01-04-2025 (Important News Clippings)

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01 Apr 2025
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Date: 01-04-25

No to regression

Disenchantment with Nepal’s political parties is exploited by reactionaries

Editorial

The violent protests in Kathmandu on Friday, which left two dead, dozens injured and saw arson and looting, were spearheaded by fringe political forces such as the royalist Rastriya Prajatantra Party. Though long relegated to the political margins, the royalist camp has managed to seize upon growing disillusionment with the political establishment. The series of pro-monarchist rallies and demonstrations have been drawing crowds across Kathmandu and other cities, signalling an undercurrent of dissatisfaction with the republic, which is surprising and concerning. Nearly two decades ago, Nepal made a decisive break from monarchy, an institution that had shaped its identity for over 240 years. This was neither a moment of spontaneous outrage nor a casual shift, but the culmination of years of discontent. The turning point came with the royal massacre at Narayanhiti Palace in June 2001, which irreparably damaged the monarchy’s image. When Gyanendra Shah ascended the throne after his brother’s death, he attempted to reassert absolute authority and return Nepal to the pre-1990 political order. His power grab and crackdown on democratic forces triggered a backlash. The tide turned definitively when Maoist rebels abandoned an armed struggle to join the mainstream democratic process. Their integration, along with the withdrawal of international support — particularly Indian — for the monarchy, sealed the institution’s fate. A democratically elected Constituent Assembly (CA) was formed, and in 2008, passed a near-unanimous resolution declaring Nepal to be a federal democratic republic. Despite the political volatility which included two iterations of the CA before the Constitution was promulgated in 2015, Nepal has remained a constitutional republic. Since 2008, power has primarily alternated among the Nepali Congress, which has led the fight for democracy since the fall of the Rana regime; the Communist Party of Nepal (Unified Marxist-Leninist), the largest of the leftist parties; and the former Maoist rebels. However, chronic instability, opportunistic alliances, poor governance, and self-serving leadership have plagued the system. The hopes of the CA for inclusive development and justice have largely gone unfulfilled.

Even so, most Nepalis remain acutely aware of the authoritarianism and injustices that characterised the monarchist era. The recent surge in pro-monarchy sentiment is a regressive response to democratic disillusionment. The government must move swiftly to hold accountable those responsible for the recent violence, including any role played by Mr. Shah. At the same time, the ruling party and the opposition must rise to the occasion, restoring public faith by demonstrating the strength, responsiveness, and integrity of parliamentary democracy. That is the surest antidote to calls for a return to monarchy.


Date: 01-04-25

क्या देश एआई की नई दौड़ के लिए तैयार है?

संपादकीय

कुछ माह पहले जब खबर मिली कि देश की टेक-सेवा निर्यात ने मैन्युफैक्चरिंग निर्यात को पार कर लिया है तो लगा कि भारत तकनीकी की इस रेस में गति पकड़ रहा है। आंकड़े गवाह थे कि पिछले 11 वर्षों में भारत से टेक-सेवा निर्यात विश्व के कुल ऐसे निर्यात का 3 की जगह 4.5% प्रतिशत हो गया, जबकि वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग निर्यात में शेयर 1.75% पर आज भी अटका है। लेकिन हाल के दो तथ्यों ने चौंका दिया। आईआईटी के छात्र को नौकरी का प्रतिशत घटता जा रहा है यानी वे उद्योगों की नई जरूरतों के अनुरूप ज्ञान नहीं हासिल कर रहे हैं। अगर टेक्नोलोजी की तेज दौड़ में बने रहना है तो तकनीकी ज्ञान का स्तर तेजी से बदलें। इसके लिए न केवल यूजीसी या अफसरशाही का शिकंजा ढीला करना पड़ेगा, बल्कि विश्व उद्योग की जरूरतों के अनुरूप ज्ञान देना होगा। वह दौर गया जब मात्र कोडिंग और वेलिडेशन के सहारे भारत टेक-सेवा की दुनिया में उद्योगों की जरूरत अपेक्षाकृत सस्ते में पूरा कर रहा था और बेंगलुरु के ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (जीसीसी) भारतीय इंजीनियरों को नौकरी दे रहे थे। अब कोडिंग के सारे पहलू, डी- बगिंग, अल्गोरिदम लिखना और कानूनी दस्तावेज चेक करना ही नहीं, वित्तीय सलाह देना भी एआई करेगा, जो ज्यादा तेज और अधिक एक्यूरेसी ( सटीकता ) के साथ होगी। ऐसे में क्या हमारा देश एआई की नई दौड़ के लिए तैयार है ?


