सॉफ्टवेयर पावर बने भारत
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वेंचर कैपिटलिस्ट मार्क एंड्रीसन ने 15 साल पहले कहा था कि ‘सॉफ्टवेयर दुनिया को खा रहा है।’ वे बिल्कुल सही थे। अब हमारे पास हर चीज के लिए एक ऐप है। असल में एक ही काम के लिए कई ऐप हैं। इस प्रकार से सॉफ्टवेयर ही सॉफ्टवेयर को खा रहा है।
इसमें कोई शक नहीं कि सॉफ्टवेयर का बाजार बहुत तेजी से बदलता रहता है। माइक्रोसॉफ्ट और एप्पल पहले ऊँचाई पर थे, नीचे आए और कभी भी वापस शीर्ष पर जा सकते हैं। इस बाजार में हार्डवेयर अभी भी मायने रखता है। लेकिन सॉफ्टवेयर ही मुख्य अंतर पैदा करने वाला है। अपने बड़े प्रतिभाशाली वर्ग के साथ भारत भी सॉफ्टवेयर पावर हाउस बन सकता है। आखिरकार, अल्फाबेट और माइक्रोसॉफ्ट को सालों से भारतीय मूल के इंजीनियर चला रहे हैं। इसके लिए हमें लिथियम और कोबाल्ट की खदानों की जरूरत नहीं है। हमारे इंजीनियर पहले से ही बहुराष्ट्रीय कंपनियों और जीएनयू कम्पाइलर कलेक्शन या जीसीसी के लिए कोड लिख रहे हैं। सवाल अपने ब्रांड का है।
इस हेतु भारत को –
- केवल सेवाओं से आगे बढ़कर उत्पाद आधारित सॉफ्टवेयर से जुड़ी शिक्षा और कौशल को बढ़ावा देना चाहिए।
- एआई और डीपटैक में अधिक निवेश करना चाहिए।
- वैश्विक स्तर का डिजीटल ढांचा तैयार किया जाना चाहिए।
- स्टार्टअप्स को नीतियों और पूंजी से सहयोग देना चाहिए।
- ओपन सोर्स मंच पर वैश्विक स्तरों का नेतृत्व करना चाहिए।
- अपने डेटा की सुरक्षा, भरोसा और नैतिकता पर काम करना चाहिए।
- ‘मेड इन इंडिया सॉफ्टवेयर’ को प्रमोट किया जाना चाहिए।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 14 जनवरी, 2026