक तस्वीर को छिपाते हैं। क्योंकि आबादी के एक छोटे हिस्से की आय में तो तेज वृद्धि हुई है, लेकिन बड़ी संख्या में लोग आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं।
इतने गहरे आर्थिक विभाजन को बने रहने देना नीतिगत-विफलता है। अपेक्षाकृत कम मजदूरी वाले मध्यम आय के देश के रूप में भारत सही नीतियों के सहारे अपने युवाओं के लिए पर्याप्त रोजगार पैदा कर सकता है। यह बात तब भी सही है, जब श्रम बाजार के मौजूदा रुझान एआई और अन्य डिजिटल तकनीकों से प्रभावित हो रहे हों, जो मानव-श्रम की मांग घटाती हैं और मुनाफे को कुछ हाथों में केंद्रित करती हैं।
जैसे-जैसे अर्थव्यवस्थाएं अधिक खंडित होती जा रही हैं, नीति-निर्माताओं, विश्लेषकों और अन्य पर्यवेक्षकों को समग्र आंकड़ों के नीचे छिपी वास्तविकता पर अधिक ध्यान देना होगा। हम शायद उस दौर में प्रवेश कर रहे हैं, जिसे ‘गेटेड रिसेशन’ कहा जा सकता है। यह ऐसी स्थिति है, जिसमें कुछ समूह या क्षेत्र मंदी जैसी परिस्थितियों से गुजरते हैं, जबकि अमीर लगातार और अमीर होते जाते हैं। इससे ओवरऑल आर्थिक इंडिकेटर अच्छे दिखाई देते रहते हैं।
मिसाल के तौर पर, भारत में निम्न-मध्यम वर्ग के परिवार- खासकर वे, जिनके युवा बच्चे अभी-अभी कॉलेज से निकले हैं- व्यावहारिक रूप से ऐसे ही ‘गेटेड रिसेशन’ में फंसे हो सकते हैं। अमेरिका में भी कम आय वाले लोगों की सबसे अधिक आबादी वाले मिसिसिपी, न्यू मैक्सिको, लुइजियाना और ओक्लाहोमा जैसे राज्य श्रम बाजार की स्थिति बिगड़ने के साथ स्थानीय स्तर पर ऐसे ‘गेटेड रिसेशन’ का अनुभव करते हैं।
मुद्दा किसी पार्टी या सरकार पर दोष मढ़ने का नहीं है, क्योंकि इन असमानताओं के कारण अकसर बहुत गहरे और जटिल होते हैं। फिर भी, राजनेताओं को इस समस्या पर उनकी प्रतिक्रिया के लिए जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। उन्हें अच्छे आंकड़ों का हवाला देकर इस समस्या को खारिज करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। देर-सबेर इन विभाजनों को दूर करने के लिए बहुआयामी नीतिगत हस्तक्षेपों की ही जरूरत होगी। जैसे-जैसे एआई आगे बढ़ेगा, संपत्ति की असमानता के भी और तेजी से बढ़ने की आशंका है।
एआई को अपनाने से संकोच करते हुए नौकरियां बचाने की कोशिशें फायदे से ज्यादा नुकसान पहुंचाएगी। इससे महंगे आर्थिक संकट पैदा होंगे और उत्पादकता वृद्धि पर भी बोझ पड़ेगा। ‘गेटेड समृद्धि’ और ‘गेटेड गरीबी’ के बीच की दीवारों को तोड़ने तथा तकनीकी प्रगति से होने वाले लाभ को व्यापक रूप से समाज तक पहुंचाने का अधिक प्रभावी तरीका यह हो सकता है कि सुपर-रिच की संपत्ति, विरासत और आय पर ऊंचे मार्जिनल टैक्स लगाया जाएं। अमेरिका से आ रही खबरों पर ध्यान दें।
ब्यूरो ऑफ लेबर स्टैटिस्टिक्स के ताजा आंकड़े बताते हैं कि जुलाई में अमेरिकी अर्थव्यवस्था से 23,000 नौकरियां चली गईं, लेकिन इसके बावजूद बेरोजगारी दर घटी है। इस विरोधाभास का कारण यह है कि अमेरिका में किसी व्यक्ति को बेरोजगार माने जाने के लिए उसका सक्रिय रूप से नौकरी की तलाश करना जरूरी है। लेकिन आज श्रम बाजार की स्थिति इतनी निराशाजनक हो चुकी है कि लोग नौकरी तलाशना ही छोड़ रहे हैं।
