10-09-2026 (Important News Clippings)
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Date: 10-09-26
Read, Don’t Rush
PISA 2025 underlines that students need to be taught slow, mindful engagement with difficult text
TOI Editorials
Modern economy is a fast changing thing, except in one aspect. There is broad consensus that literacy and numeracy remain foundational skills for successful participation in it. But the new PISA report on 15-year-olds nuances this in an important way. It underlines, in the words of Andreas Schleicher, OECD director of education and skills, that reading is the gateway to all learning. While the 91 countries and economies that participated in the 2025 assessment make an uneven picture, three-quarters recorded a decline in reading. Countries like US and Germany reported their lowest reading scores since PISA got into action in 2000. Schleicher also underlines that those who have fallen the furthest behind actually come from wealthy families, “which points to a much broader challenge than inequality alone”.
What must be understood is how students are failing at reading. Tasks that require them to locate a single piece of information, are the least affected. Those that use longer texts as stimuli, are seeing the most rapidly declining success rates. Larger story here is about attention, persistence, and the ability to stay with difficult material. There’s a category called hasty readers, who give fast and incorrect responses. Their numbers have gone from 7% to 11% between 2018-25, the period in which all societies have become more digital. This is not a rant against tech but a call for its careful governance. It is also a recommendation for students to read more fiction books, print magazines, and physical newspapers. To quote Schleicher again, “We do not get fit by watching sports, but by doing sports.”
India does not participate in PISA but is part of the same societal trend. Yes, its school system is more poorly resourced. As a TISS study has recently highlighted, there is an acute shortage of teachers in core subjects as well as an acute mismatch between what they have studied and what they are teaching. Still, the deepest point of PISA data holds as much for our students as any others. That “slow reading” is a prerequisite for using tech intelligently. Certainly for engaging with AI that produces information faster than we can consume it.
Regression Can’t Be Peddled as Diversity
ET Editorial
Earlier this week, the Eiffel Tower found itself at the centre of a cultural skirmish. A Hindu temple organisation reportedly sought — and attained — gender restrictions on female staff working at the monument. Understandably, it sparked outrage and rebuke. The episode is a reminder of a principle too often forgotten: when you enter someone else’s ‘house’ — whether country, institution or household — you abide by ‘house rules’.
Temptation to bend local norms in accordance with other cultural practices is strong, particularly when cloaked in the language of ‘respecting all traditions’. But respect cuts both ways. To demand that a host suspend its standards — of gender equality, racial fairness, caste neutrality or civic order — is not cultural accommodation but cultural imposition. France, especially with its secular republican ethos, is right to insist its public spaces be ‘indiscriminate’. To do otherwise, as critics make of its ‘lax’ immigration policy, would be to erode the very values that define its society. This principle extends beyond a sect’s whims being attended to in Paris. A society that tolerates, say, spitting on pavements because ‘that’s ok back home’, or a vegetarian household coerced to put meat on its menu for its guests, ironically corrodes cultural pluralism. Uniform civil codes — whether in formal laws or informal social standards — exist precisely to prevent such friction. Exceptions can, and should, be made. But only to enrich, not undermine local norms.
Globalisation has made cultures and values intermix. But they cannot be used to slip in culturally-insensitive or offensive behaviour tolerated ‘elsewhere’. ‘Our house, our rules’ may sound blunt. But it ensures that regressive ‘club rules’ aren’t passed off as diversity.
नई पीढ़ी को सक्षम बनाने की चुनौती
जीएन वाजपेयी, ( लेखक सेबी और एलआइसी के पूर्व चेयरमैन हैं )

नई दिल्ली में जंतर-मंतर पर युवा आंदोलनकारियों के धरना-प्रदर्शन और शिक्षा मंत्री के त्यागपत्र के बाद से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार ने जेन-जी को ध्यान में रखते हुए एक के बाद एक कई निर्णय लिए हैं। अगर इन फैसलों पर सही से अमल हो सका तो इस पीढ़ी की तमाम चिंताएं दूर हो सकती हैं। इस दिशा में तत्परता से काम भी शुरू हो चुका है। इसी के साथ इस विरोध-प्रदर्शन में निहित संदेश को समझने के लिए यह पड़ताल करना भी उतना ही आवश्यक है कि किसी प्रायोजक या सुनियोजित एवं संगठित समर्थन के बिना इतनी भारी भीड़ आखिर ‘स्वतः स्फूर्त’ ढंग से क्यों उमड़ पड़ी?
