अदालतों में बढ़ते मुकदमे : बुनियादी अवसंरचना, न्यायाधीशों की कमी तथा बजट और भविष्य के लिए सुझाव
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भारत की अदालतों में 5.5 करोड़ मामले लंबित हैं, जो हमारी न्यायिक प्रणाली की सर्वविदित कमजोरी है। आइए हम इसके कारण जानते हैं –
- न्यायालयों में न्यायाधीशों के साथ-साथ स्टेनोग्राफर और क्लर्क जैसे अधीनस्थ कर्मचारियों की भारी कमी है। 2026 की स्थिति के अनुसार प्रति दस लाख पर 22 न्यायाधीश हैं, जबकि विधि आयोग ने 1987 में ही 50 न्यायाधीशों की सिफारिश की थी।
- बुनियादी ढ़ाँचे की कमी भी इसका मुख्य कारण है।
- निचली अदालतों में कुल लंबित मुकदमों का 85% है, जिनमें ई-कोर्ट को बढ़ावा देने के प्रयासों के बावजूद आधे से भी कम निचली अदालतों में वीडियो कांफ्रेंसिंग की सुविधा है तथा एक-तिहाई न्यायाधीशों के पास ही कंप्यूटर होता है।
- कई अदालती भवनों में साफ शौचालय, पीने का पानी, आरामदायक प्रतीक्षा क्षेत्र या डिजिटल सूचना प्रणाली जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है।
- न्याय को गति देने वाले पंचाट भी अस्थाई या साझा कार्यालयों में काम करते हैं। जैसे राष्ट्रीय कंपनी विधि पंचाट और उसका अपीलीय निकाय; दोनों मध्य दिल्ली के साझा कार्यालयों से काम करते हैं।
- न्यायिक नियुक्तियों में बढ़ता राजनीतिकरण तथा निचली अदालतों में कामकाज की निगरानी की कोई व्यवस्था न होना भी बढ़ते मुकदमों का कारण है।
- केन्द्र न्यायिक अवसंरचना के लिए केन्द्र प्रायोजित योजनाएँ चलाता है। पर राज्य अपना 40% हिस्सा देने में विफल रहते हैं। अधिकांश राज्यों ने 2% से भी कम बजट इसके लिए आवंटित किया है।
हम क्या कर सकते हैं?
- हमारे मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने अवसंरचना के लिए ‘न्यायिक अवसंरचना सलाहकार समिति’ गठित करने की पहल की है, जो उन्नत न्याय प्रणाली के लिए 40000-30000 करोड़ रुपये का बजट सरकार द्वारा अलग से आवंटन की दिशा में काम करेगी। 2016 में भी एक न्यायाधीश ने राष्ट्रीय न्यायिक अवसंरचना निगम की स्थापना का सुझाव दिया था।
- मुख्य न्यायाधीश ने डिजिटलीकरण के बजाय ‘अधिकार केंद्रित डिजिटल दृष्टिकोण’ अपनाने की बात कही है।