कुछ अनुमानों के अनुसार नवंबर 2025 से अब तक 20 लाख से अधिक लोग अमेरिकी वर्कफोर्स से बाहर हो चुके हैं। यह चौंकाने वाला आर्थिक विभाजन है। एक ओर कामगार नुकसान उठा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर जिनकी आय शेयर बाजार और कॉर्पोरेट मुनाफे पर निर्भर है, उनके लिए तेजी का दौर चल रहा है। नौकरियां जाने और श्रम बाजार की स्थिति बिगड़ने की खबरों के साथ ही अमेरिकी शेयर बाजारों में उलटे तेजी आई है।
Date: 01-09-26
72 सालों में हिमालयी ग्लेसियर के 75% तक खत्म होने की आशंका
जेसन गली, ( दक्षिण फ्लोरिडा यूनिवर्सिटी में विज्ञान के प्रोफेसर )

नेपाल में पिछले बुधवार को हुई त्रासदी का सटीक कारण अब तक सामने नहीं आया है। हालांकि यह स्पष्ट है कि ग्लेशियर का एक विराट टुकड़ा अलग होकर चार हजार फीट नीचे गिरा और भोटेकोशी नदी की एक सहायक नदी से जा मिला। चट्टानों के खिसकने पहाड़ों के धंसने से आई विनाशकारी बाढ़ ने सैकड़ों लोगों को चपेट में ले लिया। ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमालय में बर्फ के पिघलने की गति तेज हो गई है। अगर कार्बन उत्सर्जन यूं ही जारी रहा तो 2100 तक यानी 74 सालों में 75% ग्लेशियर समाप्त हो जाएंगे। इनसे बनने वाली झीलें निचले इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए टाइम बम के समान होंगी। हिमालय में ग्लेशियरों की वजह से कई झीलें बन रही हैं। झीलों के कारण कई बार बाढ़ आ चुकी है। लेकिन इस बाढ़ में कोई ग्लेशियर झील सक्रिय नहीं देखी गई। यह असामान्य घटना है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि बहुत अधिक ऊंचाई से गिरने के कारण बर्फ ही पिघलकर पानी बन गई होगी। हिमालय में तापमान बढ़ने के कारण ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं। जब नेपाल के ग्लेशियर स्वस्थ थे, तो वे पहाड़ों को ढहाते हुए नीचे की ओर बढ़ते थे और सैकड़ों फीट ऊंचे चट्टानी मलबे के ढेरों को ऊपर धकेलते थे। इससे कुछ खास तरह की आकृतियां बनती हैं, जिन्हें ग्लेशियोलॉजिस्ट मोरेन कहते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार ग्लेशियरों के पीछे हटने से चटटानों के मलबे से मोरेन बन जाते हैं। ये मोरेन पिघले पानी को रोक लेते हैं। इससे खतरनाक झीलें बनती हैं। झीलों का गाद मिला गहरा पानी धूप से गर्म होकर आसपास की बर्फ को पिघलाने की गति को बढ़ा देता है।
यह गर्म पानी ग्लेशियरों को अंदर से खोखला कर देता है। इस तरह से बनने वाली सुरंगें ढहती हैं और गहराई बढ़ने से झील को और बड़ा कर देती हैं। धरती के गर्म होने से पूरे हिमालय में भी तापमान बढ़ा है। इससे ग्लेशियर सिकुड़ गए हैं और उन मोरेनों ने पिघले हुए पानी को रोक लिया है। इससे ऐसी झीलों का निर्माण हुआ है, जो बढ़ती रहेंगी जब तक कि वे अपने मूल ग्लेशियर का स्थान न ले लें या किसी अन्य कारण से उनके विनाशकारी रूप से बह जाने का कारण न बन जाए। ग्लेशियर के टूटने से चीन-नेपाल सीमा क्षेत्र में 1900 के बाद से दर्जनों बार बाढ़ आई है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि हिमालय, काराकोरम, पामीर, हिंदू कुश और तियान शान को कवर करने वाले ऊंचे एशियाई पहाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तापमान से 2100 तक बचे हुए ग्लेशियरों का तीन चौथाई हिस्सा समाप्त हो जाएगा।
