परंपरा जानलेवा बन रही है

Afeias
02 Apr 2026
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पिछले कुछ दिनों में महिलाओं और लड़कियों की आत्महत्या से जुड़े समाचार खबरों की सुर्खियां बन रहे हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारे देश में महिलाओं की आत्महत्या के कुल मामलों में दो-तिहाई औरतों की उम्र 25 वर्ष से कम होती है।

अधिकांश मामले ऐसे हैं, जिनमें महिलाओं या लड़कियों पर विवाह या चाल-चलन को लेकर दबाव डाले जाते हैं। इन्हें राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो ‘पारिवारिक मामले’ कहकर निपटा देता है। दूसरी तरफ, उत्तराखंड उच्च न्यायालय एक पति को सुसाइड के लिए उकसाने के आरोप से बरी कर देता है। उसका यह कहना कि ‘शक करना आम बात है’ पुरूषों के क्रूरतापूर्ण व्यवहार को सामान्य बना देता है।

‘भारतीय पारिवारिक परंपरा’ के नाम पर होने वाले काम देश के बहुत से युवा जोड़ों से उनका संवैधानिक अधिकार छीन रहे हैं, और उम्मीदों का बोझ औरतों पर डाल रहे हैं। 15-29 वर्ष का समूह परिवार के दबावों से सबसे ज्यादा पीड़ित है। यौवनावस्था के दौर में अरेंज मैरिज शादी के बुरे संबंधों में रहने को मजबूर होना औरतों की कमजोरी को बढ़ा देता है।

हमारे देश में ग्रामीण भारत की तुलना में ज्यादा पढ़ी-लिखी औरतें आत्महत्या का प्रयास करती हैं। राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो का ‘पारिवारिक मामले‘ का जाल ऐसा है, जो औरतों को करियर, लाइफस्टाइल, साथी या बुरी शादी से बाहर निकलने के तरीके चुनने के अधिकार से दूर करता है। देश की औरतों को अंतरजातीय, अंतरधार्मिक, समलैंगिक या कुल मिलाकर अपने सपनों को जीने की संवैधानिक स्वतंत्रता मिली हुई है। लेकिन फिर भी उत्तराखंड लिव-इन को पंजीकृत करवाना चाहता है, और गुजरात ‘प्रेमविवाह’ में माता-पिता की स्वीकृति को अनिवार्य करता है। उन्हें यह समझना चाहिए कि वे एक हारी हुई लड़ाई लड़ रहे हैं।

‘द टाइम्स ऑफ इंडियामें प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 24 फरवरी 2026