जेन-जी न केवल देश की एक बड़ी आबादी का प्रतिनिधित्व करती है, बल्कि यह पीढ़ी देश की नई आकांक्षाओं का प्रतीक भी है। जेन-जी का बचपन और जवानी इंटरनेट, स्मार्टफोन और इंटरनेट मीडिया के साए में गुजरी है। इनके लिए आभासी और वास्तविक दुनिया के बीच की दीवार बनावटी और बेमानी है। सूचनाओं तक तात्कालिक पहुंच के बल पर यह पीढ़ी दुनिया भर में संबंध जोड़ सकती है, ज्ञान हासिल कर सकती है, स्टार्टअप शुरू कर सकती है और मुख्यधारा के मीडिया या पारंपरिक तंत्र की के बिना भी अपनी बात को राष्ट्रीय मंच पर रख सकती है। जंतर-मंतर का वह जमावड़ा इसी ताकत का प्रत्यक्ष प्रमाण रहा। इन पहलुओं ने एक ऐसी पीढ़ी को आकार दिया है, जो व्यक्तिगत पहचान, प्रामाणिकता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और समावेशिता को सर्वोपरि मानती है।
जेन-जी पीढ़ी किसी सत्ता या व्यवस्था को महज इसलिए स्वीकार करने को तैयार नहीं है कि वह पारंपरिक रूप से चली आ रही है। वह सीधे सवाल करती है कि पुरानी व्यवस्थाएं बदस्तूर क्यों बनी रहें, क्या स्थापित संस्थाएं उनकी आवाज सुन भी रही हैं और क्या मौजूदा तंत्र उन्हें न्यायसंगत एवं समान अवसर उपलब्ध करा पा रहा है? इनकी आकांक्षाएं पिछली पीढ़ियों की तुलना में बुनियादी रूप से भिन्न हैं, जिनके लिए एक सुरक्षित और स्थिर करियर ही जीवन का वास्तविक एवं अंतिम ध्येय हुआ करता था।
पुरानी पीढ़ी की तुलना में वे कोई अर्थपूर्ण अथवा रुचि का काम चाहते हैं। ऐसा काम, जिसमें न केवल आर्थिक आजादी, बल्कि अपनी शर्तों पर काम की सहूलियत के साथ ही कुछ नया रचने की छूट और आत्मविकास की गुंजाइश हो। स्टार्टअप, फ्रीलांसिंग, डिजिटल प्लेटफार्म, कंटेंट क्रिएशन और आधुनिक तकनीकी पेशों ने रोजगार को लेकर उनके सोच के क्षितिज को और व्यापक स्वरूप प्रदान किया है। हालांकि इस सिक्के का दूसरा पहलू उतना ही स्याह है और वह यह कि उत्कृष्ट शिक्षा और ढंग की नौकरियों के लिए आज भी इन्हें बेहद कड़े संघर्ष और प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। शैक्षिक डिग्रियों और आर्थिक अवसरों के बीच बढ़ता अंतर युवाओं में भारी हताशा पैदा कर सकता है। जेन-जी युवा संभवतः सरकारी नौकरियों के अभाव को स्वीकार कर भी ले, किंतु वह पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया, योग्यता-आधारित चयन, भरोसेमंद बुनियादी ढांचा और ऐसे संस्थान अवश्य चाहता है, जो नागरिकों के साथ गरिमापूर्ण व्यवहार करें। वस्तुतः, उनकी सबसे मूल आकांक्षा आत्मसम्मान और गरिमा से जुड़ी है।
यदि पुरानी पीढ़ी ने इंटरनेट के नए सबक सीखे तो जेन-जी एआइ के दौर में पलने वाली पहली पीढ़ी है। एआइ इनके पठन-पाठन, सृजन, संवाद और सवालों के हल का सबसे बड़ा जरिया बनेगी। एक ऐसे डिजिटल मार्गदर्शक के बूते यह पीढ़ी नई भाषाएं और कला-कौशल सीखेगी। दुनिया के किसी भी कोने में बैठकर एक-दूसरे के साथ सहजता से मिलकर काम कर सकेगी। संभावनाओं के इस अपार संसार में उन पर एक भारी नैतिक दायित्व भी होगा। स्पष्ट है कि भविष्य में में मशीनी दक्षता से कहीं ज्यादा अहमियत मानवीय फैसलों, संवेदना, सृजनशीलता, नैतिक मूल्यों, नेतृत्व-कौशल और सच तथा गढ़े गए झूठ के बारीक फर्क को पकड़ने वाली क्षमताओं की होगी।
भारत की युवा आबादी देश की ताकत तभी बन सकती है, जब इस पीढ़ी को हुनर, रोजगार, आत्मसम्मान, अपनी बात कहने का मंच और एक बेहतर भविष्य का भरोसा मिले। इसके लिए शिक्षा को रटने की परिपाटी से मुक्त कर रचनात्मक विवेक, प्रयोगधर्मिता और समस्याओं के व्यावहारिक समाधान की ओर मोड़ना होगा। साथ ही तकनीकी एवं व्यावसायिक पठन-पाठन का उद्योगों से सीधा तालमेल बैठाना, युवाओं को बाजार की मांग के अनुरूप तैयार करना और स्टार्टअप एवं नए अनुसंधानों के दरवाजे हर तबके के लिए खोलना अपरिहार्य होगा।
