
उत्तराखंड में लागू समान नागरिक संहिता
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कुछ बिंदु –
- समान नागरिक संहिता या यूनिफार्म सिविल कोड (यूसीसी) सामाजिक मामलों से संबंधित कानून है। यह विवाह, तलाक, भरण पोषण, विरासत आदि मामलों में सभी पंथ पर समान रूप से लागू होता है। यह सामाजिक समानता को बढ़ावा देने वाला माना जाता है। धर्म या समुदाय के आधार पर भेदभाव को खत्म करता है।
- हाल ही में उत्तराखंड राज्य ने इसे लागू किया है। इस कानून के नियम ऐसे लग रहे हैं, जैसे कि वे हमारे समय की जरूरतों को पूरा करने के लिए सुधार के बजाय, सामाजिक प्रगति को रोकना चाहते हैं।
- इसका सबसे बड़ा उदाहरण लिव-इन-रिलेशनशिप पर निगरानी रखने के लिए बिल्कुल नई व्यवस्था है। राज्य में लिव-इन में रहने वाले जोड़ों को पंजीकरण कराना अनिवार्य होगा। इसे पुलिस के साथ साझा किया जाएगा। विविध आधारों पर इसे खारिज किया जा सकता है।
- यह निजता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों पर हमला है।
- लिव-इन पर बनाए गए नियम के संबंध में ऐसा कोई डेटा पेश नहीं किया गया, जो इस व्यवस्था को बढ़ते अपराध से जोड़ता हो, क्योंकि ऐसा कोई डेटा है ही नहीं। लिव-इन के बढ़ते चलन के पीछे एक बड़ा सामाजिक परिवर्तन है, जहाँ जेनरेशन ज़ी और उसके साथ के युवा अब पिछली पीढ़ियों की जीवन शैली से हटकर जीवन जी रहे है। बढ़ते शहरीकरण ने इसे बढ़ावा दिया है। अब उनसे पारंपरिक जीवन-पद्धति की आशा रखना एक बेतुका विचार है।
- तलाक और विवाह की आयु के मामले में संहिता में सुधार की उम्मीद थी, लेकिन ऐसा नहीं किया गया है। वैवाहिक जीवन में पति द्वारा किए जाने वाले बलात्कार पर पत्नी अभी भी तलाक नहीं मांग सकती है।
यह संहिता भारतीय सामाजिक कानूनों की विकृति को सुधारने में नाकाम रही है। नए कानून की यह ऐसी दुखद और बुरी शुरुआत है, जिसका अनुसरण अन्य राज्य भी करेंगे।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 28 जनवरी, 2025