Date: 01-04-25

कानून के राज को बहाल करना सत्ता की जिम्मेदारी

पवन के. वर्मा, ( पूर्व राज्यसभा सांसद व राजनयिक )

संविधान की सर्वोच्चता और सर्वोच्च न्यायालय की महत्ता तब बहुत कम मायने रखने लगती है, जब शक्ति-प्रदर्शन ही सत्ता की प्रणाली हो और कानून के राज को एक वैकल्पिक व्यवस्था के रूप में देखा जाने लगे। जिस तरह से राजनेता और राजनीतिक दल संविधान में निहित सिद्धांतों और सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों की अवहेलना कर रहे हैं, उससे देश के लोकतांत्रिक ताने-बाने के सामने सवालिया निशान लगने लगे हैं।

बुलडोजर-न्याय इसी का प्रतीक है। इसका उद्देश्य तो स्पष्ट है : भय पैदा करने और अपना प्रभुत्व कायम करने के लिए राज्य की शक्ति का अवैध रूप से उपयोग करना। इसके निशाने पर अमूमन गरीब, अल्पसंख्यक और असहमत लोग होते हैं।

चाहे महाराष्ट्र या यूपी हो, या एमपी या दिल्ली- बुलडोजर से किए जाने वाले ज्यादातर विध्वंस बिना उचित प्रक्रिया के, बिना नोटिस दिए और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किए बिना होते हैं। इसमें निष्पक्ष सुनवाई का अवसर और दोषी सिद्ध होने तक किसी को निर्दोष मानने का सिद्धांत भी शामिल है, जो हमारी न्याय-व्यवस्था का आधार है।

औरंगजेब पर नागपुर में भड़की साम्प्रदायिक हिंसा के बाद म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन के बुलडोजर भी हरकत में आ गए, भले ही बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस पर रोक लगाई थी। प्रशासन ने दावा किया कि वह दंगा भड़काने के आरोपियों पर कानून का शासन लागू कर रहा था। जबकि यह बुलडोजर-न्याय का एक और उदाहरण था।

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रयागराज में नोटिस के 24 घंटे के भीतर की गई तोड़फोड़ ने ‘हमारी अंतरात्मा को झकझोर दिया।’ वीडियो फुटेज में एक स्कूली छात्रा को विध्वंस से अपनी किताबें बचाते देखा गया था। सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी कई टिप्पणियों और फैसलों में लक्ष्मण-रेखा खींचने के प्रयास किए हैं।

दिल्ली नगर निगम बनाम उमर खालिद और अन्य (2023) मामले में न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि तोड़फोड़ को प्रतिशोध के साधन के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति बी.आर. गवई ने जोर देते हुए कहा कि उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना घरों को ध्वस्त करने के लिए बुलडोजर का उपयोग न केवल असंवैधानिक, बल्कि असभ्यतापूर्ण भी है।

न्यायालय ने दोहराया कि भले ही निर्माण अवैध हों, उन पर कार्रवाई करते समय उचित प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए। लोगों को बेघर करने से पहले नोटिस दिया जाना चाहिए, सुनवाई की जानी चाहिए और वैकल्पिक व्यवस्था पर विचार किया जाना चाहिए।

बेंच ने कुछ समूहों को टारगेट करने के लिए कानूनों काे हथियार की तरह इस्तेमाल करने के खिलाफ भी चेताया और इसे संविधान के अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) और 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन बताया।

जब राज्यसत्ता किसी दंड के भय से मुक्त होकर गैरकानूनी और प्रतिशोधात्मक तरीके अख्तियार करती है, तो इससे राजनीतिक कार्यकर्ताओं को भी कानून को हाथ में लेने की प्रेरणा मिलती है। हाल ही में मुंबई में शिंदे गुट के शिवसैनिकों ने स्टैंड-अप कॉमेडियन कुणाल कामरा के खिलाफ उत्पात मचाया और जिस स्टूडियो में उन्होंने अपना कार्यक्रम रिकॉर्ड किया था, उसमें तोड़फोड़ की।

हालांकि बाद में कुछ अपराधियों के खिलाफ मामले दर्ज किए गए, लेकिन भीड़ से जो छूट गया था, उसे राज्य सरकार के बुलडोजरों ने पूरा कर दिया। लगता है हमारे राजनेताओं ने कानूनसम्मत आचरण के साथ-साथ सेंस ऑफ ह्यूमर भी खो दिया है।

यह दु:खद है, क्योंकि आलोचना, असहमति और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संविधान द्वारा गारंटीशुदा हैं। जो राज्यसत्ता के दबंगईपूर्ण तौर-तरीकों का समर्थन करते हैं, उन्हें समझना चाहिए कि अनियंत्रित राज्यसत्ता किसी को भी अपना अगला शिकार बना सकती है- उन्हें भी। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होगी।

सुप्रीम कोर्ट को उन लोगों के खिलाफ तत्काल कार्रवाई करनी चाहिए, जिन्होंने उसके स्पष्ट निर्देशों का मखौल उड़ाया है। साथ ही उन्हें न्यायालय की अवमानना​ के लिए दोषी ठहराया जाना चाहिए। जब ​​तक कि अदालत के आदेश और संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन करने वालों को कठोर सजा नहीं दी जाती, तब तक सत्ता के दुरुपयोग का दौर जारी रहेगा।

बुलडोजर एक मशीन है; उसका अपना कोई विवेक नहीं होता। लेकिन उसे चलाने वालों के पास जरूर अपना विवेक होना चाहिए। भारत का संविधान कमजोरों को ताकतवरों के अत्याचार से बचाने के लिए बनाया गया था। अगर सरकार खुद ही उत्पीड़न का साधन बन जाए, तो लोकतंत्र की आत्मा कैसे बच सकेगी?