Date: 01-09-26
बड़ी टेक कंपनियां ईस्ट इंडिया कंपनी जैसा खतरा बन सकती हैं
विलियम डेलरिंपल, ( ईस्ट इंडिया कंपनी के इतिहास पर किताबें लिख चुके हैं )
1756 से 1803 के बीच भारत पर एक निजी कंपनी ईस्ट इंडिया कंपनी ने विजय प्राप्त की थी। वह केवल अपने शेयरधारकों के प्रति जवाबदेह थी। शुरुआत में उसका ध्यान मसाले और कपड़ों के व्यापार पर था। लेकिन बाद में उसने भारत पर कब्जा कर लिया था। रूसी लेखक लियो टॉलस्टॉय ने लिखा था, एक व्यापारिक कंपनी ने 20 करोड़ लोगों के देश को गुलाम बना लिया। ईस्ट इंडिया कंपनी की ताकत की तुलना वर्तमान में बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों से कर सकते हैं। उनके पास अपार आर्थिक साधन हैं। वे सरकारी नीतियों को प्रभावित कर रही हैं। लेकिन इतिहास से सबक लेकर इन पर नियंत्रण करना मुमकिन है।
इतिहास चेतावनी देता है कि जब कोई कॉर्पोरेट घराना राज्य जैसी शक्तियां हासिल कर लेता है, तो वह अपने ही देश की राजनीति, न्यायपालिका और लोकतंत्र को भ्रष्ट करता है। सरकारों के पास इन दिग्गजों को नियंत्रित करने के साधन मौजूद हैं। कमी केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति की है। इस समय बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों ने भी संप्रभु राज्यों जैसे लक्षण अपना लिए हैं। एनवीडिया का बाजार मूल्यांकन 5 ट्रिलियन डॉलर से अधिक है। यह दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था जर्मनी की जीडीपी के बराबर है। एपल का मूल्य ब्रिटेन के वार्षिक उत्पादन और अल्फाबेट का फ्रांस के उत्पादन से अधिक है।
ईस्ट इंडिया कंपनी ने कॉर्पोरेट लॉबिंग का आविष्कार किया था। आज की दिग्गज टेक 1 कंपनियों ने 2025 की पहली छमाही में लॉबिंग 1 पर 36 मिलियन डॉलर खर्च किए है। 1772 में कुप्रबंध और बंगाल के भीषण अकाल के कारण दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी होने के बावजूद कंपनी दिवालिया हो गई। इसके वित्तीय – पतन से यूरोप में बड़ा आर्थिक संकट आ गया। ब्रिटिश संसद ने कंपनी को बचाने के लिए 1773 में 1.4 मिलियन पाउंड का बेलआउट दिया और उसकी बिना बिकी हुई चाय को अमेरिका भेजने के लिए टी एक्ट पारित किया। इस एकतरफा कॉर्पोरेट हितैषी कानून के कारण अमेरिकी उपनिवेशों में आक्रोश फैल गया। इसके बाद हुई घटनाओं के बीच अमेरिका ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी।
टेक कंपनियों के खिलाफ कड़े कदमों की शुरुआत हो गई है। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग अलीबाबा और टेनसेंट जैसी टेक कंपनियों के खिलाफ अब तक का सबसे बड़ा नियामक हमला किया है। अमेरिका में भी बिग टेक के खिलाफ दोनों प्रमुख पार्टियों-रिपब्लिकन, डेमोक्रेटिक के अंदर विरोध बढ़ रहा है। 2026 की पहली तिमाही में स्थानीय विरोध के कारण 130 अरब डॉलर के डेटा सेंटर प्रोजेक्ट रुक गए। हाल ही में मेटा ने 47 राज्यों द्वारा दायर मुकदमे को निपटाने के लिए 17.1 अरब डॉलर का जुर्माना भरने पर सहमति व्यक्त की है।