भारत को एआइ से लैस ऐसे कुशल कार्यबल को तैयार करना होगा जो मशीनों से महज प्रतिस्पर्धा के बजाय उनके साथ मिलकर उत्पादकता और सृजनशीलता से काम करने की सामर्थ्य विकसित कर सके। इसके साथ ही, युवाओं में मानसिक दृढ़ता, शारीरिक तंदुरुस्ती, खेलकूद, सांस्कृतिक अभिरुचि और जीवंत एवं गतिशील सामुदायिक जीवन को बढ़ावा देने पर भी पहले से कहीं अधिक बल देना होगा। सबसे अहम बात यह है कि सरकार को इन युवाओं की आवाज को संवेदनशीलता से सुनना होगा और समयानुकूल समुचित कदम उठाने होंगे। डिजिटल कनेक्टिविटी के इस दौर में सुस्त और अपारदर्शी लालफीताशाही वाली प्रक्रियाओं के प्रति इस पीढ़ी का असंतोष एवं असहिष्णुता और तीखा होता जाएगा। अतः नागरिक विमर्श और विधायी संस्थाओं में उनकी सार्थक और प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करना निरंतर रूप से आवश्यक होगा।
भले ही पीएम मोदी ने सांसदों-विधायकों को नई पीढ़ी से जुड़ने की एक कवायद सौंप दी हो, लेकिन महज बातों पर सुनवाई उनके मनोभावों और आकांक्षाओं की पूर्ति नहीं कर सकती। समय आ गया है कि संसद और विधानसभाओं में नौजवानों को अपनी बात रखने की असली जगह मिलनी चाहिए। इसका मतलब यह नहीं कि पुराने नेतृत्व को एकाएक दरकिनार कर दिया जाए। शासन-प्रशासन में अनुभव, समझ और संयम का महत्व तो सदैव रहेगा, मगर भारत के भविष्य को गढ़ने में भावी पीढ़ी की भूमिका तय होनी ही चाहिए।
Date: 10-09-26
ब्रिक्स को नए आयाम देता भारत
जीएन बाजपेयी , ( रूस में भारत के राजदूत रहे लेखक टेरी में फेलो हैं )
अजय मल्होत्रा। नई दिल्ली में 12 से 13 सितंबर के बीच ब्रिक्स का शिखर सम्मेलन होने जा रहा है। इस साल अपनी स्थापना की 20वीं वर्षगांठ मना रहे इस संगठन की यह शिखर बैठक उस कसौटी को निर्धारित करेगी कि तमाम भिन्नताओं के बावजूद यह मंच सदस्य देशों के बीच जमीनी सहयोग और व्यावहारिक समन्वय का माध्यम बन पाया है या नहीं? न्यूयार्क में 20 सितंबर, 2006 को संयुक्त राष्ट्र की बैठकों के बीच स्थापना के दौरान भले ही इसे लेकर बहुत ज्यादा उम्मीदें नहीं थीं, लेकिन एक नई शुरुआत का रोमांच साफ महसूस हो रहा था। तब से लेकर अब तक इस संगठन का निरंतर विस्तारित हो रहा दायरा वास्तव में चकित करने वाला है।
विश्व की लगभग आधी-आबादी और जीडीपी में करीब 40 प्रतिशत की हिस्सेदारी के साथ ब्रिक्स एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संगठन बन चुका है। हालांकि, इसके सदस्य देशों के बीच न तो कोई साझा भू-राजनीतिक एजेंडा है और न ही मौद्रिक या सुरक्षा से जुड़ा कोई एकीकृत दृष्टिकोण। यहां भारत और चीन की प्रतिद्वंद्विता के बीच उनका सहयोग भी जारी है। जबकि ईरान, सऊदी अरब और यूएई भी अपनी गहरी क्षेत्रीय रंजिशों के बावजूद ब्रिक्स के मंच पर साथ आते हैं। यह आंतरिक विविधता ब्रिक्स को किसी अड़ियल संगठन बनने से रोकने के साथ ही उसे एक लचीले मंच के रूप में और अधिक मजबूती भी प्रदान करती है।
ब्रिक्स की अध्यक्षता के दौरान भारत ने देश के 30 शहरों में 35 अलग-अलग मुद्दों पर 350 से अधिक बैठकें आयोजित कीं। इस क्रम में ‘संपूर्ण भारत’ के साझा संकल्प की झलक दिखाई दी, जिसमें केंद्र से लेकर राज्यों की सरकारें, उद्योग, शोध संस्थान और समाज का हर वर्ग साथ खड़ा दिखा। इनमें कागजी घोषणाओं पर जोर के बजाय ठोस नतीजों को प्राथमिकता दी गई। बैठकों का यह व्यापक दायरा यही दर्शाता है कि भारत ने नए सदस्यों से लैस ब्रिक्स को कहीं अधिक एकजुट, कार्यकुशल और असरदार बनाने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है।