बुलडोजर एक मशीन है; उसका अपना कोई विवेक नहीं होता। लेकिन उसे चलाने वालों के पास जरूर अपना विवेक होना चाहिए। भारत का संविधान कमजोरों को ताकतवरों के अत्याचार से बचाने के लिए ही बनाया गया था।


Date: 01-04-25

नौकरशाही का भ्रष्टाचार

संपादकीय

कार्मिक, लोक शिकायत, कानून एवं न्याय संबंधी संसदीय समिति ने बीते वर्ष 91 आईएएस अधिकारियों की ओर से अचल संपत्ति का विवरण न दिए जाने का उल्लेख करते हुए यह जो कहा कि ऐसे अफसरों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जाए, उससे कुछ हासिल होने वाला नहीं है। इसमें संदेह है कि ऐसे किसी प्रविधान से आईएएस अफसर भय खाएंगे।

यदि ऐसा कोई प्रविधान बन भी जाता है तो ये अफसर उसमें आसानी से छिद्र तलाश लेंगे। बहुत संभव है कि शीर्ष नौकरशाह प्रविधान ही ऐसे तैयार कराएं, जिससे अपनी संपत्ति का विवरण न देने वाले आईएएस अफसरों के खिलाफ ठोस कार्रवाई संभव न हो सके। आखिर यह एक तथ्य है कि नियम-कानून बनाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

इसी का लाभ उठाकर वह ऐसी व्यवस्था नहीं बनने दे रहे हैं, जिससे उन्हें जवाबदेह बनाया जा सके अथवा उन्हें उनके भ्रष्टाचार से रोका जा सके या फिर उन्हें इसके लिए दंडित किया जा सके। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार का एक कारण नौकरशाहों का रवैया है। यदि वे चाह लें तो प्रशासनिक और राजनीतिक भ्रष्टाचार पर प्रभावी ढंग से अंकुश लग सकता है।

ध्यान रहे कि यदि नेता भ्रष्टाचार करने में समर्थ रहते हैं तो नौकरशाहों की मदद से ही। नौकरशाह न केवल नेताओं के भ्रष्टाचार में मददगार बनते हैं, बल्कि ऐसे जतन भी करते हैं, जिससे खुद उनके भ्रष्ट तौर-तरीकों का पर्दाफाश न हो सके। यही कारण है कि रह-रहकर ऐसे भ्रष्ट नौकरशाहों का मामला सामने आता रहता है, जिनके पास अकूत चल-अचल संपत्ति होने का पता चलता है।

यदि यह सोचा जा रहा है कि नौकरशाहों की ओर से अपनी संपत्ति का विवरण सार्वजनिक करने से उनके भ्रष्टाचार पर अंकुश लग जाएगा तो यह एक दिवास्वप्न ही है। अच्छा हो कि इससे आगे कुछ सोचा जाए। सबसे पहला काम तो प्रशासनिक सुधार का किया जाना चाहिए।

यह निराशाजनक है कि भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के तमाम दावों के बाद भी मोदी सरकार प्रशासनिक सुधारों को इस तरह आगे नहीं बढ़ा सकी है, जिससे नौकरशाही के भ्रष्टाचार पर रोक लग सके। समस्या केवल यह नहीं है कि आईएएस अफसरों के भ्रष्टाचार के मामले थमने का नाम नहीं ले रहे हैं।

समस्या यह भी है कि अन्य सरकारी अधिकारियों और यहां तक कि कर्मचारियों के भ्रष्टाचार के किस्से खत्म होने का नाम नहीं ले रहे हैं। इससे संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि केंद्र सरकार की शीर्ष नौकरशाही के भ्रष्टाचार पर एक बड़ी हद तक लगाम लगी है, क्योंकि निचले स्तर पर पहले की ही तरह भ्रष्टाचार व्याप्त है।

इस भ्रष्टाचार के चलते न केवल विकास एवं जनकल्याण की योजनाएं प्रभावित होती हैं, बल्कि आम लोगों को सरकारी विभागों से अपने छोटे-मोटे काम कराने में भी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।


