अरावली, विंध्य से पश्चिमी घाट तक संकट में पहाड़ियां
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हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने अरावली पर अपने ही पूर्व मे दिए आदेश पर रोक लगाई, जो पहाड़ पर्यावरण के संरक्षण के लिए बड़ा कदम है। पहाड़ पर्यटन व खनन के लिए ही नहीं हैं, बल्कि पृथ्वी के अस्तित्व का महत्वपूर्ण अंग हैं।
- पहाड़ जंगल, जल और वायु की दशा व दिशा तय करते हैं, ये अधिकांश नदियों के उद्गम स्थल भी हैं। खनिजों के कारण मनुष्य पहाड़ों का शोषण करता है। जबकि पहाड़ हजारों साल में बनते हैं और खनिज मुश्किल से 100 साल ही चलते हैं।
- भारत में 15% भूभाग भूस्खलन के प्रति संवेदनशील हो चुके हैं, जिसमें हिमालय, पश्चिमी घाट, नीलगिरि ओर विंध्य शामिल हैं। पर्यटन, धर्म व व्यापार से जुड़े पहाड़ जब दरकते हैं, तो उन पर खूब चर्चा होती है। लेकिन इस समस्या को सिर्फ मुआवजे की खानापूर्ति तक ही देखा जाता है।
- सहयाद्री, पश्चिमी घाट व पूर्वी घाट पर्वतमाला में अधिक बारिश के कारण भूस्खलन होता है। वृक्ष कटाव के कारण वर्षा के समय मिट्टी अधिक बह जाती है, जिससे पहाड़ कमजोर होते हैं तथा पहाड़ों पर विस्फोटकों के प्रयोग से भी पहाड़ कमजोर होते हैं।
- विंध्य पर्वतमाला भारत के बीचो-बीच स्थित है, जो उत्तर व दक्षिण भारत को विभाजित करती है। यह पर्वतमाला उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, गुजरात व बिहार को जोड़ती है। यह चंबल, बेतवा, केन एवं सोन नदियों का उद्गम स्थल भी है। अवैध खनन, वनों की कटाई तथा प्रदूषण यहाँ भी समस्या है। इससे भूस्खलन, जैव विविधता के विनाश, सूखे व भूकंप के जोखिम बढ़ गए हैं।
केंद्रीय पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की पहली जलवायु परिवर्तन मूल्यांकन रिपोर्ट में स्पष्ट चेतावनी थी कि समुद्र और बड़ी पर्वतमालाओं के आसपास के पहाड़ी इलाके बदलते मौसम के लिए बेहद संवेदनशील हैं और यहाँ प्राकृतिक आपदाओं की अधिक आशंका है। वृक्षों को काटने के जैसे सख्त नियम हैं, अरावली के लिए गठित विशेषज्ञ समिति पूरे देश के पहाड़ों के लिए सख्त नियम बनाएँ।