क्वाड समूह का सही दिशा में बढ़ना जरूरी
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हाल ही में क्वाड समूह के विदेश मंत्रियों की बैठक नई दिल्ली में सम्पन्न हुई है। राष्ट्रपति ट्रंप के कार्यकाल की शुरुआत से लेकर अब तक यह तीसरी बैठक थी। इसका उद्देश्य भारत, आस्ट्रेलिया, जापान और अमेरिका को भरोसा दिलाना था कि तेजी से हो रहे भू-राजनीतिक परिवर्तनों के बावजूद यह समूह प्रासंगिक और काम का बना हुआ है।
अन्य मुख्य बातें –
- हिन्द-प्रशांत की समुद्री सुरक्षा से जुड़े तीन पहलुओं पर सहमति बनी है। इनमें मैरीटाइम सर्विलांस कोलेबोरेशन, मैरीटाइम डोमेन अवेयरनेस के लिए साझेदारी, और एक क्वाड-एट-सी शिप ऑब्जर्वर मिशन शामिल है।
- ऊर्जा और दुर्लभ खनिजों से जुड़े क्वाड क्रिटिकल मिनरल को-ऑपरेशन इनिशिएटिव, एनर्जी सिक्योरिटी पार्टनरशिप और फिली में पोर्ट बनाने के लिए प्रथम क्वाड बुनियादी ढांचा योजना को मंजूरी दी गई है।
- संयुक्त वक्तव्य में एक मुक्त और खुले हिन्द-प्रशांत, क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने, सीमा-पार आतंकवाद का मुकाबला करने और यूनाइटेड नेशन्स कन्वेंशन ऑन द लॉ ऑफ द सी पर फोकस के साथ अंतरराष्ट्रीय कानून को बनाए रखने के लिए प्रतिबद्धता दिखाई गई है।
वक्तव्य में पहलगाम हमला, पूर्वी और दक्षिणी चीन समुद्र में गतिविधियों और होर्मुज जलडमरूमध्य पर चिंता जताई गई है।
- ईरान के एक्शन की निंदा की गई। ईरान-इजराइल-अमेरिका के बीच युद्ध, हिंद महासागर में अमेरिकी सैनिकों द्वारा ईरानी जहाज पर टॉरपीडो हमला करने या पाकिस्तान को मध्यस्थ बनाने पर कोई बात नहीं हुई।
भारत के लिए चुनौती
2024 में भारत ने समूह की अध्यक्षता की थी। तभी से उसे सम्मेलन की मेजबानी करने में मुश्किलों का सामना करना पड़़ रहा है। 2024 में पन्नुन-निज्जर मामला, 2025 में टैरिफ, अमेरिकी प्रतिबंध, ट्रेट और ऑपरेशन सिंदूर के दावों से बढ़े तनाव के बीच यह संभव नहीं हुआ है। यदि 2026 में भारत सम्मेलन किए बिना अगर आस्ट्रेलिया को अध्यक्षता सौंप देता है, तो यह प्रतिबद्धता में कमी का संकेत लग सकता है। जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य, ऋण की उपलब्धता, बुनियादी ढांचा और समुद्री सुरक्षा पर क्वाड की क्षेत्रीय पहल हिंद-प्रशांत क्षेत्र के लिए एक बड़ी ताकत है। अत: समूह को सही उद्देश्य के साथ आगे बढ़ते जाना चाहिए।
(‘द हिन्दू’ में प्रकाशित 30/05/2026 के संपादकीय पर आधारित)