Date: 01-04-25

अमेरिका के शुल्क और भारत पर असर

रजनी सिन्हा और मिहिर एस शर्मा, ( रजनी सिन्हा केयरएज रेटिंग में मुख्य अर्थशास्त्री और मिहिका शर्मा अर्थशास्त्री हैं )

अमेरिका ने वैश्विक व्यापार नीति पर मंडरा रही अनिश्चितता को शुल्कों पर रोज नई घोषणाएं कर और भी बढ़ा दिया है। वहां डॉनल्ड ट्रंप की अगुआई वाली सरकार ने अब वाहनों और उनके कुछ पुर्जों के आयात पर अलग से 25 फीसदी शुल्क लगाने का ऐलान कर दिया है। उससे पहले अमेरिका ने कनाडा और मेक्सिको से आयात पर 25 फीसदी, चीन से आयात पर 20 फीसदी और एल्युमीनियम तथा स्टील आयात पर 25 फीसदी शुल्क अलग से लगाने की घोषणा की थी। दूसरे देशों ने भी जवाबी शुल्क का ऐलान किया है, जिसके कारण शुरू हुए व्यापार युद्ध ने दुनिया भर में वृद्धि तथा महंगाई पर गंभीर चिंता उत्पन्न कर दी हैं। चिंता की वजह से भारत समेत पूरी दुनिया के वित्तीय बाजारों में बहुत उठापटक हुई है।

भारत को 2 अप्रैल से जवाबी शुल्क लगाने की अमेरिकी धमकी खास तौर पर चिंतित कर गई है। अमेरिका के साथ भारत का वस्तु व्यापार अधिशेष पिछले एक दशक में दोगुना होकर 2023-24 में 35 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। द्विपक्षीय व्यापार में कोई देश दूसरे देश से आयात की तुलना में उसे जितना अधिक निर्यात करता है वही व्यापार अधिशेष कहलाता है। अमेरिका को भारत से होने वाले निर्यात में रत्नाभूषण, रसायन, इलेक्ट्रॉनिक्स और कपड़ों की सबसे बड़ी हिस्सेदारी है। अमेरिका से आयातित माल पर भारत औसतन 11 फीसदी शुल्क वसूलता है, जबकि भारतीय आयात पर अमेरिका औसतन 3 फीसदी शुल्क ही लेता है। अगर अमेरिका भारत से समूचे आयात पर 8 फीसदी बराबरी का शुल्क और लगा देता है तो हमारे विश्लेषण के मुताबिक भारत को निर्यात में सालाना लगभग 3.1 अरब डॉलर की ही चोट लगेगी। यह भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 0.1 फीसदी ही होगा। विश्लेषण में माना गया है कि रुपया कुछ कमजोर होगा, जिससे ऊंचे शुल्क का असर कुछ हद तक कम हो जाएगा। असर इस बात पर निर्भर करेगा कि बराबरी का शुल्क किस तरह का होता है और यह अभी स्पष्ट नहीं है।

अन्य देशों के साथ भारत का व्यापार कुछ कम है। देश से जीडीपी के 21 फीसदी के बराबर वस्तु एवं सेवा निर्यात होता है, जिसमें वस्तु निर्यात की हिस्सेदारी 2023-24 में 12 फीसदी रही थी। थाईलैंड जैसी कुछ अन्य एशियाई अर्थव्यवस्थाओं से वस्तु एवं सेवा निर्यात उनके जीडीपी के 60 फीसदी के आसपास है। व्यापार कम होने के बाद भी शुल्क की जंग (टैरिफ वॉर) कई प्रत्यक्ष और परोक्ष तरीकों से भारत पर असर डालेगी। विश्व व्यापार धीमा पड़ा तो भारत के कुल निर्यात में कमी आ सकती है और चीन भी अपना सस्ता सामान भारत में पाट सकता है क्योंकि अमेरिका उस पर ज्यादा शुल्क थोप रहा है। ऐसी अनिश्चितताओं के बीच भारत में निवेश का हौसला भी कम हो सकता है। साथ ही पूंजी की आवक घट सकती है और रुपया गिर सकता है, जो हमें पिछले कुछ महीनों में नजर भी आया है। इसीलिए भारत पर शुल्कों का जो प्रभाव दिख रहा है, असली असर उससे ज्यादा हो सकता है।

इन अनिश्चितताओं के कारण भारत और पूरी दुनिया में पूंजी बाजार चढ़ते-गिरते रहेंगे। पिछले साल अक्टूबर से इस साल फरवरी के बीच 4.4 फीसदी टूटने के बाद पिछले 30 दिन में रुपया कुछ मजबूत हुआ है। हमारा अनुमान है कि रुपया कमजोर ही रहेगा और वित्त वर्ष 2025-26 के अंत में उसकी कीमत 88-89 प्रति डॉलर रह सकती है। जीडीपी की तुलना में चालू खाते के घाटे का अनुपात भी बढ़ सकता है। लेकिन हमारे हिसाब से यह 2025-26 में जीडीपी का 1.1 फीसदी रहेगा, जो 2024-25 में 0.7 फीसदी रहने का अनुमान है। पिछले कुछ सालों में इसे तगड़े सेवा निर्यात से सहारा मिलता आया है।

