लैंगिक समानता में मिली-जुली उपलब्धि
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भारत में लड़कियों ने स्कूल मूल्यांकन और बोर्ड परीक्षा में लड़कों से बेहतर प्रदर्शन किया है। आज वे लगातार स्कूलों और विश्वविद्यालयों में आगे दिखाई दे रही हैं। ए फिल रजिस्ट्रेशन में लगभग ¾ हिस्सा महिलाओं का है। इससे पता चलता है कि ज्यादा लड़कियां स्कूलों में एडमिशन ले रही हैं, ज्यादा समय तक रुक रही हैं और उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही हैं। वहीं कामकाज तक पहुंचने के बीच एक दरार बन जाती है, जो कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी को कम कर देती है। कुछ बिन्दु –
- स्नातक करने वाली 48% महिलाएं हैं। शुरुआती रोजगार में ये 31% रह जाती हैं।पेशे के स्तर बढ़ने के साथ ही उनकी संख्या और कम होती जाती है।
- महिलाएं भले ही घर का किचन संभालती हों, लेकिन सिर्फ 10% प्रोफेशनल और एग्जीक्यूटिव शेफ महिलाएं हैं। महिलाओं की कम भागीदारी का कारण क्षमता नहीं, बल्कि सामाजिक मानदंड और अपेक्षाएं हैं। उनसे आज भी देखभाल के अवैतनिक काम ज्यादा करवाए जाते हैं। वर्कप्लेस अब भी पुरुषों को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं। इसके अलावा सुरक्षा, बुनियादी ढांचे की अनकूलता एवं परिवहन जैसी सुविधाएं उनके करियर को बनाए रखने के लिए जरूरी हैं। साक्षरता में लैंगिक अंतर अभी भी बहुत ज्यादा है, लेकिन 24 वर्ष से कम उम्र वालों में यह काफी कम हो गया है।
अच्छी बढ़त –
- सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय की नई रिपोर्ट के अनुसार पिछले सात वर्षों में शीर्ष प्रबंधकीय पदों पर पुरुषों की संख्या 74% बढ़ी है। इसके मुकाबले महिलाओं की संख्या में 103% की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है।
- मंत्रालय की ही एक रिपोर्ट के अनुसार 2017 में शीर्ष प्रबंधन की तीन श्रेणियों में महिलाओं की संख्या 2017 के नौ लाख से बढ़कर 2025 में 18 लाख से अधिक हो गई है।
- महिलाओं की संख्या के अनुपात में प्रबंधन क्षेत्र में भले ही उनकी हिस्सेदारी कम लगे, लेकिन अन्य क्षेत्रों से तुलना करने पर यह आंकड़ा अच्छा कहा जा सकता है।
ऐसा माना जा रहा है कि 2013 में कंपनी अधिनियम में हुए एक संशोधन ने भी महिलाओं की इस बढ़त में मदद की है। इस संशोधन के जरिए 300 करोड़ रुपए से अधिक के टर्न ओवर वाली कंपनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में एक महिला निदेशक का होना अनिवार्य किया गया था। नतीजा यह है कि आज 9,08,719 महिलाएं बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में हैं, जबकि 22,59,793 पुरुष इसमें हैं।
यह तरक्की सालों से लगातार नीति पर ध्यान देने, उसे लागू करने, जवाबदेही और सामान्य शब्दों में कहें, तो स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग टॉयलेट बनाने से हुई है।
(समाचार पत्रों पर आधारित- 11/05/2026)