सेवा क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को नई दिशा

Afeias
10 Aug 2026
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भारत सरकार का सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय पहली बार इंडेक्स ऑफ सर्विसेज प्रोडक्शन का परीक्षण संस्करण जारी करने जा रहा है। यह इंडेक्स ऑफ इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन की तर्ज पर तैयार किया गया है जो सेवा क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों का उच्च-आवृत्ति संकेतक होगा। प्रारंभिक चरण में यह केवल ट्रेंड इंडिकेटर होगा, पूर्ण आर्थिक मापदंड नहीं।

मुख्य बिंदु –

  1. आईएसपी क्या है? –
  • यह सेवा क्षेत्र के उत्पादन को मापने वाला सूचकांक होगा। इससे अर्थव्यवस्था में सेवाओं की वास्तविक स्थिति का नियमित आकलन संभव हो सकेगा।
  • यह जीडीपी के आधिकारिक आँकड़ों से पहले आर्थिक रुझानों का संकेत देगा।
  1. इसकी आवश्यकता क्यों है? –
  • भारत की जीडीपी में सेवा क्षेत्र का योगदान लगभग 55–56% है।
  • रोजगार में इसका योगदान लगभग 30% है।
  • अब तक सेवा क्षेत्र के लिए औद्योगिक उत्पादन जैसा कोई मासिक सूचकांक नहीं था।
  • इससे आरबीआई, वित्त मंत्रालय और नीति आयोग को समय पर नीति-निर्माण में मदद मिलेगी।
  1. प्रमुख चुनौतियाँ –

(क) असंगठित क्षेत्र (Informal Sector)

  • भारत के सेवा क्षेत्र का बड़ा हिस्सा असंगठित है।
  • छोटे दुकानदार, स्थानीय परिवहन तथा छोटे होटल आदि का डेटा उपलब्ध नहीं होता।
  • इसलिए आईएसपी प्रारंभिक चरण में पूरी तस्वीर नहीं दिखा पाएगा।

(ख) मूल्य निर्धारण

  • यद्यपि वस्तुओं के लिए WPI उपलब्ध है, लेकिन सेवाओं के लिए अलग मूल्य सूचकांक विकसित नहीं है।
  • इसलिए विभिन्न क्षेत्रों के लिए अलग-अलग प्रॉक्सी (Proxy) का उपयोग होगा।

(ग) कई बड़े क्षेत्र शामिल नहीं

प्रारंभिक आईएसपी में शिक्षा, रक्षा, स्वास्थ्य तथा सरकारी सेवाएँ आदि शामिल नहीं होंगे।

ये सभी भारत के सेवा क्षेत्र का बड़ा हिस्सा हैं।

  1. आईएसपी के लाभ
  • आर्थिक गतिविधियों की शीघ्र जानकारी मिलेगी।
  • आरबीआई को ब्याज दर तय करने में सहायता मिलेगी।
  • निवेशकों का विश्वास बढ़ेगा।
  • सरकार को समय रहते आर्थिक मंदी या तेजी का संकेत मिलेगा।
  • जीडीपी के अनुमान अधिक सटीक होंगे।

आईएसपी भारत की सांख्यिकीय प्रणाली में एक महत्वपूर्ण सुधार है। प्रारंभिक चरण में इसकी कुछ सीमाएँ अवश्य हैं, लेकिन जैसे-जैसे डेटा संग्रह बेहतर होगा और अधिक सेवा क्षेत्रों को इसमें शामिल किया जाएगा, यह भारत की सेवा-प्रधान अर्थव्यवस्था का एक विश्वसनीय संकेतक बन सकता है।

इससे सरकार, उद्योग और निवेशकों को बेहतर निर्णय लेने में सहायता मिलेगी तथा भारत की आर्थिक नीति अधिक साक्ष्य-आधारित बन सकेगी।

‘द इकोनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। (13/07/26)