वित्त वर्ष 24-25 पूंजी की आवक के लिहाज से अच्छा नहीं रहा है। इस दौरान 28 मार्च तक केवल 2.7 अरब डॉलर का शुद्ध विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (एफपीआई) आया, जो 2023-24 के 41 अरब डॉलर से बहुत कम है। इस वित्त वर्ष के पहले दस महीनों में शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) भी केवल 1.4 अरब डॉलर रहा, जो पिछले वित्त वर्ष के पहले 10 महीनों से 88 फीसदी कम था। एफडीआई और एफपीआई की आवक नए वित्त वर्ष में भी कमजोर रह सकती है, जिससे भारत के भुगतान संतुलन और रुपये पर दबाव होगा। रुपये में थोड़ी कमजोरी भारतीय रिजर्व बैंक को सही लग सकती है क्योंकि इससे शुल्क की चोट कुछ कम होगी। हो सकता है कि अमेरिकी शुल्कों से निपटने के लिए युआन लुढ़क जाए और उससे भी रुपये में गिरावट आएगी। पिछले व्यापार युद्ध के दौरान चीनी माल पर अमेरिका का औसत शुल्क 2018 के 3 फीसदी से उछलकर 2019 में 21 फीसदी हो गया था। उस दौरान युआन 10-12 फीसदी लुढ़का था, जिसकी मार रुपये पर भी पड़ी थी।

चिंता यह भी है कि वैश्विक व्यापार युद्ध के कारण भारत में महंगाई न आ जाए। किंतु देश के मुद्रास्फीति दर घटने के कारण रिजर्व बैंक शायद वृद्धि को सहारा देने पर ही ध्यान लगाएगा। लगता है कि रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति अप्रैल की बैठक में नीतिगत दरें 25 आधार अंक और कम कर सकती है। दरें इससे ज्यादा घट सकती हैं मगर यह मॉनसून की स्थिति तथा देश के भीतर महंगाई पर निर्भर करेगा। अगर अमेरिकी फेडरल रिजर्व 2025 में नीतिगत दर घटाता रहा तो रुपये पर दबाव कम हो सकता है, जिससे रिजर्व बैंक को दर कटौती का और भी मौका मिल सकता है।

भारत फिलहाल अमेरिका के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर बात कर रहा है और उसकी शर्तें भविष्य के लिए बहुत अहम रहेंगी। वैश्विक उथल-पुथल में भी फायदे की बात यह है कि वृद्धि बरकरार रखने के लिए भारत को कुछ सुधारों पर तेजी से काम करना ही पड़ेगा। शुल्क घटाने का भारत का कदम भविष्य में बहुत फायदा देगा मगर सरकार को सुधारों में तेजी लानी होगी ताकि देसी विनिर्माता सबसे होड़ करने के लायक बनें। दूसरी जरूरी बात है देश के भीतर खपत तेज करना क्योंकि वैश्विक मांग कुछ समय तक डांवाडोल ही रहेगी।


Date: 01-04-25

तैनाती और भ्रष्टाचार

संपादकीय

नौकरशाही को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त करने की सिफारिशें लंबे समय से की जाती रही हैं। मगर इस दिशा में किसी भी सरकार ने गंभीरता से पहल नहीं की। यह परिपाटी-सी बन गई है कि जब भी सरकार बदलती और कोई दूसरा दल सत्ता की कमान संभालता है, तो बड़े पैमाने पर अधिकारियों के तबादले किए जाते हैं। हर राजनीतिक दल सत्ता संभालने के साथ ही अपने करीबी और भरोसेमंद अधिकारियों को जिम्मेदार पदों पर पदस्थ करता और उन्हें लंबे समय तक वहां बनाए रखने का प्रयास करता है। अब संसद की एक स्थायी समिति ने कहा है कि अधिकारियों को लंबे अरसे तक एक ही जगह पदस्थ किए रखने से भ्रष्टाचार बढ़ता है। कार्मिक, लोक शिकायत, विधि एवं न्याय विभाग से संबंधित संसद की स्थायी समिति ने कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग से संबंधित चालू वर्ष की अनुदान मांगों पर अपनी रपट पेश करते हुए कहा कि अधिकारियों की बारी-बारी से स्थानांतरण की प्रचलित नीति लागू की जानी चाहिए। संसदीय समिति ने अपनी जांच में पाया कि कुछ अधिकारी आठ-नौ वर्षों से एक ही मंत्रालय में जमे हुए हैं। कुछ अधिकारियों ने अपनी तैनाती में कुछ इस तरह चतुराई दिखाई है कि उनका पूरा कार्यकाल एक ही मंत्रालय में बीता है। करीब पंद्रह वर्ष पूर्व जब अधिकारियों की थोड़े- थोड़े समय पर तबादलों की बढ़ती प्रवृत्ति पर अंगुलियां उठनी शुरू हुई थीं, तब प्रशासनिक आयोग ने सिफारिश की थी कि किसी भी अधिकारी का तबादला तीन वर्ष से कम समय में न किया जाए, ताकि वे एक स्थान पर रह कर कुछ बेहतर काम कर सकें। मगर अब इसके उलट प्रवृत्ति विकसित हुई देखी जा रही है, तो यह भी चिंता का विषय है। निस्संदेह कुछ अधिकारी ईमानदारी और संजीदगी से काम करते हैं और उनका एक जगह लंबे समय तक बने रहना लाभदायक साबित होता है। मगर संसदीय समिति की इस बात को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता कि एक ही जगह लंबे समय तक बने रहने वाले अधिकारी अनियमितताओं में लिप्त हो जाते हैं। अगर बारी-बारी से अधिकारियों के तबादले की नीति रही है, तो उसका पालन करने में सरकारों को क्यों गुरेज होना चाहिए।


