बदलनी होगी यूरिया उपयोग की रीति-नीति
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हमारे प्रधानमंत्री ने पिछले दिनों किसानों से आह्वान किया कि वे यूरिया और डीएपी जैसे रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग में कम से कम आधे की कटौती करें और अधिक से अधिक प्राकृतिक खेती करें।
इस अपील के पीछे के कारण –
- उर्वरकों की अधिकांश खरीदी विदेशों से की जाती है। इससे हमारी काफी विदेशी मुद्रा खर्च होती है।
- भारत में किसान 45 कि.ग्रा. यूरिया का एक बैग 266 रुपये में खरीदता है, जबकि इसकी वास्तविक कीमत करीब 2200 रुपये होती है। इस सब्सिडी के कारण 2026-27 में सरकार ने 1.7 लाख करोड़ रुपये खर्च किए। जबकि इतनी अधिक राशि से सिंचाई, शिक्षा, सड़क जैसे दूसरे जरूरी काम किए जा सकते थे।
- पश्चिम एशिया संकट के कारण दो माह के अंतराल में उर्वरकों की कीमतें दोगुना बढ़ गई हैं।
- विज्ञानियों के अनुसार तीन मुख्य पादप पोषक तत्व; नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटेशियम का 4:2:1 के अनुपात में संतुलित उपयोग करना चाहिए। पर किसान सामान्यत: 11:4:1 के अनुपात में इन तत्वों का प्रयोग करते हैं। इसका एक-तिहाई हिस्सा पौधे अवशोषित करते हैं।शेष या तो ग्रीन हाउस गैसों के रूप में उत्सर्जित हो जाता है, या मिट्टी में घुलकर जल को भी दूषित करता है।
- सरकारी आकलन के अनुसार सब्सिडी पर दी जाने वाली 20% यूरिया की कालाबाजारी होती है। फिर इस यूरिया का प्रयोग औद्योगिक रसायन के रूप में किया जाता है या विदेशों में ऊंची कीमतों पर बेचा जाता है।
इस दिशा में क्या सुधार किए जा सकते हैं ?
- सरकार द्वारा किसानों की जोत व भूमि की गुणवत्ता के आधार पर यूरिया के लिए सीधे नकदी किसानों के खातों में भेजी जाए। आधार, बैंकिंग व मृदा स्वास्थ्य कार्ड की सहायता से इसे आसानी से संभव बनाया जा सकता है।
- यदि यूरिया की कीमतों को बढ़ने दिया जाए, तो कालाबाजारी कम होगी, जिससे मुनाफाखोरी घटेगी और किसान भी किफायत से यूरिया का प्रयोग करेंगे।
- फास्फोरस और पोटेशियम की तरह यूरिया को भी अन्य उर्वरकों की दृष्टि से देखा जाए। इससे न्यायसंगत व्यवस्था के तहत यूरिया को नियंत्रित किया जा सकेगा और फिजूल प्रयोग पर लगाम लगेगी।
- तरल यूरिया या नीम कोटेड यूरिया पर सरकार को सब्सिडी देनी चाहिए, क्योंकि वह अच्छे से अवशोषित होती है, जिससे बर्बादी कम होती है।
40 वर्षों से विशेषज्ञ समिति की इन सिफारिशों को उपेक्षित नजर से ही देखा गया, क्योंकि एक बार किसी सहायता को शुरु करने के बाद उस सहायता को वापस लेना मुश्किल होता है। पर यदि कोई पदार्थ महंगा व दुर्लभ हो जाए, तो रणनीति बदलनी ही पड़ती है। इसीलिए समय रहते समाधान बहुत जरुरी है।