सवालों के घेरे में लिव इन संबंध
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हाल ही में मद्रास उच्च न्यायालय ने लिव इन रिलेशनशिप के चलन पर चिंता जताते हुए कहा है कि ऐसे रिश्तों में महिलाओं को पत्नी का दर्जा देकर सुरक्षा दी जाए। न्यायालय ने यह भी कहा कि लिव-इन रिलेशन भारतीय समाज के लिए एक सांस्कृतिक झटका है। लेकिन ये बड़े पैमाने पर हो रहे हैं। लड़कियाँ सोचती हैं कि वे माडर्न हैं और लिव-इन में रहने का फैसला करती है। लेकिन कुछ समय बाद उन्हें आभास होता है कि यह रिश्ता शादी की तरह कोई सुरक्षा नहीं दे रहा है।
हमारे लिए आधुनिकता का मतलब पश्चिमी सभ्यता अपनाना हो गया है। इसी कारण आज युगल ऐसी स्थितियों में फंस जाते हैं, जहाँ से पीछे लौटना मुश्किल होता है। इसीलिए ये युगल बाद में न्यायालय का दरवाजा खटखटाते दिखते है।
अदनान बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य मामला –
अगस्त 2023 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस मामले में टिप्पणी की थी “अधिकांश लिव इन जोड़ों के बीच ब्रेकअप हो जाता है और उसके बाद महिला के लिए समाज का सामना करना मुश्किल हो जाता है। अभद्र सार्वजनिक टिप्पणियाँ जीवन का हिस्सा बन जाती हैं। न्यायालय ने यह भी कहा कि विवाह संस्था व्यक्ति को जो सुरक्षा, सामाजिक स्वीकृति, प्रगति और स्थिरता प्रदान करती है, वह लिव इन रिलेशन कभी नहीं दे सकता।
लिव-इन और नैतिक नियमों को स्पष्ट करता ब्रिएना पेरेली – हैरिस शोध –
यह शोध यूरोप के 11 देशों पर आधारित है। इसमें पाया गया कि लिव-इन में रहने वाली महिलाओं को पुरुषों की तुलना में अधिक नकारात्मक दृष्टि, चरित्रगत संदेह और सामाजिक आलोचना का सामना करना पड़ता है। जहाँ पारंपरिक, पारिवारिक और नैतिक मूल्य अधिक मजबूत हैं, वहाँ लिव-इन के बाद महिलाओं के लिए नए संबंधों में स्थापित होना, सामाजिक स्वीकृति पाना और सम्मानजनक जीवन में पुनः प्रवेश करना कहीं अधिक कठिन हो जाता है। इसी असमान और कठोर सामाजिक व्यवहार को ‘जेंडर्ड स्टिग्मा’ कहा जाता है। इससे यह पता चलता है कि लिव इन महिलाओं का व्यक्तिगत निर्णय नहीं बल्कि एक सामाजिक जोखिम बन जाता है।
स्टाइडिंग बनाम डिसाइडिंग सिद्धांत –
मनोविज्ञानी स्काट एस स्टैनली ने अपने इस सिद्धांत में बताया है कि लिव-इन संबंधों में युवा अक्सर सोच समझकर निर्णय नहीं लेते, बल्कि परिस्थितयों के साथ धीरे-धीरे फिसलते हुए जीवन के बड़े निर्णयों में प्रवेश कर जाते हैं। इन रिश्तों में स्पष्ट और सचेत प्रतिबद्धता नहीं होती। इससे भावनात्मक असुरक्षा, मानसिक तनाव और संबंधों की अस्थिरता भी बढ़ जाती है। लिव-इन संबंध टूटने पर अवसाद, आत्मसम्मान में गिरावट और भविष्य के रिश्तों पर नकारात्मक प्रभाव छोडते हैं। ये संबंध आकर्षक लगते जरूर हैं, लेकिन उच्च जोखिम वाले होते है।
सोशल साइंस रिसर्च में प्रकाशित शोध –
‘कोहैबिटेशन डिसोल्यूशन एंड साइकोलाजिकल डिस्ट्रेस अमंग यंग अडल्ट्रस’ शोध के अनुसार लिव-इन संबंध टूटने के बाद अवसाद, मानसिक तनाव और भावनात्मक अस्थिरता बढ़ती है। इसके दूरगामी और घातक मनोवैज्ञानिक परिणाम होते है।
अन्य बिंदु –
इस बारे में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा था कि यह इस देश में विवाह संस्था को नष्ट करने समाज को अस्थिर करने और हमारे देश की प्रगति में बाधा डालने की एक व्यवस्थित योजना है।
लिव-इन रिलेशन कहीं न कहीं पश्चिमी संस्कृति, धारावाहिक तथा बॉलिबुड; इन तीनों के कारण उत्पन्न समस्या है।
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