भारत की अध्यक्षता का मूल मंत्र सक्षमता, नवाचार, परस्पर तालमेल और टिकाऊ भविष्य पर केंद्रित है। यह प्रधानमंत्री मोदी के ‘मानवता सर्वोपरि’ की जन-केंद्रित सोच का ही प्रतिबिंब है। इस दौरान भारत ने लाजिस्टिक्स नेटवर्क, बैट्री एवं ऊर्जा स्टोरेज, नए उद्यमों के लिए पूंजी, छोटे उद्योगों की वैश्विक पहुंच, आसान कस्टम प्रक्रिया और जलवायु संकट से निपटने के उपायों पर कार्य को आगे बढ़ाया है। साथ ही, आयुष एवं पारंपरिक चिकित्सा और मानसिक स्वास्थ्य को ब्रिक्स के विमर्श में शामिल कर भारत ने इस मंच को पारंपरिक आर्थिक सहयोग के एजेंडे से इतर नया आयाम प्रदान किया है। इस शिखर सम्मेलन के दौरान स्वाभाविक रूप से सबका ध्यान डालर से इतर विकल्पों पर जाएगा। यह चर्चा किसी मुद्रा के वर्चस्व को समाप्त या सीमित करने से अधिक उस पर निर्भरता घटाने की अधिक है।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आइएमएफ के अनुसार विश्व के विदेशी मुद्रा भंडार में डालर का हिस्सा 1999 के 72 प्रतिशत से घटकर 2026 की शुरुआत में 57.1 प्रतिशत रह गया है। इसके बावजूद डालर के रुतबे पर संदेह नहीं, क्योंकि उसकी जैसी साख, बाजार विस्तार और बेहिसाब नकदी किसी और मुद्रा के पास नहीं है। चीनी युआन पर अब भी बंदिशें हैं और ब्रिक्स की साझा मुद्रा बनाने के लिए जिस आर्थिक सहमति और संप्रभुता के समझौते की जरूरत है, उसके लिए कोई देश तैयार नहीं। इसलिए व्यावहारिक रास्ता यही निकाला जा रहा है कि चुनिंदा द्विपक्षीय व्यापार में अपनी-अपनी मुद्राओं का उपयोग हो, डिजिटल पेमेंट सिस्टम आपस में जुड़ें और स्थानीय स्तर पर कर्ज एवं वित्तीय संसाधन जुटाए जाएं। टैरिफ के जरिये व्यापारिक प्रतिबंधों के विरोध में भी ब्रिक्स देश एकमत हैं। असल में टैरिफ को लेकर मनमानेपन के बीच प्रभावित देश अपने व्यापार, भुगतान प्रणाली और आपूर्ति शृंखलाओं को किसी एक बाजार पर निर्भर बनाए रखने के बजाय उसके विविधीकरण पर अधिक ध्यान देते हैं।
ब्रिक्स से जुड़ी आकांक्षाओं की पूर्ति की एक परीक्षा न्यू डेवलपमेंट बैंक यानी एनडीबी की व्यावहारिकता को लेकर भी होनी है। 2015 से अब तक इसने केवल भारत के लिए ही इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास हेतु करीब 10 अरब डालर तो मंजूर किए हैं, लेकिन अपनी गतिशीलता, वित्तीय आकार और पहुंच के लिहाज से यह आज भी विश्व बैंक या एशियाई विकास बैंक यानी एडीबी से कोसों पीछे है। इस मंच पर भारत की छाप इससे तय होगी कि वह बैंक के कर्ज देने के तौर-तरीकों, परियोजनाओं की तैयारी और अपनी मुद्राओं में फंडिंग को बढ़ावा देने वाले सुधारों को कितनी मजबूती से लागू करा पाता है।
भारत की अध्यक्षता ब्रिक्स को संप्रभु राष्ट्रों के एक स्वतंत्र मंच के रूप में अक्षुण्ण रखते हुए व्यावहारिक सहयोग के एक अधिक प्रभावी माध्यम के तौर पर स्थापित करने की दिशा में अग्रसर है। नई दिल्ली शिखर सम्मेलन की सफलता का आकलन इस आधार पर होना चाहिए कि इसने धरातल पर क्या परिणाम दिए। इस समूह की परिपक्वता की वास्तविक परीक्षा उन पहलुओं पर निर्भर करेगी कि भारत द्वारा आरंभ की गईं पहल अगले वर्ष चीन को अध्यक्षता सौंपे जाने के बाद भी निरंतर रहते हुए स्थायी संस्थागत ढांचे का रूप ले पाती हैं या नहीं?
