सूचना आयोग ही सूचना देने में चूक रहा
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हाल ही में सूचना आयोग की विफलता का एक और मामला सामने आया है। केंद्रीय सूचना आयोग का काम ‘जानकारी तक आसान और ज्यादा पहुँच बनाना है‘, लेकिन रेलवे के किराए तय करने के आधार को लेकर मांगी गई जानकारी को सूचना आयोग ने 2 वर्ष बाद खारिज कर दिया। इस आधार पर खारिज किया कि यह जानकारी ट्रेड सीक्रेट/बौद्धिक संपदा से जुड़ी हुई है।
दरअसल, रेलवे आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम, 1923 पर बना एक सरकारी निकाय है। लेकिन सवाल यह है कि सूचना आयोग ने किस तर्क पर उसकी बात मानी है। आयोग ने कहा कि अधिनियम की धारा 8(1)(डी) के प्रावधान के तहत इस जानकारी को सार्वजनिक न किया जाना ठीक है।
दूसरे, केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी सूचना का केवल संवाहक (कम्यूनिकेटर) है। वह कार्यालय के रिकार्ड के अनुसार ही सूचना दे सकता है।
बीस वर्ष पहले, आरटीआई को प्रशासन में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए लाया गया था। 2026 में प्रशासन में और भी अधिक पारदर्शिता आ जानी चाहिए थी। नौ वर्षों बाद अब आयोग के पास 10 कमिश्नरों की पूरी ताकत है। लेकिन उसके पास 32,000 से ज्यादा केस लंबित हैं। इन्हें निपटाने में तीन साल से ज्यादा का समय लग जाएगा। इससे आरटीआई का पूरा उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 16 जनवरी 2026