Date: 01-04-25

सौहार्द की चिंता

संपादकीय

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का यह कथन स्वागतयोग्य है कि हम औरंगजेब को पसंद करें या न करें, उसकी कब्र एक संरक्षित स्मारक है। यह टिप्पणी इस आश्वासन का संकेत है कि मुगल बादशाह की कब्र को हटाया नहीं जाएगा। पिछले दिनों से महाराष्ट्र में इस कब्र को लेकर जो विवाद की स्थिति दिख रही है, जिस तरह का तनाव नागपुर में देखा गया है, उससे वाकई चिंता होती है। औरंगजेब को लेकर भारतीय समाज में विभाजन कोई नया नहीं है। इस मुगल बादशाह की नीतियों से न तो सारे अल्पसंख्यक इत्तेफाक रखते हैं और न सारे बहुसंख्यक उससे नफरत करते हैं। अतः यहां समझदारी की जरूरत है। पहले के समाज में या मध्ययुग के समाज में सत्ता के स्तर पर भयानक हिंसा होती थी, राजा हों या बादशाह, सभी के खिलाफ मनमानी थोपने बा मानवाधिकार हनन के मामले मिल जाते हैं। औरंगजेब के खिलाफ भी न सिर्फ शिकायत, बल्कि रोष का भाव भारत में नया नहीं है। बेशक, आज आजाद और लोकतांत्रिक भारत में मध्ययुग का कोई बादशाह आदर्श नहीं हो सकता और न यह कहा जा सकता है कि हर बादशाह ने तमाम मजहबी पैमानों पर मुकम्मल रहते हुए हुकूमत किया।

दरअसल, इतिहास भावनाओं में बहने का विषय नहीं, बल्कि समझदारी की मांग करने वाला विषय है। यह भी एक समझदारी है कि किसी भी विषय पर जरूरत से ज्यादा हठ न किया जाए और बहुमत के तर्क को भी देखा जाए। अगर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने यह स्पष्ट कर दिया है कि हम किसी को भी औरंगजेब का महिमामंडन करने की अनुमति नहीं देंगे, तो चौंकना नहीं चाहिए। छत्रपति संभाजीनगर जिले खुल्ताबाद शहर में स्थित करीब तीन सौ साल पुरानी कब्र को सहेजने में कोई हर्ज नहीं है। कोई बादशाह भले ही महिमामंडन लायक न हो, पर उसके स्मारक को सहेजने और उससे सबक लेने में बुराई नहीं है। ध्यान रहे, राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने भी अकबर को अमृत समान और औरंगजेब को हलाहल समान माना था। सद्भाव और कट्टरता के परस्पर संघर्ष का यह विवरण दिनकर की पुस्तक संस्कृति के चार अध्याय में विस्तार से मिलता है और खास यह कि इस पुस्तक की भूमिका पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लिखी थी । अतः औरंगजेब का विरोध पुराना है, पर पुरानी पीढ़ियों ने भी कब्र के साथ कुछ गलत नहीं किया और हमें भी इसी समन्वयी परंपरा के अधीन चलना चाहिए।