व्यवस्था पर सवाल
संपादकीय
देश के तमाम छोटे-बड़े शहरों में ढांचागत विकास के साथ-साथ जर्जर और कमजोर हमारतों की समस्या भी भयावह रूप अरि कर रही है। देश के अनेक शहरों में ऐसी इमारतें मौजूद है, जिनकी दीवारों में दरारे हैं, छते कमजोर हो चुकी हैं और सुरक्षा के माकूल बंदोबस्त भी नहीं है। इसके बावजूद इनमें लोग रह रहे है, दुकाने, कार्यालय और अन्य व्यावसायिक गतिविधियां संचालित की जा रही हैं। इन इमारतों की वजह से जब कोई बड़ा हादसा होता है, तो शासन प्रशासन अचानक सक्रिय हो जाता है। जांच के आदेश दिए जाते हैं, कुछ कर्मियों का निलंबन होता है और मुआवजे की घोषणा की जाती है। फिर धीरे-धीरे सब कुछ उस पर लौट आता है और इंतजार किया जाता है किसी दूसरे हादसे का राष्ट्रीय राजधानी के सलानिकेशन में एक छात्रावास की इमारत के ढहने से विद्यार्थियों समेत सात लोगों की मौत की घटना के बाद भी यही सब हो रहा है। दिल्ली सरकार ने एलान किया है कि पेइंग गेस्ट (चीनी) को कानूनी दायरे में लाने के लिए सुरक्षा नीति बनाई जाएगी। साथ ही शहर में अवैध निर्माणों को गिराने के आदेश जारी किए गए हैं।
अहम सवाल यह है कि हादसे के बाद हरकत में आने वाले सरकारी अमले को पहले कुछ दिखाई क्यों नहीं देता है? जर्जर एवं असुरक्षित भवनों के संभावित खतरे का पता लगाने और उनकी नियमित निगरानी करने पर ध्यान क्यों नहीं दिया जाता। बड़े शहरों में तो किसी इमारत का नक्शा पास होने से लेकर उसके बनने तक एक लंबी विभागीय प्रक्रिया होती है मानुसार संरचनात्मक स्थिरता प्रमाण- पत्र और अग्नि सुरक्षा अनापत्ति प्रमाण पत्र समेत कई निर्धारित मानकों की जांच के बाद किसी इमारत के इस्तेमाल की अनुमति दी जाती है। इसके बाद भी भवनों की सुरक्षा एवं मजबूती को लेकर समय-समय पर उनकी जांच करने का प्रावधान है। अगर कोई इमारत जर्जर हालत में पाई जाती है, तो उसे असुरक्षित घोषित कर खाली कराया जाता है। जाहिर है कि इन तमाम नियमों का कड़ाई से पालन नहीं हो रहा है। समस्या केवल भवन मालिकों की लापरवाही तक सीमित नहीं है। स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है। भवनों की नियमित जांच, संरचनात्मक सुरक्षा का आकलन और असुरक्षित इमारतों को समय रहते खाली कराने की प्रभावी व्यवस्था होनी चाहिए ।
सरकार अब पीजी सुरक्षा नीति लागू करने की तैयारी कर रही है। हालांकि पानी में इस तरह के प्रवास वर्ष 1993 से जारी है, लेकिन अभी तक ठोस नियम जमीनी स्तर पर लागू नहीं हो पाए हैं। ऐसे में जरूरत सिर्फ नीतियां या कानून बनाने की नहीं हैं, बल्कि उनका प्रभावी असर दिखे, वह सुनिश्चित करना भी जरूरी है। पीजी में रहने वालों से रकम किराए में वसूली जाती है, लेकिन उनकी सुरक्षा को हाशिए पर डाल दिया जाता है। खासकर विद्यार्थियों को इस तरह की जोखिम भरी परिस्थितियों में इसलिए रहना पड़ता है, क्योंकि शिक्षा संस्थान उन्हें अपने स्तर पर छात्रवास उपलब्ध कराने में विफल रहते है। अगर दिल्ली विश्वविद्यालय की बात की जाए तो इससे संबद्ध 77 में से 57 कालेजों में छावास की सुविधा नहीं है सवाल सिर्फ किसी एक शहर का नहीं है, बल्कि देश भर में उन हजारों जर्जर इमारतों का है जिनका नियमों की परवाह किए बगैर व्यापक इस्तेमाल हो रहा है। यही वजह है कि सर्वोच्च न्यायालय ने बीते मंगलवार को स्पष्ट तौर पर कहा कि यह देश भर में भवनों की सुरक्षा जांच के मसले पर विचार करेगा।
भारत रूस की पारखी हुई दोस्ती
रहीस सिंह,( वैश्विक मामलों के वरिष्ठ अध्येता )
