नई जीडीपी श्रृंखला, आगे का रास्ता दिखाती है
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सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने वित्त वर्ष 2022-23, 2023-24 और 2024-25 के लिए सकल घरेलू उत्पाद अनुमानों और संबंधित पूर्णयोग की एक नई श्रृंखला पर प्रेस नोट जारी किया है। बेस ईयर को अपडेट करके अर्थव्यवस्था के आकार की अधिक सटीक और सही तस्वीर की लंबे समय से मांग की जा रही थी। इस नई श्रृंखला से 2011-12 बेस ईयर पर निर्भर अनुमानों की कमियों को दूर किया जा सकता है।
कुछ बिंदु –
- नई सीरीज के अनुसार, मौजूदा कीमतों पर जीडीपी के हिसाब से भारतीय अर्थव्यवस्था का कुल आकार वित्त वर्ष 2024-25 के लिए 318.7 लाख करोड़ रु. रहने का अनुमान है। यह आंकडा पहले की सीरीज में जारी आंकड़े से 3% से 4% कम है।
- 2024-25 के दौरान मौजूदा कीमतों का कुल ग्रॉस वैल्यू एडेड (जीवीए) में प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्र का संबंधित हिस्सा क्रमशः 21.4 प्रतिशत, 8 प्रतिशत, 52.9 प्रतिशत रहा।
- विनिर्माण क्षेत्र ने 2024-25 के लिए वास्तविक जीवीए में उच्च वृद्धि दर दिखाई है।
नई श्रृंखला में बड़े सुधार –
- गैर- वित्तीय निजी कॉर्पोरेट क्षेत्र से जुड़े बहुगतिविधि उद्यमों की गतिविधियों को अलग करना पहला बड़ा सुधार है। इससे बेहतर क्षेत्रीय सकल लाभ आवंटन हो सकेगा।
- सक्रिय कंपनियों के जीवीए को बढ़ाने के लिए चुकता पूंजी के आधार पर उद्योग ग् आकार वर्ग स्तर पर एक अलग ब्लोन अप फैक्टर का उपयोग, ताकि रिटर्न दाखिल नहीं करने वाली कंपनियों के योगदान को शामिल किया जा सके।
- कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय के आंकडों का उपयोग करते हुए सीमित देयता भागीदारी का व्यापक कवरेज।
- घरेलू क्षेत्र के जीवीए योगदान का अनुमान लगाने के लिए आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण के माध्यम से उपलब्ध सूचनाअें का उपयोग करना। श्रमिकों की संख्या के अनुमानों के साथ अनिगमित क्षेत्र के उद्यमों के वार्षिक सर्वेक्षण के अनुसार प्रति कर्मचारी जीवीए पर उच्च आवृत्ति डेटा का उपयोग करना।
- नई सीरीज डबल डीफ्लेटर तरीके से इनपुट और आउटपुट के लिए अलग-अलग मुद्रास्फीति एडजस्टमेंट करेगी। इससे जीवीए एवं जीडीपी और सटीक हो सकेगा।
- सप्लाइ एंड यूज टेबल्स या एमयूटी को राष्ट्रीय लेखा-जोखा के साथ एकीकृत किया जाएगा। ये उत्पादन स्रोत आयात मध्यवर्ती उपयोग, कुल उपभोग और निर्यात दिखते हैं। इससे उत्पादन और खपत का सही डेटा मिल सकेगा।
- इन सबसे पीछे स्थानीय निकायों, स्वायत्त संस्थानां और राज्यों से मिलने वाले डेटा में सुधार होगा।
अनुमानित प्रभाव –
- जीडीपी को नए तरीके से देखने पर कुछ वर्षें की वृद्धि दर कम आ सकती है, और कुछ की अधिक।
- अब भार 2008 के सिस्टम ऑफ नेशनल अकांउटस की जगह एसएनए 2025 को अपना रहा है।
चुनैतियां भी हैं –
- डबल डीफ्लेशन या दोहरी अपस्फीति (एक ऐसी लेखांकन पद्धति, जिसका उपयोग सकल उत्पादन और मध्यवर्ती इनपुट को अलग-अलग समायोजित कर जीडीपी की गणना के लिए किया जाता है) की जटिलता, बहुत सारे डेटा को एकीकृत करना,और पुरानी सरीज को नए तरीके से बनाना।
- राज्य-स्तरीय डेटा की सटीकता, आनौपचारिक क्षेत्र के मापन में आने वाला अंतर, और सर्वेक्षण से मिले डेटा का अभाव।
- पिछले जीडीपी के सुधारों से होने वाले विवाद।
अंततः भारत के राष्ट्रीय अकाउंट्स में 2022-23 बेस ईयर को आधार बनाया जाना ही अपने आप में सांख्यिकी अपग्रेड है। अगर इसे पारदर्शी तरीके से लागू किया जाता है, और नियमित रूप से अपडेट किया जाता है, तो संशोधित जीडीपी फ्रेमवर्क सबूतों पर आधारित नीतिनिर्माण से अंतरराष्ट्रीय भरोसा मजबूत होगा।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित जी.सी. मन्ना के लेख पर आधारित। 20 मार्च 2026