किसी की आस्था को ध्वस्त करने की कुप्रथा कतई उस भारत की नहीं है, जिस पर हम गर्व करते हैं। पीछे पलट-पलटकर देखने के बजाय हमें आगे बढ़ना चाहिए। आज जो भी लोग हलाहल की पैरोकारी करेंगे, उनकी भावी पीढ़ियां आर्थिक-सामाजिक रूप से पिछड़कर पछताएंगी। अरब दुनिया में ही अगर हम झांककर देखें, तो जो देश मध्ययुगीन बर्बरता की ओर लौट गए, वे आज अमन-चैन की तलाश में परेशान हैं। दूसरी ओर, बर्बरता छोड़कर आगे बढ़ रहा संयुक्त अरब अमीरात आज दुनिया में हर लिहाज से आदर्श देश बनकर उभर रहा है। दुनिया में सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी वाला इंडोनेशिया भी सद्भाव की एक बेहतर मिसाल है, अपने इतिहास के प्रति उसकी समझदारी उसे नफरत की आंधियों से बचाए हुए है। भारत को भी नफरती अभियानों से बचना है। ऐसे में, शैक्षणिक- सामाजिक-आर्थिक रूप से हमारी तेज तरक्की ही हमें फिजूल के मुद्दों से बचा सकती है और तभी हम विकसित राष्ट्र के सपने को जल्दी साकार कर सकते हैं।


Date: 01-04-25

जाति गणना से जागने लगीं जातियां

एस. श्रीनिवासन

बिहार और तेलंगाना के बाद अब कर्नाटक जाति सर्वेक्षण के नतीजों से जूझ रहा है। राज्य में पिछड़ा वर्ग आयोग ने राज्य सरकार को एक रिपोर्ट सौंपी है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने अभी तक सर्वेक्षण के निष्कर्षो का खुलासा तो नहीं किया है, पर ‘लीक’ हुई रिपोर्ट की सामग्री राज्य में सियासी तूफान पैदा करने लगी है।

खास बात है कि जातिगत आंकड़ों की चर्चा के बाद सिर्फ प्रभावशाली या अब तक दबंग रही जातियां ही रिपोर्ट का रोना नहीं रो रही हैं, अन्य जातियों की भी अपनी चिंताएं हैं। यह तो साफ हो चुका है कि कथित अगड़ी या प्रभावशाली जातियों के लोग अब संख्याबल में हारते दिख रहे हैं। दलित समुदाय में भी तीखे मतभेद हैं, क्योंकि वे अपने समग्र कोटे के अंदर खुद को मिल रहे आंतरिक आवंटन को लेकर लड़ने लगे हैं। एक ही वर्ग या स्तर की जातियों के बीच ज्यादा लाभ के लिए संघर्ष की स्थिति बढ़ने लगी है। खास बात यह भी कि कर्नाटक में एक अलग समिति ने भी मुख्यमंत्री को अपनी सिफारिशें सौंपी हैं।

गौर करने की बात है कि आजादी के बाद से कर्नाटक में शासक वर्ग पर दो प्रमुख जातियों लिंगायत और वोक्कालिगा का नियंत्रण रहा है। आशंका है कि अगर सर्वेक्षण उजागर हो जाए, तो दोनों जातियां सत्ता पर अपनी पकड़ खो सकती हैं। ‘लीक’ हुई सूचना बताती है कि लिंगायतों की संख्या 18 प्रतिशत से घटकर 10 प्रतिशत से नीचे आ गई है। वोक्कालिगा के मामले में गिरावट है कि इनकी आबादी 14 प्रतिशत से घटकर आठ प्रतिशत से भी कम रह गई है। दूसरी ओर, दलितों की संख्या 17 प्रतिशत से बढ़कर 24 प्रतिशत हो गई है। और पिछड़ा वर्ग के लोगों की संख्या सामूहिक रूप से 55 प्रतिशत होने का अनुमान है।

इससे परेशान होकर लिंगायतों ने अपना अलग जाति सर्वेक्षण शुरू करने का फैसला किया है। उनके अनुसार, लिंगायत के 101 उप संप्रदाय हैं और लोगों ने गलत सूचना दी है, जिससे गंभीर विसंगतियां पैदा हो गई हैं। दलितों की संख्या में वृद्धि हुई है, पर राज्य में ‘दाहिने हाथ’ दलितों और ‘बाएं हाथ’ दलितों के बीच अधिक आंतरिक आवंटन के लिए हो-हल्ला हो रहा है। इस मुद्दे पर पेश एक अंतरिम रिपोर्ट ने हंगामा खड़ा कर दिया है, जिसके बाद सिद्धारमैया ने नागमोहन दास आयोग का कार्यकाल 60 दिन के लिए बढ़ा दिया है और उसे एक नया सर्वेक्षण करने के लिए कहा है।