भारत ब्रिक्स सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है, जिसके अपने निहितार्थ हैं और संदेश भी, लेकिन उससे भी अधिक मायने हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मुलाकात के, जो ब्रिक्स की बैठक से एक दिन पहले ही हो रही है। यह भेंट क्रेमलिन की इस सोच के साथ हो रही है कि रूस, भारत को अपना रणनीतिक साझेदार मानता है और दोनों देशों के रिश्ते उसके लिए बेहद अहम हैं।
अहम इसलिए, क्योंकि पुतिन उस दौर में भारत की यात्रा पर आ रहे हैं, जब रूस वैश्विक अलगाव एवं पश्चिमी दुनिया के वैचारिक-आर्थिक हमलों से गुजर रहा है और पूरी दुनिया की निगाहें पुतिन पर आ ठिठकी हैं। पुतिन के लिए यह तय करने का वक्त भी हो सकता है कि पुरानी और नई दोस्ती को कैसे देखें और किसे चुनें? कुछ विश्लेषक उन्हें स्टालिन के सर्वसत्तावादी चश्मे से देखते हैं, जिससे पुतिन में उन्हें डरना कम, डराना अधिक दिखता है। वैसे, इन सबके बीच अच्छी बात यह है कि ऐसे वक्त में भी पुतिन दुनिया की अपेक्षा भारत की ओर देख रहे हैं। यह भारत के लिए मॉस्को की तरफ से मिलने वाला ‘डिप्लोमैटिक डिवीडेंड’ है, जो नई दिल्ली के लिए स्थितियों को अनुकूल बनाता है। तो क्या यह कहा जा सकता है कि इन स्थितियों में पुतिन की भारत यात्रा रणनीतिक, सैन्य, आर्थिक और भू-राजनीतिक आयाम की दृष्टि से बेहद संवेदनशील है?
चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों और संवेदनशील समय में होने जा रही मोदी-पुतिन बैठक में कुछ अहम मुद्दे शामिल हो सकते हैं। रक्षा, परमाणु ऊर्जा, ईंधन, व्यापार और भू-राजनीति से जुड़े द्विपक्षीय मुद्दों के अलावा संभावना यह भी है कि इसमें यूक्रेन युद्ध और फारस की खाड़ी में जारी तनाव जैसे मुद्दे भी होंगे। ये दोनों संघर्ष भू-राजनीति और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गहरा असर डाल रहे हैं, जिससे भारत भी अछूता नहीं है। इसलिए इन पर चर्चा भी होनी चाहिए। ध्यान देने वाली बात यह है कि पुतिन खाड़ी में कायम तनाव से प्रभावित वैश्विक अर्थव्यवस्था पर तो मुखरता से बोलते हैं, मगर यूक्रेन के मामले में वह चुप्पी साध लेते हैं। यह देखा गया है कि राष्ट्रपति पुतिन युक्रेन युद्ध को रोकने की सलाह या ऐसे किसी वक्तव्य पर सहज नहीं होते। ऐसे में, यूक्रेन युद्ध को लेकर किसी शांति पहल की वकालत करने के बजाय भारत को कूटनीतिक सहयोग को मजबूत करने वाले मुद्दों पर आगे बढ़ना चाहिए।इस बैठक में द्विपक्षीय रक्षा सहयोग एक बड़ा मुद्दा हो सकता है। जैसा कि क्रेमलिन के प्रवक्ता की तरफ से बताया गया है कि रूस द्वारा पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ तकनीक (जिसे रडार न पकड़ सकें) वाला जेट फाइटर सुखोई 57 (एसयू-57) भारत को देना रूसी एजेंडे में शामिल है। इसके साथ ही बैठक में द्विपक्षीय रक्षा सहयोग एक अहम मुद्दा हो सकता है।
पुतिन की पिछली भारत यात्रा दिसंबर 2025 में हुई थी। नौ महीने में यह उनकी दूसरी भारत यात्रा है, इसलिए भारत-रूस मैत्री और मोदी-पुतिन केमिस्ट्री को समझने की आवश्यकता होगी। हालांकि, यह मैत्री नई नहीं है, पिछले 55 वर्षों से चली आ रही है। यद्यपि बीच में यह कुछ गड़बड़ाई और अभी भी इसे संभाले रखने की चुनौती है। ऐसा इसलिए, क्योंकि इसका असर रक्षा, भू-रणनीति और ऊर्जा रणनीति पर पड़ सकता है।
