कृषि में महिलाओं का योगदान और उनकी बढ़ती भूमिका

Afeias
30 May 2026
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संयुक्‍त राष्‍ट्र ने 2026 को ‘अंतरराष्‍ट्रीय महिला किसान वर्ष’ घोषित किया है। इसका उद्देश्‍य उन असमानताओं की ओर ध्‍यान आकृष्‍ट करना है, जिनका सामना महिलाओं को मजदूरी की दरों, संसाधनों तक पहुँच, जमीन के मालिकाना हक, विकास के अवसरों और निर्णय लेने की प्रक्रिया में करना पड़ता है।

भारतीय कृषि में महिलाओं की स्थिति –

  • भारत में कृषि कार्यबल में 40% महिलाएँ शामिल हैं और वे लगभग 80% कृषि कार्य करती हैं। वे कृषि, बागवानी, रेशम-उत्‍पादन, मत्‍स्‍य पालन व वानिकी की रीढ़ हैं। वे प्रारंभिक प्रसंस्‍करण, कृषि उत्‍पादों की पैकिंग तथा जंगली जड़ी-बूटियों को एकत्रित करने का काम भी करती हैं।
  • महिलाएँ एक फसल के मौसम में औसतन लगभग 3300 घंटे खेतों में काम करती हैं, जबकि पुरुष 1860 घंटे घर के अन्‍य नियमित कार्यों के कारण महिला किसानों का श्रम और भी अधिक हो जाता है। फिर भी सिर्फ 13% महिलाओं के पास ही भू-स्‍वामित्‍व है।
  • महिलाओं को कम मजदूरी दी जाती है और सरकारी रिकार्ड में उन्‍हें ‘अवैतनिक पारिवारिक कामगार’ के रूप में दर्ज किया जाता है।
  • संयक्‍त राष्‍ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन द्वारा प्रस्‍तावित ‘महिला किसानों’ की परिभाषा में औपचारिक व अनौपचारिक रूप से संलग्‍न महिलाएँ शामिल हैं, जिसमें किसान मजदूर से लेकर प्रसंस्‍करणकर्ता, व्‍यापारी और महिला वैज्ञानिक भी शामिल हैं। इस परिभाषा के अनुसार महिला किसानों में 33% श्रमिक और 48% स्‍वरोजगार यानी स्‍वयं के खेतों में काम करने वाली महिलाएँ शामिल हैं।
  • फसल उत्‍पादन में लगातार गिरावट तथा कृषि लाभ में गिरावट के कारण पुरुषों का शहरी नौकरियों की ओर आकर्षण बढ़ा है, जिससे पलायन भी बढ़ा है और महिला किसानों पर पहले से ज्‍यादा जिम्‍मेदारियाँ आ गई हैं।

उपरोक्‍त कारणों से हमें कृषि विकास में महिला केन्द्रित नीतियों और कार्यक्रमों पर अधिक बल देने की आवश्‍यकता महसूस होती है।

  • नई दिल्‍ली में आयोजित कृषि खाद्य प्रणालियों में महिलाओं पर तीन दिवसीय वैश्विक सम्‍मेलन में कृषि में महिलाओं का समर्थन करने के लिए नीतियों की पुनर्रचना करने, जागरूकता बढ़ाने, अंतरराष्‍ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देने और संसाधनों को जुटाने का आह्वान किया गया है। इसमें भूमि, संसाधन, प्रौद्योगिकी, वित्त और बाजार तक समान पहुँच सुनिश्चित करने पर बल दिया गया है।
  • भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की 2022-23 की रिपोर्ट में कहा गया है, कि ‘जब महिलाओं को प्रौद्योगिकी, संसाधनों और सेवाओं तक समान पहुँच मिलती है, तो वे अपने उद्यमों के माध्‍यम से मजबूत आर्थिक परिणाम उत्‍पन्‍न करने में सक्षम होती हैं। ग्रामीण महिलाओं के लिए लघु स्‍तर पर मुर्गी पालन, पशुपालन और मछली के मूल्‍यवर्धन से संबंधित उद्यमिता मॉडलों को बढ़ावा देना समय की आवश्‍यकता है’।

कृषि में महिलाओं की उल्‍लेखनीय भूमिका – 

  • फरवरी केअंत तक 10000 एफपीओ में से 1175 एफपीओ में 100% महिला सदस्‍य हैं, शेष में से 1084 में 50 से 99% महिला सदस्‍य हैं। ओडिशा, झारखंड, बिहार, महाराष्‍ट्र और तेलंगाना महिला सदस्‍यों वाले एफपीओ में अग्रणी राज्‍य हैं।
  • प्रख्‍यात कृषि वैज्ञानिक एम.एस.स्‍वामीनाथन कहते थे कि फसलों को मुख्‍य रूप से महिलाओं द्वारा ही घरों के उपभोग लायक बनाया गया था, क्‍योंकि उन्‍होंने कृषि की कला और विज्ञान की शुरुआत की।

महिलाओं ने मूलभूत जीवन सहायक संसाधनों के संरक्षण में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारतीय कृषि में महिलाएँ हमेशा से आधारशिला रही हैं। इसीलिए उन्‍हें सशक्‍त बनाना आवश्‍यक है।

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