सप्तधारा बनाएगी विकसित भारत
अनिल बलूनी, ( लेखक लोकसभा सदस्य एवं भाजपा के राष्ट्रीय मीडिया संयोजक हैं )
भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस के ऐतिहासिक अवसर पर लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2047 तक ‘विकसित भारत’ के निर्माण का एक स्पष्ट, पारदर्शी और दूरगामी खाका देश के सामने रखा। स्वतंत्रता दिवस समारोह के इतिहास में पहली बार संपूर्ण ‘वंदे मातरम्’ के गायन के साथ राष्ट्र ने अपनी क्षमताओं को सुदृढ़ करने का नया संकल्प लिया। 2022 के ‘पंच प्रण’ से आगे बढ़ते हुए अब देश ‘सप्तधारा’ (सामर्थ्य की सात धारा) के मार्ग पर आगे बढ़ चुका है, जो भारत की आर्थिक, तकनीकी और रणनीतिक क्षमता को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगा। ‘सप्तधारा’ केवल सरकारी नीतियों का पुलिंदा नहीं है, बल्कि यह 140 करोड़ भारतीयों के सामूहिक सपनों का प्रकटीकरण है। विकास की सप्तधारा के सात प्रमुख स्तंभ नए भारत की नींव रख रहे हैं।
इनमें पहला है विनिर्माण: ‘मेक इन इंडिया’, ‘स्वदेशी’ और ‘वोकल फार लोकल’ के मंत्र ने जमीनी स्तर पर क्रांति ला दी है। 2014-15 में हमारा इलेक्ट्रानिक उत्पादन लगभग 1.9 लाख करोड़ रुपये था, जो 2024-25 में करीब छह गुना बढ़कर 12 लाख करोड़ रुपये हो गया। इसी तरह मोबाइल फोन का उत्पादन 18,000 करोड़ रुपये से 28 गुना बढ़कर 5.45 लाख करोड़ रुपये हो गया है। आज भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल निर्माता देश है। मोबाइल फोन निर्यात में 127 गुना वृद्धि सिद्ध करती है कि भारत अब आयात पर निर्भर नहीं, बल्कि वैश्विक जरूरतों को पूरा करने वाला निर्यातक बन चुका है।
कृषि और खाद्य उत्पादन: हमारे किसान भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। सरकार का लक्ष्य किसानों को वैश्विक निर्यात बाजारों से जोड़ना है। 2013-14 में बागवानी उत्पादन 280.7 मिलियन टन था, जो अब 31 प्रतिशत बढ़कर 367.7 मिलियन टन हो गया है। मत्स्य उत्पादन में 104 प्रतिशत की अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की गई है, जो 96 लाख टन से 195 लाख टन तक पहुंच गई है। कृषि-खाद्य निर्यात में प्रसंस्कृत भोजन की हिस्सेदारी 13.7 से बढ़कर 20.4 प्रतिशत हो गई है। प्रौद्योगिकी और नवाचार: नया भारत नवाचार का भारत है। 2014 से पहले देश में बमुश्किल 350 स्टार्टअप थे, आज 2026 में भारत के पास 2.3 लाख से अधिक मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स की फौज है। यूनिकार्न कंपनियों की संख्या चार से बढ़कर 120 से अधिक हो गई है। अंतरिक्ष के क्षेत्र में स्टार्टअप्स एक से बढ़कर लगभग 440 हो गए हैं। भारत आज दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम है और ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स में 80वें स्थान से छलांग लगाकर 38वें स्थान पर आ गया है। एआइ, 6जी, क्वांटम प्रौद्योगिकी और डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर के जरिये देश के युवाओं को भविष्य के लिए तैयार किया जा रहा है।