कूटनीति में ‘फॉरवर्ड’, ‘बैलेंसिंग’, ‘रीसेट’ और ‘रीबैलेंसिंग’ एक चक्रीय क्रम में चलता रहता है, इसलिए ठहरने के बजाय आगे बढ़ने की जरूरत होती है और भारत और रूस इन मामलों को लेकर गंभीर हैं। यही कारण है कि रूस ने अमेरिका के विरोध के बावजूद भारत के साथ एस 400 डील की और भारत ने यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद अमेरिका और यूरोपीय देशों द्वारा रूस पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद भी उससे तेल खरीद जारी रखी। हालांकि, ट्रंप की टैरिफ नीतियों के चलते यह प्रक्रिया कुछ हद तक प्रभावित हुई, जैसा कि दुनिया के अन्य देशों के साथ भी हुआ।भारत और रूस को नई वैश्विक परिस्थितियों में साझेदारी के अन्योन्याश्रित मॉडल को फिर से परिभाषित करने की आवश्यकता है। ध्यान रहे, आज भी भारत के लगभग 55 से 60 प्रतिशत हथियारों और प्रौद्योगिकी का रूस से ही सरोकार है, जिसमें ब्रह्मोस मिसाइल से लेकर एस-400 एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम तक शामिल हैं। ये हमारी सुरक्षा क्षमता बढ़ाते हैं। भारत और रूस के ऊर्जा संबंध (विशेषकर कच्चे तेल की आपूर्ति) भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए ‘बूस्टर’ का काम कर सकते हैं। दोनों देश रुपया-रूबल आधारित व्यापार, लॉजिस्टिक्स कॉरिडोर और एनर्जी परियोजनाओं (रोसनेफ्ट, सखालिन) की ओर कदम बढ़ाकर नए कूटनीतिक अध्याय लिख सकते हैं।
भू-राजनीतिक दृष्टि से नई दिल्ली-मॉस्को इस समय बहुध्रुवीय विश्व को मजबूत करके वाशिंगटन धुरी को संतुलित करने का काम कर सकते हैं। भारत और रूस की दोस्ती अभी भी चल रही है, इसका अहम कारण यह है कि नई दिल्ली मानती है कि पिछले कुछ दशकों में वैश्विक स्तर पर कई आधारभूत बदलाव आए, कई तरह के भू-राजनीतिक समीकरण उभरे, किंतु इनके बावजूद भारत-रूस मित्रता अडिग रही है।
सोवियत युग के समाप्त होने के बाद भारत-रूस मैत्री में कुछ उतार-चढ़ाव आए, क्योंकि नई दिल्ली मॉस्को के बजाय वाशिंगटन की ओर देखने लगी थी। कारण था- पूंजीवाद के नए युग का आरंभ और उसका नेतृत्व वाशिंगटन द्वारा किया जाना। भारत ने भी नई जरूरतों के अनुरूप स्वयं को बदलने की कोशिश की, लेकिन दोनों देशों के बीच स्थापित रक्षा और रणनीति के रिश्तों में कोई बड़ी दरार नहीं आ पाई। आज दोनों देश ‘2+2 डिप्लोमैसी’ के जरिये आगे बढ़ रहे हैं और नई बुनियाद रखने की कोशिश में हैं। प्रधानमंत्री मोदी पहले ही कह चुके हैं कि दो नए दोस्तों के मुकाबले एक पुराना दोस्त ज्यादा अच्छा है।
भारत और रूस के रिश्तों की उम्र 55 साल के आसपास हो गई है, यानी पूरी तरफ से परिपक्व, इसलिए ये दोनों न केवल द्विपक्षीय जरूरतों, बल्कि तमाम अड़चनों के बावजूद भावी विश्व-व्यवस्था के अनुरूप आकार ग्रहण अवश्य करेंगे। भारत बहुत से लोकाचारों और संकोचों को तोड़ते हुए ‘सॉफ्ट पावर ऑफ सिविलाइजेशन’ की दावेदारी के लिए तैयार है। यह बात और है कि सिर पर लाल टोपी रूसी फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी की प्रतिध्वनि अब वैसी नहीं है।
Date: 10-09-26
पश्चिम से उत्तर भारत तक आसान हुई माल ढुलाई
विजय दत्त,( सेवानिवृत्त अतिरिक्त सदस्य, रेलवे बोर्ड )

दो दशक पुराना सपना पूरा हुआ है। 2,843 किलोमीटर लंबे समर्पित माल ढुलाई गलियारे (डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर) पर मालगाड़ियां अब दौड़ने लगी हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने वडोदरा दौरे में वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (डब्ल्यूडीएफसी) के आखिरी करीब 326 किलोमीटर हिस्से को राष्ट्र के नाम किया, जिसके बाद माल ढुलाई को समर्पित ईस्टर्न और वेस्टर्न, यानी पूर्वी और पश्चिमी, दोनों गलियारों पर सेवाएं पूरी तरह से शुरू हो गईं। ईस्टर्न से जहां कोयला और अयस्कों आदि की ढुलाई हो रही है, वहीं वेस्टर्न से सामानों से लदे कंटेनर ढोए जाएंगे।
