भारत में उर्वरक उपयोग पर कुछ बिन्‍दु

Afeias
15 Jun 2026
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  • पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध से बढ़ी ईंधन और उर्वरकों की लागत ने हमें एक अवसर दिया है। अवसर यह सोचने का है कि उर्वरकों की कृषि में कैसी भूमिका है, और स्‍वास्‍थ्‍य के लिए कितनी उपयोगिता?
  • हम जितने अधिक उर्वरकों का उपयोग करते हैं, उतना ही वे मिट्टी के कार्बनिक पदार्थ और पानी के पोषक तत्‍वों को रोकने की क्षमता को कम करते हैं।
  • भारत अपनी यूरिया की आवश्‍यकता का 80% घरेलू स्‍तर पर उत्‍पादन करता है, और बाकी आयात करता है।
  • इस बीच वह घरेलू उत्‍पादन को बढ़ाने में भी लगा हुआ है। लेकिन भारत के यूरिया उद्योग को इस हेतु आयातित ईंधन पर निर्भर रहना पड़ता है। ग्रीन अमोनिया एक विकल्‍प है, लेकिन पानी की कमी वाले क्षेत्रों में यह नहीं बनाया जा सकता। फॉस्‍फेटिक उर्वरक भी भारत में नहीं बन पाता, क्‍योंकि यहाँ पत्‍थरों में फॉस्‍फेट मिनरल की कमी है।
  • उर्वरकों में नाइट्रोजन (ज्‍यादातर यूरिया) और फॉस्‍फोरस ही ज्‍यादा प्रयोग में आते हैं।
  • सरकार किसानों को उर्वरकों के लिए लगभग 2 लाख करोड़ की सब्सिडी देती है। इसमें से 2/3 से ज्‍यादा प्रदूषण में बर्बाद हो जाता है।
  • इसका कारण साफ है कि हमारे किसानों को उर्वरकों की सही मात्रा में उपयोग की समझ ही नहीं है। इसके चलते उर्वरकों की हमारी मांग कभी पूरी ही नहीं होती है। यदि देखा जाए, तो यह समझ विकसित करने का यह सही समय है। इस अभियान में किसानों को उर्वरक की पूरी क्षमता यानि एक किलो उर्वरक से अधिकतम पैदावार प्राप्‍त करना या उर्वरक कम करते हुए पैदावार को बनाए रखने का ज्ञान दिया जाना चाहिए।

सरकारी प्रयासों की असफलता –

  • सरकार की ‘न्‍यूटिएंट बेस्‍ड-सब्सिडी, से क्षमता में सुधार नहीं हुआ है, और न ही मांग कम हुई है, क्‍योंकि यूरिया को योजना में शामिल ही नहीं किया गया था।
  • दालें, फलीदार कवर फसलें, खाद और कम्‍पोस्‍ट से मिले उर्वरक के उपयोग को कम किया जा सकता है। लेकिन अब ये हमारे कृषि का मुख्‍य आधार ही नहीं रहे। हाल ही में, केन्‍द्र सरकार ने राज्‍यों को हरी खाद को बढ़ावा देने का निर्देश दिया, लेकिन उर्वरक बचाने पर जोर नहीं दिया है।
  • प्रधानमंत्री ने 2017 में मन की बात में पांच साल में उर्वरकों के उपयोग को आधा करने की बात की थी। लेकिन मंत्रालयों और विभागों के बीच तालमेल की कमी के कारण उर्वरक की खपत बढ़ गई है।
  • सरकार 20 से ज्‍यादा फसलों पर न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य की घोषणा करती है। लेकिन असल में सरकारी खरीद चावल, गेहूं और गन्‍ने तक सीमित है। ये कुल यूरिया खपत का दो-तिहाई से ज्‍यादा उपयोग करती हैं।

क्षमता बढ़ाना –

  • भारत को दालों/फलियों पर आधारित फसल चक्र या मल्‍टीक्रॉपिंग को बढ़ावा देना चाहिए।
  • उर्वरक की जगह खाद, कम्‍पोस्‍ट और बायोचार की रिसाइक्लिंग को तीन गुना करना चाहिए, ताकि मृदा स्‍वास्‍थ्‍य सुधरे।
  • उर्वरक के उपयोग को अंतिम साधन के रूप में प्रचारित किया जाना चाहिए।
  • फसल को बेहतर बनाने के लिए नाइट्रोजन/फॉस्‍फोरस स्रोतों के विकल्‍प में निवेश किया जाना चाहिए।
  • नेशनल नाइट्रोजन स्‍टीयरिंग कमेटी को फिर से शुरू करना चाहिए।

(द हिन्‍दूमें प्रकाशित नंदूला रघुराम के लेख पर आधारित-19/05/2026)