क्या भारत में स्वास्थ्य कर लगाया जाना चाहिए?
To Download Click Here.

भारत में बढ़ते मोटापे और आहार से जुड़े गैर संक्रामक रोगों की समस्या बढ़ती जा रही है। इसका संबंध केवल व्यक्तिगत चुनाव से नहीं, बल्कि सार्वजनिक नीति और राजकोषीय नीति से भी है।
कुछ बिंदु –
- मूल मुद्दा –
भारत लंबे समय तक कुपोषण से जूझता रहा है। इनमें बौनापन, दुर्बलता और माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की कमी जैसी समस्याएँ आज भी मौजूद हैं। लेकिन अब भारत को कुपोषण की दो तरफा मार का सामना करना पड़ रहा है। एक तरफ कुपोषण है, तो दूसरी तरफ मोटापा है। साथ में डायबीटीज, उच्च रक्तचाप और हृदय रोग जैसे गैर संक्रामक रोग बढ़ते जा रहे हैं।
अर्थात भारत की पोषण नीति को केवल “कम खाना” नहीं, बल्कि “सही खाना” सुनिश्चित करने की दिशा में बदलना होगा।
- अतिपोषण क्यों गंभीर समस्या है?
अतिपोषण का अर्थ केवल अधिक भोजन करना नहीं है। आज की समस्या मुख्यतः ऐसे खाने की बढ़ती खपत से जुड़ी है, जिनमें अत्यधिक वसा, शर्करा या नमक होता है।
यदि अस्वास्थकर भोजन सस्ता हो, आसानी से उपलब्ध हो, बच्चों को आकर्षक विज्ञापन दिखाए जाएँ, पैकेजिंग आकर्षक हो,तो उपभोक्ता का विकल्प वाला वातावरण ही अस्वास्थकर बन जाता है। इसलिए सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
प्रमुख उपाय –
- उत्पाद के पैकेट पर पोषण की सही जानकारी होनी चाहिए।
- स्वास्थ्य कर- अत्यधिक वसा, शर्करा और नमक वाले उत्पादों पर अतिरिक्त कर लगाया जाए।
- बच्चों के लिए खाद्य वातावरण सुरक्षित बनाया जाना चाहिए। इसके लिए—
- स्कूलों में स्वास्थ्य के लिए हानिकारक खाद्य पदार्थों की उपलब्धता नियंत्रित की जानी चाहिए।
- स्कूलों की कैंटीन में स्वास्थ्यवर्धक खाने के विकल्प होने चाहिए।
- शिशु आहार में अत्यधिक शर्करा को रोका जाना चाहिए।
यह सुरक्षित स्वास्थ्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों से क्या सीख मिलती है?
- कोलंबिया में पैकेज्ड फूड पर अतिरिक्त कर लगाया गया और कर की दर को धीरे-धीरे बढ़ाया गया।
- अन्य देशों ने भी अस्वास्थ्यकर खाद्य सामग्री पर कर नीति अपनाई है। यह दिखाता है कि स्वास्थ्य-कर कोई बिल्कुल नई अवधारणा नहीं है। लेकिन भारत में इसे लागू करते समय ध्यान रखना होगा कि—
- गरीब परिवारों पर असंगत बोझ न पड़े,
- छोटे व्यापार को अनावश्यक नुकसान न पहुँचे,
- कर केवल पैकेज्ड फूड तक सीमित न रह जाए,
- पोषक विकल्पों की उपलब्धता भी सुनिश्चित की जाए।
स्वास्थ्य कर की सीमाएँ –
- प्रतिगामी कर – गरीब परिवार अपनी आय का बड़ा हिस्सा भोजन पर खर्च करते हैं। इसलिए उपभोग कर उन पर अतिरिक्त बोझ डाल सकता है।
- अस्पष्ट भाषा – किस खाद्य पदार्थ को “अस्वास्थ्यकर” माना जाए? क्या हर प्रसंस्कृत खाना अस्वास्थ्यकर है? नहीं। इसलिए वैज्ञानिक रूप से तय किया गया एफएसएसएआई (FSSAI) मानक जरूरी है।
- खाद्य उत्पाद बनाने वाले उद्योगों का विरोध सहना पड़ सकता है।
- उपभोक्ताओं को विकल्प – यदि एक अस्वास्थ्यकर उत्पाद महँगा होता है, तो उपभोक्ता किसी दूसरे समान अस्वास्थ्यकर उत्पाद की ओर जा सकता है।
- केवल कर से बात नहीं बनेगी – यदि स्वास्थ्यवर्धक खाना महँगा और अस्वास्थ्यकर खाना सस्ता रहता है, तो केवल कर लगाने से व्यवहार में सीमित परिवर्तन आएगा।
अतः नियमित निगरानी रखना जरूरी है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि स्वास्थ्यवर्धक खान-पान को केवल उपभोक्ता की जिम्मेदारी न बनाया जाए, बल्कि स्वास्थ्यवर्धक विकल्प को आसान और सस्ता भी बनाया जाए।
भारत को अब केवल “भूख से लड़ने” वाली पोषण नीति से आगे बढ़कर ऐसी खाद्य नीति बनानी होगी, जो नागरिकों को अस्वास्थ्यकर खानपान से बचाए।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 01/08/26