‘वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर’ के पूरी तरह शुरू हो जाने से कुछ अन्य उपलब्धियां भी भारत के खाते में जुड़ गई हैं। मिसाल के लिए, हम दुनिया के इकलौते देश बन गए हैं, जिसके पास पूरी तरह बिजली से चलने वाला ‘डबल-स्टैक कंटेनर’ फ्रेट कॉरिडोर का नेटवर्क है। यानी, एक के ऊपर दूसरा कंटेनर लादकर माल ढुलाई की जा सकेगी। इतना ही नहीं, दुनिया भर में पारंपरिक ओवरहेड तार लगभग 5.5 मीटर पर होते हैं, लेकिन डब्ल्यूडीएफसी में तारों की ऊंचाई करीब 6.4 मीटर है, जिससे एक ही वैगन पर दो या कम ऊंचाई वाले तीन कंटेनरों को लादना संभव हो सकेगा। कंटेनरों के निर्माण में भी खास ध्यान रखा गया है, ताकि तूफान जैसी विपदाएं इसका रास्ता नहीं रोक सकें।
कहने को यह कॉरिडोर नवी मुंबई के जवाहरलाल नेहरू पोर्ट (जेएनपीटी) को एनसीआर के दादरी से जोड़ता है, लेकिन इससे पिपावाव, मुंद्रा, कांडला जैसे प्रमुख बंदरगाहों पर उतरने वाले सामान को उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब जैसे पश्चिम और उत्तर भारत के औद्योगिक शहरों में पहुंचाना आसान होगा। इसके लिए दादरी, कोटा, वडोदरा जैसी तमाम जगहों पर बड़े-बड़े कंटेनर डिपो बनाए गए हैं, जो सड़क मार्ग से जुड़े हुए हैं। इससे ‘प्वाइंट-टु-प्वाइंट कनेक्टिविटी’ संभव हो सकेगी। हालांकि, इस गलियारे से सिर्फ राज्यों की अर्थव्यवस्था को फायदा नहीं होगा, बल्कि राष्ट्र की आर्थिकी पर भी इसका सकारात्मक असर पड़ेगा। माना जा रहा है कि इससे भारत की कुल लॉजिस्टिक लागत, जो अभी जीडीपी की 14 फीसदी है, घटकर सात प्रतिशत पर आ सकती है, जिससे वैश्विक बाजार में भारतीय सामान को प्रतिस्पर्द्धा करने में सहूलियत होगी।पर्यावरण के लिहाज से भी यह कॉरिडोर काफी काम का साबित होगा। तथ्य यही है कि बिजली से चलने वाली ट्रेनें कार्बन उत्सर्जन को बिल्कुल शून्य कर देती हैं। माना जा रहा है कि एक डबल-स्टैक मालगाड़ी में 250 ट्रकों के बराबर माल ढोया जा सकेगा। इसका अर्थ है कि इतने ट्रकों से पर्यावरण को जो नुकसान होता, वह नहीं होगा। वैसे भी, ‘कॉप-26’ की बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत को वर्ष 2070 तक कार्बन न्यूट्रल (शून्य उत्सर्जक) बनाने का लक्ष्य रखा है।
फ्रेट कॉरिडोर पर चलने वाली गाड़ियों की तेज गति भी काफी काम की साबित होंगी। असल में, सामान्य मालगाड़ियां आमतौर पर 60 से 65 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलती हैं। इसी कारण ‘मेन लाइन’ पर पीछे चलने वाली यात्री गाड़ियों की गति पर इसका नकारात्मक असर पड़ता था। इस मामले में डब्ल्यूडीएफसी से दोतरफा फायदा होगा। एक, इस पर मालगाड़ियां 100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से गुजर सकेंगी। चूंकि यह समर्पित गलियारा है, इसलिए उनको यहां ‘क्लीयरेंस’ भी आसानी से मिल सकेगा, जिससे सामान की ढुलाई तेज हो सकेगी। दूसरा फायदा यह होगा कि यदि मालगाड़ी को मेन लाइन पर लाना भी पड़े, तो उसकी गति यात्री गाड़ियों को प्रभावित नहीं करेगी। चूंकि सभी गाड़ियों की गति कमोबेश समान होगी, इसलिए एक ही पटरी पर कई गाड़ियों को दौड़ाना आसान होगा।
साफ है, माल ढुलाई के लिहाज से यह एक ऐसा कदम है, जिसका दूरगामी असर पड़ेगा। अच्छी बात यह भी है कि मालगाड़ियों के अब ईस्टर्न और वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर से गुजरने के कारण मेन लाइन पर यात्री गाड़ियों को अधिक वक्त मिल सकेगा। इससे कई नई ट्रेन चलाने के रास्ते खुल सकेंगे। इससे अंतत: रेलयात्रियों को ही फायदा होगा।