गति शक्तिः पीएम गति शक्ति योजना के तहत भारत में मल्टीमाडल कनेक्टिविटी का जाल बिछाया जा रहा है। राष्ट्रीय राजमार्गों की लंबाई 91,287 किमी से 60 प्रतिशत बढ़कर 1,46,000 किमी से अधिक हो गई है। हाई-स्पीड कारिडोर्स का निर्माण 32 गुना बढ़कर 3,052 किमी हो गया है। आज भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सड़क नेटवर्क वाला देश है। रेलवे का लगभग पूर्ण रूप से विद्युतीकरण किया जा चुका है, जो कभी केवल 20 प्रतिशत तक सीमित था। हाइड्रोजन ट्रेन की शुरुआत परिवहन क्षेत्र में स्वच्छ ऊर्जा के युग का शंखनाद है। रक्षा शक्ति: भारत रक्षा उपकरणों का आयातक नहीं, बल्कि निर्यातक बन रहा है। रक्षा उत्पादन में लगभग चार गुना की वृद्धि हुई है और रक्षा निर्यात 56 गुना बढ़कर 38,424 करोड़ रुपये के स्तर को छू चुका है। ‘मिशन सुदर्शन चक्र’ और हाइपरसोनिक रक्षा प्रौद्योगिकियों ने हमारी सेना को अजेय बना दिया है। सशस्त्र माओवाद पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया गया है और देश के ताने-बाने को तोड़ने वाले वैचारिक (अर्बन) नक्सलियों से निपटने के लिए राष्ट्र पूरी तरह सतर्क है।
हरित और नीली अर्थव्यवस्था: भारत आज जलवायु परिवर्तन के खिलाफ वैश्विक लड़ाई का नेतृत्व कर रहा है। हमारी नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता 76.38 गीगावाट से बढ़कर 288.58 गीगावाट हो गई है। सौर ऊर्जा क्षमता में 59 गुना का भारी उछाल आया है। भारत अब स्थापित नवीकरणीय और सौर क्षमता में विश्व में तीसरे स्थान पर है। 2025 के ऐतिहासिक शांति अधिनियम ने परमाणु ऊर्जा के विस्तार का मार्ग प्रशस्त किया है। गैस ग्रिड का विस्तार 70 से 700 शहरों तक हो गया है। नीली अर्थव्यवस्था के तहत मत्स्य पालन 142 प्रतिशत बढ़ा है। इसके साथ ही इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री 1.5 लाख से बढ़कर 25 लाख हो गई है, जो स्वच्छ भारत के संकल्प को पुष्ट करता है। साफ्ट पावर: भारत के सांस्कृतिक मूल्य आज विश्व के लिए मार्गदर्शक बन रहे हैं। यूनेस्को विश्व धरोहर स्थलों की संख्या 31 से बढ़कर 44 हो गई है। ‘अंतरराष्ट्रीय योग दिवस’ आज पूरी दुनिया में मनाया जाता है। ‘हील इन इंडिया’ और आयुर्वेद ने भारत की स्वास्थ्य सेवाओं को वैश्विक मंच पर स्थापित किया है। विदेशी पर्यटकों की आवक में 43 प्रतिशत की शानदार वृद्धि दर्ज की गई है। वेव्स समिट जैसे आयोजनों ने भारत की रचनात्मक और एनिमेशन/गेमिंग अर्थव्यवस्था को एक साफ्ट पावर के रूप में प्रस्तुत किया है।
लोकतंत्र का जीवन
संपादकीय
किसी भी देश में लोकतंत्र की खूबसूरती और मजबूती इस बात पर टिकी है कि वहां नागरिकों को सत्ताधारी दलों, जनप्रतिनिधियों से वाजिब सवाल करने में कोई हिचकिचाहट नहीं होती हो और उन्हें इसका जवाब भी मिलता हो। विडंबना यह है कि कई बार समाज के किसी हिस्से से अगर सत्ता के केंद्रों पर सवाल उठाया जाता है। और वैसी समस्याओं का जिक्र किया जाता है, जिस पर जवाब देना सरकार के लिए असुविधाजनक हो या वह खुद को कठघरे में पाए, तो सवाल पूछने वालों पर