परीक्षाओं के लिए नई प्रणाली की आवश्यकता – 2
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नीट और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक के खिलाफ छात्रों के शांतिपूर्ण विरोध का असर दिखाई दिया। सरकार द्वारा परीक्षा संबंधी अनियमितताओं और पेपर लीक के दोषियों को त्वरित एवं कठोर दंड देने के लिए फास्ट-ट्रैक अदालतें स्थापित करने की घोषणा एक सकारात्मक कदम है। लेकिन केवल दोषियों को सजा देना पर्याप्त नहीं है। भारत की पूरी प्रतियोगी परीक्षा प्रणाली में व्यापक संरचनात्मक सुधार की आवश्यकता है।
- स्वतंत्र और जवाबदेह परीक्षा प्राधिकरण –
वर्तमान परीक्षा व्यवस्था में प्रशासनिक हस्तक्षेप, जवाबदेही की कमी और संस्थागत कमजोरियाँ दिखाई देती हैं। इसलिए एक स्वतंत्र वैधानिक परीक्षा प्राधिकरण बनाया जाना चाहिए, जिसे कार्यात्मक स्वायत्तता प्राप्त हो।
इसके प्रमुख अधिकारियों का कार्यकाल निश्चित हो तथा नियमित बाहरी ऑडिट और संसदीय निगरानी अनिवार्य हो।
इससे परीक्षा संस्थाओं की विश्वसनीयता, पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ेगी।
- परीक्षा सुरक्षा को तकनीक से मजबूत करना –
प्रश्नपत्रों की सुरक्षा के लिए आधुनिक तकनीक का उपयोग आवश्यक है। इसके अंतर्गत –
- प्रश्नपत्रों का एन्क्रिप्टेड डिजिटल ट्रांसमिशन
- परीक्षा से ठीक पहले अधिकृत केंद्रों पर प्रश्नपत्रों की प्रिंटिंग
- अलग-अलग उम्मीदवारों के लिए कई रैंडमाइज्ड प्रश्नपत्र सेट, तथा
- नियमित साइबर सुरक्षा ऑडिट जैसे उपाय अपनाए जा सकते हैं।
हालाँकि, केवल डिजिटलीकरण पर्याप्त नहीं है। साइबर हमलों, डेटा चोरी और तकनीकी विफलताओं से बचने के लिए मजबूत डिजिटल सुरक्षा तंत्र भी आवश्यक होगा।
- ईमानदार अभ्यर्थियों के अधिकारों की रक्षा –
परीक्षा संचालन में प्रशासनिक विफलता का दंड छात्रों को नहीं मिलना चाहिए।
यदि किसी परीक्षा में पेपर लीक या गंभीर अनियमितता होती है, तो –
- पुनर्परीक्षा निश्चित समय-सीमा में कराई जाए।
- प्रभावित उम्मीदवारों के प्रयास बहाल किए जाएँ।
- आवश्यक होने पर आयु-सीमा में छूट दी जाए।
- परीक्षा यात्रा और अन्य वास्तविक खर्चों की भरपाई की जाए।
यह व्यवस्था प्राकृतिक न्याय और समान अवसर के सिद्धांतों के अनुरूप होगी।
भारत की वास्तविक प्रगति तभी संभव है, जब शिक्षा और विद्यार्थियों को विकास की प्राथमिकता बनाया जाए। प्रतियोगी परीक्षाओं को अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और जवाबदेह बनाना आवश्यक है। लेकिन दीर्घकालिक समाधान केवल परीक्षा व्यवस्था में बदलाव नहीं है। गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा के अवसरों का विस्तार, सार्वजनिक शिक्षा में निवेश और विद्यार्थियों पर एक ही परीक्षा के अत्यधिक दबाव को कम करना भी उतना ही आवश्यक है।
‘द इकोनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 24/07/26