सार्वजनिक स्वास्थ्य की मजबूती में बड़ी कसर
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राष्ट्रीय सांख्यिकीय कार्यालय ने हाल ही में घरेलू सामाजिक उपयोग (स्वास्थ्य) सर्वेक्षण का 80वां दौर पूरा किया है। महामारी और आयुष्मान भारत प्रधानमंद्धी जन आरोग्य योजना के आगे बढ़ने के साथ ही यह अपनी तरह का पहला सर्वेक्षण है। इस दौर में जो सबसे बड़ा अंतर नजर आया है, वह स्वास्थ्य बीमा को लेकर है। यदि पिछले दो सर्वे की तुलना करें, तो इस बार बीमा कवरेज लगभग तीन गुना बढ़ गया है।
कुछ बिन्दु –
- बीमा कवरेज बढ़ने से हॉस्पिटल में स्वास्थ्य देखभाल फाइनेंसिंस का हिस्सा बढ़ रहा है। लेकिन भर्ती होने की दर अभी भी नहीं बढ़ी है। यह बताता है कि आयुष्मान कार्ड से बेड मिलने की दर बढ़ी नहीं है।
- इसके अलावा अस्पताल कुछ अन्य खर्च ऐसे डाल देते हैं, जिन्हें कार्ड में मान्यता नहीं है।
- पीएमजेएवाय और सरकार द्वारा फंडेड इंश्योरेंस स्कीम की प्रतिपूर्ति दर बाजार की अन्य बीमा नीतियों से कम है। फिर भी, सरकार बाजार की बीमा कंपनियों को कम आय वाले समूह तक पहुँच बनाने के लिए सब्सिडी दे रही है। यह संयुक्त प्रयास एक सुरक्षा कवच देता है। इसमें भर्ती होने का खर्च सरकार वहन करती है। जबकि सार्वजनिक नेटवर्क से प्राथमिक स्वास्थ्य चाहने वालों के लिए वित्तीय सुरक्षा बेहतर बनती है।
- सर्वे में बीमार आबादी का अनुपात दोगुना बताया गया है। यह तब है, जब संक्रामक बीमारियां कम हुई हैं और गैर-संक्रामक बीमारियां बढ़ी हैं। अर्थशास्त्रियों ने इसे स्वास्थ्य के प्रति लोगों की जागरुकता और स्वास्थ्य देखभाल चाहने वालों की संख्या में वृद्धि का संकेत माना है।
- पिछले स्वास्थ्य सर्वे में स्वास्थ्य देखभाल पर जेब से होने वाला खर्च गरीबी का मुख्य कारण था। 80वें राउंड में इसका माध्य औसत (मीन) दोगुना हो गया है, जबकि माध्यिका औसत (मीडीयन) प्रति भर्ती 11,285 तक गिर गया है। आउटपेशेंट केयर में यह शून्य दिखाई पड़ता है। इन दोनों चलन का मतलब है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधा लोगों के लिए वहन करने योग्य हो गई है।
- फिलहाल आयुष्मान योजना के एएएम नेटवर्क में कमी है। यह मुफ्त दवाओं और डायग्नोस्टिक से जुड़ा हुआ है। यह लंबे ईलाज की मांग रखने वाले रोगों के खर्च के लिए पर्याप्त फंडेड नहीं है। यहाँ निजी क्षेत्र पर ही निर्भर होना पड़ता है।
कुल-मिलाकर गरीबों के पास नाममात्र का कवरेज है। मिडिल क्लास को इंश्योरेंस की बढ़ती लागत का सामना करना पड़ रहा है। अत: स्वास्थ्य देखभाल के अगले चरण में, लोगों को स्वास्थ्य पर खर्च से होने वाली गरीबी से बचाने, और तृतीयक स्वास्थ्य देखभाल में निजी क्षेत्र का मुकाबला करने के लिए सार्वजनिक अस्पतालों की दशा सुधारनी होगी।
(‘द हिन्दू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित – 02/05/2026)