सामान्य रूप से दक्षिणी राज्य और उत्तर भारत के कुछ छोटे राज्य जनगणना को लेकर चिंतित हैं, क्योंकि यह राजनीतिक सत्ता से संबंधित परिसीमन को प्रभावित करती है। पूरे भारत में बड़ी संख्या में राजनेताओं के लिए जो बात सबसे ज्यादा परेशान करने वाली है, वह है, भारत की जाति संरचना में होने वाले बदलाव । आधिकारिक तौर पर जारी जातिगत आंकड़े वर्ष 1931 में जाति जनगणना के बाद जारी किए गए थे। काफी मांग के बाद स्वतंत्र भारत में पहली जातिगत गणना 2011 में की गई थी, पर उसके आंकड़े कभी आधिकारिक तौर पर सामने नहीं आए। इस बीच कुछ राज्यों ने अपने स्वयं के जाति सर्वेक्षण करने शुरू किए। बिहार ने जून 2022 में अपने जातिगत सर्वेक्षण के निष्कर्षो को अधिसूचित किया, जिससे राज्य में कुछ वर्गों में खलबली मच गई और असर पूरे भारत में देखा गया। आंध्र प्रदेश ने भी इसी तरह का कदम उठाया था और लोकसभा व विधानसभा के लिए एक साथ होने वाले चुनावों की पूर्व संध्या पर जनवरी 2024 में जातिगत सर्वेक्षण शुरू कर दिया था। अक्तूबर 2024 में तेलंगाना ने भी अपना जातिगत सर्वेक्षण शुरू किया। बिहार और तेलंगाना में जातिगत सर्वेक्षणों के निष्कर्षों को संबंधित राज्य सरकारों द्वारा प्रकट किया गया है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने निष्कर्षो को अधिसूचित किया है, जिसमें पिछड़ों और दलितों की संख्या अधिक है। प्रभावशाली उच्च जातियों की संख्या में गिरावट है। इसी तरह तेलंगाना में कांग्रेस के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी द्वारा किए गए सर्वेक्षण में पिछड़ों की अधिक संख्या का पता चला है, जिससे सत्तारूढ रेड्डी और खम्मा समुदाय चिंतित हैं। मुख्यमंत्री द्वारा पेश रिपोर्ट में हिंदू और मुस्लिम ओबीसी जैसी नई शब्दावली का भी इस्तेमाल किया गया है। अब यह मांग उठ रही है कि पूरी रिपोर्ट जारी की जाए, क्योंकि विपक्ष को संदेह है कि मुख्यमंत्री ने सियासी मकसद को पूरा करने के लिए इसमें हेराफेरी की है।

आंध्र प्रदेशको चुनावों के कारण अपने सर्वेक्षण को बीच में ही छोड़ना पड़ा था। जगन मोहन रेड्डी द्वारा आदेशित सर्वेक्षण पूरा नहीं हो सका, क्योंकि सरकारी मशीनरी चुनावों में व्यस्त हो गई। कर्नाटक के मामले में निष्कर्षो को गुप्त रखा गया और मुख्यमंत्री सिद्धारमैया पर चुनिंदा लोक पर चलने का आरोप लगाया गया। तमिलनाडु और केरल में ऐसा कोई सर्वेक्षण नहीं हुआ है। तमिलनाडु ने केंद्र से व्यापक सर्वेक्षण करने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया है।

प्रत्येक राजनीतिक दल के पास सर्वेक्षण करने या न करने के अपने-अपने कारण हैं। अगर उन्होंने सर्वेक्षण किए भी हैं, तो उनके पास रिपोर्ट प्रकट करने, न करने या चुनिंदा रूप से लीक करने के कारण हैं। भाजपा सर्वेक्षणों को चिंता के साथ देख रही है, क्योंकि उसे चिंता है कि इससे समग्र हिंदू समाज विभाजित हो जाएगा। आरएसएस ने भी एक प्रस्ताव पारित किया है, जिसमें कहा गया है कि जनगणना का राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए।

भारत अपनी स्वतंत्रता के 78वें वर्ष में है और हमारे पूर्वजों द्वारा सामाजिक, जनसांख्यिकीय व राजनीतिक मुद्दों के प्रबंधन के लिए की गई व्यवस्था में बड़े पैमाने पर बदलाव की आवश्यकता है। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे सामाजिक संकेतकों में सुधार के बाद जनसांख्यिकी में बदलाव हो रहा है, इसलिए नीतिगत पहल में भी उस बदलाव की झलक दिखनी चाहिए। दशकों से सकारात्मक कार्रवाई ने कई पिछड़े, उत्पीड़ित और उपेक्षित वर्गों को ऊपर उठाने में मदद की है। हालांकि, प्रगति असमान रही है। समाज में अपेक्षाकृत निचले स्तर पर छूटे महत्वाकांक्षी वर्ग अब अधिक हिस्सेदारी के लिए दबाव बना रहे हैं, जिससे सामाजिक तनाव की नई लहर पैदा हो रही है। वैसे, एक तरह से यह लोकतंत्र के गहराने या परिपक्व होने का एक अच्छा संकेतक भी है, क्योंकि आखिरकार सब कुछ संख्या के खेल और सत्ता हासिल करने के लिए बहुमत हासिल करने की राजनीतिक वर्ग की क्षमता पर निर्भर करता है।