अंगुली उठाई जाने लगती है। जबकि अभिव्यक्ति को रोकने की ऐसी कोशिशें आखिरकार लोकतंत्र को कमजोर करने की कवायद साबित होती हैं। शायद यही वजह है कि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश उज्जल भुइयां ने इस तरह की प्रवृत्तियों पर चिंता जताई है। नई दिल्ली के राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने साफ लहजे में कहा कि असहमति व्यक्त करने या सवाल पूछने वाले विद्यार्थियों को सजा या सजा की धमकी देना असंवैधानिक और सत्ता का दुरुपयोग है।
यह छिपा नहीं है कि पिछले कुछ समय से सरकार के किसी रुख से असहमति या अपनी अलग राय जाहिर करने वाले नागरिकों को इस तरह देखने- बताने की कोशिश की जाती है, मानो उन्होंने कोई अपराध कर दिया हो। जबकि भारत के लोकतंत्र का जीवन इसी से समृद्ध हुआ है कि यहां नागरिकों को सरकार और अपने नुमाइंदों से सवाल करने या अपने विचार अभिव्यक्त करने का अधिकार प्राप्त रहा है। खासतौर पर विश्वविद्यालयों को अलग-अलग विचारों के समृद्ध होने के केंद्र के तौर पर देखा जाता रहा है और वहां विद्यार्थी किसी भी मुद्दे का अपने आलोचनात्मक विवेक के साथ परीक्षण करते हैं, सहमति असहमति जाहिर करते हैं। इस तरह लोकतांत्रिक परंपरा को मजबूती मिलती है। अब पिछले कुछ समय से इस तरह के स्वतंत्र विवेक की अभिव्यक्ति को अगर किसी रूप में बगावत के रूप में देखा या बताया जाने लगा है, तो यह अपने आप में लोकतांत्रिक परंपराओं के विरुद्ध है। न्यायाधीश भुइयां ने इस प्रवृत्ति पर भी चिंता व्यक्त करते हुए साफ तौर पर कहा कि विश्वविद्यालय को ऐसी जगह होना चाहिए, जहां स्थापित विचारों की जांच की जा सके और उन पर प्रश्न उठाए जा सकें सवाल पूछने का अधिकार बगावत या अवज्ञा का कृत्य नहीं है और असहिष्णु मानसिकता देश के संविधान के उलट है।
निश्चित तौर पर जस्टिस भुइयां ने ऐसे समय में एक जरूरी हस्तक्षेप किया है, जब सहिष्णुता और स्वतंत्र अभिव्यक्ति की जगह सिकुड़ती जा रही है। ऐसे अनेक मामले सामने आ चुके हैं, जिसमें विद्यार्थी या युवा अगर सरकार की किसी नीति पर सवाल उठाते हैं और अभिव्यक्ति के संवैधानिक अधिकार के तहत असहमति जाहिर करते हैं, तो उन्हें दुश्मन की तरह देखा जाने लगता है, उनकी आवाज को दबाने के प्रयास होते हैं। अपने से असहमति रखने वालों के प्रति असहिष्णुता का रुख अपने आप में हिंसा का ही एक रूप है। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि हमारा संविधान आवाज उठाने, खुद को अभिव्यक्त करने और अलग तरह के विचार रखने की आजादी की रक्षा करता है। अभिव्यक्ति को बाधित करने वाले शायद भूल जाते हैं कि उनकी हरकतों से देश का लोकतंत्र कमजोर होगा और अगर ऐसा हुआ, तो लंबे समय में इसका खमियाजा सभी नागरिकों को भुगतना पड़ेगा।
शंघाई सहयोग जरूरी
संपादकीय
किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में आयोजित हो रहा शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन मौजूदा समय के हिसाब से बहुत महत्वपूर्ण है। एससीओ की वह 25वीं वर्षगांठ और 26वां सम्मेलन पूरी दुनिया का ध्यान खींच रहा है। इस संगठन में शामिल 10 महत्वपूर्ण देशों के नेताओं के सम्मेलन से कुछ बड़ी उम्मीदें हैं। सम्मेलन में रूस, चीन, भारत, ईरान और पाकिस्तान जैसे देशों का साथ मायने रखता है। इसके अलावा बेलारूस, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान इस संगठन में शामिल हैं। एकाध अपवाद को छोड़ दें, तो ये देश आपसी रणनीतिक गठजोड़ को मजबूत करना चाहते हैं। वैसे, इस सम्मेलन में भारत के तीन महत्वपूर्ण लक्ष्य हैं भारत की सुरक्षा, कनेक्टिविटी और अवसर संबंधी प्राथमिकताओं पर प्रकाश डालना। एससीओ जब बना था, तब बड़ी उम्मीद थी कि यह संगठन तरक्की के साथ ही अमन-चैन की राह दुरुस्त करेगा। अफसोस, चीन और पाकिस्तान की कूटनीति अगर भारत की आशा के अनुरूप होती, तो एससीओ एक अलग ही ऊंचाई पर होता। यहां यह मानने में हर्ज नहीं कि यह संगठन रूस की वजह से चल रहा है। उसी की वजह से इसके साथ भारत जुड़ा हुआ है। भारत की उम्मीदें भले पूरी न हो पाएं, लेकिन वह इस संगठन का साथ देता रहा है।
बहरहाल, सम्मेलन के साथ-साथ वहां चल रही नेताओं की परस्पर बैठकें भी खास मानी जा रही हैं। सबसे ज्यादा चर्चा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मुलाकात की होगी, लेकिन भारतीय प्रधानमंत्री का ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन से मिलना कई देशों को नागवार गुजर सकता है। ध्यान रहे, अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान ईरान के साथ भारत के आर्थिक एवं रणनीतिक संबंधों का कड़ा विरोध करता आया है।
अमेरिका ने हाल ही में ईरानी पेट्रोलियम और पेट्रो-केमिकल आयात में सहायता करने के लिए कई भारतीय कंपनियों और नागरिकों पर प्रतिबंध लगाए हैं। ईरानी तेल के आयात के चलते अमेरिका ने अनेक भारतीय कंपनियों पर जुर्माना लगाया है। और तो और, अमेरिकी विदेश मंत्री माकों रुबियो सहित उच्च पदस्थ अमेरिकी अधिकारियों ने भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर को चेतावनी दे रखी है कि अमेरिका ईरानी ऊर्जा आपूर्ति के अवैध परिवहन को बर्दाश्त नहीं करेगा। वाशिंगटन नई दिल्ली पर ईरान में क्षेत्रीय गतिविधियों को कम करने के लिए लगातार दबाव डाल रहा है। अमेरिकी नाराजगी के बावजूद भारतीय प्रधानमंत्री का ईरानी राष्ट्रपति से मिलना भारत की स्वतंत्र कूटनीति का प्रमाण है। कोई दोराय नहीं, भारत युद्ध नहीं चाहता और वह अमेरिका के साथ ही ईरान को जंग रोकने के लिए कहता रहा है। एससीओ सम्मेलन का एक मुख्य मकसद बुद्ध विराम का प्रयास भी हो सकता है। अंततः अमेरिका और ईरान को पीछे हटना पड़ेगा। कोई भी युद्ध अनंतकाल तक नहीं चल सकता। एससीओ के सदस्यों में रूस भी एक युद्ध में शामिल है, उसे भी यूक्रेन के साथ चल रहे युद्ध को रोकने के प्रयास करने चाहिए। इस दिशा में चीन को भी सक्रिय होना चाहिए। एससीओ की स्थापना 2001 में चीन, रूस और चार मध्य एशियाई देशों द्वारा एक सुरक्षा मंच के रूप में की गई थी। क्या यह मंच सभी सदस्य देशों को सुरक्षा का एहसास करा पाया है? क्या आतंकवाद को रोकने में इसे कामयाबी मिली है? ध्यान रहे, किसी भी संगठन को साझा हित से ही चलाया जा सकता है। भारत को इसी दिशा में प्रयास करने चाहिए।